मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

भाग-9 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-9 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                       
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                          जैसे पिछली किश्त में मैने आपको बताया था कि फिसलने से ऋषभ के पैर में चोट लग गई थी और बूट डाले होने के बावजूद भी पैर के अंगूठे का नाखून कुछ उखड़ गया था.........
                          रात के आठ बजे से ऊपर का समय हो चुका था, राणा चरण सिंह बोले..... चलो धीरे-धीरे चलते हैं, अब डेरा कोई ज्यादा दूर नही है....और ऋषभ हिम्मत कर खड़ा हो चल दिया........ पौने घंटे के बाद एक नदी पर बने कच्चे पुल को पार कर आखिर हम चरण सिंह के डेरे पहुंच गए और मैने समय देखा, तो रात के नौ बज चुके थे........
                        मिट्टी के तेल से चलने वाले दीये से रोशनी कर...... सब से पहले चरण सिंह ने दूध गर्म किया और एक सभ्य शहरी की तरह ही हमे गर्म दूध के साथ बिस्कुट प्रस्तुत कर अपनी मेहमान नवाज़ी का आरम्भ किया............ फिर तत्पश्चात हमे गर्म पानी दिया, ताकि हम अपने हाथ-मुँह धो सके और कहा कि मैं खाना परोसता हूँ.......हमने अपनी रक्सकों से खाना निकाल कर बाहर रखा, तो चरण सिंह बोले, "ब्राह्मण देवता अब अपना भोजन रहने दे, कृपया मेरा अतिथ्य  स्वीकार करे ".........मैं उनकी बात सुन कर हंस दिया और बोला, राणा जी....चलो जैसी आपकी मरजी जी.....और हम दोनों भाइयों को वो खाना परोसा, जो चरण सिंह अपने घर से साथ लाये थे, मैने इन से कहा कि यह भोजन तो किसी उत्सव का लगता है, तो चरण सिंह ने कहा..... कि आज मेरे स्वर्गीय पिता का चोबरक( चतुर्थ बरसी) था, सारे गांव और रिश्ते-नातेदारों को भोजन का न्यौता दिया था, तो मैने झट से हमे रास्ते में राणा रोशनलाल उत्तम जी का जिक़र किया, जिनके साथ हम गेरा गांव से रावा गांव तक आए थे....चरण सिंह बोले, हां वे हमारे रिश्तेदार है और हमारे पास ही आज इस मौके पर आए थे..........
                       रात्रिभोज बहुत स्वादिष्ट था दोस्तों...चने, रोटी, चावल, पनीर का मंदरा(हिमाचली व्यंजन) और मीठे में हलवा तथा मीठे चावल......... सलाद में पहाड़ी खीरा, यह सब व्यंजनों का स्वाद में जीवन भर नही भूल सकता........किसी पांच सितारा होटल में मोमबत्ती प्रकाशित रात्रिभोज में भी वो आनंद की अनुभूति नही हो सकती, जो इस दीये की लौ में किये भोजन और चरण सिंह की मेहमान नवाज़ी से हो रही थी........ सोच रहा था दिमाग में उस समय कि, " वाह रे विकास नारदा.... कभी पहले सोचा था कि एक दिन ऐसे किसी पहाड़ के बियाबान जंगल में एक गद्दी की झोपड़ी में उसके पशुओं के साथ बैठ मटरपनीर की दावत भी उडाएगा "
                       रात्रि भोजन करने के पश्चात चरण सिंह ने अपना हुक्का भरा और कश खींचते हुए मुझे बोले, "अच्छा तो पंडितजी...आप ब्रह्म हो तो मुझे कुछ ज्ञान दे".........मैं हंस दिया और बोला, "पूछिए जनाब... आप किस विषय पर विचार-विर्मश करना चाहते है" और फिर कुछ धार्मिक बातों का दौर चला और उल्टा  मैं राणा चरण सिंह के ज्ञान को देखकर आर्चरज में पड़ गया कि एक भेड़-बकरी चराने वाला गद्दी इतनी ज्ञान की बेशुमार बातें भी कर सकता है........
                       चरण सिंह के डेरे के आसपास तीन और झोपड़ियाँ भी थी, जोकि चरण सिंह के पारिवारिक सदस्यों की ही थी, यह सब डेरे मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और टीन का एक अस्थाई ढांचा हैं, जिसे वह परिवार साल के कुछ महीने इस्तेमाल में लाता है और बर्फ गिरने से पहले इन घरों की छते उतार कर यह लोग नीचे अपने गांव रावा में चले जाते हैं क्योंकि यहां कई फुट बर्फ पड़ जाती है......... इन झोपड़ियों का भीतरी डिजाइन मुझे बहुत पंसद आया, इन झोपड़ियों को चार भागों में बांटा गया है, सबसे पहला भाग पशुओं को बांधने के लिए, उसके से एक स्तर ऊपर मध्य में दीवार कर आधे हिस्सा में रसोई और बाकी में एक बंद कमरा, यहां नवजन्में पशुओं के बच्चों को ठंड से बचाने के लिए रखा जाता है और उस छोटे से कमरे की छत पर दो-तीन लोगों के सोने योग्य एक ऊंची व सुरक्षित जगह, जिसकी सीढ़ी रसोई की तरफ से जाती है...... और इस सारे ढांचे के ऊपर एक सम्पूर्ण छत........
                       ऋषभ के पैर पर अब सूजन काफी बढ़ गई थी, जिससे यह तो तय हो गया था कि...... अब आगे का सफर ऋषभ के बस से बाहर है...... परन्तु मैं तो हमेशा अपनी धुन का पक्का रहता हूँ, मन में ठान लिया, कि अब ऋषभ को चरण सिंह के डेरे पर छोड़.... कल सुबह आगे का सफर करूं और चरण सिंह से आग्रह किया कि आप ही मुझे लमडल तक ले जाए....चरण सिंह बोले, आप अभी सो जाईएे, कोशिश तो यह ही रहेगी कि मैं ही आपको लमडल ले जाऊं या फिर किसी और आदमी को आप के साथ भेज देंगे...कल सुबह को देखेगें........
                       सो, अब सोने की तैयारी शुरू हुई तो चरण सिंह ने हमे कम्बल आदि देने चाहे तो मैने कहा, कि राणा जी हमारे पास सब इंतजाम है, आप जैसे और रोज यहां सोते हो, वही सोईये...... हम आपके घर मे नये हैं और नई जगह कहीं भी सो जाएगें, आप तंग मत होना हमारी वजह से......परन्तु चरण सिंह कहां मानने वाले थे और हमे झोपड़ी की उस ऊंची व सुरक्षित जगह पर चढ़ा दिया ......और खुद नीचे रसोई वाले हिस्से में यह कहते हुए लेट गए, कि मुझे प्रात: जल्दी उठ कर पशुओं का दूध भी दोना है, यदि आपके साथ सो गया तो सुबह उठते समय आपकी नींद खराब होगी
                       सो हमने अपने बिस्तर खोले और मैं अपने -10डिग्री के स्लीपिंग बैग की जिप खोल कर उस में घुस गया........ सारे दिन में जल्दी-जल्दी बदल रहे घटनाक्रम पर सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई पता ही नही चला...............
           
                                                                           ............................(क्रमश:)
राणा चरण सिंह के डेरे के साथ बहती नदी पर बना एक कच्चा पुल... 

राणा चरण सिंह ने अपनी मेहनवाज़ी का आगाज कुछ इस तरह से शुरू किया.... 

और,  मेहमान नवाज़ी की एक सभ्य शुरुआत... 

मुझे इस अन्न के एक-एक दाने का स्वाद पूरे जीवन याद रहेगा.... दोस्तों 

"दीया प्रकाशित रात्रिभोज"  का सुखद अहसास... 

भोजन का आरंभ भी मीठे हलवे से.... 

और,  अंत भी मीठे चावलों से.... 

राणा चरण सिंह हुक्का घुडघुडाते हुए.....

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