मंगलवार, 29 अगस्त 2017

भाग-18 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-18 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....
                                                " कहाँ ठोकरें खा रहे हो बादशाहों "    
     
                                         22जुलाई 2016.........दिन के ग्यारह बजने को थे और मैं व विशाल रतन जी भीम तलाई से अगले पड़ाव "कुंशा" के आस-पास पहुँच चुके थे.... कुंशा(3630मीटर) से कुछ पहले रास्ते में एक स्थानीय गद्दी नोया राम ने भी यात्रा के लिए अपनी दुकान लगा रखी थी,  वे दो जन अपनी भेड़े व उस अस्थाई दुकान को संभाल रहे थे...भूख भी जागृत थी, सो तम्बू में जा बैठे खाना खाने के लिए.... और आदतन अपने प्रश्नबाण फिर दाग़ छोड़े दुकानदार बने गद्दी भाई नोया राम की ओर,  कि अभी पीछे रास्ते में मिले शेषनाग के फन सी आकृति जैसे पत्थर वाले स्थान का क्या इतिहास है... मेरी बात सुन नोया राम जी हंसने लगे और धीरे से मेरे कान के पास हो बोले,  " वो नाग के फन वाला पत्थर मैने ही वहाँ रखा है, पिछले साल भेड़े चरातें वक्त मुझे वहीं रास्ते में वो पत्थर पड़ा मिला... चाहता तो था कि उस पत्थर को उठा कर अपने डेरे पर ले आऊँ, परन्तु भारी होने की वजह से वहीं रास्ते के किनारे उसे रख दिया और अब तो उस पर हर रोज फूल चढ़ रहे हैं भाई जी...!!! "         
                            मैं बोल उठा, " भाई आस्था है, यदि दो दीवारें और बना दो तो फूल क्या पैसे भी चढ़ने शुरु हो जाएंगे..!! " 
                              खैर,  नोया राम ने हमें राजमाँह के साथ गर्मागर्म कनक के फुल्के(रोटियाँ) भरपेट खिलायें... और फिर से यात्रा पथ पर खड़े थे,  तो चलते हुए मैने बाहर खड़े नोया राम के भाई से पूछा कि क्या आपने "निऔला" दे दिया... उन्होंने कहा, हां अभी कल ही दिया है.... दोस्तों, निऔला मतलब "बलि"....इस पुरातन प्रथा को अब भी कई गद्दी लोग निर्वाह कर रहे हैं, भगवान शिव को समर्पित यह बलि वर्ष में एक बार सावन के महीने में गद्दी लोग देते हैं कि हमारी भेड़-बकरियाँ बीमारियों और भालू के आक्रमण से बची रहे... खैर मैं तो बलि-प्रथा का निंदक हूँ, परन्तु उस समय मैने नोया राम व उनके भाई से इस कुप्रथा के बारे में टीका- टिप्पणी ना करने में ही भलाई जानी और हम दोनों अब बेहद खूबसूरत स्थल कुंशा में से गुज़र रहे थे... 
                             बेफिक्र हरियाली और मदमस्त फूलों से भरे क्षेत्र "कुंशा" में रास्ते के किनारे भी कई सारे टैंट लगे हुए थे,  सूर्य देव को बादलों और धुंध ने मिली-भगत कर गायब ही कर दिया था.....कुंशा भेड़-बकरी चराने वाले गद्दियों की आर्दश भूमि है, पेड़-झाड़ी रहित पहाड पर घास से भरी मैदान नूमा ऊँची-नीची धरती.... कुंशा से आगे बढ़ पहाड के कंधे से पार हो दूसरी तरफ गए तो वहाँ की खूबसूरती भी हमारी आँखों को स्थिर कर गई, हरियाली के दो रंग अब नज़र आ रहे थे.... गहरा हरा रंग "तांगुड" की झाड़ियों का और हल्का हरा रंग "चलिंगडू" नामक बूटी का...जिस की उस क्षेत्र में भरमार थी..... रास्ता अब कुछ कठिन व पथरीला सा आना शुरु हो गया, जितनी मुश्किल से हम पहाड के कंधे से नीचे की ओर उतरते,  उतनी ही मुश्किल से आगे बढ़ते हुए फिर दूसरे पहाड के कंधे पर चढ़ते..... और अब हमे बहुत दूर तक जा रही पगडंडी भी दिखाई देने लग पड़ी थी,  जो पहाडों की बनावट के अनुसार नीचे-ऊपर होती हुई दूर आगे धुंध में ही विलुप्त होती नज़र आ रही थी.... 
                             दोपहर के दो बजने वाले थे,  मैं विशाल जी से कुछ कदम आगे चल रहा था कि एक मोड़ पर कुछ लड़के और उनसे कुछ दूर एक व्यक्ति अलग सा बैठा था.... मेरे वहाँ पहुँचतें ही उस व्यक्ति ने पंजाबी भाषा में कहा, " किथे रुड़े फिरदे ओ बादशाहों...! " ( मतलब कि "कहाँ ठोकरें खा रहे हो बादशाहों")        उन अनजान व्यक्ति द्वारा हमसे ऐसा पूछना मुझे बड़ा अखड़ा,  तो मैं अहम में आ कुछ उखड़ी हुई ज़ुबान में बोला, " मैं गोल पत्थर की तरह हूँ जो रुड़-रुड़(ठोकरें खा-खा कर) यहाँ तक पहुँच गया हूँ... वरना चपटे पत्थर होते तो डाँडा धार भी नही चढ़ पाते जनाब...!! "
उन जनाब की आँखों पर बेहद मोटे शीशों वाला चश्मा चढ़ा हुआ था और चेहरा खोदा (जिस पर ढाढ़ी-मूछ ना उगती हो)  था... पता नही क्यों मुझे उनकी कही बात व शक्ल बहुत चुभ रही थी, इसलिए मैने उस समय उनकी तस्वीर भी नही खिंची.....  परन्तु दोस्तों, उनकी कही इस बात का अर्थ मुझे यात्रा के अंत में पता चला कि उनके मुख से यह बात क्यों निकली,  इस बात का ज़िक्र मैं यात्रा के अंत में करुगाँ तो आप मेरी व इन महाशय की मनोदशा बखूबी समझ पायेंगे... बस इस बात के बारे में आप लोग याद रखना, मैंने उनसे फिर पूछा कि आप कहाँ से हो...तो वे बोले, " बहादुरगढ़ दिल्ली से " ....और मेरे बारे में पूछने पर मैने कहा, "गढ़शंकर"
                               और, तभी पास बैठे उन लड़कों के समूह में कानाफूसी शुरु हो गई "गढ़शंकर-गढ़शंकर" ......मेरा ध्यान अब उन लड़कों की तरफ हो गया तो,  वे लड़के एक सुर में बोले..."हम भी गढ़शंकर वाले है,भाजी....!!"
                                 परन्तु मेरे लिए वो पांचों लड़कों की शक्ल एक दम नई थी कि एक व्यक्ति पीछे से चलता हुआ हमारे पास आ खड़ा हुआ, जिसकी शक्ल मैं भलिभाँति पहचानता था परन्तु नाम नही... उसने आ गर्मजोशी से मुझे गले लगा लिया और अपना नाम "पम्मा" बताया..... मैने पम्मे से हैरानी जाहिर की,  कि मैं आपको तो पहचानता हूँ... पर इन बाकी लड़कों को मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा हूँ, जो यह कह रहे हैं कि हम एक ही शहर में रहते हैं..... तभी उनमें से दो-तीन लड़के बोल पड़े, "हम तो आपको अच्छी तरह से जानते हैं, आपकी फ़लाँ-फ़लाँ जगह पर दुकान है आदि-आदि.........और पम्मे ने मुझे एक-एक कर उन सब लड़कों के बारे में बताया कि ये फ़लाँ का लड़का है और उस मुहल्ले में इसका घर है....
                                 अच्छा लगता है जब किसी अनजान जगह पर आपके कुछ जानकार मिल जाए... और फिर से हम सब यात्रा पथ पर थे.... आगे एक बहुत सुंदर झरना गिर रहा था,  हम दोनों वहीं रुक अपनी फोटो खींचने लगे... तो बाकी के सब आगे की ओर बढ़ गए,  आगे बढ़ते-बढ़ते पथ पर इतनी ज्यादा धुंध आ गई कि कुछ ही कदम ही आगे दृष्टिगोचर हो रहा था... आगे बढ़ने पर गिरते जल की कल-कल करती मधुर ध्वनि से यह तो अंदाज़ा हो गया कि अभी धुंध के बीच में से कोई बड़ा जल-प्रपात प्रकट होने वाला लगता है..... और दस कदम बढ़ने पर वही नतीजा आया कि एक अति सुंदर व बेहद विशाल जल-प्रपात का विहंगम दृश्य हमारे नयन-चक्षुओं को भेद पर दिमाग में जा बसा, और खुले हुए मेरे मुख से निकला " वाह" ......और विशाल जी भी अपना चिरपरिचित शब्द बोल उठे "औसम्"
                                  और,  अब आगे बढ़ते हुए नीचे उबड़-खाबड़ रास्ते को कौन देख रहा था.. कमबख़्त नज़रे तो बस उस जल-प्रपात की खूबसूरती पर गड़ी हुई थी.... तभी ध्यान भंग हुआ,  जब हमसे आगे निकल चुके पम्मे व उसके साथियों नें मुझे दूर से आवाज़ लगा कहा, " यदि हमारे शहर गढ़शंकर में ऐसा झरना हो तो...!! " 
                                  मैने भी अपना व्यंग्य-बाण दाग़ दिया, " हमारे शहर के गंदे पानी के नाले को तो प्रशासन व नगरपालिका को संभालनें में दो-चार होना पड़ता है,  इस झरने को क्या ख़ाक संभालगें....!!! "   और हम सब "गढ़शंकरिऐं" इस व्यंग्य पर हंस दिये...! 
                                   दोपहर के साढे तीन बजने वाले थे और हम श्री खंड महादेव के तीसरे व अंतिम पडाव "भीमद्वारी" से ज्यादा दूर नही थे,  सो रास्ते में "लूनावाडी" स्थान पर कुछ चाय इत्यादि के लिए रुक गए.... और उस दुकान पर एक सज्जन मिले,  जिनके अनुसार वो हिमाचल प्रदेश में कई सारे ट्रैक कर चुके थे....... और एक अन्य सज्जन और भी मिले,  जिनके साथी आगे जा चुके थे और वो कल से वहीं ठहरे हुए थे... सो हमारे साथ आगे जाने की फ़रमाइश करने लगे, परन्तु कुछ कदम हमारे साथ चलने के बाद यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि मैं आपको भीमद्वारी में मिलूँगां......... मैने विशाल जी से कहा, " चलो अच्छा हुआ पर अब हम इन्हें भीमद्वारी में नही मिलेंगे...!!"
                                    क्योंकि मेरी अपनी सोच है कि पर्वतारोहण के समय दल में यदि कम लोग होगें, तो यात्रा सुखद बनी रहेगी... नही एक-दूसरे-तीसरे की इंतजार में बहुत समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है,  इसलिए मैं और विशाल रतन जी केवल दोनों ही पर्वतारोहण करते है.....ताँकि एक-दूसरे के साथ-साथ चल सकें,  एक-दूसरे को संभाल सके और एक बोले तो दूसरा मान ले... इसलिए तीसरा बीच में नही डालते......!!!!!

                                                      ............................(क्रमश:)
चलत मुसाफिर, मोह लिया रे......!!! 

गद्दी नोया राम की दुकान की ओर बढ़ते हुए हम लोग.... 

कुंशा में नोया राम का गद्दी डेरा....

देखो....दो गबरु जवान मुण्डें 

नोआ राम का भाई चाय बनाते हुए..... 

मेरे कान के पास आ कर नोया राम जी बोले, "वो नाग के फन वाला पत्थर मैने ही वहाँ रखा है....! "

नोआ राम जी हमारे लिए भोजन तैयार करते हुए.... 

लो जी..... राजमाँह के साथ कनक के फुल्के 

स्वादिष्ट भोजन उपरांत.... हम कुंशा के ओर चल दिये 




"कुंशा" की सुंदरता इन फूलों की ज़ुबानी....

कुंशा में रास्ते किनारे भी कई टैंट लगे हुए थे.... 

पेट भरा हुआ हो तो,  56भोग भी लुभानें में नाकामयाब......कुंशा में लगा चाइनीज़ कोना  

धुंध की वजह से कुछ दूर ही दृष्टिगोचर हो रहा था.... 

प्रकृति के दो हरे रंग...... गहरा हरा रंग तांगुड की झाड़ियों का और हल्का हरा रंग चलिंगडू बूटी का.... 

पर्वत के एक कंधे से उतर..... दूसरे पहाड के कंधे पर चढ़ना 

 प्राकृतिकता में मगन खड़े विशाल रतन जी.... 

आ-जा रहे श्रद्धालु... 

रास्ते में आया एक जल-स्रोत जिससे किनारे एक लाल झंडा गड़ा था.... मेरी उत्सुकता बढ़ गई उस बारे में जानने की,  परन्तु मेरे प्रश्न शांत करने वाला वहाँ कोई नही मिला.... 

राह में आई एक कलाकृति.... 

वो दूर तक रास्ता जा रहा है, जिस पर हमें जाना था.... 

और, रास्ते का क्या कहना.... 

खुद ही देख लो.... दोस्तों 

भाजी, हम भी गढ़शंकर से है..... पम्मा और उसके साथी 



राह में आया एक सुंदर झरना.... 

धुंध में कल-कल करती गिरते जल की मधुर ध्वनि बता रही थी कि कोई जल-प्रपात आ रहा है.... 

और,  कुछ कदम बाद ही एक विशाल व विहंगम जल-प्रपात धुंध में से प्रकट हुआ.... 

पम्मे ने दूर से हाथ हिला कर जोर से कहा, " यदि हमारे शहर गढ़शंकर में ऐसा झरना हो तो...! " 

लो, फिर से इक्ट्ठा हुए "गढ़शंकरिऐं"

खूबसूरती में खड़े.... जनाब विशाल रतन जी 

ये रंगीले भाई साहिब मुझे लूनावाडी में मिले थे..... इन्होंने मुझे पर्वतारोहण में अपनी कई उपलब्धियाँ गिना दी... 

चलो, अच्छा हुआ विशाल जी, अब हम इन्हें भीमद्वारी में नही मिलेंगे...!!! 

                    
                    

रविवार, 13 अगस्त 2017

भाग-17 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-17 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर..... 
                                                 " काल रुपी सांड "  

                                     22जुलाई 2016........सुबह के दस बज चुके थे,  मैं और विशाल रतन जी भीम तलाई से ठाकुरकोट पास को पार कर गागनी पास से होते हुए "कुंशा" की ओर बढ़ रहे थे.... प्राकृतिक सुंदरता से धनवान उस पथ पर हम भौंचक्कें से कदम पर कदम बढ़ाये जा रहे थे,  पथ की दोनों ओर "वुशी" के जहरीलें परन्तु बेहद हसीन फूल विषकन्या की भाँति अपना आकर्षण हम पर छोड़ रहे थे... 
समुद्र तट से करीब 3500मीटर की उस ऊँचाई पर हर तरफ व हर किस्म के पौधे पर फूलों की बहार छाई पड़ी थी...कहीं दुल्हन के जोड़े सा सुर्ख लाल रंगी फूल,  तो कहीं बंसत की बहार जैसा पीला फूल,  तो कहीं नीलम जैसे रत्नों सी आभा बिखेरतें नीले व जामुनी पुष्प...... और दोस्तों हर तरफ सफेद धुंध छाई होने की वजह से इन पुष्पों की पुष्पांजलि ऐसी दिखाई दे रही थी कि मानो किसी चित्रकार ने एक बहुत बड़ी सफेद पृष्ठभूमि के मध्य एक छोटी सी रंग-बिरंगी चित्रकारी कर दी हो.... बेहद यादगारी दृश्य थे वो दोस्तों..... 
                             रास्ता तो वही चढ़ाव का ही था, चढ़ते-चढ़ते रास्ते की एक तरफ दीवार सा खड़ा एक बड़ा का पत्थर आया और मैं व विशाल जी उस खड़े पत्थर की टेक लगा कर खड़े-खड़े ही विश्राम करने लगे,  तो थकान से हमारी आँखें बंद हो रही थी...सो एक-दो मिनट की अल्प निद्रा ने हमे आ घेरा, निद्रा टूटते ही हम फिर से ऊपर की ओर चढ़ने लगे...ऊपर से एक सज्जन उतर रहे थे जिनके हाथ की लाठी एक विशेष किस्म के बाँस की थी,  सो लाठी देख पूछ बैठा कि यह बाँस तो हमारे यहाँ के किसी भी इलाके का नही है क्योंकि इसकी गांठें गोलाईदार है.... तो वो सज्जन हंसते हुए बोले मैं बंगाल से आया हूँ भाई..... 
                             हर तरफ छाई हुई धुंध मुझे निराश भी कर रही थी क्योंकि इस की वजह से ना तो पर्वतों की ऊँचाई दिख रही थी और ना ही गहराई.... खैर बीस-तीस कदम जो भी दिख रहा था, वो नज़ारा ही बेहद संतुष्ट कर रहा था... कुछ आगे चले तो एक झरने ने हमारा राह रोक लिया और कहने लगा, " क्या मेरे संग फोटो नही खिंचवाओगें जनाब...!" 
दस मिनट चलते रहने के बाद एक मोड़ मुड़े तो सामने इस यात्रा का पहला ग्लेशियर दिखाई दिया,  वो "कुंशा नाला" था... पर्वत की ऊँचाई से गिरता जल उस ग्लेशियर को भेदता हुआ नीचे की ओर आ रहा था..... गर्मियों के मौसम में मैदानी इलाकों की प्रचण्ड गर्मी को झेलता हुआ जब कोई व्यक्ति पहाड की ऊँचाई पर पड़ी बर्फ तक पहुंच जाए... वो पल उसे बेहद आनंदित करते हैं..... मेरे और विशाल जी के साथ ऐसा ही हो रहा था, हम क्या हमारे जैसे और कई जन उस ग्लेशियर पर बेहद आनंदित हो रहे थे.... खैर अपने मन की चंचलता को काबू में कर आगे का रुख किया......!!
                            गज़ब की हरियाली और रास्ते पर हम,  रास्ता कहीं अच्छा तो कहीं है ही नही.... कहीं दोनों कदम अच्छे से पड़ जाते,  तो कहीं अगला कदम रखने की जगह ही नही मिल पा रही थी... परन्तु इन सब कठिनाइयों पर प्राकृतिक सौम्यता भारी पड़ रही थी....और आगे देखने की चाह मेरे कदमों को मानो खींच सी रही हो,  फिर रास्ते में एक तरफ शेषनाग के फन की आकृति वाला प्राकृतिक पत्थर रखा देख, हम दोनों खड़े हो गए और उस नाग फन से पत्थर पर फूल-पत्ते भी यात्रियों द्वारा चढायें हुए देख कर सोचा कि शायद यह जगह शेषनाग से सम्बन्धित हो....!
                              जैसे-जैसे हम "कुंशा" नामक स्थान की ओर बढ़ रहे थे, पहाडों पर अब हरी-हरी घास के ऊंचे-नीचे मैदान नज़र आने शुरू हो रहे थे.... चलते-चलते फिर से हमारे कदम शिमला वाले हंसमुख कानूनगो साहिब त्रिभुवन शर्मा जी से जा मिले... और एक दूसरे से बातचीत करते हुए अब हम साथ-साथ ही चल रहे थे,  एक जगह कुछ विश्राम के लिए हम सब इक्ट्ठा बैठ गए........तो मैने त्रिभुवन जी से पूछ लिया कि आप कितनी बार पहले भी श्री खंड आए है,  तो वे बोले, " दो बार,  अब तीसरी बार जा रहा हूँ अपनी माँ के लिए.....!! "              और कहते-कहते त्रिभुवन शर्मा जी भावुक हो कर बोले कि मेरी माँ का देहांत हुए करीब एक साल होने को आया.... वे बीमार चल रही थी परन्तु मैं उन्हें बचा नही पाया, इस भार को साथ ले जी रहा हूँ...तो मेरी धर्मपत्नी बोली कि आप एक बार फिर से श्री खंड जा कर माँ की आत्मा की शांति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना कर के आओ,  ऐसा करने से आपके व्याकुल मन को भी शांति प्राप्त होगी.... और ये कह कर त्रिभुवन शर्मा जी फूट-फूट कर रोने लगे व मुझ अति भावुक व्यक्ति को भी अपने संग रुला लिया,  परन्तु मैने अपने आँसू छिपा लिये...... और चंद क्षण अपने-आप को थामने के उपरांत मैने त्रिभुवन जी को ढांढस बधानें के लिए अपने पिता डाक्टर कृष्ण गोपाल नारदा जी की आप बीती सुनानी मुनासिब जानी.........
                                वो आप बीती जो अकसर हम बचपन से ही उनके मुख से सुनते आ रहे हैं कि उनके बड़े भाई यानि मेरे ताया जी डाक्टर रवि दत्त नारदा (पी. एच. डी) .....सन् 1971 में मरणासन्न पड़े थे,  वे पंजाब में ही लुधियाना कृषि युनिवर्सिटी में प्राध्यपक के पद पर कार्यरत थे और कैंसर पर उनकी शोध चल रही थी कि रेडियो ऐक्टिव किरणों के प्रभाव में आने के कारण उनको ही कैंसर जैसी बेइलाज बीमारी ने आ घेरा..... चण्डीगढ़ के पी. जी. आई हास्पिटल में भरती थे.... और मेरे पिता जी भी उनकी देखभाल के लिए वहीं हास्पिटल में थे... तो उस रात जब मेरे पिता अपने सहपाठी मित्र डाक्टर अमीर अब्बास जैयदी जो सहारनपुर से मेरे ताया जी का हाल जानने आए थे,  के संग हास्पिटल में ही अपने ईष्ट भगवान शिव से प्रार्थना करते-करते कुछ समय के लिए सो गए..... तो अर्धनिद्रा के अवचेतन मन में भी मेरे पिता जी भगवान शिव से निरंतर प्रार्थना कर रहे थे कि आप तो मौत के देवता है शिव जी,  मेरे बड़े भाई की जान बख्श दें.. जान बख्श दें....जान बख्श दें....!!
                                कि तभी कमरे में एकाएक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ... और उस प्रकाश पुंज में उन्हें भगवान शिव के दर्शन हुए......मेरे पिता जी के अनुसार, मैं स्वप्न में ही अपने शरीर को छोड़ भगवान शिव के चरणों में पड़ गया कि हे प्रभु मेरे भाई को बचा लो.... तो भगवान शिव ने मुझे कहा कि तुम उस खिड़की से नीचे की ओर देखो..... तो मैं देखता हूँ कि नीचे हास्पिटल नही, एक भरा-पूरा बाज़ार है और लोग इधर-उधर भाग रहे हैं.... एक " सांड " उन लोगों में से किसी-किसी को टक्कर मार रहा था,  जिसे वे टक्कर मार रहा था वह मर रहा था.... तो भगवान शिव बोले, " यह ही काल है.. इसकी टक्कर से कोई नही बच सकता, जिन- जिन का समय नजदीक आ रहा है वे खुद-व-खुद इस काल रुपी सांड के सामने खिंचे चले आ रहे हैं......!!! "
                                मेरे पिता जी फिर से भगवान शिव के आगे गिड़गड़ाएे कि यह तो बता दो भगवन... कि मेरे भाई की कितनी साँसें शेष है........ तो भगवान शिव बोले, " आओ मेरे साथ "......और मैं भी भगवान शिव पीछे-पीछे उड़ चला,  आकाश में एक महल के कई सारे गलियारों को पार करने के पश्चात भगवान शिव ने मुझे चित्रगुप्त को सौंप दिया और उन्हें आदेश दे आलोप हो गए.....चित्रगुप्त ने मेरे भाई की जीवन-वही खोली और कहा कि बस आज की रात ही तेरे भाई की आखिरी रात है,  कल दो पहर से पहले ही उसकी जीवन लीला समाप्त है................. और मेरे पिता जी को नींद में बचैंनी से बुडबडातें हुए देख उनके मित्र ने जगाया.... और मेरे पिता जी झटके से उठ बैठे,  परन्तु ठीक वैसे ही हुआ त्रिभुवन जी.... मेरे ताया जी अगले दिन दोपहर से पहले 11बजे के करीब अपना दम तोड़ गये......!!!
                                "इस मृत्यु पर  हम मनुष्य कभी भी पूर्णतया विजय नही पा सकते त्रिभुवन जी,  मैडिकल साईस की बदौलत इस मृत्यु को कुछ समय तो टाला जा सकता है... परन्तु मृत्यु को सदा रोकना असत्य है,  इस सत्य का हर किसी के जीवन में घटित होना ही अंतिम सत्य है.... इसलिए आप अपने मन पर अपनी माता जी की मृत्यु का भार मत ले,  ये व्यर्थ का भार उठा आप अपने को भी ही परेशान कर रहे हो त्रिभुवन जी...!! "
                                  मेरी बातें सुन त्रिभुवन जी बोले कि आप से वार्तालाप कर मेरा मन बेहद हल्का है... कह कर त्रिभुवन शर्मा जी अपने साथियों के साथ फिर से यात्रा-पथ पर अग्रसर हो चले और मैं व विशाल जी वहीं पत्थरों पर बैठे रहे....और शायद हम दोनों एक सी ही बात सोच रहे थे कि इस यात्रा पर हर कोई एक कहानी बन चला जा रहा है, चला जा रहा है... चला जा रहा है.....चला जा रहा है...!!!!

                                                          ......................................(क्रमश:)
विषकन्या सा आर्कषक.... "वुशी" का जहरीला फूल 

दुल्हन के जोड़े सा सुर्ख लाल फूल.... 



नीलम रत्न सी आभा बिखेरतें....पुष्प 


दोस्तो, मेरा मानना है कि हमारे बुजुर्गो ने "सुंदर" शब्द की उत्पत्ति फूलो को देख कर की होगी....!!

तीखी चढ़ाईयाँ..... 

और, इन तीखी चढ़ाईयों को चढ़ने की थकान से हम उस पत्थर पर खड़े-खड़े टेक लगा कर अल्प निद्रा अवस्था में पहुँच गए... 

चंद क्षणों की अल्प निद्रा भी मुझे तरो ताजा कर जाती है,  दोस्तों... 

वुशी का फूल और पत्थर..... 

मैं बंगाल से आया हूँ भाई..... 

मैं ऐसा ही बहता हुआ जल पीता जा रहा था.... 

धुंध का प्रकोप..... बस कुछ दूर तक ही दर्शनीय था.... 

हमारा रास्ता रोक यह झरना बोला... क्या मेरे साथ फोटो नही खिंचवाओगें जनाब जी 

यात्रा की प्रथम बर्फ.....कुशां नाला ग्लेशियर 




कुंशा नाले पर हम दोनों.... 

इस यात्रा की पहली बर्फ पर स्पर्श.... 



हमने अपनी चंचलता पर काबू रखा, नही तो वहाँ कई लोग खूब आनंद मंगल हो रहे थे.... 

कुंशा नाला.... और विशाल रतन जी 

पर्वत राज..... वाह तेरी सुडोलता 

कुछ नाराज़ से रास्ते...!!! 

पर्वत राज पर मोहित... मैं या ये बादल 

रास्ते में कई जगह तो बस एक ही मौका मिलता है... आगे कदम बढ़ाने का,  जरा सी असावधानी और नतीजा दूसरों को सावधान कर जाता है, दोस्तों 

अरे, वो देखो.....भीम तलाई, जहाँ से हम चले आ रहे है 

रास्ते का एक रंग ऐसा भी......


फन फैलाए शेषनाग की आकृति वाला पत्थर..... 

 पहाड़ की ऊँचाइयों पर प्राकृतिक रुप में बने हरी घास के मैदान..... 

पर्वत राज का चेहरा.........उस पत्थर को ध्यान से देखो, दोस्तों... 

लो, यात्रा पथ पर हमारे कदम फिर से हंसते-मस्कुरातें कानूनगो साहिब त्रिभुवन शर्मा जी से जा मिले.... 

आपसी वार्तालाप के समय का चित्र,  त्रिभुवन जी की आँखें नम है... जबकि मैने अपने आँसू छिपा लिये...