शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

"एक गाँव ऐसा, जहाँ घरों की दूसरी मंजिल बनाना वर्जित है..!" (जयंती देवी)


                    मैं चण्डीगढ़ बेशुमार बार गया हूँ...... और चण्डीगढ़  में रहती अपनी छोटी बहनों के साथ, चण्डीगढ़ या आसपास के दर्शनीय स्थलों पर घूमना-फिरना अक्सर ही होता रहता है।
              चण्डीगढ़ के आस-पास बहुत सारे दर्शनीय स्थलों में एक स्थल, चण्डीगढ़ से केवल 14किलोमीटर दूर हिमालय की प्रथम परत शिवालिक की पहाड़ियों की रमणीकता में, 600वर्ष पुरातन मंदिर "जयंती देवी"  एक ऊँचे पहाड़ी शिखर पर स्थित है।  बहुत समय से मन में था कि इस पुरातन मंदिर को जरूर देखना है.. और आखिर मार्च 2016 को यह वह समय भी आ गया, जब मुझे भी सपरिवार मां जयंती देवी का बुलावा ही आ गया।
              चण्डीगढ़ के प्रसिद्ध 17सेक्टर से पीजीआई हस्पताल वाली सड़क पर चलते हुए खुड्डा लाहौरा कस्बे से "जयंती मजारी" गाँव पहुँचकर व्यक्ति को सामने पहाड़ी शिखर पर किले की शक्ल में बना जयंती देवी मंदिर आकर्षित करने लग पड़ता है। सौ-सवा सौ सीढ़ियों पर चढ़ाई जब हमने शुरू ही की थी तो सूर्य देव अपने घोड़े अस्तबल की ओर ले जा रहे थे।  मार्च महीने की हल्की सी सर्दी पर, दिन की जाती हुई धूप की चमकार खूब भा रही थी।    अभी कोई बीस-तीस सीढ़ियाँ ही चढ़ पाए थे कि ऊपर से एक बुजुर्ग अपने लंबे टांहगू (डंडे) का सहारा ले, बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहे थे। उन्हें देख मन में विचार कौंदा तो उन बूढ़े बाबा से मैं पूछ बैठा, " बाबा आप कैसे इतनी सारी सीढ़ियाँ चढ़कर माता के दरबार में जा आये...!"
                तो वह ग्रामीण बुजुर्ग हंसते हुए बोले, " ओ पुत्रा मैं थोडी जानां हां,  मेैनू तांह माता आपे ही लेह जांदी अा..!!"  (बाबा के पंजाबी भाषा में कहें वाक्य का मतलब है कि पुत्र मैं खुद नही जाता, मुझे तो माता अपने आप ले जाती है।) बाबा की यह बात सुन मैंने झट से निष्कर्ष निकाल लिया कि स्थानीय लोगों में जयंती माता के प्रति गहरी आस्था है।
                जैसे ही आधी से ज्यादा सीढ़ियाँ हम चढ़ चुके थे तो उस ऊँचाई से जयंती माजरी गाँव का विहंगम दृश्य दिखना आरंभ हो गया.....तो मेरे बहनोई रमन जी ने मुझे गाँव की तरफ इशारा कर दिखाते हुए कहा, " भाजी,  देखो इस गाँव में क्या खास है..!" मैंने सरसरी सी नज़र मार कर कहा कि ऐसा तो कुछ खास नही, सामान्य गाँवों जैसा ही है यह गाँव है रमन जी..!!
                 रमन जी जो पहले भी जयंती देवी आ चुके थे, सो उस रहस्य को जानते थे..... जो रहस्य इस जयंती मजारी गाँव के बारे में प्रसिद्ध है। सो रमन जी ने हंसते हुए कहा कि इस गाँव की बनावट को ध्यान से देखो, यहाँ सारे मकानों की दूसरी मंजिल नही है....सारे के सारे मकान सिंगल छत के बने हैं..!!!!
                 अब मुझे सारा का सारा गाँव एक खुली किताब सा स्पष्ट दिखाई देने लगा कि हर गरीब-अमीर के छोटे-बड़े मकानों की छतों पर दूसरी छत ही नही है। यानि गाँव के मकान एक अनोखी गाथा समेटें बैठे हैं कि क्यों मकान मालिक पहली मंजिल के ऊपर दूसरी या तीसरी मंजिल नही बनाते।  हालाँकि मैं उस ऊँचाई से यह बात भी देख रहा था कि गाँव में बहुत सारे घर सम्पन्नतापूर्ण भी हैं, पर हैं सिर्फ एकमंजिला। यहाँ तक कि गाँव का गुरुद्वारा साहिब गाँव के मकानों से कुछ ऊँचा तो जरूर है, परन्तु है एकमंजिला ही।  मैंने हैरानी ज़ाहिर कर रमन जी से कहा, " सही कहा आपने... क्योंकि आज की आधुनिक सोच,  समय और जरूरत में अपने घरों को बहुमंजिला न करना खास बात है वैसे पुराने समय गाँवों में बनी धार्मिक जगहों की इमारतों की ऊँचाई से ऊँचा मकान कोई भी गाँव वासी नही बनाता था.... ठाकुरद्वारा के कलश शिखर हो या गुरुद्वारे साहिब के गुम्बद,  हर गाँव वासी सम्मान व आस्था में अपने बहुमंजिला मकान की ऊँचाई उनके बराबर नही होने देता था,  आज भी कुछ जगहों पर ऐसा देखा जा सकता है.... मेेरे शहर गढ़शंकर से केवल 6 किलोमीटर दूर हिमालय की प्रथम परत शिवालिक का पहला गाँव "कोट मैहरा " भी इस पुरातन रीति का उदाहरण है,  वहाँ के सब घर भी एकमंजिला है क्योंकि गाँव में मौजूद सारे धार्मिक स्थल भी एकमंजिला ही हैं.....  परन्तु यहाँ तो ऐसी कोई स्थिति भी नही है क्योंकि जंयती माता का मंदिर तो गाँव से करीब पाँच-छह सौ फुट ऊँची पहाड़ी पर बना है,  फिर भी क्यों लोग अपने घरों की ऊँचाई को मात्र दस-बारह फुट तक ही सीमित कर रखे हैं.....!!!!!"
                 रमन जी ने जवाब दिया कि मैंने भी यही सवाल स्थानीय लोगों से किया था तो उत्तर मिला कि जिस किसी ने भी कभी दूसरी मंजिल बनाने की कोशिश की... तो उसका नुकसान होना शुरू हो गया, सो लोगों ने दूसरी मंजिल बनाने की जुर्रत करनी ही छोड़ दी।
 
                     जैसे-जैसे हम सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे, ऊँचाई हमारी आँखों के समक्ष आस-पास व दूरदराज़ की सुन्दरता को प्रस्तुत किए जा रही थी.... एक तरफ तो दूर-दूर तक बिखरी सी पड़ी शिवालिक की पहाड़ियों का मनमोहक दृश्य और उसमें बांध बनाकर रोके गए बरसाती पानी से बनी सुन्दर जयंती झील.... दूसरी तरफ दूर तक देखते छोटे-छोटे गाँव और उनके खेतों में खड़ी गेहूँ की फसल की हरियाली।  मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते वहाँ घूम रहे मोरों को देख बच्चों का मन भी मयूर सा नाच रहा था।  शिखर पर पहुँचते-पहुँचते साढे छह बज चुके थे...हमारे सामने दिख रहे मैदानों में तो सूर्यास्त हो रहा था और हमारे पीछे शिवालिक की पहाड़ियों में चन्द्रोदय हो चुका था।
               शिखर पर पहुँच मंदिर प्रांगण में कदम रखते ही हमारा स्वागत तेज गति में बह रही हवा ने किया।  हवा इतनी तेज थी कि किले नुमा मंदिर की प्राचिरों और बुर्जों में बंधे लाल झंडों की  फड़फड़ाहट व मंदिर की घंटियों के मिश्रित ध्वनियां एक मंत्रमुग्ध संगीत की लहरें फैला रही थी।  मंदिर परिसर में कदम रखते ही यूँ ही नज़र दीवार पर लिखे  "जय मां कांगड़े वाली"  पंक्ति पर पड़ी,  तो दिमाग में आया कहाँ चण्डीगढ़ और कहाँ हिमाचल प्रदेश का प्राचीन शहर नगरकोट जो अब कांगड़ा नाम से जाना जाता है। कांगड़ा शहर तो माता ब्रजेश्वरी देवी मंदिर व चार हज़ार वर्ष पुराने नगरकोट दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है, क्या यह कांगड़े वाली माता ब्रजेश्वरी का ही स्थान है..... परन्तु इस मंदिर का नाम तो माता जयंती देवी है।
                मेरे दिमाग के स्मरण घोड़े प्रकाश की गति से दौड़ने लग पड़े और दो क्षणों में ही अंधेरे दिमाग में प्रकाश ले आये कि कांगड़े के नगरकोट दुर्ग के पास भी माता जयंती देवी का मंदिर है, जहाँ हर वर्ष  5दिवसीय मेला "पंचभीषम"  लगता है।  मंदिर की दीवार पर माता जयंती देवी का संक्षिप्त इतिहास पढ़ कर मां के दरबार में शीश निभाया।
                 क्या सुन्दर मां जयंती का दरबार, क्या सुन्दर सजावट, स्वर्ण आभूषणों से लदी मां की  पिंडियाँ और देसी घी से जल रही मां की ज्योतें देख मन ठहर सा गया। मेरी पत्नी व बहनें मां के दरबार में दुर्गा सप्तशती के पाठ में मगन हो गई और मैं व रमन जी पुजारी व स्थानीय लोगों से मंदिर के इतिहास व मान्यताओं के बारे में और ज्यादा जानकारियां हासिल करने में व्यस्त हो गए।
     
                  अब इन सब जानकारियों का सार आपको सुनाता हूँ कि कहानी शुरू होती है, 15वीं सदी में जब दिल्ली पर बाबर का राज था और अब यहाँ जयंती माजरी गाँव व मंदिर है, तब यह सम्पूर्ण क्षेत्र " हथनौर"  रियासत नाम से जाना जाता था। हथनौर के हिन्दू राजपूत राजा के 22भाइयों में से एक भाई का रिश्ता कांगड़े के कटोच राजा की पुत्री से तय हुआ। राजा की पुत्री कांगड़े स्थित अपनी कुलदेवी मां जयंती देवी की अनन्य भक्त थी। प्रतिदिन पर्वत शिखर पर स्थापित मां जयंती देवी के मंदिर दर्शन उपरांत ही राजकुमारी जल ग्रहण करती थी। शादी तय होने पर राजकुमारी को अब रात- दिन यह चिंता सताने लगी कि मैं अपनी ईष्ट मां से बिछुड़कर कैसे ससुराल में जी सकूँगी।
                  खैर एक रात मां जयंती ने राजकुमारी के स्वप्न में आकर कहा, " तुम क्यों व्यर्थ चिंता करती हो,  मैं तुमसे कहाँ बिछुड़ने वाली हूँ... तुम जहाँ भी जाओगी मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगी, तेरी अकेली की डोली कांगड़े से नही जा पाएगी...!!!"                           आखिर विवाह का दिन भी आ गया,  विवाहोपरांत विदाई का समय...... राजकुमारी की डोली चलने को तैयार,  परन्तु यह क्या डोली उठाने वाले कहार पसीना-पसीना हो गए,  मगर राजकुमारी की डोली उनसे उठ क्या टस से मस भी ना हुई...! यह करिश्मा देख हर कोई हैरान-परेशान था,  तो राजकुमारी ने अपने पिता को अपने स्वप्न सम्बंधी बताया, फिर राजा ने एक अन्य डोली सजवा कर उसमें विधिपूर्वक जयंती मंदिर से मां जयंती को छोटी सी पिंडी रूप में बिठाया.... तो दोनों डोलियां एक साथ उठ गई और कांगड़ा से विदा हो हथनौर आ पहुँची। हथनौर के राजा ने कांगड़ा से विवाह कर लाई राजकुमारी के साथ आई मां जयंती रूपी पिंडी को अपने राज्य की एक पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर बनवाकर स्थापित कर दिया और राजकुमारी पुन: वैसे ही पूजा अर्चना करने लगी, जैसे वह कुंवारी होते हुए अपने मायके में किया करती थी।
                 राजकुमारी जब तक जीवित रही और उसकी तीन पीढ़ियाँ करीब दौ सौ साल तक मां जयंती की पूजा अर्चना करती रही,  परन्तु आगामी पीढ़ियों ने धीरे-धीरे मां जयंती को भुला दिया...अहंकार में यह कहते हुए की माता तो हमारी बहू के साथ डोली में आई थी और हम उसे विवाह कर लाए थे, हम उसके आगे सिर नही झुकायेगें।
                     मां जयंती देवी का वो छोटा सा मंदिर अब वीरान हो चुका था। मां जयंती देवी इस पर क्रोधित हो उठी और अपने एक परम भक्त डाकू गरीबू  (जो तब आज के चण्डीगढ़ से सटा मनीमाजरा शहर जब जंगल हुआ करता था, में रहता था)  के सपने में आकर उसे आदेश दिया कि हथनौर रियासत के सर्वनाश का समय आ गया है, रियासत के शासक अपनी ऐश-प्रस्ती और अहंकार में मुझे अपमानित कर रहे हैं...तू हथनौर पर हमला कर और उन कुपूतों का नाश कर हथनौर का राजा बन राज कर...!!
                    गरीबू डाकू ने जब अपने संगी-साथी इकट्ठे कर हथनौर पर चढ़ाई कर दी तो चमत्कारिक ढंग से हथनौर किले के अंदर जगह-जगह खुद-ब-खुद आग लग गई। जो लोग आग से बचने के लिए किले से बाहर आते रहे उन्हें गरीबू डाकू के आदमी मौत के घाट उतारते रहे। रियासत में कोई भी मां जयंती के प्रकोप से बच ना पाया, केवल वही बच पाए जो उस समय हथनौर से बाहर थे या समय रहते हथनौर से भाग गए थे। सारे का सारा हथनौर नेस्नाबूत हो चुका था.... बचा क्या बस एक शिव मंदिर जो आज भी जयंती माजरी गांव की आबादी से बाहर है और दूसरा मां जयंती का मंदिर।
                        पूरे क्षेत्र पर गरीबू डाकू का नियंत्रण हो चुका था और उसके हाथ जो भी लूट का पैसा-जेवर लगा,  उससे उसने मां जयंती देवी मंदिर से पाँच किलोमीटर दूर एक नया गढ़ बसाया "मुल्लापुर गरीबदास"  जो चण्डीगढ़ से केवल दस किलोमीटर की दूरी पर है। मां की कृपा से गरीबू डाकू से राजा बने गरीबदास ने पहाड़ी पर बने मां जयंती देवी के छोटे से मंदिर के स्थान पर ही करीब चार सौ साल पहले किले नुमा इस बड़े मंदिर का निर्माण करवाया।
                      जयंती देवी मंदिर का पुजारी भी कांगड़े से ही मां की पिंडी के साथ ही आया था,  आज उसकी 10वीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है। मैंने पुजारी से जयंती माजरी गाँव के एकमंजिला मकानों के विषय में पूछा, " क्या यह मां जयंती का श्राप है कि गाँव का कोई भी घर बहुमंजिला नही हो सकता..!!!"
                        पंडित जी बोले कि यहाँ अकेले जयंती माजरी गाँव में एकमंजिला नही, बल्कि इस क्षेत्र के पाँचों गांवों में कोई भी मकान दो मंजिला नही है....माँ के श्राप से हथनौर रियासत का नामोनिशान भी नही रहा, कालांतर में लोग पुन: आ कर यहाँ बसने लगे और जिस किसी ने भी अपने मकान की दूसरी मंजिल बनानी चाहिए वह बन नही पाई... उसका कोई ना कोई नुकसान हो गया,  सो लोगों ने इस संयोग को मान दूसरी मंजिल बनाने ही छोड़ दी.... अभी कुछ समय पहले ही गाँव में सरकारी स्कूल बन रहा था, प्रशासन उसे दोमंजिला बनाना चाहता था परन्तु दूसरी मंजिल शुरू करते ही निर्माण कार्य में लगे एक व्यक्ति को करंट लग गया, ठेकेदारों के नुकसान पर नुकसान होने लगे तो आखिर उन्होंने भी हार मानकर स्कूल को एकमंजिला ही बनाया। चंद वर्ष पहले भी गाँव वालों ने देवी से दूसरी मंजिल डालने के संबंध में प्रश्न डाला था,  ग्यारह दिनों तक विधिवत पाठ-पूजा की गई,  फिर कन्या पूजन के उपरांत एक नन्ही कन्या से हां या नही की दो गुप्त पर्चियों में से एक उठवाई गई...... परन्तु जब पर्ची खोली गई तो मां का उत्तर  "नही"  ही निकला।  अपने मकानों को एकमंजिला रखना मां जयंती का श्राप कहो या वरदान,  परन्तु गाँव वासी बढ़-फूल रहे हैं देवी की कृपा इन सब पर बनी हुई है,  अब तो गाँव वाले मकानों की छतों से बच्चों को नीचे गिरने से बचाने लिए बनेंरे (रेलिंग) भी लगाने लगे हैं... जब कि पहले मकानों के बनेंरे भी नही बनाए जाते थे।

                         सूर्यास्त की लालिमा को धीरे-धीरे कर अंधेरा पीता जा रहा था, सात बजने को थे और हमारा लाम-लश्कर जयंती मंदिर पर माथा टेक सीढ़ियाँ उतरता जा रहा था....सीढ़ियाँ उतरते- उतरते मुझे दो स्थानीय नवयुवक मिल गए जो अब मेरे प्रश्नों का शिकार होने वाले थे।   मैंने उन नवयुवकों से पूछा, " भाई अब तो ज़माना बदल रहा है, सोच बदल रही है...आप लोग बताओ कि क्या अब भी आप लोग मकानों की दूसरी मंजिल नहीं बनाना चाहते..!!"       तब नवयुवकों का संयुक्त सा जवाब था कि समय व सोच तो आधुनिक हो रही है परन्तु पुरातन धारणाएँ हम सब के दिमागों में हावी है, चाहे हम अपने घरों में जगह की तंगी झेल रहे हैं क्योंकि हमारे परिवार बड़े होते जा रहे हैं... परन्तु हम फिर भी अपने घरों के ऊपर दूसरी मंजिल नही बनाते,   बस अब तो गाँव फैल रहा है लोगों ने खेतों में भी अपने एकमंजिला मकान बनाने शुरू कर दिए हैं,  चण्डीगढ़ जैसे चकाचौंध वाले आधुनिक शहर के इतने करीब होने पर भी हमारा गाँव पिछड़े का पिछड़ा ही है....गाँव से आने- जाने के लिए केवल एक ही बस आती-जाती थी जिसको भी अब सरकार ने बंद कर दिया है....बहुत लोग अपने-अपने साधनों पर माता जयंती माता माथा टेकने पहुँचते हैं, परन्तु उन्हें ले कर आने वाली सड़क पिछले कई वर्षों से टूटी हुई है....सफेद कपड़ों वाले चुनाव में वादे तो कर जाते हैं परन्तु शायद वह माता जयंती से नही डरते....!!!!!
               
                        सीढ़ियाँ उतर हम गाड़ी ले उस प्राचीन शिव मंदिर में जा पहुँचे....क्योंकि माता जयंती के दर्शनों के बाद इस प्राचीन शिवलिंग के दर्शन करने से ही यात्रा सफल मानी जाती है और इसी शिव मंदिर के अलावा पूरी की पूरी हथनौर रियासत विध्वंस हो गई थी और आज भी इस मंदिर के आस-पास कोई आबादी नही है।
                       काले हो चुके आसमान पर अब चाँद चमक रहा था और सड़क को मेरी गाड़ी की हेडलाइट चमका रही थी।  गाड़ी चलाते हुए मेरे दिमाग में सोच चल रही थी कि माता जयंती के प्रकोप से उजड़ चुके हथनौर में जब दोबारा आकर लोगों ने मां के श्राप से डरते हुए अपने घरोदों को पुन:  बनाना शुरू किया होगा तो बस सिर छिपाने हेतु ही छत डाली होगी.... और वही सिर छिपाने वाली छतें आज भी जयंती माजरी गाँव में है।

जंयती माजरी गाँव पहुँच कर, सामने दिख रहे पहाड़ी शिखर पर स्थित जयंती माता मंदिर आकर्षित करने लग पड़ता है। 

जंयती माता मंदिर का मुख्य द्वार व सीढ़ियाँ। 

जैसे-जैसे हम जयंती माता मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे,  ऊँचाई हमारी आँखों के समक्ष आस-पास व दूरदराज़ की सुन्दरता प्रस्तुत किये जा रही थी। 

एक ओर तो गेहूँ के हरे-भरे खेतों में सूर्यास्त हो रहा था....

और..... दूसरी ओर बिखरी सी पड़ी शिवालिक की पहाड़ियों में चन्द्रोदय हो चुका था। 

जयंती माता का किले नुमा मंदिर। 

माँ जयंती मंदिर प्रांगण। 

क्या खूब सजावट मां जयंती मंदिर की। 

क्या भव्य दरबार माता रानी का। 

मां दी आं सोहनीआं ज्योतें।


जंयती देवी मंदिर से दिखाई देता जयंती डैम।

जयंती माता मंदिर से नज़र आता जयंती माजरी गाँव,  यहाँ सभी मकान एकमंजिला है। 

जयंती देवी मंदिर के बुर्जों में खड़ा हमारा लाम- लश्कर। 


अंधेरा होने को था... और हम मंदिर माथा टेक वापस उतर रहे थे। 

जयंती माजरी गाँव से बाहर बना प्राचीन शिव मंदिर,  मान्यता है कि जयंती माता के दर्शनोपरांत यहाँ दर्शन करने से ही यात्रा सफल मानी जाती है। 

अंधेरे में शिव मंदिर से नज़र आ रहा माँ जयंती का मंदिर। 

गूगल नक्शे से प्राप्त जयंती माता क्षेत्र का चित्र.... बेहद रमणीक स्थान,  शिवालिक की पहाड़ियों में स्थापित माँ जयंती मंदिर व जयंती झील और पहाड़ियों के सामने मैदानों में बसे गाँव व उनके खेत-खलिहान।

मेरी साहसिक यात्राओं की चित्रकथाएें...
(1) " श्री खंड महादेव कैलाश की ओर " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(2) "पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(3) " चलो, चलते हैं सर्दियों में खीरगंगा " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(4) करेरी झील, " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।

रविवार, 22 अप्रैल 2018

भाग-6 करेरी झील...." मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "(अंतिम किश्त)


                                             " जो जीतना चाहे,  वो आशिक कहाँ का...!!! "     
               
  इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र (http://vikasnarda.blogspot.in/2018/02/1.html?m=1 )स्पर्श करें।

                             करेरी झील के रास्ते में.....31 दिसम्बर 2012 की वो सर्द रात उस गुफा में कट चुकी थी।  सुबह 7 बजे के करीब मुझे जाग आती है,  विशाल जी चूल्हे के समीप बैठे आँखें मूंदे अपना नित्य नाम जप रहे थे। मैं उन्हें सुप्रभात बोलकर झट से गुफा से बाहर निकल जाता हूँ क्योंकि मेरी आँखों को तलाश है, करेरी झील पर जाने वाले रास्ते की। मन में प्रकाश व उल्लास है उस जमी हुई झील तक पहुँचने का।  कल शाम रास्ते पर बर्फ ज्यादा आने के कारण हमें आगे बढ़ने का उचित मार्ग नहीं मिल पा रहा था,  तो हमने रात गुफा में आग जलाकर जैसे-कैसे काट ली थी।                               जल्द ही मुझे आगे बढ़ने का वैकल्पिक रास्ता भी मिल जाता है। मैं उन्हीं पैरों से भागता हुआ गुफा में वापस आ विशाल जी को खुशी से कहता हूँ कि मुझे आगे जाने का रास्ता मिल गया है..... परंतु आँखें मूंदे पाठ में मग्न विशाल जी केवल अपना सिर जरा सा ही हिला देते हैं।
                            मैं फिर बच्चों की तरह उछलता-कूदता गुफा से बाहर निकल नदी के किनारे खड़ा हो,  कभी बर्फ बन चुके नदी के जल को देख रहा हूँ तो कभी उस घाटी के पर्वत शिखरों को निहार रहा हूँ जिन पर पड़ी बर्फ सूर्य की ताज़ी किरणों से चमक रही थी...जिन्हें देखकर मेरा मन भी चहक रहा था।
                           फिर से गुफा में आ,  भड़क रहे चूल्हे की आग को सेंकने लग पड़ता हूँ और जैसे ही विशाल जी अपना पाठ समाप्त करते हैं......मैं उत्सुक हो उन्हें देख रहा हूँ, परंतु विशाल जी अब आगे बढ़ने की बात को नकार देते हैं यह कहते हुए कि विकास जी हमारे पास खाने के लिए कुछ भी नही है, चलो यहीं से वापस चलते हैं।
                           मैं उन्हें कहता हूँ, " नही हमारे पास दो बिस्कुट के पैकेट बच रहे हैं, इस से ही काम चला लेंगे..!"  परंतु विशाल जी ने फिर सिर ना में हिला दिया, "नही, विकास जी मुझे अब और ऊपर नही जाना है... मैं वापस जाना चाहता हूँ...!!! "
                           मैं फिर से उन्हें यह कहकर उत्साहित करता हूँ, "विशाल जी, मुझे लगता है करेरी झील अब ज्यादा से ज्यादा 2 किलोमीटर की दूरी पर है....और दिन अभी शुरू ही हुआ है, बस ऊपर झील पर थोड़ा समय रुक वापस चल देंगे।"
                            परंतु विशाल जी का जवाब ना में ही था मतलब उनके मन का प्रकाश कब का बुझ चुका था।  मुझे उनके इस नकरात्मक रवैय्या पर बेहद गुस्सा आ रहा था। पर उसे उन पर ज़ाहिर नही कर पा रहा था।
                            विशाल जी तर्क देते हुए बोलते हैं, "विकास जी, हमें इससे ज्यादा खतरा नही उठाना चाहिए, बेहतरी इसी में है कि यहीं से वापस चलते हैं...!!!!"       मेरे मन के प्रकाश पर विशाल जी के मन के अंधेरे बादलों ने हमला बोल दिया था।  मैं दुविधा में खड़ा आखिर अपने मन पर पत्थर डाल, विशाल जी के साथ वापस चलने को राज़ी तो हो जाता हूँ परंतु अशांत व गूंगे रोष भरे मन के साथ।
                             8बजे हम दोनों अपनी लाठियों उठा खामोशी से वापस चल देते हैं। आधा घंटा चलते रहने के बाद हमें पीछे से आवाज़ें आती सुनाई देती है तो मुड़ कर देखते हैं कि कल हमारे आगे गए हुए अंग्रेजों का दल चला आ रहा था।  उनके पीछे-पीछे करेरी गाँव के गाइड और वन विभाग के अधिकारी का बेटा व उसका दोस्त भी चले आ रहे थे।
                            अब हम सब एक-दूसरे की आप-बीतियाँं सुन-सुना रहे थे।  गाइड के साथ गए लड़कों ने सिर्फ हल्की सी गर्म शर्ट ही पहन रखी थी..... उसे देख मैंने पूछा, "क्यों भाई कैसी कटी रात...!"  तो वे बोले, "भैया मत पूछो हम तो ऐसे ही चल दिए थे करेरी झील कि शाम तक वापस आ जाएंगे, परंतु बर्फ बहुत ज्यादा आने के कारण ऊपर पहुँचते-पहुँचते ही अंधेरा हो गया, अच्छा हुआ आप लोग ऊपर नही आए....एक तो वहाँ जलाने के लिए लकड़ी भी नहीं थी और दूसरा झील के किनारे बने मंदिर की धर्मशाला में इतनी भयंकर ठंड थी कि हमारे शरीर कांप रहे थे तो ये गाइड साहिब हमें और अंग्रेजों को लेकर झील से दूर बने एक और डेरे पर ले गए... जहाँ हमें जलाने के लिए लकड़ी भी मिल गई और खाना हमें अंग्रेजों ने थोड़ा बहुत दे दिया, बस सारी रात बैठकर ही काटी...!!!!!"
                           उनकी बात सुन हमने बचे हुए दोनों बिस्कुट के पैकेट खोल उन सब में बाँट दिये।  मैं उन सबके बूट देख रहा था जिसकी बर्फ पर पड़ी छाप,  कल से हमारी पथ प्रदर्शक बनी हुई थी। उस छाप को पहचान कर मैं उस अंग्रेज के से जब यह कहता हूँ कि आप का जूता कल से हमारा गाइड बना हुआ है तो वह खूब हंसा और मुझे गले से लगा लिया।
                          अब हम नौ लोग इकट्ठा नीचे उतर रहे थे।  मैं गाइड से चिपक चुका था क्योंकि मुझे जिज्ञासाओं को भी तो शांत करना था।    "हम जिस जगह पर रात, उस गुफा में रुके थे...उस जगह को आप लोग क्या कहते हैं...?"
                          मेरा सबसे पहला सवाल गाइड "सुरेश" से......  "उटवाला है उस जगह का नाम...!" सुरेश का जवाब।  "हम करेली झील से कितना पीछे रह गए" तो सुरेश बोला, "ज्यादा नही केवल 2 किलोमीटर के करीब...!!  मेरे मन में इक ठीस सी उठी जो ठंडी आह बन मेरे मुँह से निकली और मेरा मन व्याकुल सा हो चला।
                           बच्चों सा जिज्ञासु हो सुरेश से प्रश्न पर प्रश्न पूछता रहा कि ऊपर झील कैसी है, वहाँ क्या-क्या है आदि-आदि।   गाइड सुरेश मेरे हर सवाल का जवाब भी बूढ़े दादा की तरह ही देता रहा कि करेरी देवी के नाम पर ही इस झील और गाँव का नाम करेरी पड़ा। करेरी देवी माँ का मंदिर करेरी झील के किनारे पर है....बेहद ही खूबसूरत स्थान है करेरी झील और करेरी से भी ऊपर 6झीलें और भी हैं,  आप मेरे पास गर्मियों में आना...मैं आपको करेरी झील से भी आगे उन सब झीलों को दिखाता हुआ धौलाधार हिमालय की सबसे गहरी व लंबी झील "लमडल" दिखाने ले चलूँगा।
                           सुरेश की बातें सुन मेरा ध्यान रास्ते पर कम आकाश की तरफ ज्यादा हो रहा था जिसके नीले रंग में धौलाधार हिमालय के श्वेत शिखर चमक रहे थे और मैं ख्यालों की लहरों में तैर रहा था कि जाने कैसी दिखती होंगी वे सात झीलें इन शिखरों के नीचे।  लमडल झील का नाम मेरी स्मृति में सुरेश ने चिपका दिया था...जिसकी यात्रा मैने अगले साल एक स्थानीय गद्दी राणा चरण सिंह की मदद से संपन्न की। (लमडल यात्रा की धारावाहिक चित्रकथा आप मेरे ब्लॉग की पिछली किश्तों में पढ़ सकते हैं, यह पदयात्रा मेरे जीवन की सर्वोत्तम रोमांचक यात्रा है,  दोस्तों लमडल यात्रा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें  )
                     
                      रास्ते में बर्फ पर पड़े निशान देख, मैं सुरेश को उस बारे में पूछता हूँ तो वह कहते हैं, "भालू के पैरों के निशान"   यह जवाब सुन मैं और विशाल जी एक दूसरे के मुँह को फटी आँखों से देख रहे थे क्योंकि सुबह गुफा से चलते समय मुझे विशाल जी ने गुफा के से करीब 20 फुट की दूरी पर बर्फ पर बने ऐसे निशान दिखाए थे.... जो उन्होंने सुबह लकड़ी इक्ट्ठा करते हुए देखे थे।  हम तब इतना तो समझ चुके थे कि यह किसी जानवर के पैरों के निशान तो हैं...परंतु जब सुरेश के मुँह से भालू का नाम सुना तो पल भर में बीती हुई सारी रात घूम गई कि रात के अंधेरे में हमारी गुफा के बाहर भालू घूम रहा था।   एक सिहरन सी ऐसी घूमी तन-मन में जो चंद क्षणों के लिए ही हमें भयभीत कर गई...!!!!
                            ट्रैकिंग स्टिक की तरह पकड़ा वह 4 किलो का डंडा,  अंग्रेज महिला पर्वतारोहियों की नज़र में मुझे हास्य का पात्र बना रहा था..... परंतु मुझे उनकी परवाह कहाँ थी क्योंकि मैं मन-ही-मन ठान चुका था कि इन दोनों डंडों को वापस वही पहुँचाना है,  जहाँ से हमने इन्हें चोरी किया था।
                           चाहे उस वक्त मैं उन पहाड़ों की ऊँचाई से नीचे उतर रहा था परंतु मेरे भीतर एक नई इच्छा चढ़ती जा रही थी। इच्छा उन पहाड़ों में फिर से आने की, उन उँचाईयों को साक्षात देखने की जिन्हें केवल अपना शरीर तोड़ कर ही देखा जा सकता है।
                            यदि यह मेरी पहली पर्वतारोहण यात्रा सफल हो जाती तो शायद मैं फिर से तुम्हें फाँदने ना आता, हे  हिमालय...!!  मंजिलें मिल जाने पर इंसान संतुष्ट हो जाता है परंतु तूने मुझे संतुष्ट नही होने दिया क्योंकि तुझे सच्चे आशिक की पहचान है और वो आशिक ही क्या,  जो संतुष्ट हो जाए....!!!
                            "हे हिमालय, मेरे भीतर तेरी आशिकी का बीज अंकुरित हो चुका था.... जिसे अब तेरी मोहब्बत ही पाल-पोसकर वृक्ष का रूप दे सकती है। मुझे कोई तमन्ना नही कि मैं तेरी सबसे ऊंची चोटी को सिर करूँ क्योंकि मुझे तुझे जीतना नही है,  सच्चा आशिक कभी जीतता नही और जो जीतना चाहे वो आशिक कहाँ का...!!!!"
                            दोपहर का समय हो चला था हम दोनों की रफ्तार सबसे कम होने के कारण सब के सब हमें छोड़ आगे बढ़ चुके थे। लियोंड खड्ड का पक्का पुल आ चुका था। हमारे असली हमसफ़र उन चोरी के डंडों को हम एक मूक आभार सहित उस निर्माणाधीन सड़क के सामान में रख,  करेरी गांव की ओर बढ़ जाते हैं।
                            करेरी गांव में पहुँच हम सब फिर से इकट्ठा हो जाते हैं वन विभाग के विश्राम घर में और जीवन में पहली बार बगैर दूध की चाय को चखा, जो अंग्रेजों ने बनाई थी और सुरेश ने हमें परोसी थी। बातचीत के दौरान वह गद्दी भी वहाँ आ पहुँचा जिस के डेरे पर हम रात रूके थे वह कुछ परेशान सा था,  परंतु हमने उसे यह कहकर निश्चिंत किया कि हमने तुम्हारे डेरे में से कोई भी लकड़ी तोड़कर जलाई नही है....बल्कि तुम्हारा बहुत शुक्राना तुमने वहाँ चिमटा और बोरी की चटाई छोड़ रखी थी जो हमारे बहुत काम आई.... यह बात सुन सब खूब हंसे।
                            हमारे कदम अब करेरी गाँव को पीछे छोड़, दूर नीचे घाटी में दिख रही काली चींटी सी हमारी गाड़ी की ओर बढ़ रहे थे।

                                                    ......................................(समाप्त)
गुफा डेरे से बाहर सामने की तरफ दिखता था यह नज़ारा, सारी रात मैं अंधेरे में चमक रही इस सफ़ेदी को देखता रहा। 

सुबह उठते ही मैं गुफा से निकल बाहर की तरफ भागा,  करेरी झील जाने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता खोजने। 

करेरी झील से बह कर आ रही लियोंड नदी का जल भी जमा हुआ था। 

और....वैकल्पिक रास्ता खोजने के उपरांत, मैं गुफा में वापस पहुँच भड़क रहे चूल्हे के सामने आ बैठता हूँ। 

बस इतनी सी ही थी,  वो गुफा दोस्तों.... और गुफा की दीवार पर रखी वो डिज़ीटल दीवार घड़ी,
 जिसे विशाल जी अपने घर से उतार लाये थे...समय देखने के लिए नही बल्कि तापमान देखने के लिए दोस्तों...!!!  

गुफा डेरे के बाहर खड़ा मैं। 

अब,  गुफा के आगे खड़े हो फोटो खिंचावने की बारी विशाल जी की थी। 

गुफा के बाहर थोड़ी दूरी पर ही यह पलंग नुमा शिला पड़ी थी। 

लो,  मैं भी लेट कर देखता हूँ...!! 

गुफा से वापसी के समय खींचा हुआ चित्र। 

वापसी का सफर। 
  (1) "श्री खंड महादेव कैलाश की ओर"......यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(2) "पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास"....यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(3) "चलो, चलते हैं सर्दियों में खीरगंगा ".....यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।

रविवार, 1 अप्रैल 2018

भाग-5 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "



                                                                           आग और हम....!!

इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने के लिए यंत्र (http://vikasnarda.blogspot.in/2018/02/1.html?m=1)स्पर्श करें।
                                     
                                      31 दिसम्बर 2012 साल के आखिरी उजाले को अंधेरे ने मार दिया था।  शुगल-मेले में शुरू की हुई हमारी करेरी झील की ट्रैकिंग अब हमारे संग ही शुगल-मेले कर रही थी। हम करेरी झील के रास्ते में ज्यादा बर्फ आने के कारण फंस चुके थे।
                          और,  अब उस गुफा नुमा गद्दी डेरे में हम लकड़ियां इकट्ठे कर लाये हैं और उन्हें गुफा में बने चूल्हे पर जलाने का कार्यक्रम प्रगति पर है..... विशाल जी कांपते हाथों से अपने पिट्ठू बैग में से अखबार का एक टुकड़ा और माचिस निकालते हैं।  मैं छोटी-छोटी सूखी लकड़ियों और घास-फूस को चूल्हे में चिन रहा हूँ,  ताकि उस भयंकर ठंड से हमारी जीवन रक्षक आग जल्द से जल्द जल जाए।
                          आग के जलते ही मानो उस वीरान गुफा में जैसे उत्सव सा माहौल छा गया,  गुफा की दीवारें आग की रोशनी से चमक उठी थी और हमें उस निर्जन जगह में आग से मिलना....ऐसे लग रहा था जैसे मेले में गुम बालक को उसका पिता मिल गया हो...!!    यह गुफा और उस में जल रही आग अब हमारी ढाल बन चुकी थी क्योंकि पहने हुए कपड़ों के अलावा हमारे पास कोई भी गर्म कपड़ा नही था,   जो गर्म लोईयाँ भी हमारे पास थी...उन्हें हम व्यर्थ का भार जान गाड़ी में ही फेंक आए थे।
                          हमारे मोबाइल फोन इतनी ऊँचाई पर आकर नाकारा हो चुके थे,  क्योंकि उनकी टावर रेंज नुमा धड़कन  तो सुबह धर्मशाला शहर से चंद किलोमीटर आगे आने पर ही बंद हो चुकी थी।  हम दीन-दुनिया से कट चुके थे... गुफा और उस में जल रही आग ने ही,  हमें उस दुनिया में वापस जाने का सहारा दे दिया था।
                          विशाल जी आग के बिल्कुल समीप चौकड़ी मारकर बैठ,  बार-बार औसम्-औसम् बोलते हुए चहक रहे थे। जबकि मैं आग से कुछ दूर बैठा था, क्योंकि मुझे अपनी स्वर्गीय दादी जी के बोल याद आ गए जो मैं बचपन में उनके मुख से सुनता था...जब मैं रसोई घर में जल रहे चूल्हे के सामने जा बैठता तो वह अक्सर कहती कि आग ज्यादा सेंकने के बाद उतनी ही ज्यादा ठंड लगती है।  सो मैं आग से एक निश्चित दूरी बना बैठा रहता हूँ।
                          गीले हो चुके हमारे बूट अब चूल्हे के किनारे पड़े आग की तपिश में सूख रहे हैं, जबकि जुराबों को हमारे शरीर की तपिश सुखा चुकी है।  हालात अनुकूल होते ही पेट के ढोल बजने लगते हैं... तो विशाल जी अब गुफा की अलमारी में मिले चिमटे से कल सुबह के नाश्ते से बची हुई कुछ कचौरियों को पकड़कर आग पर गर्म कर रहे थे और मैं भी सुबह धर्मशाला से खरीदे समोसों में लकड़ी घुसेड़,  उन्हें आग पर पनीर टिक्का की तरह भून रहा हूँ।
                        अब आप लोग उस आनंद को महसूस करें, जो हम दोनों सांढू़ भाइयों को उस वक्त मिल रहा था कि हम सर्दियों के मौसम में बर्फ से भरे हिमालय में एक गुफा के अंदर आग जला....जली हई कचौरियाँ, भुने हुए समोसे और गरमा-गरम पलंगतोड़ (मिल्क केक) की दावत उड़ा रहे हैं।  ऐसी दावत का असली रस आप लोग शिमला के किसी पांच सितारा होटल में भी बैठ नही प्राप्त कर सकते दोस्तों।
                         थकान और पेट का भरना मतलब नींद पर सवारी।  सो गुफा की उस छोटी सी अलमारी में मिली बोरी को हम गुफा ठंडे-ठार फर्श पर बिछा चुके हैं... जो भी मेरे पास था सब कुछ धारण कर लेता हूँ जैसे बंदर टोपी, दस्ताने आदि। तभी विशाल जी अपने बैग में से एक डिजिटल दीवार घड़ी निकाल गुफा के एक कोने में सजा देते है। मैं हैरानी से उस घड़ी को देख रहा हूँ कि इतनी बड़ी दीवार घड़ी को विशाल जी क्यों लेकर आए हैं,  क्या सिर्फ समय देखने के लिए...!!!    विशाल जी खुद ही बोल पड़ते है, " विकास जी,  इस डिजिटल घड़ी में समय तारीख के साथ तापमान भी आता है,  सो घड़ी को अपने डैडी जी के कमरे की दीवार से उतार साथ ले आया कि पहाड़ में जाकर तापमान भी देखते रहेंगे...!"  और उस समय दीवार घड़ी रात के 8बजा कर तापमान 6डिग्री दिखा रही थी।
                       विशाल जी को जैसे जलते चूल्हे से मुहब्बत हो चुकी हो....!!!  वे उस के पास ही लेट जाते हैं और मैं उनकी बगल में गुफा के मुहाने की तरफ।   बस इतनी सी ही जगह थी उस गुफा में कि दो व्यक्ति लेट सकें.... उस 4 किलो के डंडे को भी मैं अपने साथ ही लिटा लेता हूँ।
                       रह-रहकर सर्द हवा के झोंके मुझसे आकर टकरा रहे थे.... मेरे लिए वह जलती आग अब बीरबल की खिचड़ी साबित हो चुकी थी।  जलते चूल्हे की गर्मी और मेरी ओट में लेटे विशाल जी झट से ही गहरी नींद में जा पहुँचें और छेड़ दी तानें व अलाप निद्रा-राग की.....  लो मैं फिर फंस गया,  उड़ गई सारी नींद...!!!!
                       ऊपर से सर्द हवा थोड़ी-थोड़ी देर बाद आ मुझे थप्पड़ लगा जाती और नीचे गुफा का फर्श इतना ठंडा था कि जैसे मैं बर्फ पर लेटा हूँ।  लेटते ही मेरा मन स्थिर हो जाता है और दिमाग दौड़ने लगता है कि विशाल जी ने बड़ी समझदारी से निर्णय लिया जो इस गुफा में रुक गए....यदि हम ऊपर जाते हुए अंधेरे में फंस जाते, तो...!!!!!!
                        मेरा विचार-मगन दिमाग स्वयं से ही प्रश्न पूछ रहा है कि क्यों हम दोनों पहाड़ों में नववर्ष मनाने के लिए इस वीरान जगह पर आ गए....जबकि हम भी उन अधिकांश लोगों की तरह शिमला-डलहौजी-मंसूरी जैसे पर्वतीय स्थलों पर जा बर्फबारी का आनंद ले, बड़े मजे से इस नव वर्ष को मना सकते थे।  आखिर क्यों मेरे दिमाग में इस ट्रैकिंग का कीड़ा आ घुसा।
                       हुआ कुछ इस तरह कि इस ट्रैकिंग पर आने से 4 दिन पहले विशाल जी मेरे पास गढ़शंकर आए थे, सो मैं उन्हें लेकर 10 किलोमीटर दूर डल्लेवाल गाँव में अपने फार्म हाउस (जोकि शिवालिक की पहाड़ियों में है ) पर घुमाने ले जाता हूँ। फिर वहीं से कुछ किलोमीटर और आगे जा झुग्गियां नामक गाँव में उन्हें अपने मनपसंद पकौड़े खिलाता हूँ.....क्योंकि जो भी मेहमान मेरे खेतों पर जाता है,  मैं उसे झुग्गियां जरूर ले जाता हूँ, बिंदु चाट वाले के पकौड़े खिलाने और या यह कह लो खुद खाने..... अरे भाई आप सब जानते ही हो कि पकौड़े मेरी दुखती रग है..!!
                       वहीं बैठे-बैठे मैं विशाल जी को कहता हूँ कि चलो आपको 1000 साल पुराना मंदिर भी दिखा लाता हूँ.... विशाल जी बेहद हैरानी से पूछते हैं कि क्या सच में,  मैं तो सोच भी नही सकता कि गढ़शंकर क्षेत्र में इतना पुरातन मंदिर भी होगा।   मैं अपने तर्क देता हूँ, " जी हां जी जनाब,  इस मंदिर को पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकार में ले रखा है जी।"
                      कुछ देर बाद हम भवानीपुर गाँव में टीले पर बने हरि देवी मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहे थे।  टीले पर बने इस मंदिर की भव्यता का अनुमान बस वहाँ पड़े चंद अवशेषों से ही ज्ञात होती है।  कुछ पुरानी मूर्तियों को फिर से चूने से बनी दीवारों में चिन,  शायद सौ साल पहले एक सादा मंदिर फिर से खड़ा किया गया है।
                     हरि देवी मंदिर प्रांगण में खड़ा हो,  मैं विशाल जी को दूर दिखाई देती एक बहुमंजिला इमारत दिखा कर कहता हूँ, " यह गुरु रविदास जी की चरण छू भूमि पर बना गाँव खुराली का गुरुद्वारा है...मैं यहाँ बहुत बार पैदल जा चुका हूँ।  पैदल जाने की बात सुन विशाल जी बोले, " क्यों वहाँ सड़क नही जाती क्या...!"
                     मैंने हंसते हुए कहा, "जाती है जनाब, यदि इस जगह से आप सड़क मार्ग से वाहन द्वारा खुराली गाँव जाएं तो मैं पैदल ही चल, आपसे पहले वहाँ पहुँच आपके स्वागत में खड़ा मिलूंगा... क्योंकि सड़क मार्ग से इस जगह पहुँचने में 15 किलोमीटर है और सामने दिख रही कुछ गहरी खड्ड को पार कर व्यक्ति केवल 2 किलोमीटर पैदल चल वहाँ पहुँच सकता है, चलो अब लगे हाथ इसी रास्ते से गुरुद्वारा साहिब जा माथा टेक आते हैं विशाल जी...!"
                     अब हम दोनों पहाड़ी से उतर खड्ड को पार करते हुए दूसरी तरफ की पहाड़ी पर चढ़ रहे थे जिस पर छोटा सा गाँव खुराली बसा है।
                      मान्यता है कि 15वीं सदी में इस गाँव में गुरु रविदास जी 4 वर्ष 2 महीने 11 दिन रूके थे क्योंकि तब इस रियासत का राजा वैन बहुत अहंकारी स्वभाव का था और राजा वैन मीराबाई का मौसा था।
                      मीराबाई के गुरु संत रविदास जी थे, सो मीराबाई के आग्रह पर संत रविदास जी मीराबाई के साथ ही सन्1515 में खुराली गाँव आए और अहंकार में डूबे राजा वैन ने भजन बंदगी में लीन गुरु रविदास जी की प्रजा में बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्या कर उन्हें कारागृह में डाल दिया और बैलों से चलाई जाने वाली खरास यानि आटा पीसने वाली चक्की को बैल की जगह खुद जुतकर चक्की चलाने की सज़ा दे डाली...!!
                                   गुरुजी ने निर्विरोध सजा स्वीकार की और अंतर्ध्यान हो एक जगह बैठ गए।
                                                               कहते हैं चमत्कार हुआ....!!!
                     और......चक्की बगैर बैलों के ही चल पड़ी, आटा पिसता रहा।   यह चमत्कार देख अत्यंत प्रभावित राजा वैन ने गुरु रविदास जी से माफी मांगी।
                                                                           :-)~~(-:        
                                 
                     बस यही छोटी सी पदयात्रा हमारे ट्रैकिंग जीवन की नींव बन गई दोस्तों। वैसे आज गाँव खुराली का नाम "श्री खुरालगढ़ साहिब" हो चुका है.... दलित समाज से जुड़े होने के कारण पंजाब में आई हर सरकार इस पावन तीर्थ स्थल को रौशन करने के लिए तत्पर है। एक बहुत बड़े म्यूज़ियम "मीनारें बेगमपुरा" भी निर्माणाधीन है... चलो अच्छा है कि मेरा गढ़शंकर क्षेत्र भी भविष्य में पर्यटन की ऊँचाइयों को छुएगा।

                     तभी एक तेज़ हवा का झोंका मेरी सोच को विराम देता है....चूल्हे में आग कम हो चुकी है सो उठकर लकड़ियां डाल,  फिर से लेट जाता हूँ। दिमाग शून्य होने से झट से ही मुझे नींद आ जाती है। मेरी आँखें चाहे अंधकार में जा चुकी थी,  परंतु मन में प्रकाश चल रहा था "कल सुबह उठकर करेरी झील जाने का प्रकाश...!!"
                     करीब 2 घंटे बाद मुझे विशाल जी की ठंड से कांपती आवाज़ नींद से जगाती है क्योंकि अब आग केवल सुलग रही थी और मेरी दादी जी के कथन को भी तो सही होना था कि जो ज्यादा आग सेंकता है,  उसे बाद में ज्यादा ठंड लगती है।  सो अर्ध सोई अवस्था में लेटे-लेटे ही, मैं विशाल जी की दोनों टांगों को अपनी टांगों के बीच दबा लेता हूँ ताकि एक दूसरे को कुछ गर्मी मिल सके।  शायद हम दोनों की थकान की वजह से नींद की नीम-बेहोशी में पड़े थे,  तो किसी ने भी उठ लकड़ी आग में नही डाली।
                      गुफा में रखी दीवार घड़ी के घंटे बढ़ते जा रहे थे और तापमान घटता जा रहा था। बाहर बह रही लियोंड नदी में पानी गिरने की आवाज़ भी कम होती जा रही थी।  आधी रात के वक्त विशाल जी लेटे-लेटे बोलते हैं, "विकास जी, हैप्पी न्यू ईयर...!!!!"
                      हां दोस्तों,  नव वर्ष 2013 चढ़ चुका था और हम दोनों सांडू़ ठंड से कांपती अपनी आवाजों से एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई दे रहे थे। रात का डेढ़ बज चुका था और तापमान 2डिग्री। चूल्हा अब हमारे द्वारा एकत्रित की हुई सारी लकड़ी को खा चुका था।  गुफा के रड़े फर्श पर लेटे मेरी कमर ठंड से अकड़ चुकी थी।  शरीर अब नींद को भी नकार चुका था। उस स्याह रात में मैं लेटा हुआ बार-बार बाहर दिख रहे पहाड़ पर पड़ी बर्फ को एकटक सा देखता जाता हूँ और कभी-कभी मेरी आँखें खुद-ब-खुद बंद हो जाती थी।
                      अब पिछले कुछ घंटों से हम दोनों में कोई भी संवाद नही हुआ था.... क्योंकि हम दोनों ही एक-दूसरे की नींद खराब नहीं करना चाहते थे। एक आवाज़ जो पिछले कई घंटों से मैं सुनता रहा था,  वह कम होते-होते अब बंद हो चुकी थी मतलब बाहर बह रही नदी का पानी भी जम चुका था।  मैं उत्सुकतावश धीरे-धीरे उठ दीवार घड़ी की तरफ देखता हूँ तो रात के 3बज चुके हैं और गुफा के अंदर का तापमान 1 डिग्री हो चुका था यानि बाहर का तापमान शून्य से भी नीचे हो चुका होगा।

                                            ..............................................(क्रमश:)
               

गाँव भवानी पुर में टीले पर बना करीब एक हजार वर्ष पुराना "हरि देवी मंदिर " 

हरि देवी मंदिर की सीढ़ियां। 

हरि देवी मंदिर। 

कुछ पुरातन मूर्तियों को फिर से मंदिर की दीवारों में चिना हुआ है। 

मंदिर की दीवार में पुरातन मूर्तियाँ। 

पुरातन हरि देवी मंदिर की एक मूर्ति। 

पुरातन हरि देवी मंदिर के अवशेष। 

अवशेष ही बताते है कि मंदिर कितना भव्य रहा होगा। 

हरि देवी मंदिर प्रांगण से दिखता खुराली गाँव का गुरुद्वारा खुरालगढ़ साहिब। 

हरि देवी मंदिर के भीतरी कक्ष में एक गणिका की मूर्ति। 

हरि देवी मंदिर गाँव भवानीपुर। 
                                           
                                                                                 
गुरु रविदास जी का तप स्थान.... खुरालगढ़ साहिब। 

गुरुद्वारा में स्थापित गुरु रविदास जी की मूर्ति। 

गुरुद्वारा में सुशोभित.... खरास (चक्की)  जो अपने आप चल पड़ी थी। 

बहुमंजिला गुरुद्वारे की छत से दिख रहा खुराली गाँव। 
गुरुद्वारे में लगी मीराबाई भी तस्वीर। 

छत से दिख रहे खुराली गाँव के खेत। 
खुराली गाँव..... का नाम अब श्री खुराल गढ़ साहिब हो चुका है।

(अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

रविवार, 4 मार्च 2018

भाग-4 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

            " और ले पंगें,  और ले पंगें....!!"      
                                               
इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र (http://vikasnarda.blogspot.in/2018/02/1.html?m=1)स्पर्श करें।
                                         
                                    करेरी झील के ट्रैक पर बंदरों से हुई मुठभेड़ के बाद, मैं और विशाल रतन जी फिर से चल पड़े।  अब रास्ता और भी घने जंगलों से होकर,  दीवार रूपी पर्वत पर चढ़ रहा था।  पत्थरों को काट- काट कर बनाई सीढ़ियां उस पर्वत की दीवार पर चिनी हुई थी। यह चढ़ाई ऐसी थी मानो हम सौ मंजिल ऊँची इमारत पर चढ़ते जा रहे हो।                          पहाड़ के मध्य जो वृक्षवीहीन जगह,  हमें लियोंड खड्ड के निर्माणाधीन पक्के पुल पर मिले मजदूरों ने दूर से दिखाई थी... पर आ पहुँचते हैं।  यह बहुत शानदार घास का मैदान था....जैसे यह जगह नीचे से देखने पर पूरे पहाड़ का आकर्षण बिंदु लग रही थी,  वैसे ही इस जगह पर खड़े हो नीचे घाटी में हमारी नज़रें लियोंड पुल को तलाश रही थी।अब सामने दिख रहे पर्वत के शिखर पर ताज़ी गिरी बर्फ दिखाई भी देने लगती है।  बर्फ के पास पहुँचने की उम्मीद हमारे उमंग भरे मनों को उत्साहित करती जा रही थी.... क्योंकि पर्वतों में पहुँच बर्फ को पाना,  किसी पुरस्कार से कम नहीं होता दोस्तों।
                         कदम बढ़ाते ही मंज़र बदल गया,  पर्वतों के मध्य बेहद खुली घाटी और उसके मध्य में बह रही लियोंड नदी।  दूर एक झोपड़ी नज़र आई,  पास जाकर उस झोपड़ी की बनावट देख हम दोनों ने सही अंदाज़ा लगाया कि यह भेड़-बकरी चराने वाले का डेरा है.... परंतु तब वहां कोई नहीं था।  पचास कदम चलने के बाद नदी की दूसरी तरफ भी एक और डेरा दिखाई दिया,  मतलब कि मजदूर ठीक ही कह रहे थे कि रास्ते में आपको रात काटने के लिए डेरे मिल जाएंगे।  "परंतु अभी तो 3:30 ही बजे हैं,  आगे चलते हैं...!" मैं विशाल जी से बोला।
                        रास्ता अब कुछ समतल सा चल रहा था, एक मोड़ मुड़े..... और, रास्ते पर पड़ी एक चीज देख हम दोनों के हर्षोउल्लास की सीमा ना रही।  वह रास्ते के किनारे पड़ी थोड़ी सी बर्फ थी दोस्तों।
                         "पहुँच गए... पहुँच गए, बर्फ के पास...!!!!"  यह कहते हुए हम दोनों उछल रहे थे।  
कुछ ही दूर लियोंड नदी पर बना लोहे का पैदल पुल नज़र आ रहा था,  मतलब हम रीओठा नामक जगह पर पहुँच चुके थे।   पुल पार कर हमें बांयी ओर मुड़ कर नदी के साथ-साथ ऊपर को चढ़ना था।  पुल पर खड़े हो जब बांयी ओर देखा तो बड़े-बड़े पत्थरों से थोड़ी सी जलधारा रिस रही थी।  यह ही छोटी सी जलधारा गर्मियों में विशाल रूप अख्तियार कर लेती होगी....जिसका प्रमाण यह लोहे का पुल और नदी में बिखरे पड़े पत्थर दे रहे थे।
                          पुल से बांयी ओर मुड़,  अब रास्ता बड़ी-बड़ी चट्टानों के ऊपर से हमें ले जा रहा था और आधा किलोमीटर बाद एक मोड़ मुड़े.......  तो दो पहाड़ों के मध्य आ रही इस नन्ही नदी लियोंड के सिवा सब कुछ बर्फ की चादर ओढ़े खड़ा था। यह दृश्य देख मेरी पहली नज़र में मुँह से निकला " वाह"  परंतु दूसरे पल दिमाग़ बोला " स्वाह...और ले पंगें....!!!!!"
                          परंतु मेरा मन पहले से ही लापरवाह रहा है,  दिमाग़ की कम ही सुनता है। सो हम चलते-चलते नदी किनारे चल एक समतल सी जगह पर आ रुके,  जिसमें एक झोपड़ी का ढांचा खड़ा था।  क्योंकि अब आगे बर्फ ही बर्फ और आगे बढ़ने का रास्ता बर्फ के नीचे कहीं दब चुका था।  इस बात का ज्ञान पहली बार हुआ कि सूरज की तरफ मुख वाले पहाड़ के हिस्से पर बर्फ नहीं थी,  जिस पर हम चढ़कर आ रहे थे और जब इसी पहाड़ की दूसरी तरफ पहुँचे तो इसे बर्फ से भरा पाया.... यानी सूर्य मुख वाले पहाड़ से बर्फ जल्दी पिघल जाती है।
                         अब हमें समझ नहीं आ रहा था कि इस बर्फ पर कहाँ अपना पहला कदम रखें.... तभी कुछ दूर पहाड़ पर चढ़ती पत्थर की सीढ़ियां दिखाई दी,  तो उसी दिशा में नीचे की ओर देखा तो हमें बर्फ में पड़े पदचिन्ह नज़र आ गए।वो पदचिन्ह जो सुबह आगे गए अंग्रेजों के दल और स्थानीय गाइड के दल ने बना दिए थे। ये पद चिन्ह अब हमारे पथप्रदर्शक बन चुके थे.... वरना इन निशानों के बगैर हम बर्फ में घुसने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।
                          4बज चुके थे और हम पदचिन्हों का पीछा करते हुए जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे,  बर्फ भी बढ़ती जा रही थी।  दिमाग़ ने सोचना बंद कर दिया था... आँखें केवल बर्फ पर बने निशानों को ही ढूँढ रही थी। पहाड़ की छाया वाले इस हिस्से पर ठंड भी एकाएक बढ़ चुकी थी...और हमारे चलने की रफ्तार कम होने से शरीर भी ठंडे हो रहे थे। बर्फ पर पड़े पदचिन्हों की गहराई कहीं-कहीं इतनी गहरी थी कि हम घुटनों तक बर्फ में धंस जाते।
                          विशाल जी ने स्पोर्ट्स शूज़ डाल रखे थे जो अब पूरी तरह गीले हो चुके थे.... मेरे चमड़े के सेमी हाई नैक शूज़ में पानी अभी अंदर नहीं पहुँच पाया था। परंतु कुछ समय बाद हम दोनों की हालत एक सी हो गई थी, बर्फ की वजह से हम घुटनों तक बुरी तरह से भीग चुके थे। बार-बार बूट खोलकर उसमें घुसी बर्फ को बाहर निकाल रहे थे। जीवन में पहली बार ताज़ी गिरी बर्फ से हम अनाड़ियों का साक्षात्कार हुआ था....सो दोनों पक्ष एक-दूसरे पर प्रभाव डालने के लिए कोशिश में जुटे हुए थे।
                          आखिर डेढ़ घंटे बाद लगातार उस बर्फीले रास्ते पर धंसते हुए,  हम दोनों अब एक ऐसी जगह खड़े थे....जो नदी के किनारे पर थी और रास्ता ऊपर को चढ़ रहा था।  परंतु उस पर ना तो हमारे पथप्रदर्शक पदचिन्ह थे और बर्फ भी बेशुमार थी।   मेरा दिमाग़ पिछले एक घंटे से हर दो मिनट बाद पंजाबी में चीख उठता था, "होर लै पंगें, होर लै पंगें...!!!! "
                           परंतु मन बेशर्म कहाँ सुनता है मेरे दिमाग की.... ठीक इसी प्रकार की मनोस्थिति विशाल जी की भी रही होगी, परंतु इस स्थान पर पहुँच शायद उनका दिमाग़ मन को जीत चुका था।  वह एकाएक बोले, " नहीं विकास, अब और आगे बढ़ना मूर्खता की निशानी है,  एक तो आगे कोई भी पदचिन्ह नही दिखाई दे रहा... दूसरा अंधेरा भी जल्दी ही हो जाएगा...!"
                           मेरा मन सदा से ही लापरवाह रहा है.... मैं विशाल जी को तर्क देता हूँ,  "इस जगह बर्फ ज्यादा होने के कारण वह लोग घूम-घाम कर आगे चढ़ गये होंगे और अभी साढे पांच ही तो बजे हैं,  वह देखो सामने पर्वत के शिखर पर कैसी धूप चमक रही है....और लगता है कि हम करेरी झील से ज्यादा दूर नहीं है, चलो आगे जाने का रास्ता ढूँढते हैं और आज रात जमी हुई करेरी झील पर बनी धर्मशाला में जाकर ही रुकते है... यदि करेरी ना पहुँच पाए तो रास्ते में आए किसी गद्दी के डेरे पर रुक जाएंगे...!"
                           परंतु विशाल जी ने सिरे से मेरी बात यह कहते हुए नकार दी, " विकास जी, भले ही दिन के उजाले में यह नज़ारा हमें बहेद खूबसूरत नज़र आ रहा है,  परंतु रात के अंधेरे में यह सारा नज़ारा खतरनाक रूप ले सकता है.... हमारे पास कोई टॉर्च भी नही है और यदि रोशनी रहते झील तक नही पहुँच पाऐं,  और रास्ते में रात गुज़ारने के लिए हमें कोई भी उचित जगह या गद्दी डेरा ना मिला,  तो निश्चित है हम दोनों कल आ रहे नव वर्ष के पहले दिन को ना देख पाएें, हमारी बेहतरी इसी में ही है कि दिन रहते हम वापस उस गुफा की ओर चलते हैं,  जो हमने अभी आते समय नदी के उस पार देखी थी... वही चल आज नववर्ष की पूर्वसंध्या मनाते हैं।"
                           मेरा लापरवाह मन नही मान रहा था क्योंकि वह व्यक्तिगत कीर्तिमानों का भूखा है.... परंतु जैसे एक गाड़ी के पहियें एक ही दिशा में चल व मोड़ सकते हैं,  सो मुझ पहिये को सूत्र में बंधा होने के कारण बेमन से विशाल जी रूपी पहिये के संग मुड़ना ही पड़ा।
                           नदी में पानी बहुत कम था,  सो पार हो हम दूर दिख रहे उस गुफा नुमा डेरे पर जा पहुँचें।  एक बहुत बड़ी चट्टान के नीचे बनी इस प्राकृतिक गुफा को किसी गद्दी ने अपनी जरूरत अनुसार ढाल रखा था। उस छोटी सी गुफा में एक चबूतरा बना,  एक तरफ भेड़-बकरियों के बच्चों के लिए एक बंद बाड़ा.... मध्य चूल्हा,  दो जनों के लेटने योग्य  समतल स्थान और सामने लकड़ी की एक छोटी सी अलमारी व गुफा के बाहर भेड़-बकरियों के लिए घास-फूस की छत वाला छप्पर। गुफा का मुहाना खुला था उसे तो बंद नहीं किया जा सकता था....हाँ नदी की तरफ वाली दिशा में एक-दो दरार नुमा झरोखे से थे,  जिनमें से सर्द हवा अंदर आ रही थी.... जिन्हें मैं अब पत्थर चिन कर बंद कर रहा था।
                           उस छोटी सी अलमारी को खोला तो उसमें से हमें लोहे का एक चिमटा और दो बोरियों को सिल कर बनाई हुई चटाई मिली..... उन्हें देख हम दोनों की खुशी का ठिकाना ना रहा और उस बोरी नुमा चटाई को गुफा के ठंडे फर्श पर बिछा लिया।  अब हमे अंधेरा होने से पहले लकड़ी का इंतजाम भी करना था,  गुफा के बंद बाड़े के फर्श को लकड़ी के फट्टों से बना रखा था और बहुत सी लकड़ी उस गुफा नुमा डेरे के निर्माण में लगी हुई थी।  हम दोनों ने सलाह की, कि इस गुफा में लगी किसी भी लकड़ी को हम तोड़ जलाएंगे नही.... क्योंकि यह भी किसी का घर है,  चलो आस पास जाकर सूखी लकड़ी ढूँढ कर लाते हैं।
                           और,  हम बाहर से इतनी लकड़ी इकट्ठी कर लाए जो सारी रात जल सके। इन्हीं यत्नों में कब अंधेरा हो गया,  पता ही नही चला और अब हाथ कांप रहे थे क्योंकि अंधेरा अपने साथ भयंकर सर्दी को भी ले आया था, दोस्तों।

                                       ............................(क्रमश:)
पर्वत शिखर गिरी ताज़ी बर्फ को दिखाता हुआ, मैं। 

वो,  चार किलो का डंडा...!!

पगडंडी में बुराश के पेड़ के तने को आधा काट कर रास्ता बनाया गया था।



और, जैसे- जैसे हम पहाड़ पर चढ़ते जा रहे थे... बर्फ नजदीक आती जा रही थी। 

कुछ दम लेते हुए.... विशाल रतन जी। 

अरे,  यह तो किसी गद्दी का वीरान डेरा है। 

नदी की दूसरी तरफ दूर हमें एक और वीरान गद्दी डेरा दिखाई दिया,  मतलब कि वे मजदूर सही कह रहे थे कि आपको रात गुज़ारनें के लिए रास्ते में गद्दियों के वीरान डेरे मिल जाएंगे,  परन्तु अभी तो दोपहर के साढे तीन ही बजे थे... सो हम अागे बढ़ जाते हैं। 

पहुँच गए,  पहुँच गए बर्फ के पास.....
पर्वतों में पहुँच बर्फ को पाना किसी पुरस्कार से कम नही होता दोस्तों। 

तब मोबाइल में फ्रंट कैमरा का अविष्कार नही हुआ था,  परन्तु मैं डिजीटल कैमरे को अपनी तरफ मोड़ खुद की ही फोटो खींच लेता था....
जिसे आजकल "सैल्फी" नाम से जाना जाता है। 

लियोंड खड्ड पर बना लोहे का पैदल पुल... रीओठा पुल। 

रीओठा पुल। 

पुल से बायी ओर लियोंड नदी के साथ हम ऊपर को चढ़ते हुए....इस समतल से स्थान पर पहुँचें,  जिससे आगे बर्फ ही बर्फ थी। 

बस बर्फ ही बर्फ,  हमारे आगे गए अंग्रेज़ों के दल के पदचिन्ह अब हमारे पथप्रदर्शक बन चुके थे। 

रास्तें में गद्दियों के वीरान व सूने डेरे मिलते जा रहे थे। 

गिरता हुआ पानी भी जम चुका था,  हमारे पैर भी गीले हुए बूटों में जम चुके थे। 

आखिर, इस जगह पर पहुँच रास्ता बर्फ में कहीं गुम हो चुका था और हमारे पथप्रदर्शक पदचिन्ह भी एकाएक गायब हो चुके थे। 

और....आखिर हम रात काटने के लिए इस गुफा नुमा डेरे की ओर बढ़ रहे थे।

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