रविवार, 9 अप्रैल 2017

भाग-23 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-23 पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास(4470मीटर)27अगस्त2015
                       
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                                         सुबह के स्वादिष्ट भोजन के बाद हम अपना साजो-सामान इक्ट्ठा करने में जुट गए और चरण सिंह से वापस जाने वाले रास्ते के विषय में पूछताछ करने की अभी कोशिश ही की थी.... तो चरण सिंह बोले, "आप क्या सोचते हो पंडित जी.... कि मैं आपको अकेले ही यहां से वापस भेज दूगाँ,  मैं आपको नीचे तक छोड़ कर आऊगां और मुझे आप को अपना घर-परिवार व अपना गांव रावा भी तो अभी दिखाना बाकी है, जनाब............. उनकी यह बात सुन कर मेरा खून एक सेर और बढ़ गया, क्योंकि मुझे वापसी का रास्ता ही नही मालूम था जो कि एक बहुत घने जंगल से हो कर गुज़रता है, जिसमें पहले दिन ऊपर जाते समय हम खो गए थे.... और करिश्माई रुप से प्रकट हुए चरण सिंह के साथ रात के अंधेरे में उस जंगल को पार कर इनके डेेरे पर पहुंचे थे......
                             सो अब चलने की तैयारी........ और उपहारों का आदान-प्रदान शुरू हो गया,  मुझे उपहार स्वरूप दी जा रही हर सब्जी को चरण सिंह एक छिलके जैसी चीज़ से बांध रहे थे, तो मैने उनसे उस प्राकृतिक रस्सी से रेशों के बारे में पूछा, तो जवाब मिला यह "निग्गी" नामक एक पौधे की छाल है.... जिससे मैं जंगल से इक्ट्ठा किये लिंगडूू की गुच्छियां बांध कर धर्मशाला शहर में बेच कर कुछ थोड़ा बहुत कमा लेता हूँ..... यह निग्गी की छाल इतनी मजबूत है कि प्राचीन समय में चम्बा के राजा द्वारा इससे रस्सियां बनवा कर रावी दरिया के ऊपर पुल लटकाये जाते थे..... मैने भी तजुरबे के लिए निग्गी के एक रेशे को अपनो दोनों हाथों से खींच कर तोड़ना चाहा...परन्तु मैं उस पतली सी छाल को बीच से तोड़ने में असफल रहा..................... मेरे पास जो भी कोस्मेटिक का सामान, खाने-पीने का सामान, सैल इत्यादि सब कुछ चरण सिंह को उपहार में दे दिया..... और एक नन्हा सा पतीला जो मैने इस ट्रैकिंग पर आने के लिए नया ही खरीदा था....यह कहते हुए चरण सिंह को उपहार में दिया कि जब भी आप इस पतीले को देखोगे भाई, आपको मेरी याद जरूर आएगी.... तो चरण सिंह ने बड़ी चतुराई से कहा कि भाई जी, याद तो तब आएगी..जब मैं आपको भुलूंगा, आपका व्यक्तित्व भुलाने वाला नही है पंडित जी....... मैं उनके मुख से अपनी प्रशंसा सुन कर हंस पड़ा, और मेरे पास जितनी भी दवाइयां थी, वे सब मैने उनके परिवार में बांट दी............
                             जाने से पहले हम उनके पारिवारिक सदस्यों से विदा लेने हेतू मिलने लगे, तो घर की महिलाओं ने ऋषभ से कहा, तू तो आज जा रहा है ऋषभ.... और हमने सोचा था कि तुझे आज बिच्छू बूटी का साग बना कर खिलाऐंगे... मैने उन सब का धन्यवाद किया कि आपने मेरे पीछे ऋषभ का बहुत ध्यान रखा और उनको अपने घर पंजाब आने का न्यौता दिया, तो वे बोली... हमारा कम ही कहीं बाहर दूर आना-जाना हो पाता है, बस यहीं इन पहाडों पर हमारा जीवन गुज़र जाता है.... तो मैने एकाएक उन से पूछा कि आपमें से किस-किस ने दिल्ली देखा है तो जवाब मिला "नही".............चरण सिंह की बुजुर्ग चाची जी से मैने पूछा कि आपने अपने जीवन में कौन-कौन सा शहर देखा है तो वह बोली..." बेटा मैं तो पूरे जीवन में कभी कांगड़े से आगे नही जा पाई".....  इस जवाब ने मुझे झिंझोर कर रख दिया क्योंकि कांगड़ा शहर वहां से सिर्फ 35किलोमीटर की दूरी पर था........और लगे हाथों मैने चरण सिंह से भी पूछ डाला कि राणा जी आप अपने गांव से कितनी दूर तक गए हो, तो चरण सिंह ने कहा कि मैं सिर्फ एक बार अपनी पत्नी के साथ अपनेे पिता जी के अस्थि विसर्जन करने हेतू हरिद्वार गया था और वहां मेरी जेब काट ली गई, बहुत मुश्किल पेश आई थी वहां उस समय जेब कट जाने के बाद..... भाई जी, हमे तो हमारा यह ही ज़हान अच्छा लगता है और हम इसी माहौल में रचे बसे हुए हैं.... और हां, हर साल जब गज पर्वत पर बर्फ पड़ जाती है तो सर्दियों में अपनी भेड़े लेकर पठानकोट पंजाब के जंगलों में चार-पांच महीनो के लिए जरूर जाता हूँ, बस यही हमारा जीवन है, इसमे ही हम रमे हुए हैं.........
                            उन लोग का हमारे प्रति स्नेह व सत्कार देखकर विदाई का समय मुझ जैसे भावुक आदमी के लिए बहुत मुश्किल खड़ी कर रहा था, क्योंकि मेरी आँखों में आँसू भर रहे थे,  सो उन्हें छिपाने के लिए मैने जल्दी से अपना काला चश्मा निकाल लगा लिया और बगैर कुछ बोले चरण सिंह की चाची जी के चरण स्पर्श कर,  पुन: सब को हाथ जोड़ कर वापसी की राह की ओर चल दिया..... मेरे पीछे ऋषभ और चरण सिंह, परन्तु यह क्या...... चरण सिंह एक बहुत भारी-भरकम पेड़ का छिला हुआ लम्बा सा तना, अपने कंधे पर लाद हमारे पीछे चल दिये, मैने फिर पूछा..... यह क्या राणा जी, तो वे बोले यह लकड़ी मैं अपने घर पर ले जा रहा हूँ,  क्योंकि मैने वहां पशुओं के लिए एक छप्पर बनाना है, इसलिए धीरे-धीरे सब सामान इक्ट्ठा कर रहा हूँ...... मैने हैरानी से कहा, " कमाल है राणा जी, आपका घर यहां से ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर है, और आप यह वजन अपने कंधे पर उठाकर इतना सफर तय करेंगे... सच में आपका छोटा नाम आपके पिता जी ने सही ही रखा है ............." पक्का "
       तो चरण सिंह ने तर्क दिया, कि मेरा इस भार को इतनी दूर पैदल ले जाने का एक मक़सद और भी है कि मैं अपने बच्चों के लिए यह उदारहणें पेश करता रहूं, कि देखो हमारे पिता ने यह सब लकड़ी के शहतीर इतने दूर से अपने कंधे पर लाद यहां घर तक पहुंचायें है,  हमे भी अपने पिता जैसे ही मजबूत व मेहनती बनना है.....मैं चरण सिंह की इस उत्तम सोच पर बस इतना ही कह सका........ " सुभान अल्लाह "
                              हमने अपनी पानी की बोतले खाली ही रख ली थी, क्योंकि चरण सिंह ने कहा था कि यहां से दो किलोमीटर चलने के बाद एक जगह आयेगी, जिसे हम   "गुड़गुड़ाता पानी या अंग्रेज़ का पानी " नाम से सम्बोधन करते हैं,  वहां भूमिगत रुप से गुड़गुड़ की आवाज़ कर जल जमीन से बाहर निकल रहा है........वह स्थान पगडंडी के साथ ही था, एक गड्ढे नुमा गुफा के अंत में कुछ मात्रा में पानी गुड़गुड़ की आवाज़ के साथ भूमि से निकल रहा था.......... चरण सिंह ने बताया कि इस जल में औषधीय गुण है, जिससे कई बीमारियों को ठीक किया जा सकता है,  और यह जल बाहर बह रही गज नदी व अन्य झरनों के जल से बहुत ज्यादा ठंडा व शुद्ध है...... दोस्तों मैने देखा कि.... वह जल ठंडा इतना था कि बोतल में भरते ही बोतल के बाहर वाष्पीकरण की बूँदे उत्पन्न हो गई और शुद्ध इतना कि पानी का स्वाद कड़वा था......... चरण सिंह ने कहा कि इस गुड़गुड़ाते जल स्रोत की खोज आज़ादी से पहले एक अंग्रेज़ अधिकारी ने की थी, इसलिए इसे हम लोग इस जल स्रोत को अंग्रेज़ का पानी  कहने लगे,  हमारे यहां जब बूढ़े-बुजुर्ग   जब मरणशय्या पर हो तो,  गगांजल की बजाय इस जल स्रोत के जल की मांग की जाती है......... भाई जी, आप यह जल अपने घर ले जाकर अपने सब घरवालो को पिलाना............
                           मैने अपनी तर्क विद्या से उस जल के बारे में यह निष्कर्ष निकाला, कि वह जल उन पहाडो की चोटियों पर पड़ी बर्फ के पानी का भूमिगत रुप में छन कर व भूमि के गर्भ में छिपे हुए खनिजों से साथ घुल कर.... अंततः नीचे आ भूमि से बाहर निकल जाना ही,  उस अंग्रेज़ के गुड़ाड़ते पानी के इतने ठंडे व औषधिदायक होने का प्रमाण हैं...........
                                         .........................( क्रमश:)
तोहफ़ों से मेरी झोली भर दी.... चरण सिंह ने..

ऊपर से.... रोंग फ गनडोली
निक,  लिंगडू, चूकरी व घुग्गीबाण..... 

यह चित्र मेरी चित्रशाला का एक गहना है दोस्तों.... चरण सिंह की चाची जी का है,  यह चित्र.. 

स्वयं चित्र.... चरण सिंह के पारिवारिक सदस्यों के साथ.. 

विदाई के समय..... और मैने अपनी अश्रुपूर्ण आँखों को काले चश्मे के साथ छिपा कर,  एक दम इनसे दूर जा... यह चित्र खींचा था,  दोस्तों 

निग्गी के रेशे.... जिन्हें एक धागे के रुप में प्रयोग लाया जाता है,  लिंगडू आदि सब्जियों के गुच्छी बंधन में... 

और... चरण सिंह एक भारी-भरकम पेड़ की लकड़ी उठा हमारे पीछे चल दिये... और इनके पारिवारिक सदस्य तब तकहमें देखते रहे,  जब तक हम उनकी आँखों से ओझल नही हो गए.. 

अंग्रेज के गुड़गुडाते जल स्रोत पर पानी की बोतल भरते चरण सिंह... 



गुड़ाड़ते पानी की ओर बढ़ते हुए ऋषभ.... 

मैने भी खूब पानी पिया, इस गुड़ाड़ते जल स्रोत से...

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4 टिप्‍पणियां:

  1. रस्सी जैसी निग्गी फिर और एक बात पता चली....वाकई पहाड़ी लोगो का दर्द दिख रहा है...यह लोग कभी अपने जीवन मे कही आये गए नही...आपकी पोस्ट के माध्यम से इनसे एक रिश्ता से हो गया है जी...

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