सोमवार, 3 अप्रैल 2017

भाग-5 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.... Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-5 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                   
इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र (https://vikasnarda.blogspot.in/2017/04/1-lamdal-yatra-via-gaj-pass-4470mt.html?m=1) स्पर्श करें।

                                    मैं और मेरा भाई ऋषभ, 24अगस्त2015 के दिन भगवान शिव की पवित्र झील लमडल की तरफ पैदल अग्रसर हो रहे थे......... जैसा कि मैने पिछली किश्त में आपको बताया था, कि... रावा गांव से आगे हम दोनों जंगल की तरफ खुले में खड़े बारिश का सामना कर रहे थे, खैर कुछ समय के बाद बारिश कम हुई और हम दोनों फिर चल दिये आगे उस रास्ते की ओर....... जो रास्ता हमे अभी दो घंटे बाद जंगल में मिले एक आदमी ने बताया, परन्तु मुश्किल से बीस मिनट ही चल पाए कि तेज बारिश फिर से शुरू और अब तो बारिश के साथ बड़े-बड़े ओले गिरने लगे......खुशकिस्मती से हमे पगडंडी के साथ ही एक जगह मिल गई यहां मैं और ऋषभ बस खड़े हो सकते थे.......
                       खड़े-खड़े मेरा ध्यान मेरे पैरों की तरफ गया तो देखा कि.... मेरे पैरों की अगुलियां खून से लथपथ थी, सैंडल खोल कर देखा तो "जोंकें" पैरों से चिपक खून चूस रही थी........ दोपहर के तीन बज चुके थे, भूख ने भी अब सताना शुरू कर दिया.......और बारिश कहां थम रही थी,सोे जैसे-तैसे वहीं बैठ कर सिर पर छाता ले खाना खोला........ मेरी श्रीमती जी ने हमे दो दिन के लिए भोजन साथ दे दिया था..... आलू की सूखी सब्जी, भरवा करेले साथ में परोंठियां.... ऐसे व इन हालतों में भोजन का स्वाद कई गुणा बढ़ जाता है, दोस्तो......
                        बारिश थमने के इंतज़ार में वहीं रुके एक घंटा हो चुका था, ओले गिरने तो कब के बंद हो चुके थे.... पर बारिश पूरी तरह से रुक नही रही थी, मैने ऋषभ को कहा कि इसी प्रकार यहीं जंगल में खड़े रहे तो, हम अपने निश्चित स्थान पर नही पहुंच पाएंगें और यहीं कहीं जंगल में ही रात काटनी पड़ेगी...... और हमने बारिश में ही फिर से चलना शुरू कर दिया, अपने पहले दिन के पड़ाव "बग्गा" की तरफ......
                        आगे जंगल बहुत घना होता जा रहा था, बारिश भी थम चुकी थी और आसमान से बादल ऐसे साफ हो गया जैसा "गधे के सिर से सींग".......पगड़़ंडी पर दोनों ओर बिच्छू बूटी का ही साम्राज्य था और बार-बार हम दोनों को यह डस रही थी, मैने अपने पहने हुए कपडो के चयन में बहुत बड़ी गलती कर दी थी, जो भी मैने अपनी सुविधा के लिए शौटस् कपडे और पैरों में सैंडल डाल रखे थे, वही सब मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर रहे थे...... मुझ पर दोनों तरफ से हमला हो रहा था, "बिच्छू बूटी और जोंकें"....जबकि ऋषभ ने पूरे कपडे और बूट डाल रखे थे, जो कि उसका काफी हद तक भलिभांति बचाव कर रहे थे............
                       जो व्यक्ति हमे रास्ते में मिला था, उसने बताया था कि अाप इन बिजली के खम्बों के साथ-साथ ही चलते रहना..... यह बिजली की लाईन ऊपर गज नदी पर बन रही एक विद्युत परियोजना तक जाती है, चाहे तो आज रात आप लोग वहां भी रुक सकते हो.... बस उन बिजली के खम्बों और पगडंडी पर हम बढ़ते जा रहे थे........मैं हर हालत में आज बग्गा पहुंचना चाहता था पर यह भी ज्ञात ना था कि हमारी आज की मंजिल अभी कितनी दूर और कहां पर हैं, इसलिए मैने अब अपने चलने की रफ्तार तेज कर दी....... जिस वजह से ऋषभ कई बार पीछे छूट जाता, परन्तु मैं ऋषभ की तारीफ़ करता हूँ कि यह उसके जीवन का पहला ही ट्रैक था, बगैर किसी अनुभव के वह मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश कर रहा था..........
                       अब, जंगल इतना घना होना शुरू हो गया कि दिन में अंधेरा सा लगने लगा....ऋषभ पीछे चल रहा था और मैं उससे कई मीटर आगे, बार-बार जंगल में ऊंची आवाज से ऋषभ को सम्बोधन कर जंगल में अपनी मौजूदगी की खबर देता....और ऋषभ की तरफ से उसकी आवाज या जवाब का इंतजार करता..... फिर मैने ऋषभ को मुंह से बजाने वाली सीटी थमाई और कहा कि यदि मैं चलते-चलते तुम्हारी आंखों से ओझल हो जाऊ...... तुम हर दो मिनट के बाद सीटी बजा कर मुझे बता देना, कि मैं पीछे आ रहा हूँ........ मैं ऊंची आवाज़ में पुराने हिन्दी गाने गाता हुआ आगे बढ़ रहा था........... ताकि कोई भी जंगली जानवर खास कर भालू से हमारा एकाएक आमना-सामना ना हो जाए और जंगल में हमारी मौजूदगी देख वह पहले ही हमारे रास्ते से पीछे हट जाए........
                                                   
                                                      ............................(क्रमश:)
रावा गांव से आगे बढ़ने पर हमें दूर पहाड पर मक्लोडगंज के साथ नड्डी गांव के एक मशहूर स्कूल की इमारतें नज़र आ रही थी... 

ग्लेशियर से निकले पानी की स्वच्छता का मुकाबला कोई भी आर.औ.मशीन नही कर सकती.... दोस्तों 

बारिश और सिर पर बज रहे दनादन ओलों की मार से बचने के लिए यहाँ शरण ली.... 

वहीं खड़े-खड़े मैने दो अलग-अलग समय पर एक से खींचें..... अब आप अंदाजा लगाये कि मौसम कैसे-कैसे रंग, पल-पल दिखा रहा था... 
श्रीमती जी द्वारा साथ दिये अति स्वादिष्ट भोजन का आंनद... और अनुभव तमाम उमर याद रहेगा, कि छाता सिर पर ले बारिश में इस आलू की सब्जी के साथ परोंठियां खाई थी..... 
मेरे पैरों पर चिपक कर खून की पार्टी मना रही... "जोंकें"

आखिर... बारिश में ही आगे बढ़ना मुनासिब समझा.... 

ऋषभ के लिए यह सब एक स्वप्न सा लग रहा था..... 

गज नदी पर बना एक पैदल पुल.... 

मैं मुसीबतों में भी आगे बढ़ने की हिम्मत रखना जानता हूँ..... दोस्तों

( अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

4 टिप्‍पणियां: