शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

भाग-20 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)


भाग-20 पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)26अगस्त2015
             
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                                 गज पर्वत की टान वतगार श्रृंखला के शिखर पर पहुंच, दूसरी तरफ नीचे ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे थे.... कि मानो मेरी लाटरी लग गई हो, क्योंकि जब कल हम इस रास्ते से ऊपर आये थे, तो हर जगह बादल ही बादल छाये हुये थे, अब सुबह का समय होने के कारण घाटी में बादल का एक कण भी मौजूद नही था...... दूर-दूर तक एक दम साफ नजर आ रहा था, फिर क्या था... मेरी जिज्ञासा कहां, मुझे शांत रहने देती है और सिलसिला शुरू हो गया वहां से नीचे दिख रही जगहों के बारे में चरण सिंह से पूछताछ का............... शिखर की एक तरफ तो चम्बा की ओर के गांवों का विवरण, जैसे चम्बा शहर की ओर जाने के लिए सड़क से जुड़ा पहला गांव "दोनाली" है, जिसके लिए यहां से चौदह किलोमीटर पैदल पहाड़ उतरने के बाद सड़क मार्ग आता है और यही से आप भरमोर मनीमहेश की यात्रा के लिए भी जा सकते हैं..... प्राचीन समय में मनीमहेश जाने के लिए यही रास्ता प्रयोग में लाया जाता था....और चरण सिंह ने बताया कि वह इसी रास्ते से चम्बा शहर के मशहूर "मिंजर" मेला देखने पैदल जा चुके हैं.........
                             जिस ओर अब हमे वापस उतरना था, उस ओर नीचे दिखाई दे रहे हर स्थान को, जैसे डिबरी की सराय, दीप गोट, गिलेरी गोट, रैलधार, जम्मूधार, बग्गा, घेरा गांव(यहां से मैने अपनी पैदलयात्रा शुरू की थी) को एक-एक कर मुझे दिखाया........ दूर धर्मशाला शहर व नड्डी गांव की कुछ इमारतें भी दिख रही थी और चरण सिंह ने अपने गांव रावा व उसमें बने अपने मकान को भी गज शिखर से दिखाया.......पर मेरे सवाल कभी खत्म नही होते हैं, सो मैने एक और सवाल चरण सिंह से कर दिया, कि जहां हम बैठे हैं...इसे वतगार नाम से क्यों जाना जाता है, तो वे बोले कि वतगार का अर्थ होता है.....केवल  एक व्यक्ति के जाने हेतू रास्ता....यह रास्ता भी मेरे पिता जी ने बनाया था, इस रास्ते से ही हम अपनी भेड़े, राशन और लकड़ी ले जाते हैं........... मैने नीचे की तरफ देखा और समझने की कोशिश की.....कि कैसे सिर पर लदा लकड़ियों गट्ठर जरा भी इधर-उधर लगा, तो नतीजा घातक........... सो अब उसी घातक रास्ते पर नीचे उतरने के लिए हमने कूच किया, पर रास्ता तो कहीं नजर नही आ रहा था, बस मानो चरण सिंह के पीछे-पीछे मैं ऐसे चल रहा था, कि जैसे चरण सिंह कोई चुम्बक हो और मैं लोहा..............
                              कुछ नीचे उतरने के बाद एक दम ऊपर की ओर देखा, तो वही ओखराल माता वाली शिला पास ही नजर आई, तो चरण सिंह से मैने कहा, कि आपने मुझे बताया नही कि ओखराल माता शिला भी पास ही है..... हम वहां भी जा आते, पर अब तो बहुत नीचे उतर चुके हैं.....चलो आगे बढ़े चलते हैं...........तभी एक जगह पर जा कर चरण सिंह मुझसे बोले, "चलो पंडित जी... हम रास्ते से हट कर सीधे ही यहां से नीचे की ओर उतर चलते हैं, यह शोट कट है.... जल्दी पहुंच जाएगें"....... मैने हंसते हुए चरण सिंह से कहा, "नही राणा जी मुझे अपनी दोनों टांगें सही सलामत वापस घर लेकर जानी है, यदि यहां से नीचे उतर गया तो इनमें से कम से कम एक टांग तो टूट ही जायेगी और हम मैदानी लोगों के लिए उतराई उतरना, चढ़ाई चढ़ने से भी ज्यादा कठिन होता है, जी....... इसलिए तो मैने अब अपने घुटनों पर सुरक्षा पट्टी बांध ली है".......
                            चलते-चलते चरण सिंह ने जमीन से कुछ बड़े-बड़े पत्ते तोड़ने शुरू कर दिऐ, मैने पूछा यह क्या है राणा जी, तो वह बोले कि यह "चुकरी" के पत्ते है.... आपको इसके पकौड़े बनाकर खिलायेंगे जनाब......!"      पकौड़े तो मेरी कमजोरी है, यदि किसी ने मुझे लूटना हो तो, पिस्तौल देखने की बजाय पकौड़े दिखा दे, मैं खुद व खुद लुट जाऊँगा...!" कहते हुए मैं हंसने लगा............ और चुकरी के कई सारे पत्ते तोड़ मेरे पास रखते हुए चरण सिंह बोले, आप यहां रुके.... मैं वो सामने पहाड के ऊपर से "निक"(पहाड़ी लहसुन) के पत्ते तोड़ कर लाता हूँ........ और मेरे देखते ही देखते सामने दीवार की तरह खड़े पहाड पर चढ़ने के लिए चरण सिंह ने "मक्कडमानव" का रुप धर लिया.... पल भर में ही वे उन सीधी चट्टानों से उछल-कूद करते हुए ऊपर तक पहुंचने के बाद मेरी आँखों से ओझल हो गए...... और मैं सामने चट्टान पर बैठे एक सुंदर पंछी की तस्वीरें खींचने में व्यस्त हो गया.....कुछ समय बाद हाथ में चुकरी, निक और पवित्र लोह-बाण के पत्तों का एक गट्ठर उठा कर वापस परत आए चरण सिंह..... और उन सब चीजों को ब्रजराज जी के द्वारा दिये गए खाली बैग में भर कर अब दोनों बैगों को फिर से अपनी पीठ पर लादने लगे, तो मैने कहा..... नही यह सब्जी वाला बैग तो अब मैं ही उठाऊंगा, तो चरण सिंह ने फिर वही पुरानी बात दोहराई...... "आप हमारे मेहमान.......!"   मैने उनकी बात बीच में ही काट दी और बोला, "मेहमान तो मैं आप का था, अब तो मुझे ऐसा लग रहा है, कि मैं आपके परिवार का एक अंग बन चुका हूँ और मुझे मेरे परिवार की सहायता व जिम्मेवारी निभावनें का अवसर दें, जी "........और वह सब्जी से भरा बैग अपनी पीठ पर लाद कर चल पड़ा.........
                             फिर थोड़ा ओर नीचे उतरे तो रास्ता एक डेरा से हो कर गुज़रा, जिसमें जलाने हेतू लकड़ी जमा थी, चरण सिंह ने बताया यह डेरा भी हमारे ही परिवार का है,  उस डेरे की खासियत यह थी.... कि उसके नीचे एक दम बहुत गहरी खाई थी, नीचे देखने पर ऐसा प्रतीत होता था, कि जैसे आप बुर्ज खलीफा की बालकनी में बैठे हो.........
                            चलते-चलते हम उसी जगह पहुंच गए, यहां हमने कल शाम को गड्ढे से पानी पिया था........ मेरा मन बहुत चंचल है, जो कुछ हासिल हुआ...उसका सुख नही, जो हासिल ना हो सका उसका दुख सताने लगता है और चरण सिंह से बोल पड़ा, "राणा जी...यदि यह वतगार वाला रास्ता अापके भाई ब्रजराज जी के डेरे को ही जाता था, तो आप कल शाम यही से पानी पिलाने के बाद मुझे टान वतगार डेरे पर ले जाते..... और सुबह लमडल को चलते, तो मैं दिन के उजाले में लमडल झील का दीदार कर सकता व उस झील के पवित्र जल में स्नान भी कर लेता " ......चरण सिंह ने कहा, "हां भाई जी,  ऐसी योजना एक बार भी मेरे दिमाग में ना आ सकी, नही तो मैं ऐसा ही करता.... पर यदि आज सुबह आप कहते तो, मैं आपको फिर से वापस लमडल झील पर ले जाता और उसी रास्ते से हम वापस उतर जाते"..... मैने बिल्कुल ईमानदारी से कहा कि "राणा चरण सिंह जी, सच बोलता हूँ, मेरी हिम्मत नही हुई फिर से दोबारा पहाड चढ़ उस तरफ जाने की......मेरी इस बात को नजरअंदाज़ कर दे, आपने मुझे जो भी दिखाया, अहसास व महसूस करवाया...वह सब मेरी जिंदगी का एक अमुल्य अनुभव हैं, जिसके लिए मैं आपका सदैव आभारी रहूंगा, जी ".................
                                                                ........................(क्रमशः)
धौलाधार हिमालय गज पर्वत की श्रृंखला "वतगार" के शिखर पर बैठे, मैं और राणा चरण सिंह... 

वतगार शिखर से नीचे नज़र आ रहे बग्गा, दीप गोट व नड्डी धर्मशाला शहर..
वतगार से कुछ नीचे उतरने पर दिखाई देती ओखराल माता शिला... 
चलो पंडित जी,  यहां से सीधे नीचे उतर चलते है.... नही राणा जी, मुझे अपनी टांगें सही सलामत वापस घर लेकर जानी है, जनाव 
"मक्कड़मानव" चरण सिंह सीधी खड़ी चट्टानों पर निक नामक पहाड़ी लहसुन की पत्तियाँ हासिल करने हेतू चढ़ते हुए.... 

और,   उस समय मेरा ध्यान इस खूबसूरत पहाड़ी परिंदे की कूहकू ने खींच लिया... 
..
जितनी फुर्ती से चरण सिंह ऊपर गए,  उतनी ही फुर्ती से वापस नीचे आए.. और साथ लाये चुकरी, निक और लोहबान..
चुकरी के पत्ते, जिनका मुझे अब इंतजार हो गया था कि कब ये पकौड़ों में तबदील होगें... 
रास्ते में आया चरण सिंह परिवार का एक और डेरा.....

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3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. जी हां, लोकेन्द्र जी... हर रंग जीया मैने इस पदयात्रा में।

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  2. चुकरी के पत्ते और निक...बहुत नया नया है खाने और जानने की

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