बुधवार, 5 अप्रैल 2017

भाग-16 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-16 पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                 
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                        सारा दिन बगैर पानी के धौलाधार हिमालय के गज पर्वत की ऊँचाई को चढ़ते-चढ़ते आखिर शाम को गज शिखर के पास मिले उस चमत्कारी जल के छोटे से जीवनरक्षी संग्रह से अपने निढाल हो चुके तन-मन को पुन: स्फुर्तिमय कर राणा चरण सिंह और मैं गज शिखर की तरफ बढ़ गए...... अब मेरी दृष्टि ऊपर की ओर कम नीचे के अद्भुत मंज़र को बारम्बार  निहार रही थी..... मंज़र था कि मैं उन गगनचुंबी बादलों के नीचे रह रही भौतिकी दुनिया से बहुत ऊपर एक आध्यात्मिक अवस्था में चल रहा हूँ ...... कि जिस प्रकार से मैं छोटी उमर से धार्मिक चलचित्रों में "स्वर्ग" की छवि देखता आ रहा हूँ, वह छवि अब मुझे साक्षात नज़र आ रही थी कि बादलों के ऊपर भी एक जहाँ है जिसे स्वर्ग कहा जाता है.........
                                   मैने ऊपर की ओर देखा.... तो गज भूमि पर पीले रंग की आभा छाई हुई देख ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि गिरिराज गज ने केसर का टीका अपने माथे पर सजा रखा है.......जब मैं वहां पहुंचा तो पाया वह पीली आभा, हर जगह बिछें हुए पीले पुष्पों की आभा थी...... जो बहुत हसीन लग रहे थे, ऐसी अनुभूति हुई कि मानो गज पर्वत ने अपने आप को हमारे लिए सजा रखा हो और तभी मेरे अवचेतन मन में एक स्वर गूँजा...."स्वागत है विकास, मैं तो सुबह से ही तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ ".......मैने आदर से अपना शीश झुकाया और चरण सिंह के पीछे-पीछे गज शिखर की ओर बढ़ गया......प्रकृति का अजब चमत्कार कि जहाँ तक मेरी नज़र जा रही थी, सब कुछ बादलों ने ढ़क रखा था, कि जैसे एक बहुत विशाल सफेद अनछुआ ग्लेशियर हो..... और गज शिखर अस्त हो रहे सूर्य की सुनहरी रौशनी से सोने सा चमक रहा था, क्योंकि हम जिस जगह से ऊपर चढ़ रहे थे, उसपर सामने वाले पर्वत की छाया पड़ रही थी, सिर्फ गज शिखर ही सूर्य की अद्भुत लालिमा में नहा रहा था...........
                                  आखिर....... आखिरी कदम गज गिरिराज के शिखर पर पड़ा.......उस झंडे वाले स्थान पर से सिर्फ पार करने हेतू मुश्किल से तीन फुट चौड़ा कुछ समतल स्थान था, बाकी सब जगह शिखर के शूल नजर आ रहे थे.......... और जैसे ही सिर गज शिखर से ऊपर हुआ, बहुत तेज गति से चल रही हवा से एकाएक सामना हुआ, गज शिखर के ऊपर सर्द हवा का वेग इतना तेज था, कि वहां खड़े रहना नामुमकिन सा लग रहा था, सो हम दोनों वहीं शिखर पर बैठ गए...... और अब दृश्य बदल चुका था, मेरी आँखों में गज पर्वत के पार का एक ऐसा दृश्य समा रहा था,जो मेरे लिए फिर से एक बिल्कुल नया अनुभव था, कि गज पर्वत धार की तरह ही सामने चम्बा धार पर्वत श्रृंखला के शिखर..... इन दोनों शिखरों के बीचोबीच तीन अलग-अलग झीलें....... यानि कि पर्वतों के ऊपर झीलें, चरण सिंह ने बताया कि वो एक तरफ धौलाधार पर्वतमालाओं की सबसे लम्बी, बड़ी,गहरी व पवित्र झील "लमडल" का एक कोना दिखाई दे रहा है, मध्य में "काली कुंड" और तीसरी झील का नाम "काली चोह" है.......... मैने कहा, हां राणा जी इन झीलो के पानी का रंग काला सा लग रहा है, इसलिए ही इसे काली नाम दिया गया होगा, तो चरण सिंह बोले....नहीं, यह नाम रंग की वजह से नही... यहां से काली कुंड का मुख्य स्रोत गिरता है, वहां प्राकृतिक रुप से पत्थर पर मां काली जी की आकृति उभरी हुई है, इसलिए इसे काली कुंड नाम से जाना जाता है......
                                 सूर्यास्त हो रहा था, गज शिखर पर सर्द हवाओं का तेज प्रवाह निरंतर जारी था, सो जल्दी से मैने अपनी गर्म जैकेट निकाल कर पहन ली...... दोस्तों, मैं उस समय के अपने मन की स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूँ,कि एक पर्वतारोही होने की वजह से मुझे लमडल झील को देखने का इतना चाव नही हो रहा था..... जितना चाव, सुख व संतुष्टि उस समय गज पर्वत के शिखर पर होने से हो रही थी, कि मैं गज गिरिराज को सिर कर चुका हूँ और उस रास्ते से लमडल तक पहुंच रहा हूँ, जो सबसे कठिन व दुर्गम है.................. जिस तरफ से हम दोनों चढ़े थे, गज पर्वत की वह तरफ सूर्य सम्मुख होने के कारण वहां की सारी बर्फ पिघल चुकी थी, पर अब जिस तरफ से हमे नीचे उतर कर लमडल तक जाना था,  गज पर्वत का वो हिस्सा,  जो कि सूर्य सम्मुख ना होने के कारण एक बहुत विशाल ग्लेशियर था, जो पूर्णता कभी नही पिघलता......एक ओर विशेष बात मैं आपको बताना चाहता हूँ कि धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं और चम्बा धार पर्वत श्रृंखलाओं के बीचोबीच एक साथ सात झीलों का क्रमवार समूह है......सोचों कि पहाडों के शिखरों के समीप एक सुन्दर झील और उसका जल बह पर नीचे दूसरी झील में जाता है और फिर तीसरी झील..... चौथी, पांचवी..........बहते-बहते वह जल सभी झीलों में समावेश कर पुन: बह कर चम्बा घाटी में बह रही "रावी नदी" में मिल जाता है............ "हे प्रकृति, तेरा हर रुप मोहिनी रुप है...जो मनुष्य मन की चंचलता के संतूर रुपी तारों को सदैव छेडता रहता है"
                              तभी मेरा ध्यान चरण सिंह की आवाज़ से  टूटा कि, चलो चलते हैं यहां एक दम से अंधेरा हो जाता है...और चरण सिंह ने अपने जूते खोल कर रक्सक में रखते हुए मुझे कहा कि, "पंडित जी... अब यहां से आगे का रास्ता मैं नंगे पैर ही तय करूंगा, क्योंकि लमडल झील का यह स्थान हम गद्दी लोगों के आराध्य भगवान शिव जी का वास है, इसलिए इस स्थान का एक-एक कण हमारे लिए पवित्र है...... और लमडल झील से चौथी झील तक हम इस सारे इलाके में नंगे पैर ही चलते हैं, लघुशंका तो क्या हम लोगों के लिए इस स्थान पर अपना थूक फेंकना भी पाप है,परन्तु आप अपने जूते मत उतारना, भाई जी".............और नंगे पैर राणा चरण सिंह ग्लेशियर की बर्फ पर भाग दिये........ मैं सुन्न सा खड़ा बस उनको देखता रह गया और सच बोलू तो मेरी हिम्मत भी नही हुई कि मैं भी चरण सिंह की तरह नंगे पैर लमडल झील माथा टेकने जाऊँ....... सो मैने धीरे-धीरे अपनी ट्रैकिंग स्टिक की सहायता से उस ग्लेशियर से सावधानीपूर्वक उतारना शुरू कर दिया............
           
                                                                      .................................(क्रमश:)
बादलों से ऊपर,  मुझे ऐसी अनुभूति हो रही थी.... कि मैं जीवित ही स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ.....


गज पर्वत शिखर की ओर चढ़ रहा... मैं

गज गिरिराज के माथे पर पीले पुष्पों का श्रृंगार..... 
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गज शिखर के समीप मेरी प्रतीक्षा करते हुए चरण सिंह... 

जब कि मैं कुछ दम ले रहा था.... 


 बादलों से ऊपर सूर्यास्त का यह अद्भुत दृश्य,  जो मैं गज गिरिराज के शिखर से देख रहा था... 
धौलाधार हिमालय के गज पर्वत शिखर (4470मीटर) पर बैठे राणा चरण सिंह और मैं... 

गज पर्वत के शिखर से यह पहला दृश्य, जो मैने देखा.... चित्र में आपके दायें तरफ लमडल झील का एक कोना,  मध्य में काली कुंड और बायें तरफ काली चोह दिखाई दे रहे हैं.... 

गज पर्वत के शिखर और लमडल झील के मध्य एक बहुत विशाल ग्लेशियर....

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3 टिप्‍पणियां:

  1. वास्तव में पक्का बन्दा है राणा चरण सिंह

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  2. वाह चरण सिंह जी की आस्था को नमन है जी...बिना चप्पल ऐसे पर्वत पर चलना बहुत कठिन काम है...बहुत बढ़िया जी...

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