बुधवार, 19 अप्रैल 2017

भाग-13 चलो, चलते हैं.....सर्दियों में खीरगंगा और मणिकर्ण Winter trekking to Kheerganga & Manikaran darshan.

भाग-13  चलो चलते हैं.....सर्दियों में खीरगंगा (2960मीटर) 3जनवरी 2016

इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र (https://vikasnarda.blogspot.in/2017/04/1-winter-trekking-to-kheerganga2960mt.html?m=1) स्पर्श करें।
               
                             माता नैना देवी जी के मंदिर में.......माथा टेकने के उपरांत अब मैं, मणिकर्ण बाज़ार के उस बेहद खुले हिस्से में आ खड़ा था.... जहाँ प्राचीन राम मंदिर है और उस खुली सी जगह के बीचों-बीच राम मंदिर के मुख्य द्वार के समक्ष लकड़ी का रथ खड़ा देख,  मैं उस ओर खींचा चला गया... और मेरी जिज्ञासा तीव्र हो गई उस रथ के विषय में जाननें के लिए .... तो उत्तर मिला, कि यह भगवान श्री राम चन्द्र जी की सवारी है,  जिसमें प्रत्येक वर्ष दशहरा त्योहार के वक्त भगवान राम जी को ले,  मणिकर्ण शोभा-यात्रा में कई सारे व्यक्तियों द्वारा खींचा जाता है, और इस प्राचीन रथ का नेतृत्व एक "विजेता" करता है..... विजेता उस प्रतियोगिता का,  जो हर वर्ष इस पर्व से कुछ पहले पार्वती नदी पर होती है,  कि पार्वती नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे पर एक निश्चित चट्टान पर जो व्यक्ति अपना पत्थर फैंक अचूक निशाना लगा देता है.. ....वह ही इस रथ को खींचने वाला मुखिया होता है, परन्तु मैने हैरान हो कहा, कि  यहाँ तो पार्वती नदी के दो किनारों की आपस में बहुत ज्यादा दूरी है,  इतनी दूरी पर पत्थर फेंक... एक अचूक निशाना लगना बहुत ही कठिन कार्य है... तो, वे जनाब बोले कि इस प्रतियोगिता के लिए बहुत सारे लोग सारा साल ही पत्थर फेंकने के अभ्यास में मगन रहते हैं....... क्योंकि भगवान राम जी के रथ का नेतृत्व करना बहुत गौरव व सम्मान की बात है......
                     और, प्रभु श्री राम जी के रथ संग अपनी तस्वीर खिंचवा,  मैं श्री राम मंदिर जाने की बजाय सीधा मणिकर्ण के बस-अड्डे की तरफ चल दिया,  कि घर वापसी के लिए जाने वाली सीधी बस का बिल्कुल सही समय पता कर सकूँ...... और उस हिसाब से यह भी निश्चित कर सकूँ,  कि मुझे इतना समय मिल पाता है कि,  मैं मणिकर्ण से चार किलोमीटर पैदल पहाड़ के ऊपर चढ़ कर "ठंडी गुफा " के भी दर्शन कर सकता हूँ या नही......
          बस-अड्डे पर पहुंच ज्ञात हुआ कि मणिकर्ण से अमृतसर जाने वाली बस शाम 4बजे चलती है.... और उस समय दोपहर के 12:45 बज चुके थे,  तो मेरे पास ठंडी गुफा जाने के लिए अब पर्याप्त समय नही रह गया था,  इसलिए मैं अब वापस श्री राम मंदिर की ओर चल दिया क्योंकि अब दोपहर का एक बजने वाला था..... और जाते-जाते विशाल रतन जी से फोन पर बातचीत कर पूछा कि "कहाँ पहुंच चुके हो जनाब"....वे    दिल्ली का आधा रास्ता पार चुके थे.......
                       वापस बाज़ार में पहुंच.......कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर श्री राम मंदिर के निहायत खूबसूरत नक्काशीदार और सजीव मूर्तियों से सुसज्जित मुख्य द्वार से,  मैं श्री राम मंदिर परिसर में दाखिल हुआ...... और जूता घर में अपने जूते रखे,  तो जूता घर के सेवादार ने मुझे कहा, " श्री मान जी,  दर्शन करने के बाद कृपया लंगर ग्रहण कर जाए जी".......मुझे अभी भूख नही थी,  सो फिर भी मैने हामी में सिर हिला दिया.... परिसर में सब पहले शिव मंदिर और उनके साथ श्री राम चन्द्र जी का मुख्य मंदिर....... मुख्य मंदिर के समक्ष एक ऊंची ध्वजा व बगल में राम प्रिय भगत हनुमान जी का मंदिर है....... उन सभी मंदिरों की निमार्ण शैली बेहद ही भव्य है,  मंदिर की दीवारों व स्तम्भों पर मनमोहक मूर्तियाँ गढ़ी हुई है...... मुख्य मंदिर में प्रवेश कर मैने भगवान राम,  लक्ष्मण व सीता जी की सुंदर मूर्तियों के आगे माथा टेका...... और पुजारी जी ने भी वही बात दोहराई, "भगत,  लंगर तैयार है... भोजन ग्रहण कर ही वापस जाना"......
                    मैने पुजारी जी से कुछ समय मंदिर के विषय में बातचीत की, और उन्हें प्रणाम कर बाहर आ सम्पूर्ण मंदिर परिसर की परिक्रमा करने लगा,  तो फिर मुझे अब तीसरे मंदिर प्रबंधक ने आकर कहा, "भाई,  ऊपरी मंजिल में चले जाए... वहीं लंगर हाल है,  दोपहर का समय है और वहाँ आहार प्राप्त करे, जी ".............ये वाक्य सुन मेरा मन गौरवान्वित हो गया, कि इस मंदिर में भी गुरुद्वारे की तरह ही सुशासन चल रहा है..... परन्तु मैने नाश्ता ही सुबह देर से किया था,  सो मुझे कताई भी भूख नही थी....सो मैने उन से क्षमा माँग ली......
                    मेरी तो रुचि इस प्राचीन मंदिर के इतिहास जानने में थी, कि "क्यों इन दुर्गम पहाडों में श्री राम जी का भव्य मंदिर एक राजा ने बनाया, जबकि पहाडों में तो ज्यादातर भगवान शिव व माँ दुर्गा के मंदिर होते हैं.....! "
                    सो,  मंदिर में जड़े हुए प्राचीन पत्थर पर खुदा हुआ पढ़ा कि, कुल्लू क्षेत्राधिकारी सूर्यकुल प्रकाश राजा गत सिंह ने सन् 1653में अपने राज्य काल के दौरान इस राम मंदिर को बनाना प्रारंभ किया..... और वहाँ मंदिर में  मौजूद लोगों....और बाहर आ स्थानीय लोगों से भी इस स्थान के इतिहास के बारे में पूछता रहा....... मैने इस भव्य मंदिर के निमार्ण सम्बन्धी जानकारियाँ हासिल कर निष्कर्ष निकाला, तो यह प्राचीन लोक कथा सामने आई ..........
                     कुल्लू नरेश "राजा श्री मान जगत सिंह जी" (1637-1662 शासनकाल) से जाने-अनजाने में एक बहुत बड़ी भूल हो गई,  जिसके परिणामस्वरूप उन पर "ब्रह्म हत्या " का दोष लग गया...... हुआ यूँ कि,  राजा जगत सिंह जी के पास आपसी रंजिश की वजह से एक झूठी शिकायत आई,  कि पार्वती घाटी में टिपरी गांव के ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास डेढ़ किलो सुच्चे मोती हैं....... राजा को भी यह बात अटपटी लगी कि, एक गरीब ब्राह्मण के पास इतने कीमती मोती कहाँ से आए....... राजा जी ने आना दूत भेज ब्राह्मण से कहा कि, " इन मूल्यवान मोतियों का या तो हिसाब दो कि इन्हें कहाँ से प्राप्त किया.... कमाए या उपहार मिला,  नही हिसाब दे सकते,  तो इन मोतियों को राजकोष में जमा करा दो....! "
                           परन्तु दुर्गादत्त के पास तो कोई ऐसे मोती नही थे,  सो वह बोला..."मेरे पास कहाँ एेसे मोती" .......और दूत ने राजा जी को जा कर सारी बात बता दी,  शिकायतकर्ता की शायद राजा पर ज्यादा पकड़ थी,  सो कुछ समय उपरान्त राजा जगत सिंह जी पार्वती घाटी मणिकर्ण दौरे पर आए,  और पंडित दुर्गादत्त को सिपाहियों द्वारा संदेश भेजवाया,  कि मैं वापसी पर तेरे पास आऊगाँ... तू मोती तैयार रखना...... सिपाहियों ने दुर्गादत्त के साथ मारपीट की और सुच्चे मोती राजा को सौंपने के लिए चेतावनी दी........
                            परेशान व भयभीत दुर्गादत्त ने परिवार व खुद को अपनी झोपड़ी में ही कैद कर खुद ही आग लगा ली..... और जलते हुये जोर-जोर से चिल्लाने लगा, " ले राजा सुच्चे मोती,  ले ले राजा सुच्चे मोती "........और बहुत दुःखद अंत हुआ पूरे के पूरे घर-परिवार का.......
                            राजा जगत सिंह को अब सच्चाई पता चली,  कि मेरी वजह से इस निर्दोष ब्राह्मण को सपरिवार आत्महत्या करनी पड़ी...... और इस घटना का राजा जी के तन-मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा,  वे अपने-आप को पापग्रस्त समझने लगे..... दिनचर्या राज-पाठ सब कुछ अब परेशान कर रहा था,  भूख-प्यास मर गई.... यदि खाना खाने बैठते तो उन्हें महसूस होता कि मेरे खाने में कीड़े रेंग रहे हैं,  पानी पीते तो,  उन्हें लगता कि मैं किसी निर्दोष का खून पी रहा हूँ...... भयंकर मानसिक स्थिति से गुज़र रहे पश्चातापी राजा जगत सिंह जी ने अपने गुरु पुरोहित फुहारी बाबा के नाम से मशहूर किशन दास जी की शरण ली,  उन सिद्ध महात्मा ने राजन को सलाह दी,  कि आपको इस ब्रह्म हत्या के पाप से तो भगवान रघुनाथ यानि श्री राम जी ही मुक्त कर सकते हैं...... आप अयोध्या में स्थापित भगवान राम जी को किसी भी तरह से यहाँ कुल्लू क्षेत्र में ले आए और अपना सारा राज-पाठ भगवान रघुनाथ जी को सौंप,  उनके सेवक व क्षमा के पार्थी बन शासन चलाये.... परन्तु अयोध्या से भगवान राम की मूर्ति लाना, एक असम्भव कार्य था........
                                 और,  इस असम्भव कार्य को संभव करने का कार्य फुहारी बाबा ने अपने एक साहसिक चेले "दामोदर दास" को सौंपा,  जो उस समय सुंदरनगर के राजा सुकेत के पास नौकर था....... अयोध्या पहुंच दामोदर दास अपनी चतुराई से राम मंदिर के मुख्य पुजारी का शिष्य बन,  और एक दिन मौका पा, दामोदर दास भगवान रघुनाथ जी को ले उड़ा........ और उसका पीछा करते-करते आखिर अयोध्या के एक पांडे जोधावर ने दामोदर दास को हरिद्वार में आ पकड़ा,  परन्तु शायद प्रभु राम को कुछ और मंजूर था..... जब जोधावर  ने दामोदर से रघुनाथ जी की मूर्ति पकड़ी,  वह मात्र तीन इंच की स्वर्ण मूर्ति के भार से ही भूमि पर गिर गया और फिर से प्रभु राम की अत्यन्त भारी हो चुकी मूर्ति को उठा ना सका,  पर जब दामोदर दास ने प्रभु राम की मूर्ति उठाने की चेष्टा की,  वह सहज उठ गई..... और दामोदर दास उसे ले 1651सन् में राजा जगत सिंह जी के पास कुल्लू रियासत के गड़सा घाटी राजमहल में आ पहुंचा.........
                           और,  राजा जगत सिंह जी ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन कर अपना समस्त राज-पाठ भगवान रघुनाथ जी को अर्पण कर....... व भगवान रघुनाथ जी को ही राज्य का राजा बना, खुद उनके सेवक बन गए........ दामोदर दास को भुन्तर में एक विशाल भू-खण्ड़ इनाम के तौर पर भी दिया गया....... भगवान रघुनाथ जी के मूर्ति को उस समय कई गांवों में बारी-बारी से छुपा कर रखा गया.......कुछ समय मूर्ति को मणिकर्ण में भी रखा गया था,  इसलिए यहाँ भी बाद में मंदिर का निर्माण किया गया..... अंत: रघुनाथ जी की मूर्ति को कुल्लू में स्थापित किया गया और राजा जगत सिंह जी जीवन में बहुत सुधार हुआ,  वे प्रतिदिन भगवान रघुनाथ जी को भोग लगा कर ही भोजन ग्रहण करते थे....... परिणामस्वरूप राजा जगत सिंह जी ब्रह्म हत्या के घोर पाप से मुक्त हो गए.... और उन्होंने ही विश्व प्रसिद्ध कुल्लू दशहरे की शुरुआत की...... सात दिनों तक चलने वाले इस दशहरा उत्सव में देश के बाकी हिस्सों की तरह रावण,कुंभकर्ण व मेघनाथ के पुतले नही जलाये जाते.....अपितु इस उत्सव में अलग ही किस्मों के रीति-रिवाजों का निर्वाह होता है,  हिमाचल प्रदेश की संस्कृति को करीब से देखा जा सकता है,  इस कुल्लू दशहरा उत्सव में...............

                                            .........................(क्रमश:)
श्री राम मंदिर मणिकर्ण.... और मंदिर के सामने खड़ा श्री राम जी का रथ,
जिस पर हर वर्ष दशहरे पर्व पर प्रभु राम की सवारी निकलती है....

पार्वती नदी पर पड़ा झूला पुल... जो मणिकर्ण को मुख्य सड़क से जोड़ता है 

मणिकर्ण मुख्य सड़क के दूसरी ओर.....पार्वती नदी के किनारे ही बसा हुआ है,  पुल से किया यह छायांकन 

श्री राम मंदिर मणिकर्ण... मुख्य मंदिर प्रभु रघुनाथ जी और साथ में महादेव शंकर जी का मंदिर,
और... श्री राम मंदिर का मुख्य द्वार 

श्री राम मंदिर के द्वार पर खड़े दरबान.... मंदिर का भीतरी कक्ष और मुस्कुरातें हुए पुजारी जी,
मंदिर में स्थापित श्री राम, लक्ष्मण व सीता जी की स्वर्ण मूर्तियाँ.... 

श्री राम मंदिर मणिकर्ण की दीवारों पर गढ़ी हुई बेहद सुंदर मूर्तियाँ 

श्री राम मंदिर मणिकर्ण का शिखर,  मंदिर प्रांगण और राम भक्त हनुमान जी का मंदिर... 

श्री राम मंदिर मणिकर्ण में दीवार पर बना... माता सरस्वती जी का सुंदर चित्र,
मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा मैं... और सीढ़ियों के सामने ही खड़ा भगवान रघुनाथ जी का रथ 

एक नज़र.... पार्वती नदी के तट पर बसा मणिकर्ण।

( इस चित्रकथा का अंतिम भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छा लगा आपका यात्रा वृतान्त, उस से भी बढ़िया ये जानकारी की अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति वो नही , वो तो कुल्लू में विराजमान हैं । और साथ में ये प्रमाण भी की 1600 सदी में राजा राम का मंदिर अयोध्या में था।

    उत्तर देंहटाएं