रविवार, 18 फ़रवरी 2018

भाग-2 करेरी झील....." मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

                     
                                                                 " कांगड़ा दुर्ग में चंद घंटे "

                                      कानों में वॉइस गाइड लगाए हम दोनों, भारत के सबसे पुराने किले नगरकोट कांगड़ा दुर्ग की ओर बढ़ रहे थे.....और हमारे हाथों में किले का नक्शा था। जिसे वॉइस गाइड के अनुसार क्रमवार नंबरों में विभाजित किया हुआ था। निर्धारित जगह पर पहुँच वॉइस गाइड का नंबर एक दबाया,  तो विश्व के सबसे पुराने राजवंश "चंद्रवंशी कटोच राजपूत राजवंश" के 488वें  राजा आदित्य देव चंद कटोच जी की आवाज कानों में गूंजी.....और शुरुआत हुई 4000 साल पुराने कांगड़ा किले की कहानी की।
                        " हिमालय में बने इस किले पर जिसका कब्जा, वही पहाड़ों का राजा घोषित होता था " तो अनगिनत देसी-विदेशी हमलावरों से हजारों साल जूझता रहा कांगड़ा दुर्ग।
                        7800 ईसा पूर्व, यानी करीब 10000 साल पहले राजा भूमि चंद कटोच से इस राजवंश की शुरुआत हुई और मुल्तान (जो कि अब पाकिस्तान में है) में अपना राज्य स्थापित किया.... जिसका क्षेत्र लद्दाख तक था। यह वह राजवंश है जिन्होंने 5000 ईसा पूर्व भगवान श्रीराम से भी प्रभुता का युद्ध लड़ा था और इस दुर्ग के स्थापक राजा सुशर्मा चंद कटोच ने 1500 ईसा पूर्व कौरवों का साथ देते हुए अर्जुन से युद्ध लड़ा था।
                       किले के मुख्य द्वार महाराजा रणजीत सिंह द्वार के पास जाने के बाद हर कदम पर किला अपने स्वर्णिम इतिहास की कहानी सुना रहा है। हर मोड़ पर दीवारें व दरवाजे अपनी बात रख रही हैं और दीवारों में मढ़ी हुई मूर्तियां भी कहां खामोश थी।
                       25 सौ साल पहले सिकंदर से युद्ध लड़ने वाला राजा पोरस भी कटोच राजवंश से ही था।  करीब 2350 साल पहले सम्राट अशोक ने कटोचों से युद्ध लड़ मुल्तान छीन लिया।  पहली सदी में कांगड़ा घराना कन्नौजों संग जूझता रहा.....और पांचवी सदी में हिमालय पर प्रभुत्व के लिए कश्मीर के राजाओं संग कटोचों का आमना-सामना होता रहा।                            10 वीं सदी में आ धमका महमूद गजनी...और लुटेरे ने खूब लूटा कांगड़े को। लूटा क्या मैं तो इसे चोरी ही कहूँगा क्योंकि जब कांगड़े की सेना किसी और जगह युद्ध में रत थी और पीछे से कोई आक्रमणकारी आ पहुँचा पहली बार किले के भीतर...!
                       मोहम्मद गौरी भी आया था किला लूटने कांगड़ा, 11वीं सदी के अंत में।  13वीं सदी में कटोच लड़ते-लड़ते दिल्ली जा पहुँचे, तुगलकों और तैमूर के विरुद्ध भी घमासान युद्ध होते रहे।  दिल्ली का शहंशाह तुगलक कांगड़ा के किले को कई महीनों तक घेरे बैठा रहा और एक दिन किले की दीवार पर घूम रहे कटोच राजा की नज़र जा मिली तुगलक से  और इशारों- इशारों में ही दोनों बातचीत के लिए तैयार हो गए....बाद में इनकी संधि हो गई।
                       फिर 15वीं सदी में शेरशाह सूरी कांगड़े पर आ चढ़ा, परंतु हार गया। मुगल सम्राट अकबर से भी भीषण  युद्ध होते रहे.... 52बार अकबर ने कोशिश की इस दुर्ग पर विजय पाने की, परन्तु कामयाब ना हो सका..  अंततः कटोचों से उसकी संधि हुई।
                        सोलहवीं सदी में अकबर का पुत्र जहांगीर एक बहुत बड़ी सेना ले ठान कर आया और 14 महीनों तक किले की घेराबंदी कर रखी। अनाज-रसद खत्म होने पर आखिर राजपूतों ने आत्मसमर्पण करने की बजाय किले के द्वार खोल कर उस विशाल सेना से लड़ना-मरना ही मुनासिब समझा।
                        कहते हैं 12हजार के करीब कटोच सैनिक मारे गए इस भीषण संग्राम में.... किला हारते देख किले के अंदर जौहर की तैयारी होने लगी। अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान बचाने के लिए बलिदान देते हुए कटोच महिलाएं किले के सरोवर "कपूर सागर"  में अपने पैरों में पत्थर बांधकर डूब मरी।  कितना हृदय विदारक दृश्य होगा....सोच कर मेरी रूह कांप उठी।
                         तलवारों की आवाजें, तोपों के बारूद की गंध, भीषण युद्ध की चीत्कार, औरतों की चीखें व बच्चों के रोने की आवाजें मुझे चंद क्षणों के लिए उस खंडहर किले में अचानक से सुनाई देने लगी...... फिर,  एकाएक उन दीवारों को पुन: देखता हूँ और अपने-आप को आज में पाता हूँ।
                        बंदी बनाए गए कटोच राजा को जहांगीर मारता नहीं, बल्कि घुट-घुटकर मरने के लिए आजाद कर देता है। पर दोस्तों कटोच तो कटोच ही है ना... कटोच का मतलब "कट-ऊँच" जिसकी तलवार हमेशा ऊँची रहती है।  कुछ समय बाद सब कुछ हारे हुए उस कटोच राजा ने पुन: कोशिश की अपना राज-सम्मान व किला वापस पाने हेतु......परंतु वह हार गया और जहांगीर ने अब उसे बेहद क्रूरता से मारा.....जीवित अवस्था में ही उस वीर कटोच राजा की खाल उतरवा दी।
                         समय का चक्कर चलता रहा जहांगीर के बाद शाहजहां का भी कांगड़े किले पर अधिकार रहा। जहांगीर की क्रूरता का बदला उस कटोच राजा के पोते ने आ लिया.. उसने पुन: किले पर चढ़ाई कर किले में मौजूद जितने भी मुगल अधिकारी व सैनिक थे उन सब की जीवित ही खाल उतरवा दी....!!
                           17वीं  सदी में कटोच राजा भीम चंद ने औरंगजेब की हिंदू धर्म विरोधी नीतियों का विरोध कर गुरु गोविंद सिंह जी का साथ देते हुए औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध लड़ा। 17वीं सदी के अंत में ही बटाला के सिख सरदार जय सिंह कन्हैया और तत्कालीन कटोच वंशी राजा संसार चंद ने कमजोर हो चुके मुगलों से किला जीता और मैदानी क्षेत्रों के बदले किले को राजा संसार चंद कटोच को सौंप दिया।
                            कई सौ वर्ष के बलिदान और जंग के उपरांत आखिर फिर से कांगड़ा दुर्ग पर हिंदू राज लौट आया और सत्ता पर काबिज हो महत्वाकांक्षी राजा संसार चंद कटोच ने अपने राज्य के विस्तार के लिए अन्य राज्यों पर हमले आरंभ कर दिए.....सो 18वीं सदी में नेपाल के अमर सिंह थापा अन्य राज्यों का नेतृत्व कर अपनी गोरखा सेना ले 4 वर्षों तक कांगड़ा दुर्ग की घेराबंदी कर खड़ा रहा। तब राजा संसार चंद ने शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह से गोरखों के विरुद्ध संधि कर किला सिक्खों को सौंप दिया......और अंत में सिक्खों के राज के बाद अंग्रेज आ दुर्ग पर काबिज हो गए।                                इस दुर्ग पर अधिकार की सनक हर काल में हर एक शक्तिशाली राजा को रही....कटोचों की जुबानी यह कहा जाता है कि उन्होंने अपने संपूर्ण इतिहास में औसतन हर चार साल बाद एक युद्ध लड़ा है।
                              किले की ऊँची रक्षा प्राचीर जो चार किलोमीटर लंबी है,  के एक बुर्ज पर खड़ा मैं नीचे देखता हूँ कि किले की पहाड़ी को टापू की तरह मध्य ले,  दो नदियां पातालगंगा और बाणगंगा बह रही हैं जो किले की पहाड़ी के इर्द-गिर्द गहरी खाईयों का काम करती है।  सामने मुझे दिखाई दे रही है धौलाधार हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ.....कितना मनोरम स्थल जो मन को सुकून दे रहा था।  फिर किले के सामने उस बड़े मैदान को देख सोचने लग जाता हूँ कि यही आ कर सब आक्रमणकारी खड़े होते होंगे.... तोपों के भरे मुँह किले को घूर रहे होंगे।
                             इतनी सुंदर जगह पर कैसे कोई लड़ सकता है.... मुझे तो चारों और फैली रमणीयता से नयन लड़ाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही....!!!
                            फिर मन का एक पक्ष बोलता है, " रे तू तो ठहरा एक सामान्य प्राकृत प्रेमी और वे सब थे ताकतवर अमीर... वो अमीर जो दूसरे अमीर को लूटकर और ज्यादा अमीर होना चाहता था...!"  पुराने समय में राजा यही तो करते थे, वह एक दूसरे को लूट ही तो रहे थे।  राज्य, किले, खज़ाना, औरतें लूटकर हर विजयी राजा अपने राज्य और खज़ाने का विस्तार कर रहा था। जर, जोरू, जमीन बल से ही रखी जाती हैं इस कहावत की उत्पत्ति राजाओं के इस व्यवहार से ही हुई होगी वरना गरीब तो दूसरे जून की रोटी की चिंता में फंसा रहता होगा।
                            अपने मुँह-मिट्ठू की परिभाषा देता जहांगीर के बनाए जहांगीर दरवाजे को लांधने के बाद सीढ़ियां चढ़ते हम दोनों उस छोटे से दर्शनी दरवाजे के आगे खड़े होते हैं,   जिसके दोनों तरफ गंगा और यमुना की खंडित मूर्तियां लगी हुई हैं।  दर्शनी द्वार पार करते ही बेहद खुली जगह आती है और सामने नज़र आता है कटोचों की कुलदेवी अंबिका मां का मंदिर,वहीं एक और मंदिर में जैन तीर्थांकर आदिनाथ जी विराजमान है।
                           किले में जैन मंदिर का इतिहास भी खासा रोचक है दोस्तों....जैन धर्म के आखिरी तीर्थांकर महावीर जी ने अपनी बहन का विवाह कटोच राजा से इसलिए किया कि निशस्त्र जैन समुदाय को सुरक्षा मिले,  क्योंकि सुरक्षा के लिए शस्त्र उठाने आवश्यक है... जो कटोच हर समय अपने सिर से ऊपर ही उठाए रखते थे।  भगवान महावीर जी ने खुद ही भगवान आदिनाथ जी की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर इसे यहां स्थापित किया था, दोस्तों।
                          उस बेहद खुले आंगन जिसमें सदियों पुराना पीपल का वृक्ष अब भी हरा भरा है। जिसने ना जाने कितनी बार उस खुले आंगन में खुशी- गमी की सभाएं लगती देखी होंगी। किले के किशोर-किशोरियों को झूले झुलवायें होंगे।  ना जाने कितनी बार लहू से रंगी नंगी तलवारों को महल में दाखिल होते देखा होगा और अपने संरक्षकों को कटते भी देखा होगा।  काश मैं उस बूढ़े पीपल बाबा की भाषा समझ पाता जो वह अपने पत्ते हिला-हिला मुझे बता रहे थे...!
                         महल के इस आंगन में जगह-जगह नक्काशीदार अवशेष बिखरें पड़े हैं जो इस जगह की भव्यता की कब्र है।  इस आंगन से चंद सीढ़ियां चढ़ हम अब उन अवशेषों में खड़े हैं,  जो किले की सबसे ऊँची जगह पर है और यह अवशेष कभी सात मंजिल हुआ करते थे।  दुश्मनों की तोपों के गोले कभी यहां तक नहीं पहुंच पाए,  परंतु प्रकृति के सबसे बड़े दुश्मन "भूचाल" ने सन् 1905 में इस महल को नेस्तनाबूद कर दिया। उस किले की दीवारें तक उखाड़ दी जो कभी हजारों सालों से आक्रमणकारियों के हौसलें उखाड़ती आ रही थी।
                           शाम के साढे चार बज चुके थे किले के बंद होने का समय हो चला था,  सो नीचे उतर कर हम किले के बाहर बने सरकारी संग्रहालय में आ पहुँचे। परंतु अभी कटोच राजपरिवार का व्यक्तिगत संग्रहालय देखना बाकी था, सो उस छोटे से बाज़ार जहाँ एक नवीन व भव्य जैन मंदिर भी है...को लांघकर "महाराजा संसारचंद संग्रहालय" में जा पहुँचे।संग्रहालय में कटोच राजपरिवार की भव्यता देख बाहर निकले तो सूर्यास्त हो चुका था।  किले के पीछे मर चुके दिन की लाली अभी अंतिम सांस ले रही थी......और लगे हाथ हम दोनों किले के सामने बने जैन मंदिर में भी जा पहुँचे, बेहद भव्य मंदिर और शांति इतनी खुद की शंखनाद ध्वनि सुनाई दे रही थी।
                          मंदिर में धर्मशाला देख मैंने विशाल जी से कहा,  "अब हमें गाड़ी में रुकने की बजाय इस धर्मशाला में रुक जाना चाहिए क्योंकि हमें अपने फोन पर कैमरे में भी तो शक्ति भरनी है..!"  धर्मशाला संचालक ने कहा, "यदि आप जैन हो तो ही आपको कमरा मिल सकता है...!!"  अब भला ब्राह्मण बंदे झूठ भी कैसे बोल सकते हैं....तो उन्होंने फिर एक और सुझाव दिया कि किसी जैनी की सिफारिश डलवा लो। परंतु ऐन मौके पर यह भी ना हो सका तो हम गाड़ी ले कांगड़ा शहर के जगमगाते बाजार में आ रुके.... और "बृजेश्वरी देवी मां मंदिर" में पहुँच मां के श्रृंगार की मंगला आरती में हाज़िरी लगवाई व दाल-चावल का लंगर ग्रहण किया।
                           कांगड़ा बाजार में ही कमरा ले,  अब कल की रणनीति यह बनाते हैं कि जितना हो सके सुबह जल्दी ही निकलना है करेरी की ओर........लेटते ही हम दोनों में से नींद किसे पहले आई,  मुझे याद नहीं रहा। परंतु हम दोनों में से जो एक पहले सो गया होगा, उसके खर्राटों की आवाज से दूसरे को कहाँ जल्दी नींद आई होगी,  दोस्तों..!!!!

                                                                  ......................................(क्रमश:)
कानों में वॉइस गाइड लगाये हम बढ़ रहे थे,  कांगड़ा दुर्ग के प्रवेश द्वार "महाराजा रणजीत सिंह द्वार " की ओर। 

कांगड़ा दुर्ग का प्रवेश द्वार। 

मुख्य द्वार से अंदर जाने के बाद। 

कांगड़ा दुर्ग के अंदर का रास्ता। 

वॉइस गाइड की बातें सुनता मैं।  

अब,  दुर्ग की दीवारें व दरवाजे अपनी बात रख रहे थे। 

दुर्ग की दीवारों में मढ़ी मूर्तियाँ भी अब कहाँ खामोश थी,
कटोचों की कुल देवी अम्बिका माँ की मूर्ति। 

एक द्वार पर बैठ उसकी कहानी सुनते विशाल जी। 

किले की रक्षा प्राचीर की ओर बढ़ता मैं। 

कांगड़े दुर्ग की चार किलोमीटर लम्बी रक्षा प्राचीर पर खड़ा, मैं सोच में डूबा हुआ था। 

कि किले की रक्षा प्राचीर से नीचे देखता हूँ,  किले के आगे इसी मैदान में आक्रमणकारियों की सेना आ खड़ी होती होगी,
अब यहाँ एक बेहद सुंदर व भव्य जैन मंदिर स्थापित है। 

फिर ऊपर की ओर देखता हूँ,  तो धौलाधार हिमालय की धौली धाराएँ दिखाई दी... और सोचने लगा कि इस सुंदर जगह में आ, कैसे कोई लड़ सकता है। 

जब कि मुझे तो चारों ओर फैली इस रमणीयता से नयन लड़ाने से ही फुर्सत नही मिल रही,
कांगड़ा किले से दिख रहा पातालगंगा और बाणगंगा नदियों का संगम। 

किले की रक्षा प्राचीर पर खड़े विशाल जी मगन थे, वॉइस गाइड की किस्से-कहानियों में। 

भूचाल से गिर चुकी दीवारों को फिर से खड़ा किया गया है।

कांगड़े किले में जहाँगीर के द्वारा निर्मित मस्जिद,
कहते हैं कि इस मस्जिद के निर्माण से पहले जहांगीर ने यहाँ गाय की बलि दी थी। 

दर्शनी द्वार। 

इस छोटे से दर्शनी द्वार की दोनों तरफ गगां व यमुना की मूर्तियाँ स्थापित है,  जो अब खंडित हो चुकी है। 

दर्शनी द्वार पार करने के बाद एक बेहद खुली जगह आती है। 

और,  सामने दिखाई देता है... कटोचों की कुल देवी अम्बिका माँ का मंदिर। 

और,  उसी खुले से आँगन में जैन धर्म के पहले तीर्थांकर आदिनाथ जी का भी मंदिर है। 

मंदिरों की दीवारों पर की हुई नक्काशी। 

उस जगह बहुत सारे अवशेष बिखरे पड़े हैं.... जो इस जगह की भव्यता की कब्र है। 



काश,  मैं इस बूढ़े पीपल बाबा की भाषा समझ पाता,  जो ये अपने पत्ते हिला-हिला कर मुझे बता रहे थे। 

इस दुर्ग में एक राजा भी अपनी मरजी से नही आ सकता था,  साधारण व्यक्ति की बात ही क्या करनी।
परंतु आज एक साधारण व्यक्ति दुर्ग के अंदर अपनी मौज से चित्र खिंचवा रहा है दोस्तों। 

कांगड़ा किले के मंदिरों की नक्काशीदार दीवारें। 

उस खुले आँगन से सीढ़ियाँ चढ़ हम किले की सबसे ऊँची जगह पर बने महल के उन अवशेषों में जा पहुँचे,  जो कभी सात मंजिल ऊँचें हुआ करते थे।  

महल की उस खिड़की में खड़ा मैं.... जिसमें कभी रानियाँ खड़ी हो,  घाटी की सुंदरता को निहारती होगी। 

किले की सब से ऊँची जगह से खींची हुई तस्वीर.... नीचे घाटी में उड़ता एक बाज़। 

किले की पीछे से आ रही पातालगंगा और बाणगंगा नदियाँ,
यह चित्र किले की सबसे ऊँची जगह खींचेहैं। 

महाराजा संसार चंद संग्रहालय में.... कटोचों के सिंहासन। 

आखिर हमे भी सम्मान दिया गया कि आप भी इन राजसी कुर्सियों पर बैठ सकते हैं,
कटोचों के व्यक्तिगत संग्रहालय में। 

संग्रहालय से बाहर निकले तो,  कांगड़े किला के पीछे मर चुके दिन की लाली अंतिम सांस ले रही थी।

संग्रहालय देखने के पश्चात हम उस भव्य जैन मंदिर में आ पहुँचे,  जो किले के सामने ही बना है। 

और,  फिर हम कांगड़े वाली माता "ब्रजेश्वरी देवी" के मंदिर में माथा टेकने आ गये। 

और, माँ के श्रृंगार की मंगला आरती में भाग लिया तथा हमें प्रसाद मिला रौंगी दाल का, दोस्तों।

                   

                             

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

भाग-1 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "


                  मित्रों जय हिंद..... इस नई धारावाहिक चित्रकथा में मैने एक नया प्रयास किया है,  कथा को लिखने के साथ-साथ...  खुद बोल कर भी आपको कथा सुना रहा हूँ, क्योंकि व्यस्त जीवन शैली में शब्दों को पढ़ने में भी समय लगता है। परन्तु अब आप जब चाहे मेरी कथा को सुन भी सकते हैं। आशा है कि मेरा यह प्रयोग आपको बेहद पसंद व सुविधाजनक लगेगा और मेरी नज़र में ब्लॉग पर यात्रा वृतांत सुनाने का प्रयास करने वाला शायद मैं पहला व्यक्ति हूँ।
                     लीजिए पेश है मेरी धारावाहिक चित्रकथा, करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा " का मौखिक व्याख्यान........
         
                                         भाग-1    करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

                                              मैंने अपनी जवानी व्यायाम शाला में लोहे से दो-दो हाथ कर, ताइक्वांडो मार्शल आर्ट के अभ्यास से अपनी हड्डियां तोड़वा और बाँसुरी को फूँकने में बिता दी.......... और पर्वतारोहण का शौक आ चिपका जवानी गुजर जाने के बाद, 38 साल की उम्र में.....!
                             सोचता हूँ यदि यह शौक मुझे बीस साल की उम्र में लगा होता,  तो मेरी झोली में अनगिनत पर्वतीय यात्रा की सफलता होती। हिमालय में कुछ ऐसी दुर्गम यात्राएँ कर जाता,  जो आज मेरी जिंदगी का पैमाना होती।                               "परंतु मर जाना यह मन भी बड़ा बेशर्म है जो इसे मिल गया वह खाक़, जो ना मिला वह सोना है....!" दोस्तों इस नई धारावाहिक चित्र कथा को लिख रहा हूँ....जिसमें की हुई यात्रा ने मुझे सामान्य घुमक्कड़ से पर्वतारोही भी बना दिया। मैं इस यात्रा को अपने छोटे से पर्वतारोहण जीवन का आधार मानता हूँ कि शुगल-मेले में की हुई इस यात्रा को मेरा अशांत मन इतनी गंभीरता से ले लेगा.....और, मुझ में भयंकर हिमालय प्रेम जागृत हो जाएगा जो अपने कदमों से हिमालय को नापना चाहता है।
                             सन् 2012 की रुखसती करीब थी, बच्चों को सर्दियों की छुट्टियों में....मैं उन्हें उनके ननिहाल "नवांशहर"  छोड़ने गया था वहाँ मेरे सांढू भाई विशाल रतन जी दिल्ली से अपने बीवी-बच्चों को ले पहुँच चुके थे।
                             हम दोनों ही घुमक्कड़ किस्म के प्राणी हैं.....और बैठे-बैठे ही हम दोनों ने जीवन में पहली बार किसी जगह अकेले घूमने का कार्यक्रम बनाना आरंभ कर दिया और निष्कर्ष निकाला कि चलो हिमाचल चलते हैं क्योंकि सर्दियों में हम दोनों में से कोई भी पहाड़ों पर नहीं गया था....और हम भी उन अधिकांश लोगों की तरह पहाड़ों को केवल गर्मियों की बीमारी का इलाज समझते थे।
                             बातों बातों में ना जाने क्या मेरे दिमाग में कौंधा कि चलो किसी पहाड़ पर चढ़ते हैं और ख़्याल दौड़ चला धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) की ओर। विशाल जी ने झट से अपना लैपटॉप खोल लिया....हाँलाकि मेरी जेब में तब साधारण बोलने-सुनने वाले फोन से कुछ तरक्की हो 2 मेगापिक्सेल कैमरा फोन आ चुका था, जिस पर अभी जुम्मा-जुम्मा मेरी आंखें गूगल कुमार जी से लड़ रही थी। फेसबुक,  व्हाट्स एप, ब्लॉग नाम तो मैंने अभी सुने भी ना थे।
                            लैपटॉप पर उंगलियों की मेहनत से नाम सामने आया "करेरी झील " धौलाधार हिमालय पर समुद्र  तट से करीब 3000 मीटर की ऊंचाई पर जमी हुई झील के साथ अपना नववर्ष मनाने का उल्लास हम दोनों को उत्साहित कर चला।  हैरानी इस बात की हुई जब दोनों बहनों यानी हमारी पत्नियों ने बिना किसी लोलो-पोचो के हमें अकेले जाने की स्वीकृति दे डाली...!!
                            दोनों सांढू अब सोच रहे थे कि यात्रा में क्या-क्या चाहिए,  एक साधारण व्यक्ति सर्दियों में यदि पहाड़ पर मुँह उठाकर चल दे तो उसकी सोच में केवल गर्म कपड़े ही होते हैं... बस इससे ज्यादा हम कुछ भी ना  सोच पाये।यद्यपि सर्दियों में बर्फ भरे गिरिराज से साक्षात्कार करने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है।
                           हमारी हमसफ़र विशाल जी की फोर्ड फिगो गाड़ी बन रही थी तो मैंने तर्क दिया,  "चलो छड़े-मलंगों की तरह चलते हैं... आप अपनी गाड़ी की पिछली सीट फोल्ड कर उसमें बिस्तर बना लो क्यों किसी होटल वाले की कमाई में इज़ाफा करें...!"
                           विशाल जी का पैतृक घर भी नवांशहर में ही है और रोजी रोटी उन्हें दिल्ली में डेरा डालने के लिए मजबूर कर रखे है.... वह भी अपने घर जा कल की तैयारियों में जुट जाते हैं और मैं भी ससुराल से केवल 10 किलोमीटर दूर अपने शहर "गढ़शंकर" में,   शाम को कल सुबह शुरू होने वाली यात्रा की तैयारी में लिप्त हो जाता हूँ।
                          बेटी के पिट्ठू नुमा स्कूल बैग को खाली कर उसमें एक गर्म लोई यानी ओढ़ने वाली चादर,दस्तानें, बंदरटोपी और गर्म जुराबें बाजार से खरीद डाल लेता हूँ... और अपनी तरफ से निश्चिंत हो जाता हूँ कि पहाड़ पर चढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है।
                         धर्मशाला जाने का रास्ता नवांशहर से गढ़शंकर होकर ही जाता है....सो 30दिसम्बर 2012 सुबह 7बजे विशाल जी मुझे ले गाड़ी दौड़ा रहे थे हिमाचल प्रदेश की ओर। मेरी एक बहुत बुरी आदत है मैं कम समय में ज्यादा जगह देखना चाहता हूँ। धुंध से भरी पंजाब की सड़कों को पार कर अपना पहला दर्शनीय पडाव मुकर्रर करता हूँ हिमालय के जिला ऊना में  "ध्" पहाड़ के शिखर पर बने " सदाशिव ध्यूसर महादेव मंदिर" को।
                         मैं यहाँ कई बार आ चुका हूँ और विशाल जी को नई जगह भी तो दिखानी थी। इस स्थल पर पांडवों के पुरोहित ऋषि धौम्य ने तपकर शिवलिंग स्थापित किया हुआ है। पर्वत शिखर पर बना मंदिर और मंदिर प्रांगण से नीचे दिखती घाटियों की हरियाली मन को भी हरा भरा कर जाती है, परंतु उस समय हरियाली को धुंध ने सफेदी मार दी थी खैर उसे भी देखने का एक अलग ही आनंद था। विशाल जी की वाहवाही लूट गाड़ी वापस चल देती है, क्योंकि एक और नई जगह भी तो विशाल जी को दिखानी है "कालेश्वर महादेव "
                         यह स्थान मेरा मनपसंद स्थान है, यहाँ मैं अनगिनत बार जा चुका हूँ......हाँ सर्दियों में कालेश्वर जाना पहली दफा ही हो रहा था जबकि पहले हर बार सावन के महीने में ही जाना हुआ।
                          पेट ने दिमाग को संदेश भेजा मैं सुबह से खाली पड़ा हूँ, इस बंदे को बोल...कुछ खा ले अब तो दस भी  बज चुके है...!!  रास्ते में एक हलवाई के शो-केस में "गजरेला"  पड़ा चमक रहा था और खींच लिया उसने हमें।
                          विशाल जी की बहन ने रास्ते में खाने के लिए कचौरियां बनाकर साथ भेज दी थी। सुबह का नाश्ता बेहद स्वादिष्ट  "कचौरियां, चाय और गजरेला" को पेट व स्मरण में हावी कर चल देते हैं कालेश्वर की ओर।
                          छोटी सड़कों पर आए छोटे-छोटे गांव बड़ा न्योता देते हैं कि मुसाफिर चंद क्षण रुक मुझसे भी बात कर.......परंतु मैं आंखों ही आंखों में उनसे बतिया आगे बढ़ता रहता हूँ।  सड़क पर एक जगह रुक विशाल जी बिखरी हुई सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करने लग जाते हैं कि कहीं रात में बोन फायर करेंगे, मतलब यारों की मस्ती खूब होने वाली है।कभी हमारा रास्ता सलेटों की छतों वाले आशियानें रोक लेते हैं....तो कभी राह में मिले धौलाधार से नीचे उतर आए गद्दी और उनकी भेड़ें।
                         बाँस की कटाई का मौसम था तो सड़क किनारे सड़क से कटकर आए उम्दा किस्म के बाँसों के ढेर भी कम आकर्षक ना थे..... और हम दोनों सांढू प्रकृति कि हर खूबसूरती संग अपने चित्रों को संग्रहित करते जा रहे थे।
                          कालेश्वर पहुंचते साढे ग्यारह बज चुके थे,  सड़क से दिख रही व्यास नदी को देख विशाल जी बच्चों जैसी चहचहाहट बिखेरते हुए गाड़ी का स्टेरिंग छोड़ सड़क किनारे खड़े व्यास नदी की नीली जलधारा को निहार रहे थे। मैं उनके इस रवैय्या पर सोचता हूँ कि दिल्ली जैसे व्यस्त महानगर की लाल-हरी बत्तियों और लाल-पीली भीड़ से दूर आ व्यक्ति प्रकृति की गीतांजलि सुन, ऐसे ही मस्त हो जाता है जैसे अब विशाल जी हुए जा रहे हैं।
                          कालेश्वर स्थल अपने नाम के अनुरूप कि भगवान शिव को समर्पित स्थल है.... राक्षसों का सर्वनाश करने में लीन मां काली ने अपना पैर पति शिवजी को लगाने का पश्चाताप इसी स्थल पर किया था। यदि आप लोग मेरी कालेश्वर और सदाशिव महादेव यात्रा को विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो मेरे ब्लॉग पर इसे पढ़ भी सकते हैं केवल एक ही लेख में लिखा है।  "मेरी मनपसंद जगह"  और लिंक यह रहा....http://vikasnarda.blogspot.in/2017/12/blog-post_21.html?m=1..मैं खामखा इस चित्र कथा को ज्यादा लंबा नहीं करना चाहता।
                           कालेश्वर महादेव मंदिर में माथा टेक, व्यास नदी किनारे घूम और बाजार से अपने मनपसंद नारियल के लड्डू खा हम चल दिए धर्मशाला की ओर....... परंतु बीच रास्ते घुमक्कड़ नजरें जा मिली "नगरकोट दुर्ग" जिसे कांगड़ा किला कहा जाता है। बस दोनों की एक राय बन गई और गाड़ी खुद-ब-खुद मुड़ चली पुराना कांगड़ा शहर की ओर...!!
                           दोपहर के ढाई बज चुके थे और किले कभी खाली पेट नहीं देखे जा सकते दोस्तों...!!!!  सो किले के सामने इक्का-दुक्का दुकानों में से एक पर, हमें एक महिला दुकानदार ने घर जैसा खाना खिला दिया। उदर भूख शांत होते ही नयन भूख तीव्र हो चली नगरकोट दुर्ग को देखने के लिए।
                           मैं इस दुर्ग को जीवन में दूसरी बार देखने जा रहा था हाँलाकि इस किले को मैंने पहली बार 30साल पहले देखा था जब मैं केवल 8वर्षीय बालक था और हमारा संयुक्त परिवार दुर्ग में पिकनिक मनाने आया था। 30साल पहले की एक धुंधली सी याद लिये किले के प्रवेश टिकट खरीदें और एक गाइड की मांग भी रखी। उत्तर ना में ही मिला और सुझाव दिया गया कि फिर से परिसर से वापस, बाहर निकल गेट के पास ही कांगड़े के राजसी परिवार के दफ्तर से आप लोग "वॉइस गाइड"  किराए पर ले सकते हैं।  यह नाम और उपकरण मेरे लिए नया ही था।  दो वॉइस गाइड उपकरण ले और उन्हें चलाने का ढंग सीख..... अब हम दोनों भारत के सबसे पुराने किले की ओर बढ़ रहे थे जो करीब 4000साल पुराना है जिसकी दीवारों ने  असंख्य हमलों को झेला है। बगैर वॉइस गाइड के यह किला खामोश रह जाता पर अब इस किले का हर पत्थर हमें अपने किस्से-कहानियाँ सुनाएगा।

                                                                       ......................................(क्रमश:)
दो सांढू़ भाई। 

विशाल रतन जी ने तब मूँछ पाल रखी थी,  दोस्तों। 

ध्यूसर सदाशिव महादेव के रास्ते में.....एक बेहद बड़ी चट्टान पर खड़ा मैं। 

ध्यूसर पर्वत शिखर पर बने सदाशिव महादेव मंदिर का दूर-दृश्य। 

रास्ते की सुंदरता....झरने का जल एक ताल से निकल दूसरे ताल को भर बहता हुआ। 

धुंध को भेद रही सूर्योदय की किरणें। 

सिंदूरी सवेर। 

सदाशिव महादेव मंदिर को जाता सीढ़ीदार रास्ता,  परन्तु हम सड़क मार्ग से ऊपर जा रहे थे। 

यात्रा की खुशी। 

धुंध फिर बलवान हो गई सूर्यदेव पर। 

परन्तु यह धुंध भरा दृश्य भी हसीन लग रहा था दोस्तों।  


सदाशिव महादेव मंदिर। 

सदाशिव महादेव मंदिर प्रांगण का प्रवेश द्वार। 

पांडवों के पुरोहित ऋषि धौम्य द्वारा स्थापित शिवलिंग। 

और,  यह शिवलिंग चौरस आकार का है। 


अरे विशाल जी,  ऊपर कहाँ देखने लगे...! 

ओह,  अब समझे.... सदाशिव महादेव मंदिर के शिखर को। 

सदाशिव महादेव मंदिर प्रांगण से नीचे दिखती सुंदर घाटियाँ। 

उस ऊँचाई से दूर-दूर दिखते गाँव व शहर। 

और,  दूसरी दिशा में दिखते पर्वत और धुंध।  

सदाशिव महादेव मंदिर में मिला चूरमे का प्रसाद। 

है ना.... कितना शानदार "गजरेला"

सुबह का नाश्ता बेहद स्वादिष्ट,  " कचौरियां, चाय व गजरेला"

विशाल जी गाड़ी से उतर सड़क पर बिखरी हुई सूखी लकड़ियाँ इक्ट्ठी करने लग जाते हैं,  कि कहीं रात को बोन-फायर करेंगें। 

कभी सलेटों की छतों वाले घर हमारा राह रोक लेते। 

तो,  कभी धौलाधार से नीचे उतर रहे गद्दी और उनकी भेड़े। 

गद्दी चरवाहा। 

कालेश्वर महादेव की ओर। 

बाँस की कटाई का मौसम था.... तो उम्दा किस्म के बाँस जंगल से काट कर सड़क किनारे इक्ट्ठा किये जा रहे थे। 

गलत बात है विशाल जी... जब मैने आपकी फोटो बाँसों के संग खींची, अब आप मेरी भी फोटो खींचो जी। 

एक किलोमीटर की दूरी पर कालेश्वर महादेव। 

कालेश्वर गाँव में खेतों की बाड़ बेहद लम्बी डंडा-थोर से रखी थी,  और हमे एक अलग पृष्टभूमि मिल गई अपने चित्र खिंचवाने के लिए।
वाह,  बहुत जंच रहे हो विशाल जी। 

फोटो खिंचवाने में... मैं बहुत माहिर हूँ दोस्तों,  देखा क्या खूबसूरत फोटो आई मेरी। 

कालेश्वर, मनियाला गाँव में बहती व्यास नदी। 

विशाल जी खूब चहक उठे व्यास नदी की नीली जलधारा देख कर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर मंदिर का स्वागती द्वार। 

कालेश्वर मंदिर परिसर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर मंदिर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर शिवलिंग। 

बहुत सारे प्राचीन मंदिर बने हुये है कालेश्वर मंदिर परिसर में। 


व्यास नदी के घाट पर। 

घाट से नदी की ओर। 

व्यास नदी की जलधारा के किनारे.... जली हुई चितांएे। 

कालेश्वर के छोटे से बाज़ार में तब मेरे मनपसंद नारियल के लड्डू बन रहे थे। 

कालेश्वर से धर्मशाला की तरफ बढ़ने पर हमे धौलाधार हिमालय की धौली-धारें दिखनी आरंभ हो गई। 

कांगड़ा शहर से कुछ पहले सड़क के पुल के समान्तर पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरो गेज रेल मार्ग का पुल। 

कांगड़े से कुछ पहले आता गुफा मार्ग। 

कांगड़े में पहाड़ पर बना जयंती माता मंदिर। 

और,  कांगड़ा दुर्ग ने हमारा रास्ता रोक ही लिया। 

और,  हमारी गाड़ी मुड़ चली पुराना कांगड़ा शहर की ओर। 

मोटर साइकिल प्रेमी तो मैं शुरू से ही हूँ..... तब हीरो का ओफ रोड़ बाइक " इम्पलस्" बाज़ार में नया-नया आया था,
और कांगड़ा किले के सामने वाले बाज़ार में इसे खड़ा देख, अपनी फोटो इस संग खिंचवाने के लिए विवश हो गया। 

किले कभी खाली पेट नही देखे जा सकते,  तो किले के सामने वाले बाज़ार में एक महिला दुकानदार ने हमें घर जैसा खाना खिला दिया। 

और... आखिर हम वॉइस गाइड किराए पर ले कांगड़ा किले की ओर बढ़ रहे थे।