रविवार, 9 अप्रैल 2017

भाग-24 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास..... Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-24 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गजपास (4470मीटर)
             
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                               अंग्रेज़ के गुड़गुड़ाते जल स्रोत से पानी भर कर हम सब अब रैलधार पर्वत के बहुत घने जंगल से गुजर रहे थे.... जंगल इतना घना कि आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों द्वारा लगाये गए पेड़ों की वजह से ऊपर आसमान ही नही नज़र आ रहा था और रास्ता भी बहुत संकरा होता जा रहा था..... कि हमारे आगे-आगे जा रहे चरण सिंह एक जगह रुके और बोले, "ओह हो...यह गाय ऊपर पहाड़ से गिर कर मर गई ".........और पगडंडी की एक तरफ एक गाय मरी पड़ी थी.... मैं निरीक्षण करने लगा कि यह कैसे हुआ होगा, तो देखा कि गाय बहुत ऊपर से फिसलती हुई पंगडडी में गड़े हुए एक नुकीले पत्थर पर आ गिरी, जो उसके काल के ग्रास बनने का मुख्य कारण बना, क्योंकि उस पत्थर की नोक पर उस गाय के बाल लगे हुए थे... उस गाय की दुखद मौत पर मन बहुत दुखी हुआ.......और चरण सिंह ने तभी चिंता व्यक्त की, कि एक सप्ताह के लिए हम लोगों का इस रास्ते से आना-जाना अब खतरनाक हो जाएगा....क्योंकि अब इस मरी हुई गाय को खाने के लिए यहां भालूओं के झुंड इक्ट्ठा होगें....... और मुसीबत यह है कि,  यह गाय पगडंडी के साथ ही पड़ी है,  मैनें कहा "चलो इसे खींच कर पगडंडी से दूर कर देते हैं राणा जी "......चरण सिंह ने जवाब दिया कि "यह आप और मेरे अकेले बस का नही है और आप लोग इस चक्कर में खुद कोई चोट मत खा बैठना,  ऋषभ के तो पैर में पहले से ही चोट लगी हुई है, इसे हम लोग बाद में देख लेंगे.... चलो आगे चलते हैं ".........
                          दोस्तों,  मैं यहां आप को कुछ बातें बताना चाहता हूँ  कि मेरे अनुभव व विचार से पहाड जितने ऊपर से हसीन दिखते हैं,  भीतर से उतने ही क्रूर व पत्थर दिल होते हैं.... यह आपके द्वारा इन पर की हुई गलती को सुधारने का दूसरा मौका नही देते, जैसे इस गाय से साथ घटा...कि एक कदम गलत पड़ा और परिणाम मौत.......... मैं हमेशा कहता हूँ कि "पहाड एक सोये हुए शेर की तरह है और मेरी औकात इसके आगे चूहे की है "..........इस सोये हुए शेर पर मैं चुपके से चूहे की भांति ही धीरे-धीरे फूदकने में ही अपनी भलाई समझता हूँ..... कि कहीं ये शेर जाग ना जाए और मैं इसके प्रकोप का निवाला ना बन जाऊँ...... पहाड के प्रकोप की ताज़ा उदाहरण केदारनाथ त्रासदी है, मित्रों जब भी पहाड पर चढ़ो...तो उसका अवआकलन मत करे, वह हर दृष्टि से हम मनुष्यों से अत्यन्त प्रबल है........
                              अब हम कुछ घने जंगल से निकल कर गज नदी के साथ-साथ ही नीचे उतरने लगे, तो एक जगह हमे चरण सिंह यह कहते हुए, रास्ते से हट कर एक तरफ ले गए कि चलो आपको एक और जगह दिखाता हूँ..."बुध की वाई "...तो वह जगह क्या थी कि गज नदी के किनारे एक बहुत खुला स्थान और गज नदी का पानी एकाएक ऊंचाई से नीचे बने प्राकृतिक कुंड में गिर रहा था.... चरण सिंह ने उस छोटे से कुंड का नाम "नाग कुंड" बताया और कहा कि इस कुंड के ऊपर वाले पहाड पर नाग देवता का एक प्राचीन मंदिर भी है..... पानी बहुत मात्रा में उस कुंड में गिर कर फिर आगे की ओर निरंतर बहता जा रहा था और उस कुंड से साथ ही पहाड की चट्टान नूमा दीवार में बहुत विशाल चोरस कमरे नुमा आकृति बनी हुई थी,  जिसके बारे में चरण सिंह ने एक दंत कथा सुनाई, कि यह खुदाई पाण्डवों ने अपने वनवास के दौरान की थी,  वह लोग यहां इसी जगह पर 96महीने रहे,  सिर्फ एक खास दिन की इंतजार में, जो बारह वर्ष में केवल एक ही बार आता था..... जिसका नाम "बुध की वाई" है,  यानि बुधवार के दिन पड़ना  वाला 22वॉ परविशटा या तारीख.... वे लोग इस चट्टानी पहाड के भीतर ही भीतर कुछ महल आदि बनाना चाहते थे और बुध की वाई वाले दिन काम आरम्भ किया परन्तु वह पूर्ण ना हो सका.......मैं तर्कबुद्धि इंसान तब बोल बैठा कि,  " यह बात अच्छी है कि हमारे समाज में कि जो चीज संदेहप्रद लगे, उसे पाण्डवों की कथा से जोड़ देना...बहुत आम बात है, राणा जी...... चलो खैर माफ़ करना, यह कथा भी तो एक दंत कथा है, जो आप भी अपने बुजुर्गो से सुनते आ रहे है.... शायद यही सच हो........"
                            गज नदी के साथ-साथ चलते हम नकेड़ा नामक उस स्थान पर वापस पहुंच गए,  जिस स्थान पर गज विद्युत परियोजना का काम निमार्णाधीन था....... और वो सुरंग का मुहाना देखा जिसमें से गज नदी के पानी को डाल कर पहाड से नीचे सत्य साई विद्युत परियोजना पर जल वेग से विद्युत चक्की चलाकर विद्युत उत्पादन का प्राविधान चल रहा था............लकड़ी के कच्चे पुलों से गज नदी को पार कर आखिर उसी मोड़ पर पहुंच गए,  जहां हम जंगल में खो गए थे और चरण सिंह से हमारी भेंट हुई थी...........और इसी "सेला मोड़" से चार दिन पहले मेरी आखिरी बात घरवालो से हुई थी, क्योंकि यहीं मोबाइल सिग्नल आ रहा था, तो झट से मैने फोन निकाल फिर से सिग्नल टटोला.....सिग्नल था तो अपनी पत्नी को फोन कर अपनी सही-सलामती की ख़बर दी...... और हर बार की तरह डाट-फटकार भी सुनी व आदेश हुआ... "बहुत हो गई ट्रैकिंग, अब आगे से जाना बंद".................परन्तु दोस्तों यह कुछ मेरे साथ हर बार होता है, मुझे पहाड फिर से खींचने लगते हैं और मैं फिर से घरवालों को मना कर अपनी अगली ट्रैकिंग पर चल देता हूँ......
                               रास्ते में चरण सिंह ने हमे कई जगह भालू के द्वारा बनाए ताज़ा निशान भी दिखायें और हिदायत दी कि, कभी भी घने जंगल में बीमारों सी चाल नही चलनी है, तन कर मुस्तौदी से चलना है, बीमारों सी ढीली चाल चलने पर भालू आपको कमजोर,बीमार व आसान शिकार जान कर दबे पाँव पीछे से हमला कर सकता है.........बातें करते-करते हम कपरालू माता के मंदिर तक पहुंच कर कुछ विश्राम करने हेतू बैठ गए और चरण सिंह ने अपने फोन से अपनी पत्नी को फोन करने की कोशिश करते रहे, परन्तु उनका दूरभाष यंत्र दूरसंचार की परिधि में नही आ रहा था.......... वह बोले यदि मेरा फोन मिल जाए, तो अपने घर आप लोगों के आने की ख़बर पहले दे दूँ.... ताकि आपकी ख़ातिरदारी में कुछ पकवान बना लिये जाए..... और मैं ठहरा "पकवानों का लालची इंसान".......सो कुछ-कुछ देर बाद अपने फोन से उनके घर का नम्बर बार-बार मिलाता रहा, परन्तु मेरा फोन भी अब अपाहिज हो चुका था......... आखिर चलते-चलते एक जगह मेरा फोन मिल ही गया और मैने चरण सिंह की बात उसके घरवालों से करवा ही दी, क्योंकि सत्य तो यह था कि मेरे मन में लालच उत्पन्न हो गया था, कि मैं वहां पर ज्यादा से ज्यादा स्थानीय भोजन के आनंद व अतुल्य अनुभव को प्राप्त करना चाहता था.............
                                    ..........................(क्रमश:)
ऋषभ और चरण सिंह यदि फोटो खींचवाने में माहिर हैं,  तो मैं फोटो खींचने में भी कम माहिर नही हूँ... दोस्तों 

काल का ग्रास बनी गाय और रास्ते का वह नोकीला पत्थर,  जिसकी नोक पर गाय के बाल दृशा रहे थे कि यही पत्थर इस गाय की दर्दनाक मौत का मुख्य कारण बना... 

रैल धार पर्वत का रास्ता कुछ ऐसा था... 

बुध की वाई नामक स्थान पर नाग कुंड में गिर रहा गज नदी का जल व कुंड के साथ ही,  पहाड के भीतर बना एक चौरस सा प्राकृतिक कक्ष... 

पहाड़ी धतूरा और गज नदी में बना नाग कुंड... 

रैल धार पर्वत के घने जंगल से बाहर निकल,  हम गज नदी के साथ-साथ चलने लगे... 

गज नदी का प्रत्येक दृश्य मन को मोह रहा था,  नाग कुंड से बह कर बाहर निकल रही गज नदी... 

विद्युत परियोजना के अंतर्गत नकेड़ा नामक स्थान पर चल रही निर्माणाधीन योजना पर हमारा वापस पहुंचना... 

और.... लकड़ी के अस्थाई कच्चे पुल से गज नदी को पार करना.. 

गज नदी पर चल रही सत्य विद्युत परियोजना की सुरंग के सामने खड़ा... मैं 

एक कच्चे पुल से गज नदी के पार उतरता.... मैं 

सेला मोड़....वही जगह यहां जंगल में खोने के बाद हमारी चरण सिंह से भेट हुई थी.. 

भालू की मौजूदगी का ताज़ा निशान दिखतें चरण सिंह.... 

और... कपरालू माता नामक स्थान पर वनखण्डी माता के मंदिर तक पहुंच तनिक विश्राम करने हेतू रुके... तो मेरा वहां स्वयं चित्र खींचना तो बनता था,  जनाब जी... 

गज नदी के किनारे एक बहुत बड़ा व खुला स्थान,  जिसे बुध की वाई नाम से जाना जाता है... धारणा है कि यहां पाण्डव 96महीनों तक रहे..

(इस चित्रकथा का अंतिम भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये तो सच है जी कि पहाड़ जितने खूबसरत होते हैं उतने ही खतरनाक होते हैं, अगर संभल गए तो ठीक वरना कुछ पता नहीं। एक बार खुद हम फंस चुके थे वो तो अच्छा था कि भोलेनाथ ने सद्बुद्धि दे दिया वरना क्या होता ये तो आप पढ़ ही चुके हैं। आपकी बात सौ प्रतिशत से ज्यादा सही है जी कि ‘‘पहाड़ एक सोया हुआ शेर होता है, जो कभी भी जाग सकता है।’’
    ‘‘वुध की बाई’’ और ‘‘नाग कुण्ड के बारे में एक नई जानकारी वाला पोस्ट! आपको यहां पांडवों की कहानी सुनने को मिल ही गई। चलिए कुछ हो न हो पांडव सब जगह मिल तो जाते हैं। अगले भाग के इंतजार में।

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    1. अभयानंद जी ....पहाड़ जितने दिन में हसीन नज़र आते हैं, वही पहाड़ रात में डरावनें नज़र आने शुरू हो जाते है। ऐसा अनुभव मैने अभी तीन महीने पहले की हुई अपनी सप्तऋषि कुंड की पदयात्रा के दौरान तब महसूस किया जब हम रास्ता भूल कर सारी रात जंगल में फंसे रहे।

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  2. सच मे स्थानीय व्यंजन का लोभ तो आपकी पोस्ट के माध्यम से यहां घर बैठे बैठे हमे भी हो गया....

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