रविवार, 17 सितंबर 2017

भाग-21 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.... Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-21 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                                    "मन में दबी आस्तिकता का, दिमाग की नास्तिकता पर भारी पड़ना "

                           23जुलाई, 2016.... मैं और मेरे पर्वतारोही संगी विशाल रतन जी श्री खंड महादेव कैलाश यात्रा के आखिरी पड़ाव "भीमद्वारी" (3630मीटर) में एक टैंट में कई सारे कम्बलों के बीच दुबके पड़े सो रहे थे कि एक चिरपरिचित तीव्र संगीतमय ध्वनि ने हमारी निद्रा तोड़ी,  वो मेरे मोबाइल पर लगा 2बजे का अलार्म था.... घड़ी पर उस समय टैंट के अंदर का तापमान 10डिग्री था,  और अब समय आ चला था...अपने सपने को पूर्ण करने के लिए भीमद्वारी से अंतिम चढ़ाई चढ़ने का, सो उठ कर अपनी कमर कसनी आरंभ कर दी और हमारा पथप्रदर्शक "केवल" भी अपने टैंट से बाहर से निकल आया...
                    उस समय मौसम में ठंडक तो थी पर हवा भी शायद सारा दिन चल-चल कर अब सो चुकी थी और आसमान में चन्द्रदेव मस्कुरा रहे थे...... करीब आधे घंटे भर में हम तैयार हो नवनीत की रसोई में पहुँचें तो नवनीत रात ढाई बजे हमारे लिए परौठें बना रहा था, जो हमे पैक कर साथ दिये जाने वाले थे...... नवनीत और केवल ने कहा कि हम ऐसे ही हर रोज आधी रात को उठ कर परौठें बना कर हमारे पास ठहरे यात्रियों को देते है कि वो रास्ते में अपनी भूख मिटा सकें..... मैने हंसते हुए विशाल जी से कहा कि यात्रियों की यात्रा का सारा पुण्य तो नवनीत जैसे मददगार ही कमा जाते हैं,  जिनकी वजह से इंसानी बस्ती से इतनी दूर हम जैसे यात्रियों को घर जैसी अनुभूति होती है......
                      दोस्तों,  एक बात और बताना चाहता हूँ कि 15जुलाई से 25जुलाई हर साल यात्रा के दौरान श्री खंड सेवा दल की तरफ से यात्रापथ के आखिरी पड़ाव भीमद्वारी में भी लंगर की व्यवस्था होती है,  जहाँ यात्री निशुल्क भोजन व रात्रि विश्राम भी कर सकता है.....
                      तीन बजने में अभी दस मिनट बाकी थे,  शिव भोले का जयकारा लगा अब हम तीनों अंधेरे में पगडंडी पर "प्रकाश गोले"  डाल कर उनका पीछा कर रहे थे.....आँखों में अंधेरा,  नाक में ठंडक की खुशबू और कानों में गिरते झरनों की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी......आधा घंटा चलते रहने पर पार्वती झरने की मधुर ध्वनि अब शोर में बदल चुकी थी और अब तीनों अकेले नही थे पगडंडी पर हमारे आगे-पीछे अब कई आवाजे़ भी प्रकाश गोलों का पीछा करती हुई आगे बढ़ रही थी,  हमारी बैटरियों के प्रकाश गोले हमे ऊँचाई से गिर रहे पार्वती झरने के दर्शन करवाने में असमर्थ साबित हो चुके थे..... और अब सीधी चढ़ाई हमारी साँसें को उखाड़ रही थी,  वह पार्वती बाग की चढ़ाई थी.... उस चढ़ाई में हमारे पीछे कई सारे व्यक्तियों का दल चल रहा था,  जिसका नेतृत्व दो व्यक्ति कर रहे थे जिन्होंने देसी ढंग से अपनी टोपियों के बीच टार्चें फंसा उन्हें हेड लाइट का रुप दे रखा था... वे दोनों पेशावर जान पड़ते थे जो ग्रुपों को इक्ट्ठा ला कर श्री खंड ले जाते होगें..... उन दोनों में से एक व्यक्ति बार-बार ग्रुप को हिदायतें देता जा रहा था कि ऐसे करो,  वैसे करो.. अब आप सब इतनी ऊँचाई पर पहुँच चुके हो कि आपके व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ जाएगा,  आपको गुस्सा आएगा... पार्वती बाग पहुँच कर आप सब को दो-दो गोली खानी है डिसप्रिन की, याद रखना...!!!
                        मैने उस व्यक्ति की बात सुन केवल और विशाल जी को रोक लिया कि इन महाशय और इनके अनुयायियों को आगे जाने दें, इनकी बातें सुन कर हम कहीं पथभ्रष्ट ना हो जाए...हम भी चिड़चड़े हो कर गुस्से में ना आ जाए और हमे भी दो गोली डिसप्रिन की इस ठंडे जंगल में खोजनी पड़े..... और हम उस ग्रुप को अपने आगे निकाल मस्ती की चाल चलने लगे.....
                         डेढ़ घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद हम पार्वती बाग के पास पहुँचें तो केवल ने हमे कहा, " वो देखो भैया, ऊपर श्री खंड महादेव शिला "     और उस अंधेरे में हमें दूर पहाड के शिखर पर  श्री खंड शिला के दर्शन हुए,  पर वो दर्शन मात्र अनुमानित ही थे क्योंकि अंधेरे में सिर्फ हमें आकाश के हल्के रंग सी पृष्टभूमि पर श्री खंड शिला का गहरा रंग परछाई सा नजर आ रहा था..... और हम दोनों ने वहीं रुक कर श्री खंड भगवान को नमन किया, कुछ समय श्री खंड शिला को निहारतें रहे और फिर ऊपर की ओर चढ़ने लगे......
                           रास्ते पर कुछ टैंट आए मतलब कि पार्वती बाग आ चुका था.... केवल ने बताया कि यहाँ रेस्कयू वालों के टैंट जो यात्रा के समय तक रहता है और कुछ टैंट दुकानदारों के भी है,  कुछ वर्ष पहले तक तो भीमद्वारी की बजाय पार्वती बाग में ज्यादा टैंट लगे होते थे... परन्तु अब सरकार ने इन्हें सीमित कर दिया है,  क्योंकि इस से पार्वती बाग की प्राकृतिक सुंदरता नष्ट हो रही थी,  अभी तो अंधेरा है... जब हम श्री खंड दर्शन कर वापस आऐंगे तो देखना क्या, देखते ही रह जाओगें भैया पार्वती बाग की सुंदरता को... मान्यता है कि इस स्थल पर माता पार्वती का द्वारा लगाया बग़ीचा है,  जिसमें फूलों की कई सारी किस्में पाई जाती है......
                           भीमद्वारी से 2घंटे की लगातार चलते रहने के बाद हमने पार्वती बाग में बने माँ पार्वती के छोटे से मंदिर पर पहुँच नमन किया.... और अब "नयन सरोवर" की ओर उस रास्ते पर चढ़ रहे थे जिसमें पत्थर-चट्टानें ही थी,  आसमान कालेपन से नीलेपन में आने लग पड़ा था,  जो पौ फूटनें का संकेत दे रहा था.......
                           चलते-चलते राह किनारे उगे उस फूल को देख मेरी बांछें खिल गई,  क्योंकि वो लम्हा जीवन में पहली बार साक्षात "ब्रह्मकमल पुष्प " दर्शन का था,  कुछ ऐसा ही हाल विशाल जी का भी था.... ब्रह्मकमल पुष्प बेहद पवित्र पुष्प माना जाता है जो सामान्यतया समुद्र तट से करीब 4000मीटर की ऊँचाई पर उगता है,  वर्ष में एक बार जुलाई-अगस्त के महीने में ब्रह्मकमल खिलता है.... जैसे संसार में प्रत्येक पौधे-वृक्ष के फूल दिन के समय सूर्य की रोशनी में खिलतें हैं,  केवल ब्रह्मकमल ही ऐसा फूल है जो रात के समय खिलता है और मान्यता है कि ब्रह्मकमल को खिलते देखना अति सौभाग्य की बात है और इस दिव्य दर्शन करने वाले व्यक्ति के जीवन में शुभ ही शुभ होने वाला है.... जैसे-जैसे रात गुज़रती है इस दिव्य पुष्प की पंखूड़ियाँ भी बंद हो जाती है.....
                            परन्तु दोस्तों,  मैने ब्रह्मकमल को छुआ तक नही...बस खुशी से उसे दूर से देखता रहा,  ठीक वैसे ही जैसे हम पालने में पड़े हाथ-पाँव मार रहे नन्हें से शिशु को मंत्रमुग्ध हो देखते रहते है...!!!
                             और,  वहीं एक जगह पत्थर पर भी लिखा था कि फूल तोड़ने मना है...... अभी पिछले महीने ही "किन्नर कैलाश " यात्रा कर आया हूँ,  इस यात्रा के दौरान मुझे तीन स्थानीय लड़के मिले थे... जो किन्नर कैलाश शिला के दर्शन कर वापस आ रहे थे,  उनके हाथों में बहुत सारे ब्रह्मकमल थे जो वे पर्वत की ऊँचाइयों से तोड़ कर ला रहे थे,  मेरे मन की चंचलता भी जाग उठी,  मैने जब उन ब्रह्मकमलों के गुलदस्तों को अपने हाथों में पकड़ एक यादगारी चित्र खिंचवाया....यकीन मानना मित्रों,  इन पुष्पों से आ रही सुगन्ध ने मुझे अलौकिकता का अनुभव करवाया और वह दिव्य सुगन्ध बहुत समय तक मुझे मेरे पास से आती रही......
                              सवा पाँच बजे ही एक दम से प्रकाश होने लगा और पीछे मुड़ कर देखा तो घाटी में जैसे प्रकृति ने किसान बन ब्रह्मकमलों की खेती कर रखी हो,  बहुत अद्भुत दृश्य था इतने सारे ब्रह्मकमलों को एक साथ देखना.... ब्रह्मकमल देखने के पश्चात एकाएक मुझे जाने क्या होने लगा,  कौन सा भाव मुझ नास्तिक की आँखों में पानी भर गया.. शायद मेरे मन में दबी हुई आस्तिकता उभर कर मेरे दिमाग की नास्तिकता पर भारी पड़ रही थी और मैं जोर-जोर से जय शिव भोले चिल्लाने लगा.................... और फिर एकाएक शांत हो पुन: उन पत्थरों की ओर बढ़ने लगा जिस पर पीला रंग कर आगे बढ़ते रहने का संकेत दिया हुआ था।

                                                     .......................................(क्रमश:)
रात 2बजे अलार्म बजा,  और उठ कर घड़ी में देखा कि उस समय टैंट के अंदर का तापमान 10डिग्री था... 

और, रात ढाई बजे देखा तो नवनीत हमारे लिए परौठे बना रहा था... 

लो,  जी मैं तो तैयार हो गया..... 

भीमद्वारी से चलने के समय खींचा चित्र..... और हमारा पथप्रदर्शक केवल

उस समय शायद हवा सारा दिन चल-चल कर सो गई थी..... और आसमान में चंद्रदेव मस्कुरा रहे थे 

हमने अपने पीछे चल रहे एक दल को आगे निकाल दिया.....
आसमान का रंग अब कालेपन से नीलेपन में बदला शुरु हो रहा था.... 

पार्वती बाग से श्री खंड महादेव शिला के दूरदर्शन......


उस अंधेरे में चलते हुए..... बस चाँद ही सबसे खूबसूरत दिख रहा था,  दोस्तों 

पार्वती बाग पहुँच.... माता पार्वती मंदिर पर नमन 

चाँद की चांदनी में माता पार्वती का मंदिर.... 

पार्वती बाग से रास्ता अब पत्थरों-चट्टानों वाला शुरु हो गया.... 

सामने दिख रहा "बसार गई पर्वत" जिसपर चढ़ कर हमे श्री खंड महादेव शिला की ओर बढ़ना था... और पत्थर पर बनाई किसी अभिलाषी की भगवान शिव से नया घर प्राप्त करने की मनोकामना.... 

ब्रह्मकमल........वो दिव्य पुष्प जो रात में ही खिलता है 

ब्रह्मकमल और चाँद.... 

यह अद्भुत दृश्य देख ऐसा आभास हुआ,  कि प्रकृति ने जैसे किसान बन इन ब्रह्मकमलों की खेती कर रखी हो... 

ब्रह्मकमल देखने के उपरांत, नाजाने कौन सा भाव मुझे नास्तिक की आँखों में पानी भर गया...
शायद मेरे मन में दबी आस्तिकता,  दिमाग की नास्तिकता पर भारी पड़ रही थी और मैं जय शिव भोले चिल्लाने लगा...!! 

फिर एकाएक शांत हो इन पीले रंग से रंगे पत्थरों की ओर बढ़ने लगा, जिनपर आगे बढ़ते रहने का संकेत था...



                

शनिवार, 9 सितंबर 2017

भाग-20 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-20 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर से.....
                                        " मौसम में ठंडक, पर जज़्बातों में गर्मी..! "

                           
                                           श्री खंड महादेव यात्रा के अंतिम पड़ाव "भीमद्वारी" में..... मैं और विशाल रतन जी टैंट में बैठे थे कि टैंट मालिक नवनीत ने आ कर कहा कि भैया रात की रोटी यहीं टैंट में ले आऊँ.....तो मैं झट से बोला, " नही भाई,  हम तो आपकी रसोई में जलते हुए चूल्हे के आगे बैठ कर ही खाना खायेंगे....ठीक वैसे, जैसे मैं बचपन में सर्दियों के दिनों में अपने घर में अक्सर खाता था,  मेरी बात सुन विशाल जी उत्साहित हो गए....!!
                         और,  हम दोनों रसोई में पहुँच चूल्हे के आगे बैठ आग सेंकने लगे,  उस वक्त और उस ठण्डी जगह में सबसे प्यारी चीज हमें आग ही तो लग रही थी दोस्तों.... जैसे ही हमारे आगे खाना परोसा गया, क्या कहूँ दोस्तों... उस गर्मागर्म व ताज़े बने भोजन से जो भाप उठ रही थी,  उस भाप की भीनी-भीनी सुगन्ध ने हाथों को मजबूर कर दिया कि झट से थाली उठा ले विकास नारदा...!!
                          माँह-चनें की काली दाल और चावल.... बेहद ही स्वादिष्ट,  फिर उसी थाली में गर्मागर्म राजमाँह व चावल के तो क्या कहने,  एक से एक बढ़ कर स्वाद की लहरें बह रही थी.... यहाँ तक कि उस समय परोसा गया पानी भी बहुत मीठा लग रहा था,  क्योंकि यदि भोजन खिलानें वाले की नीयत में खुशदिली हो तो भोजन खुद व खुद स्वादिष्ट बन जाता है.... ठीक इसी प्रकार का खुशदिल रवैय्या नवनीत का था,  वह और उसकी बुआ का लड़का " केवल " हमारी खूब मेहमान नवाज़ी कर रहे थे,  और यह "केवल " हमारी शेष बची श्री खंड यात्रा में कल सुबह को गाइड बनने वाला था....
                          तभी रसोई के अंदर एक नेपाली सज्जन आ हमारे सामने बैठ गए,  नवनीत ने उन्हें भी भोजन परोसा... मैने नवनीत से पूछ ही लिया कि यह कौन है, तो नवनीत ने कहा, " इनका नाम भीम बहादुर है,  आज नीचे से हमारे लिए 35किलो आटा उठा कर लाये हैं... सुबह 6बजे हमारे घर से आटा उठा कर शाम साढे सात बजे हमारे पास आ पहुँचें है...! "           हमारे लिए यह बात बिल्कुल अविश्वसनीय थी कि 55साल का अधेड़ आदमी 35किलो वजन उठा एक दिन में ही उस रास्ते को चढ़ आया,  जिसे हम ढाई दिन में चढ़ कर आ रहे है.... भीम बहादुर के इस काम के मेहनताना पूछने पर नवनीत ने कहा कि पूरे श्री खंड मार्ग पर जगह- जगह सामान उठा कर पहुँचने वाले कुलियों का मेहनताना तय है,  यहाँ भीमद्वारी में 55रुपये प्रति किलो के सामान नीचे से लाया जा रहा है.....मैं झट से बोल पड़ा, " तो 25रुपये किलो का आटा यहाँ तक पहुँचतें-पहुँचतें 80रुपये किलो पड़ जाता है...!! "
                           नवनीत ने कहा, " जी हां,  एक गैस का सिलेंडर नीचे से लाने और वापस ले जाने में 500रुपये के सिलेंडर की कीमत 5000रुपये हो जाती है... और इतनी ऊँचाई पर जलावन के लिए लकड़ी का प्रबंध करना भी बेहद ख़र्चीला व कठिन कार्य है...! "        
                            मैने विशाल जी से कहा, " नवनीत की बात सुन कर...मुझे अब प्रति व्यक्ति भरपेट एक समय के भोजन का 120रुपये लेना ज्यादा नही लग रहा,  क्योंकि इतनी ऊँचाई पर जहाँ चीजों का पहुँच-मूल्य पांच से दस गुना तक पहुँच जाता है... इस हिसाब से हम यात्रियों को दी जा रही रहने-खाने की सुविधा तो बिल्कुल जायज़ मूल्यों पर है..... परन्तु मैने अभी पिछले महीने ही अपने परिवार संग कश्मीर भ्रमण किया था,  वहाँ के खाने-पीने के मूल्य भी इसी प्रकार आसमान छूँ रहे थे...सुबह के नाश्ते में मिलने वाला परौठा 55रुपये में एक,  वो आचार के साथ... दही लेना हो तो 30रुपये अलग,  25रुपये का चाय का कप....कुल मिला कर एक व्यक्ति का सुबह का नाश्ता ही दो सौ-सौ के नोट हज़म कर जाता है... किसी दूर-दराज के पहाडी शिखर पर नही, भाई सड़क के किनारे बने ढाबों पर..... !!
                             पूछने पर हर किसी के पास रटा-रटाया जवाब है कि यहाँ तक सामान पहुँचने में बहुत "ट्रांसपोटेशन" पड़ जाती है.... परन्तु जब मैं उनके ढाबें देखता था तो राजस्थान का संगमरमर पत्थर फर्श क्या दीवारों पर भी मढ़ा गया था,  जो उनकी कमाई की मुँह बोली तस्वीर थी....!!
                              "पर्यटकों के भाग्य में ही होता है लुटना,  पर श्री खंड वाले दुकानदार मेरे अनुभव के अनुसार जो भी मूल्य हम यात्रियों से वसूल रहे हैं... वह उनकी "ट्रांसपोटेशन " के अनुसार बिल्कुल उचित है.....!! "
                               बचपन से ही एक फिल्मी गाना सुनता आ रहा हूँ, " यह कश्मीर है, यह कश्मीर है..!!! "     और आधी जिंदगी बीत जाने के बाद कश्मीर जाने का मौका मिला,  परन्तु जिस कश्मीर की शक्ल वो पुराने फिल्मी गानों दिखाई गई थी.... वो मुझे नही दिखाई दी,  क्योंकि कश्मीर का बिगड़ा माहौल आपकी मानसिक स्तिथि को भी बिगाड़ देता है....हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ, चंदनवाड़ी में अमरनाथ यात्रा की पहली सीढ़ी पर अपने परिवार सहित नमन कर.... पहलगाँव की सुंदरता को देख कर श्री नगर जाते हुए पता चला कि जिस "पम्पोर" शहर के बंद बाज़ार में कुछ जरुरी सामान खरीदने के लिए हम खड़े हैं... कि अभी आधा घंटा पहले यहीं सात "भारतीय फौजी" मार दिये गए.... स्थानीय लोगों के मुख से "भारतीय फौजी" सुनना मुझे बड़ा अजीब लगा,  ठीक कुछ इसी प्रकार एक शाल बेचने वाले कश्मीरी व्यापारी ने पहलगाँव के होटल में यह कह कर हमें शाल बेचे कि अपने देश के इस गरीब वासी की मदद करो और शाल खरीद लो,  यही बात फिर दोबारा मुझे गुलमर्ग  में सुनने को मिली... कि अपने देशवासी की मदद करो, यह खच्चर किराये पर ले लो..
                               मैं कन्याकुमारी तक घूमा हूँ पर यह बात मुझे किसी ने भी कहीं भी नही कही, "अपने देश के वासी की मदद करो "         अरे जब तुम लोगों को हम पर्यटकों से कुछ लेना-देना होता है तो अखंड देश याद आ जाता है,  नही तो मुझ से एक स्थानीय ने यहाँ तक पूछ लिया, " भारत से आए हो....!!!! "
                                मेरी बातें सुन विशाल जी बोले, " पर लेह-लद्दाख क्षेत्र भी तो जम्मू-कश्मीर का भाग है,  वहाँ ऐसा कोई माहौल नही है और कश्मीर की असली प्राकृतिक सुंदरता तो उसी क्षेत्र में बिखरी पड़ी है विकास जी..! "
                                 मैने जवाब दिया, " मैं अभी तक लेह नही जा पाया, भविष्य में जरूर जाऊँगा.. वैसे जम्मू क्षेत्र भी तो कश्मीर का ही भाग है,  वहाँ के लोग व माहौल बेहद दोस्ताना और शांत है.. मैने अपनी कश्मीर यात्रा से यह अनुभव किया कि जैसे ही आप जम्मू क्षेत्र से पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला में बनी जवाहर टनल को पार कर कश्मीर क्षेत्र में पहुँचतें हैं, मौसम में ठंडक पर जज़्बातों में गर्मी आनी शुरू हो जाती है.... विशाल जी,  सोने की ईंटों से सजे महल के मेहमान क्या बनना..जिसके मालिक का रवैय्या ही उखड़ा हो, उससे तो अच्छा नवनीत का यह कच्चा झोंपड़ा ही है,  जो हमें पूर्ण सत्कार दे रहा है...!! "   मैं हंसते-मस्कुरातें नवनीत के चेहरे की तरफ इशारा कर बोला....
                                 और,  भोजन करने के पश्चात हमने केवल से कल सुबह श्री खंड चलने का कार्यक्रम निश्चित किया,  आगामी सफ़र के लिए तड़के मुँह अंधेरे 3बजे चलने का समय रखा गया.... और हम दोनों साढूं भाई करीब साढे आठ बजे अपने टैंट में आ, आधी रात 2बजे का अलार्म लगा सो गए......

                                                    .................................(क्रमश:)
ताज़े बने भोजन से उठ रही भाप तो देखो.... दोस्तों 

और,  फिर उसी थाली में राजमाँह-चावल परोसे गए.... 

चूल्हे के आगे बैठ खाना खाते हम और नवनीत हमे खाना परोस रहा था.... 

नवनीत की बुआ का लड़का "केवल" जो कल हमारी बाकी बची श्री खंड यात्रा का पथप्रदर्शक बनने वाला था.... और नेपाली भारवाहक "भीम बहादुर "

रात के समय भीमद्वारी के टैंटो में सौर-ऊर्जा से चालित दीप..... 

शनिवार, 2 सितंबर 2017

भाग-19 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.... Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-19 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                           " आँखों की पुतलियों का पुतली बन नाचना "   

                                                  22जुलाई, 2016...............लूनावाडी  स्थान से चाय पीने के बाद कोई आधा घंटा चले,  और एक मोड़ आया जिस पर एक टैंट गड़ा था व उसके आगे एक बोर्ड लगा था... जिससे ज्ञात हो गया कि हम श्री खंड महादेव यात्रा के अंतिम पड़ाव "भीमद्वारी" पहुंच चुके हैं.... समय चार बज चुके थे,  जैसे ही मोड़ मुड़ कर आगे बढ़े... तो दूर धुंध में एक धुँधली सी बस्ती नज़र आई और एकाएक वहाँ क़ुदरत का करिश्मा देखा दोस्तों,  कि दूसरे ही पल हवा का एक झोंका उस धुंध को अपने संग उड़ा ले गया.... और वह धुँधली सी बस्ती एकाएक हमारी आँखों के समक्ष निखर आई,  और विशाल रतन जी अपना चिरपरिचित तकिया कलाम बोल उठे "औसम्"
                 जैसे-जैसे किश्तों में हवा धुंध को पीछे धकेल रही थी, वैसे-वैसे ही किश्तों में भीमद्वारी की विहंगम दृश्यावली हमारे समक्ष प्रकट हो रही थी... तीनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के मध्य एक बेहद बड़ी मैदान नुमा ढलान और उस ढलान में जहाँ तक मेरी नज़र जा रही थी, यात्रा सम्बन्धी टैंट ही टैंट नज़र आ रहे थे..... लूनावाडी में हमें दुकानदार ने सलाह दी थी कि भीमद्वारी में जितना हो सके आख़िर वाले टैंटों में ही रुकना... ताकि कल सुबह जल्दी जाने में आपका अगला रास्ता कुछ कम हो जाए,  इसलिए हम दोनों ने कई सारे शुरूआती टैंट तो ऐसे ही बगैर देखे पार कर दिये.... कुछ मध्य में पहुँचें तो एक मस्कुरातें से चेहरे ने बड़े प्यार से हम से पूछा, "भैया टैंट" .........  वो "नवनीत" था,  और हमने आगे जाने का विचार छोड़ हंसमुख से नवनीत के मेहमान बनना मुनासिब जाना......
                   दो जन योग्य अंग्रेजी तम्बू में हम दोनों जन पहुँच चुके थे और साथ ही साथ चाय व पचास-पचास वाले बिस्कुट भी आ पहुँचें.... धुंध ने फिर से भीमद्वारी पर अपना कब्जा जमा दिया था,  सो अब कुछ नज़र नही आ रहा था... सो चाय पी कर लमलेट होना इन थके शरीरों की मजबूरी थी..... मजबूर शरीर एक ढेड घण्टा लेट कर फिर से मजबूत बन गया तो मैं झटके से उठ,  फिर से बाहर देखने की चाह ले...टैंट से बाहर निकला तो सामने पहाड से गिरता झरना देख,  विशाल जी को जोर- जोर से आवाज़ें लगाने लगा कि आप का "औसम्" फिर से आ गया जनाब जी ....!!!
                    मैं और विशाल जी अभी उस झरने की सुंदरता को पचा नही पाये थे कि एकाएक धुंध हटी और विशाल जी चीखे, " विकास जी उस तरफ देखो..! "   और अब मेरी आँखें भी विशाल जी की आँखों की तरह ही जम चुकी थी.... वो "पार्वती झरने" के प्रथम दर्शन थे दोस्तों..... तभी प्रकृति देवी को हम गरीबों पर दया आ गई और उसने धुंध को नीचे घाटी की ओर निरिक्षण करने भेज दिया.... तो अब सम्पूर्ण भीमद्वारी नज़र आ रहा था,  हमारी आँखों की पुतलियाँ अब "पुतली" बन नाच रही थी, कभी सामने "मटरनडी पर्वत शिखर" पर जा रही सूर्यास्त की स्वर्णिम किरणें देखती,  तो मध्य दुधिया झरना दिखता,  फिर एकाएक पार्वती झरना पर जा पहुँचती.... परन्तु मेरी आँख की पुतली को कहाँ चैन,  फिर उछलती और "रोपा पर्वत " के शिखर छू कर "कुंशा पर्वत" तक पहुँच....फिर से मटरनडी पर्वत पर पहुँच जाती,  बस यह ही क्रम मुझे गोल-गोल घूमाता रहा....... कि विशाल जी फिर बोले, " वो देखो विकास जी,  पार्वती झरने के पास भेड़ों का कितना बड़ा झुंड...!"     वे भेड़े दिन भर चर कर अपने डेरे की ओर वापस आ रही थी......
                    दोस्तों,  यह रमणीक स्थल मेरे जीवन के देखे हुए बेशुमार पर्वतीय स्थलों में सबसे अधिक सुंदर है....मैं तो कहता हूँ कि इस की प्राकृतिक सौम्यता के आगे "गुलमर्ग" के रंग भी फीके है...!!!
                     वहीं टैंट के बाहर खड़े-खड़े नवनीत के पिता संसार चंद जी से हमारी भेंट हुई तो मुझ जिज्ञासु व व्याकुल व्यक्ति के प्रश्नबाण, दिमाग़ रुपी तरकश से निकलने आरंभ हो चले..... ये क्या,  वो क्या,  ये ऐसे क्यों है,  वो ऐसे क्यों है, आदि-इत्यादि...!!!  आप लोग इतना सामान इतनी दूर नीचे से ऊपर कैसे ढो कर लाते हो,  हर वर्ष वार्षिक यात्रा के लिए....... तो संसार चंद जी ने उत्तर दिया कि इनमें जो सामान खराब होने वाला नही होता,  उसे हम लोग एक गड्ढा खोद... उसमें भर कर ऊपर से मिट्टी डालकर बंद कर जाते हैं,  सारी सर्दियाँ उन पर पचासों फुट बर्फ जमी रहती है और बर्फ पिगलने के बाद अगली वार्षिक यात्रा शुरू होने के एक महीने पहले हम पुन: यहीं लौट कर आ, उन गड्ढों को फिर से खोल कर अपना सामान निकाल कर टैंट आदि लगाने शुरू कर देते है.... कई बार तो बचा हुआ सूखा राशन भी इन गड्ढों में रख जाते हैं और ताज़ुब भी बात है, वह राशन भी बिल्कुल उसी हालत में ठीक-ठाक मिलता है, जिस हालत में हम उसे रख कर नीचे अपने गाँव चले जाते हैं.....
                      और,  बातें करते-करते संसार चंद जी हमें भीमद्वारी के प्रसिद्ध "लाल पानी" दिखाने ले जाते है,  जो उनके टैंटों से कुछ ही दूरी पर था..... पहाड में से भूमिगत रूप से जल निकल रहा था और जल बहने वाली सारी भूमि व चट्टानें लाल रंग से रंगे पड़े थे,  संसार चंद जी ने कहा कि यहीं भस्मासुर की जीवन लीला समाप्त हुई थी.....
                       दोस्तों,  स्थानीय लोगों की विश्वास है कि एक राक्षस प्रवृति व्यक्ति ने तपस्या कर भगवान शिव से एक घातक वर माँग लिया कि मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूँ वो भस्म हो जाए, वर प्राप्ति के उपरांत वह व्यक्ति "भस्मासुर" नाम के जाना जाने लगा.... तत्पश्चात भस्मासुर  माता पार्वती पर मोहित हो कर, उसके कपटी मन में कपट जागृत हो गया तो वो अपनी घातकता भगवान शिव पर आज़मानें लगा,  तो भगवान शिव उस कपटी राक्षस से इस पर्वतीय क्षेत्र श्री खंड में लुक-छिप कर बच रहे थे..... भगवान शिव की विवशता को जान भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर भस्मासुर को अपने रूप के जाल में फंसा... नृत्य करते हुए उसका अपना हाथ ही उसके सिर पर रखवा दिया और वो कपटी भस्मासुर स्वयं ही भस्म हो गया.....!!!
                       दोस्तों,  सच बात बोलता हूँ ज़रा सी कड़वी तो होती है ही मेरी बातें.... मैं संसार चंद जी से बोल उठा कि ठीक इसी प्रकार की कहानी मैने मध्य प्रदेश भ्रमण के दौरान "पंचमड़ी" नामक पर्वतीय स्थल पर भी सुनी थी,  अब किसे सत्य मानूँ...!          खैर दोस्तों, तर्क बुद्धि इंसान हूँ....पर हिन्दू हूँ तो सब कुछ जानते- समझते हुए भी उन पुरातन लोक-कथाओं को सुनना व सुनाना मुझे आप लोगों की तरह ही अच्छा लगता है, क्योंकि इनमें से हमारे धर्म की प्राचीनता व भव्यता प्रकट होती है.......
                       मैने अपनी अंजलि में भर कर उस लाल पानी का स्वाद चखा,  जो देखने में लाल रंग का नही बल्कि सामान्य पानी ही लग रहा था.... परन्तु उसका स्वाद सामान्य नही अपितु ज़ंग लगे पानी जैसे था,  और मैने विशाल जी से कहा कि दरअसल इस पहाड की चट्टानों का रंग काला होने से यह बात साबित होती है कि इन चट्टानों में लोह तत्त्व की बहुतायत है.... और यह जल रिसता हुआ इनके सम्पर्क में आने के कारण रासायनिक क्रिया का शिकार हो चुका है.... इस जल के यदि हम चार घूंट पी ले तो,  हमारे उदर में भी रासायनिक क्रियाएं आरंभ हो जाएगी,  इस जल को पचाना बेहद कठिन है... लौहयुक्त चट्टानों के साथ पानी और हवा के मिल जाने पर उन पर ज़ंग जैसा लाल रंग लगा हुआ है जी,  यदि अतीत में मेरे परदादा जी अपने समय में यहाँ पहुँचतें तो अवश्य इस को देख कर चकित रह जाते और यदि भविष्य में मेरे पड़पोतें यहाँ पहुँचेंगे तो शायद इस पहाड पर यह लाल पानी का स्रोत भी "ग्लोबल वारमिंग"  की वजह से विलुप्त हो जाए.... और बर्फ केवल माउंट एवरेस्ट की चोटी पर ही मौजूद हो....!!!!!
                           अग्रिम यात्रा की पूछताछ पर संसार चंद जी ने कहा, "आपको कल मुंह-अंधेरे तीन बजे तड़के ही अपनी यात्रा प्रारंभ करनी होगी,  तभी आप कल शाम तक वापस भीमद्वारी पहुँच पायेंगें...!!"
                            लाल पानी से वापस टैंट की ओर लौटते हुए विशाल जी एकाएक बोले, " हम कल की यात्रा के लिए एक गाइड साथ ले कर चलते हैं...! "         मैने उनकी बात एक दम सिरे से दरकिनार कर दी और अहम भरे बोल बोला कि अब बचा ही क्या है,  जो हमें किसी पथप्रदर्शक की आवश्यकता आन पड़ी है..... तो विशाल जी बोले, " नही,  अब यात्रा का सबसे कठिन भाग शुरू होने वाला है... चाहे इस पथ पर सैकड़ों लोगों के पद चिन्ह हमारे संग-संग पड़ रहे हैं,  परन्तु मेरा मन चाहता है कि मैं यहाँ से एक गाइड या मददगार संग लेकर श्री खंड जाऊँ,  मुझे यह पूर्ण अहसास है कि विकास जी आपको किसी सहारे की जरुरत कम ही आन पड़ती हैं,  परन्तु मेरी जरुरत है ताकि मैं इस कठिन यात्रा को पूर्णता का रूप दे सकूं...!! "
                             मैने फिर से कहा, " विशाल जी, मुझे आपका सहारा है और आपको मेरा... फिर क्यों तीसरे सहारे की आवश्यकता है,  आप तो मुझे भलिभांति जानते ही है कि मैं अपने परिश्रम का श्रेय खुद ही लेना चाहता हूँ... क्योंकि मैं कुछ अंतर्मुखी,  अड़ियल,  अकड़ू व अहम से भरा हुआ इंसान हूँ..!!! "
                             मेरी बात सुन विशाल जी मंद-मंद मस्कुराएें और बोले, " देखिए विकास जी,  हम हर वर्ष दो बार पर्वतारोहण के लिए निरंतर आ रहे हैं,  पर्वतारोहण के लिए स्थान व कार्यक्रम आप ही निश्चित करते हैं,  मैं तो बस आपके साथ चल देता हूँ... और यदि अतीत में देखे तो जमी हुई कमरुनाग झील की शीतकालीन ट्रैकिंग गाइड तुलसी दास की वजह से ही हम पूर्ण कर पाये थे और आपकी लमडल यात्रा की सम्पूर्णता का सेहरा भी राणा चरण सिंह के माथे पर है...!! "
                             विशाल जी की ये तर्कयुक्त बातें मुझ अड़ियल व्यक्ति के दिमाग़ की बत्ती जगा गई और मैने उन्हें तुरन्त गाइड साथ ले जाने की स्वीकृति दे दी.... और नवनीत को कहा गया कि वे हमारे लिए एक गाइड का प्रबंध करे.....!!!!!

                                                   ............................(क्रमश:)
लूनावाडी से आगे.... भीमद्वारी की ओर

भीमद्वारी से पहले..... प्रकृति को निहारता हुआ मैं 

अंतिम पड़ाव को दर्शाता यह चित्रपट...... 

और,  मोड़ मुड़तें ही धुंध के कारण कुछ नही दिखाई दे रहा था...... 

भीमद्वारी की शुरुआत..... 

दोस्तों, क़ुदरत का करिश्मा...... पहले पल का दृश्य धुंध ने धुँधला कर रखा था,  परन्तु दूसरे पल हवा ने उस धुंध को पीछे धकेल दिया और स्पष्ट दृश्य हमारे सामने था 
भीमद्वारी के शुरूआती टैंटों को बगैर देखें ही हम आगे बढ़ते रहे... क्योंकि लूनावाडी में हमें दुकानदार ने सलाह दी थी कि भीमद्वारी में आखिरी टैंटों में रहना, ताकि अगले दिन की अग्रिम यात्रा का रास्ता कुछ कम हो सके... 



जैसे-जैसे हम पगडंडी पर आगे बढ़ रहे थे.... हवा धुंध को पीछे धकेल रही थी 

परन्तु धुंध के कारण भीमद्वारी का आखिरी छोर कहीं दिखाई नही दे पा रहा था.... 
भीमद्वारी में मध्य रास्ते में एक मधुरभाषी आवाज़ ने हमारे कदम रोक दिये... और हम नवनीत के टैंट में ही रुक गए
वहीं से नीचे दिखाई देता श्री खंड सेवा दल का तीसरा लंगर.....जिसपर लाउड स्पीकर पर पहाडी गायक करनैल राणा का पहाडी भजन बज रहा था, "शिव पापीयों नू नहीं ओ मिलदें"



और, हम अंग्रेजी तम्बू में आ बैठे.... हमारे पीछे-पीछे ही चाय और पचास-पचास वाले बिस्कुट भी आ पहुँचें 

कुछ आराम करने के पश्चात... जब मैं टैंट से बाहर देखने की चाह लेकर निकला,  तो यह हसीन नज़ारा सामने था कि मटरनडी पर्वत पर सूर्यास्त की स्वर्णिम किरणें फैली हुई थी.... 

औसम्.....औसम्..... औसम् 

तभी धुंध हटी... और मैं चीखा, " विशाल जी वो देखो कितना खूबसूरत झरना...! "

वाह....क्या हसीन जल-प्रपात है

तभी विशाल जी ने कहा, " वो इस ओर देखो महाराज...कितना विशाल झरना है "
यह पार्वती झरने के प्रथम दर्शन थे,  दोस्तों 

झरने से ऊपर पार्वती बाग के पर्वत के मध्य भेड़ों का झुंड, जो इस चित्र के मध्य में देखे दोस्तों 

दोनों जल-प्रापतों का चित्र.... 


सारा दिन चरने के बाद भेड़ों का झुंड....अपने डेरे पर वापस आते हुए 

भीमद्वारी के प्रसिद्ध लाल पानी के बहाव के कारण भूमि भी लाल हो गई.... 

लाल पानी का मुहाना... 

संसार चंद जी को "निचोड़ता" हुआ मैं व्याकुल इंसान 

अपने जीवन में देखे हुए बेशुमार पर्वतीय स्थलों में... सबसे हसीन भीमद्वारी है ही है......



मंगलवार, 29 अगस्त 2017

भाग-18 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-18 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....
                                                " कहाँ ठोकरें खा रहे हो बादशाहों "    
     
                                         22जुलाई 2016.........दिन के ग्यारह बजने को थे और मैं व विशाल रतन जी भीम तलाई से अगले पड़ाव "कुंशा" के आस-पास पहुँच चुके थे.... कुंशा(3630मीटर) से कुछ पहले रास्ते में एक स्थानीय गद्दी नोया राम ने भी यात्रा के लिए अपनी दुकान लगा रखी थी,  वे दो जन अपनी भेड़े व उस अस्थाई दुकान को संभाल रहे थे...भूख भी जागृत थी, सो तम्बू में जा बैठे खाना खाने के लिए.... और आदतन अपने प्रश्नबाण फिर दाग़ छोड़े दुकानदार बने गद्दी भाई नोया राम की ओर,  कि अभी पीछे रास्ते में मिले शेषनाग के फन सी आकृति जैसे पत्थर वाले स्थान का क्या इतिहास है... मेरी बात सुन नोया राम जी हंसने लगे और धीरे से मेरे कान के पास हो बोले,  " वो नाग के फन वाला पत्थर मैने ही वहाँ रखा है, पिछले साल भेड़े चरातें वक्त मुझे वहीं रास्ते में वो पत्थर पड़ा मिला... चाहता तो था कि उस पत्थर को उठा कर अपने डेरे पर ले आऊँ, परन्तु भारी होने की वजह से वहीं रास्ते के किनारे उसे रख दिया और अब तो उस पर हर रोज फूल चढ़ रहे हैं भाई जी...!!! "         
                            मैं बोल उठा, " भाई आस्था है, यदि दो दीवारें और बना दो तो फूल क्या पैसे भी चढ़ने शुरु हो जाएंगे..!! " 
                              खैर,  नोया राम ने हमें राजमाँह के साथ गर्मागर्म कनक के फुल्के(रोटियाँ) भरपेट खिलायें... और फिर से यात्रा पथ पर खड़े थे,  तो चलते हुए मैने बाहर खड़े नोया राम के भाई से पूछा कि क्या आपने "निऔला" दे दिया... उन्होंने कहा, हां अभी कल ही दिया है.... दोस्तों, निऔला मतलब "बलि"....इस पुरातन प्रथा को अब भी कई गद्दी लोग निर्वाह कर रहे हैं, भगवान शिव को समर्पित यह बलि वर्ष में एक बार सावन के महीने में गद्दी लोग देते हैं कि हमारी भेड़-बकरियाँ बीमारियों और भालू के आक्रमण से बची रहे... खैर मैं तो बलि-प्रथा का निंदक हूँ, परन्तु उस समय मैने नोया राम व उनके भाई से इस कुप्रथा के बारे में टीका- टिप्पणी ना करने में ही भलाई जानी और हम दोनों अब बेहद खूबसूरत स्थल कुंशा में से गुज़र रहे थे... 
                             बेफिक्र हरियाली और मदमस्त फूलों से भरे क्षेत्र "कुंशा" में रास्ते के किनारे भी कई सारे टैंट लगे हुए थे,  सूर्य देव को बादलों और धुंध ने मिली-भगत कर गायब ही कर दिया था.....कुंशा भेड़-बकरी चराने वाले गद्दियों की आर्दश भूमि है, पेड़-झाड़ी रहित पहाड पर घास से भरी मैदान नूमा ऊँची-नीची धरती.... कुंशा से आगे बढ़ पहाड के कंधे से पार हो दूसरी तरफ गए तो वहाँ की खूबसूरती भी हमारी आँखों को स्थिर कर गई, हरियाली के दो रंग अब नज़र आ रहे थे.... गहरा हरा रंग "तांगुड" की झाड़ियों का और हल्का हरा रंग "चलिंगडू" नामक बूटी का...जिस की उस क्षेत्र में भरमार थी..... रास्ता अब कुछ कठिन व पथरीला सा आना शुरु हो गया, जितनी मुश्किल से हम पहाड के कंधे से नीचे की ओर उतरते,  उतनी ही मुश्किल से आगे बढ़ते हुए फिर दूसरे पहाड के कंधे पर चढ़ते..... और अब हमे बहुत दूर तक जा रही पगडंडी भी दिखाई देने लग पड़ी थी,  जो पहाडों की बनावट के अनुसार नीचे-ऊपर होती हुई दूर आगे धुंध में ही विलुप्त होती नज़र आ रही थी.... 
                             दोपहर के दो बजने वाले थे,  मैं विशाल जी से कुछ कदम आगे चल रहा था कि एक मोड़ पर कुछ लड़के और उनसे कुछ दूर एक व्यक्ति अलग सा बैठा था.... मेरे वहाँ पहुँचतें ही उस व्यक्ति ने पंजाबी भाषा में कहा, " किथे रुड़े फिरदे ओ बादशाहों...! " ( मतलब कि "कहाँ ठोकरें खा रहे हो बादशाहों")        उन अनजान व्यक्ति द्वारा हमसे ऐसा पूछना मुझे बड़ा अखड़ा,  तो मैं अहम में आ कुछ उखड़ी हुई ज़ुबान में बोला, " मैं गोल पत्थर की तरह हूँ जो रुड़-रुड़(ठोकरें खा-खा कर) यहाँ तक पहुँच गया हूँ... वरना चपटे पत्थर होते तो डाँडा धार भी नही चढ़ पाते जनाब...!! "
उन जनाब की आँखों पर बेहद मोटे शीशों वाला चश्मा चढ़ा हुआ था और चेहरा खोदा (जिस पर ढाढ़ी-मूछ ना उगती हो)  था... पता नही क्यों मुझे उनकी कही बात व शक्ल बहुत चुभ रही थी, इसलिए मैने उस समय उनकी तस्वीर भी नही खिंची.....  परन्तु दोस्तों, उनकी कही इस बात का अर्थ मुझे यात्रा के अंत में पता चला कि उनके मुख से यह बात क्यों निकली,  इस बात का ज़िक्र मैं यात्रा के अंत में करुगाँ तो आप मेरी व इन महाशय की मनोदशा बखूबी समझ पायेंगे... बस इस बात के बारे में आप लोग याद रखना, मैंने उनसे फिर पूछा कि आप कहाँ से हो...तो वे बोले, " बहादुरगढ़ दिल्ली से " ....और मेरे बारे में पूछने पर मैने कहा, "गढ़शंकर"
                               और, तभी पास बैठे उन लड़कों के समूह में कानाफूसी शुरु हो गई "गढ़शंकर-गढ़शंकर" ......मेरा ध्यान अब उन लड़कों की तरफ हो गया तो,  वे लड़के एक सुर में बोले..."हम भी गढ़शंकर वाले है,भाजी....!!"
                                 परन्तु मेरे लिए वो पांचों लड़कों की शक्ल एक दम नई थी कि एक व्यक्ति पीछे से चलता हुआ हमारे पास आ खड़ा हुआ, जिसकी शक्ल मैं भलिभाँति पहचानता था परन्तु नाम नही... उसने आ गर्मजोशी से मुझे गले लगा लिया और अपना नाम "पम्मा" बताया..... मैने पम्मे से हैरानी जाहिर की,  कि मैं आपको तो पहचानता हूँ... पर इन बाकी लड़कों को मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा हूँ, जो यह कह रहे हैं कि हम एक ही शहर में रहते हैं..... तभी उनमें से दो-तीन लड़के बोल पड़े, "हम तो आपको अच्छी तरह से जानते हैं, आपकी फ़लाँ-फ़लाँ जगह पर दुकान है आदि-आदि.........और पम्मे ने मुझे एक-एक कर उन सब लड़कों के बारे में बताया कि ये फ़लाँ का लड़का है और उस मुहल्ले में इसका घर है....
                                 अच्छा लगता है जब किसी अनजान जगह पर आपके कुछ जानकार मिल जाए... और फिर से हम सब यात्रा पथ पर थे.... आगे एक बहुत सुंदर झरना गिर रहा था,  हम दोनों वहीं रुक अपनी फोटो खींचने लगे... तो बाकी के सब आगे की ओर बढ़ गए,  आगे बढ़ते-बढ़ते पथ पर इतनी ज्यादा धुंध आ गई कि कुछ ही कदम ही आगे दृष्टिगोचर हो रहा था... आगे बढ़ने पर गिरते जल की कल-कल करती मधुर ध्वनि से यह तो अंदाज़ा हो गया कि अभी धुंध के बीच में से कोई बड़ा जल-प्रपात प्रकट होने वाला लगता है..... और दस कदम बढ़ने पर वही नतीजा आया कि एक अति सुंदर व बेहद विशाल जल-प्रपात का विहंगम दृश्य हमारे नयन-चक्षुओं को भेद पर दिमाग में जा बसा, और खुले हुए मेरे मुख से निकला " वाह" ......और विशाल जी भी अपना चिरपरिचित शब्द बोल उठे "औसम्"
                                  और,  अब आगे बढ़ते हुए नीचे उबड़-खाबड़ रास्ते को कौन देख रहा था.. कमबख़्त नज़रे तो बस उस जल-प्रपात की खूबसूरती पर गड़ी हुई थी.... तभी ध्यान भंग हुआ,  जब हमसे आगे निकल चुके पम्मे व उसके साथियों नें मुझे दूर से आवाज़ लगा कहा, " यदि हमारे शहर गढ़शंकर में ऐसा झरना हो तो...!! " 
                                  मैने भी अपना व्यंग्य-बाण दाग़ दिया, " हमारे शहर के गंदे पानी के नाले को तो प्रशासन व नगरपालिका को संभालनें में दो-चार होना पड़ता है,  इस झरने को क्या ख़ाक संभालगें....!!! "   और हम सब "गढ़शंकरिऐं" इस व्यंग्य पर हंस दिये...! 
                                   दोपहर के साढे तीन बजने वाले थे और हम श्री खंड महादेव के तीसरे व अंतिम पडाव "भीमद्वारी" से ज्यादा दूर नही थे,  सो रास्ते में "लूनावाडी" स्थान पर कुछ चाय इत्यादि के लिए रुक गए.... और उस दुकान पर एक सज्जन मिले,  जिनके अनुसार वो हिमाचल प्रदेश में कई सारे ट्रैक कर चुके थे....... और एक अन्य सज्जन और भी मिले,  जिनके साथी आगे जा चुके थे और वो कल से वहीं ठहरे हुए थे... सो हमारे साथ आगे जाने की फ़रमाइश करने लगे, परन्तु कुछ कदम हमारे साथ चलने के बाद यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि मैं आपको भीमद्वारी में मिलूँगां......... मैने विशाल जी से कहा, " चलो अच्छा हुआ पर अब हम इन्हें भीमद्वारी में नही मिलेंगे...!!"
                                    क्योंकि मेरी अपनी सोच है कि पर्वतारोहण के समय दल में यदि कम लोग होगें, तो यात्रा सुखद बनी रहेगी... नही एक-दूसरे-तीसरे की इंतजार में बहुत समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है,  इसलिए मैं और विशाल रतन जी केवल दोनों ही पर्वतारोहण करते है.....ताँकि एक-दूसरे के साथ-साथ चल सकें,  एक-दूसरे को संभाल सके और एक बोले तो दूसरा मान ले... इसलिए तीसरा बीच में नही डालते......!!!!!

                                                      ............................(क्रमश:)
चलत मुसाफिर, मोह लिया रे......!!! 

गद्दी नोया राम की दुकान की ओर बढ़ते हुए हम लोग.... 

कुंशा में नोया राम का गद्दी डेरा....

देखो....दो गबरु जवान मुण्डें 

नोआ राम का भाई चाय बनाते हुए..... 

मेरे कान के पास आ कर नोया राम जी बोले, "वो नाग के फन वाला पत्थर मैने ही वहाँ रखा है....! "

नोआ राम जी हमारे लिए भोजन तैयार करते हुए.... 

लो जी..... राजमाँह के साथ कनक के फुल्के 

स्वादिष्ट भोजन उपरांत.... हम कुंशा के ओर चल दिये 




"कुंशा" की सुंदरता इन फूलों की ज़ुबानी....

कुंशा में रास्ते किनारे भी कई टैंट लगे हुए थे.... 

पेट भरा हुआ हो तो,  56भोग भी लुभानें में नाकामयाब......कुंशा में लगा चाइनीज़ कोना  

धुंध की वजह से कुछ दूर ही दृष्टिगोचर हो रहा था.... 

प्रकृति के दो हरे रंग...... गहरा हरा रंग तांगुड की झाड़ियों का और हल्का हरा रंग चलिंगडू बूटी का.... 

पर्वत के एक कंधे से उतर..... दूसरे पहाड के कंधे पर चढ़ना 

 प्राकृतिकता में मगन खड़े विशाल रतन जी.... 

आ-जा रहे श्रद्धालु... 

रास्ते में आया एक जल-स्रोत जिससे किनारे एक लाल झंडा गड़ा था.... मेरी उत्सुकता बढ़ गई उस बारे में जानने की,  परन्तु मेरे प्रश्न शांत करने वाला वहाँ कोई नही मिला.... 

राह में आई एक कलाकृति.... 

वो दूर तक रास्ता जा रहा है, जिस पर हमें जाना था.... 

और, रास्ते का क्या कहना.... 

खुद ही देख लो.... दोस्तों 

भाजी, हम भी गढ़शंकर से है..... पम्मा और उसके साथी 



राह में आया एक सुंदर झरना.... 

धुंध में कल-कल करती गिरते जल की मधुर ध्वनि बता रही थी कि कोई जल-प्रपात आ रहा है.... 

और,  कुछ कदम बाद ही एक विशाल व विहंगम जल-प्रपात धुंध में से प्रकट हुआ.... 

पम्मे ने दूर से हाथ हिला कर जोर से कहा, " यदि हमारे शहर गढ़शंकर में ऐसा झरना हो तो...! " 

लो, फिर से इक्ट्ठा हुए "गढ़शंकरिऐं"

खूबसूरती में खड़े.... जनाब विशाल रतन जी 

ये रंगीले भाई साहिब मुझे लूनावाडी में मिले थे..... इन्होंने मुझे पर्वतारोहण में अपनी कई उपलब्धियाँ गिना दी... 

चलो, अच्छा हुआ विशाल जी, अब हम इन्हें भीमद्वारी में नही मिलेंगे...!!!