रविवार, 30 अप्रैल 2017

भाग-2 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-2 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....
                                 "घड़ी, और स्वप्न यात्रा की शुभ घड़ी "

                  दोस्तों,  आप मेरी पिछले साल की हुई श्री खंड महादेव कैलाश पदयात्रा चित्रकथा की दूसरी किश्त पढ़ रहे हैं..... श्री खंड महादेव यात्रा हर साल जुलाई माह में 15जुलाई से 25जुलाई तक केवल दस दिनों के लिए सरकारी तौर पर चलती है,  सो मैने अपने पर्वतारोही संगी विशाल रतन जी के साथ 20जुलाई की तारीख मुकर्रर कर ली, श्री खंड यात्रा के लिए....
                  और,  20जुलाई2016 को तड़के 2:30 बजे... मैं अपने शहर गढ़शंकर(पंजाब) से गाड़ी ले चला और विशाल जी 19जुलाई की रात को बस में सवार हो दिल्ली से रवाना हुए....और हमें मध्य रास्ते यानि जीरकपुर में इक्ट्ठा होना था,  मैने यात्रा सम्बन्धी सारा सामान रात को ही गाड़ी में रख दिया था कि,  बस गाड़ी स्टार्ट करूँ और रवाना हो चलूँ......और घर वालों से विदा ले चल पड़ा,  आदतन मैने जल्दी से मन ही मन अपने पर्वतारोही उपकरणों की गिनती की,  तो पाया कि सबसे अहम उपकरण मेरी "बैरोमीटर-अल्टीमीटर घड़ी" तो मैं घर पर ही भूल आया हूँ... यह घड़ी मुझे मेरी धर्मपत्नी ने अभी हाल में ही अमेरिका से माँगवा कर तोहफे में दी थी.... इस घड़ी के बगैर तो पर्वतारोहण का आनंद ही आधा है,  क्योंकि यह वो उपकरण है... जो आपको बताता है कि,  आप समुद्र तट से कितनी ऊंचाई तक पहुंच चुके हो, हवा का दबाव क्या है और वातावरण का तापमान कितना है....सो सिर पर हाथ मार, दोबारा से घर की तरफ दौड़ लिया... कि शुक्र है मौके पर दिमाग ने तुझे याद दिला दिया,  नही तो विकास नारदा तूने सारी यात्रा में खुद को ही कोसते रहना था...
                  गढ़शंकर से चण्डीगढ़ की तरफ गाड़ी को आधी रात के समय खाली पड़ी सड़कों पर खूब दौड़ाया और अपने मनपसंद गायक राहत फतेह अली खान साहिब की सी डी लगा उनकी लय से खुद की लय जोड़ खूब गानें गाये,  क्योंकि मेरा मन बहुत प्रसन्न था कि...रोज-रोज की वही कश्मकश के चक्रव्यूह को तोड़, मैं बढ़ रहा हूँ श्री खंड नामक सपने को साकार करने,  और रोजमर्रा के गेयर बाक्स की सभी गरारियों को बंद कर..... "घुमक्कड़ी" नामक स्पेशल उड़न गेयर लगा... बस मीठी आशाओं के संग उड़ता ही जा रहा था..... कि उड़ते-उड़ते मैं तड़के चार बजे जीरकपुर पहुंच गया,  जहाँ विशाल जी मेरा इंतजार कर रहे थे,  दोनों सांढ़ू ऐसे गले मिले... यदि हमारी पत्नियाँ हमे उस समय देख ले तो उनका हमसे नाराज़ होना तय है, कि "देख रही हो बहन.... ये दोनों हम से अलग अकेले जा कर कितने खुश है...!"
                   गाड़ी में बैठते ही मैने जोर से कहा, "हम फिर से इक्ट्ठा हो गए विशाल जी" और विशाल जी ने अंग्रेजी में गर्म जोशी से कहा, "We are back ".......  और चहकते हुए मुझे अपनी बैरोमीटर घड़ी दिखातें हुए बोले, " लो विकास जी.. मैं आपसे पीछे नही रहने वाला,  मैने भी आप जैसी घड़ी दिल्ली में ढूँढ निकाल, खरीद ली " .....मैने कहा, फिर तो आप बधाई के पात्र है जनाब...!
                     दोस्तों, नन्हें-मुन्नों अपने खिलौनों से बहुत प्यार व मान होता है,  ठीक वैसे ही हम दोनों को अपने पर्वतारोहण खिलौनों से बहुत गहरा लगाव है... क्योंकि पर्वतारोहण नामक खेल इन खिलौनों के दम पर ही खेला जाता है....                      अब हमारी गाड़ी दौड़ रही थी एक बेहतरीन सड़क के ऊपर जिसपर मानो हमारी गाड़ी तैर रही थी,  पहाड में इतनी शानदार,  खुली व एक तरफा सड़क जो जीरकपुर से कालका ले जाती है बाहर-बाहर से...... इस सड़क के निर्माण सम्बन्धी यह बात भी प्रचलित है कि, सड़क निर्माण क्षेत्र में नई आई सड़क निर्माता कम्पनी को इस सड़क निर्माण में घाटा ही पड़ा,  परन्तु उसने इसकी गुणवत्ता सें समझौता नही किया.... शायद ऐसा कर,  वह कम्पनी अपने उत्तम कार्य शैली की एक उदाहरण स्थापित करना चाहती होगी........ कालका के बाद सड़क फिर छोटी हो जाती है,  और एक घण्टा चलते रहने के बाद हमारी गाड़ी उस जगह पर रुकी,  जहाँ शिमला जा रहा प्रत्येक सैलानी रुकना चाहता है, ताँकि वो विश्व धरोहर खिलौना गाड़ी "हिमालयन क्वींन" को पास से देख सके.... क्योंकि यह वो जगह है यहाँ अाठरहवीं सदी के अंत में बिछी,  ढाई फुट चौड़ी रेलवे लाइन सड़क को काटती है और रेलवे फाटक बंद होने पर सड़क पर रुके प्रत्येक सैलानी के लिए शिमला यात्रा का यह हसीन व यादगार पल होता है....
                      बहुत बार सोचता हूँ अंग्रेज़ों की कार्य शैली में कितना जुनून रहा होगा कि,  कालका के मैदानी इलाके से 107सुरंगों व 864पुलों के द्वारा सन् 1903में रेल गाड़ी पहाड पर चढ़ा कर शिमला पहुंचा दी.... और इस रेलवे लाइन की लम्बाई है 96.5 किलोमीटर....और 164किलोमीटर लम्बी ऐसी ही छोटी रेलवे लाइन अंग्रेज़ों ने पठानकोट (पंजाब)के मैदान से जोगिंदर नगर(हिमाचल प्रदेश) के पहाड में 1929में बिछाई थी,  कि जोगिंदर नगर में भारत का पहला जल शक्ति से चलने मैगावाट बिजली घर बन सके और इसी रेलवे ट्रैक द्वारा बिजली घर की सारी मशीनरी पहाड पर पहुँचाई गई..... और तो और अंग्रेज़ों का दिमाग तो देखो मित्रों,  उन्होंनें जोगिंदर नगर बिजली घर से उस समय 12किलोमीटर लम्बी लाइन पहाड पर 60डिग्री के कोण से चढ़ा दी,  जिस पर एक ट्राली पर्वत के शिखर पर जा दूसरी ओर बरोट नामक अति सुन्दर व शांत पर्वतीय स्थल के लिए उतर जाती... यहाँ से एक सुरंग द्वारा ऊल नदी का पानी नीचे,  जोगिंदर नगर बिजली घर में आज भी विद्युत चक्कियों को चलाता है.... परन्तु आज,  वो बरोट को जाती रेलवे ट्राली अब सरकार व विभाग की अनदेखी के कारण बंद है और मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी अफसोस की यह बात है कि आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी हमारी सरकारें अंग्रेज़ों द्वारा बिछाई इन रेलवे लाइनों को मात्र एक इंच भी आगे बढ़ा नही सकी....मेरे शहर गढ़शंकर में भी अंग्रेज़ों द्वारा 1920में बिछाई रेल लाइन जालंधर से जैजो दोआबा तक,  आज भी किसी और मुख्य रेल लाइन से जुड़ने के लिए बेक़रार है.... परन्तु सरकारों में बैठे कुछ मंत्रियों की अपनी निजी बसें चलती है, वो क्यों सस्ती परिवाहन हम जनता को उपलब्ध कराए......
                           " रुक जा, रे विकास नारदा, तू पथ भ्रष्ट हो रहा है...!!!! "
         जब मैं सुबह गढ़शंकर से चला था,  तो मेरी श्रीमती जी ने मुझे थरमस में डाल चाय साथ दे दी थी.... सो विशाल जी से कहा कि जहाँ भी रास्ते में सूर्योदय होता हमे नज़र आयेगा,  वहीं रुक कर हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए पहाडों में हो रहे सूर्योदय की सुरम्यता को निहारेंगें.....गाड़ी चलते हुए मेरी दृष्टि बार-बार पूर्व दिशा की ओर जा रही थी.... और इंतजार में था कि, कब भास्कर अपने आगमन का संदेश अपनी लालिमा बिखेर कर दें..... जल्द ही मुझे वह संदेश भी मिल गया और मैने अपनी गाड़ी एक उपयुक्त जगह देख कर रोक ली,  सुबह के 6बज चुके थे और सड़क किनारे बनी पत्थरों की रोक पर हमने अपना चाय-नाश्ता सजा लिया,  दोस्तों श्रीमती जी के हाथों बनी चाय तो हर रोज मैं पीता हूँ.... पर उस माहौल में जब मैने चाय की पहली चुस्की ली,  तो मुख से निकला "सुभान अल्लाह"..........और मेरे ज़ेहन में मेरी अर्धांगिनी के लिए खामोश व अदृश्य स्नेह व सम्मान की लहर घूम गई..... इधर हमारे चाय के कप ढ़ल रहे थे और उधर सूरज चढ़ रहा था, सच में बेहद हसीन सुबह थी वो......दोस्तों
                                      कुछ समय बाद मैं गाड़ी में बैठा था,  पर मेरे हाथों में अब दिशा-चक्र(स्ट्रेरिंग)की जगह मेरी प्रिय बाँसुरी आ चुकी थी.... और स्ट्रेरिंग विशाल जी हाथों में था.... ऐसी अवस्था प्रत्येक साल एक-दो बार ही आती है,  कि विशाल जी गाड़ी चलाते है और मैं मज़े से अपनी बाँसुरी फूँकता हूँ.... वरना सारा साल की जाने वाली यात्राओं में मेरे नसीब में स्ट्रेरिंग को पकड़ना ही होता है,  तो बाँसुरी की धुनों में बहते हुए हम एक घंटे बाद पहाडों की रानी "शिमला" से गुज़र रहे थे... सुबह के समय होने के कारण,  शिमला रानी की बलखाती-मटकाटी हुई सड़क खाली होने वजह से हम सिर्फ बीस मिनट में शिमला से बाहर नारकण्डा को जाने वाली सड़क पर थे..... शिमला से कुछ बाहर निकल कर मैने गाड़ी उस जगह रुकवाई, जिसे पिछले साल ही अपने परिवार संग की हुई "रिंकोगपीओ यात्रा " के दौरान देखा था, कि सड़क के इस मोड़ पर बहुत सारे देवदार के पेड़ों का जंगल है...जिस को पृष्ठभूमि मान कर कई सारे सैलानी अपनी गाडियाँ सड़क पर रोक कर अपना फोटो सैशन करवा रहे थे.... परन्तु अब की बार हम वहाँ अकेले थे,  क्योंकि इतनी सुबह तो सैलानी शिमला से कुफरी जाने से रहे...
                और,  मैने अपने पिता जी द्वारा मुझे भेट किये हुए "हैट" जिसे वह मेरे लिए कई साल पहले अपनी कन्याकुमारी यात्रा से लेकर आये थे... पहन कर चित्र खिंचवायें और कुछ चित्र विशाल जी के खींचे.....

                             ............................(क्रमश:)
विश्व धरोहर खिलौना गाड़ी " हिमालयन क्वींन ".........और रेलवे फाटक बंद होने पर सड़क पर रुके हम सब...

वो स्थान जहाँ हम चाय पीने के लिए रुके थे,. सूर्योदय से चंद क्षण पहले और सूर्योदय के दृश्य.....

इधर हमारे चाय के कप ढ़ल रहे थे,  तो उधर सूरज चढ़ रहा था....क्या खूबसूरत अनुभव था.. 

विशाल रतन जी के हाथों में अब, गाड़ी का दिशा-चक्र और मेरे हाथों में मेरी प्रिय बाँसुरी.... 

सुबह के वक्त पहाडों की रानी "शिमला" की व्यस्त सड़क खाली थी..... 

तभी तो तुझे पहाडों की रानी कहते हैं...... शिमला 

बादलों से घिरा हुआ..... शिमला 

जिस ओर भी नज़र घुमाई, तो तेरा हसीन चेहरा ही नज़र आया...ओ पहाडों की रानी शिमला.... 

शिमला से कुछ बाहर नारकण्डा की तरफ निकल पर......खाली सड़क पर कुछ यादगारियाँ सम्भालतें हुए हम दोनों... 

मित्रों.....यह चित्र अप्रैल 2015 में बरोट का है,  जिसमें मैं अंग्रेज़ों द्वारा बनाई जोगिंदर नगर से बरोट 12किलोमीटर लम्बी रेलवे ट्राली लाइन पर खड़ा हूँ...... इस लाइन पर मेरे खड़े होने की मुद्रा से आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि इस रेलवे लाइन का कोण कौन सा है.... वाह रे अंग्रेज़ों मान गया तुम्हारे दिमाग़ को.....!! 

1 टिप्पणी: