रविवार, 7 मई 2017

भाग-3 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.... Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-3 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....
                                        "स्मृति चिन्ह का वो पत्थर "

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                                        20जुलाई 2016,  मैं और विशाल रतन जी फिर से चल पड़े.... हमने तय किया कि सुबह का नाश्ता "नारकण्डा" पहुंच कर करेंगें,  दोस्तों मैं इस यात्रा के पिछले साल भी इसी सड़क द्वारा अपने परिवार संग रिकोंगपीओ तक गया था,  सो इस रास्ते का मुझे काफी ज्ञान हो चुका था....
                           फागू(2500मीटर)नामक स्थान से गुज़रे, यहाँ तकरीबन हर समय धुंध(फोग) ही छाई रहती है... इसलिए कहा जाता है,  कि इस जगह पर फोग होने के कारण अंग्रेजों ने इसका नामकरण ही फागू कर दिया.... फागू से आगे बढ़ते-बढ़ते प्रकृति भी अपने अलग-अलग कोणों से अपनी सुंदरता को अपने प्रेमियों के आगे पेश करती रहती है..... और पहाड पर हर नया मोड़,  नई दृश्यावली बना हमारे आगे खड़ा मस्कुरा रहा था.... दूर से पहाड के शीश पर बसा एक बहुमंजिला घरों के झुरमुट से सजा शहर नज़र आने लगा,  वह "ठियोग"(2351मीटर) शहर था....
                           एक बात जहाँ मैं कहना चाहता हूँ दोस्तों,  कि हिमाचल प्रदेश या पहाडों में घूमने आए ज्यादातर सैलानी अपनी यात्रा को शिमला-कुफरी तक ही समाप्त कर घर वापसी कर जाते है, कभी इससे आगे तो चल कर देखो दोस्तों,  प्रकृति कितनी मेहरबान है इन इलाकों पर.... हरियाली इतनी कि... शहर की "रंग -बिरंगी भीड़" को देख-देख कर थक चुकी हमारी आँखों को,  इस हरे रंग को देख आराम मिलना शुरू हो जाता है..... ऐसा आभास होता है कि यह हरियाली हमारी आँखों में वो दवा की बूंदें बन पड़ रही हो,   जो हमे राहत व शीतलता दे रही है....... पहाडों पर इंसानी चित्रकारी यानि सीढ़ीदार खेत और उनमें लगी सब्जियां व सेबों के बागान इस इलाकें की सम्पन्नता को दर्शा रहे थे,  कई जगह तो सेबों के वृक्षों को जालीदार कपड़ों से ढ़क रखा था,  कि औलावृति से कहीं सेब की फसल को नुक्सान ना पहुंचे...
                           चलते-चलते हम एक मोड़ पर रुके..... जिसे "कनाग देवी माता मोड़" कहा जाता है.... जहाँ एक खूबसूरत मंदिर बना हुआ है,  परन्तु कनाग देवी का मूल स्थान सामने वाली पहाड़ी के शिखर पर था.... यहाँ चल कर जाना पड़ता है,  यह मंदिर श्रद्धालुओं की सहुलियत के लिए यहीं सड़क किनारे बना दिया गया है,  इस बात की जानकारी वहाँ खड़े एक सज्जन ने हमे दी...... मैं मन ही मन सोचने लगा, "वाह रे मानव.. तूने तो अपने आराम के लिए पर्वतों पर चढ़े देवी-देवताओं को नीचे उतार बिठा लिया...!" तभी सकारात्मक मन ने भी अपनी राय से मेरे नकारात्मक सोच को समझाया,  कि ऐसा करने से भक्त अपनी माँ के करीब और माँ अपने भक्तों के और करीब हो गई.......मंदिर की दीवार पर लगे श्री खंड महादेव यात्रा के बैनर ने हम दोनों को अपने पास खींच लिया,  क्योंकि उस पर यात्रा सम्बन्धी क्रमवार सब स्थानों के नाम दे रखे थे,  और श्री खंड महादेव शिला के चित्र भी थे.....
                            दोस्तों,  मैने नारकण्डा को नाश्ता करने के लिए इसलिए चुना था,  क्योंकि पिछले साल जून में की हुई रिकोंगपीओ यात्रा में मैने नारकण्डा व हाटू पर्वत से हिमाचित हिमालय के अनुपम दर्शन किये थे...जिन्हें फिर से देखने की लालसा मुझे नारकण्डा में कुछ वक्त रुकने के लिए उत्साहित कर रही थी..... और 9बज चुके थे,  नारकण्डा(2600मीटर)तो पहुँचें...पर दुर्भाग्य से हिमालय दर्शन की लालसा पर बादलों ने पानी फेर दिया,  निराशा हाथ लगी कि मैने कितनी सारी भूमिकाएँ बांधी थी विशाल जी के आगे.... सब व्यर्थ चली गई..... परन्तु नारकण्डा अपने-आप में ही बेहद हसीन जगह है,  जुलाई के उस मौसम में भी बेहद ठंडी-ठंडी हवा के झोंके मेरी बाँह के रोंएें खड़े कर गए थे..... नारकण्डा से केवल 6किलोमीटर की दूरी पर हाटू पर्वत शिखर(3400मीटर) है, वहाँ तक जाने वाली सड़क ही आपको रोमांचित कर जाती है... क्योंकि उस की चौड़ाई केवल एक ही कार चलने योग्य है,  सामने से आई गाड़ी को रास्ता देना बहुत टेढ़ी खीर साबित होता है.... और हाटू शिखर पर पहुंच माता हाटू जिन्हें स्थानीय लोग रावण की पत्नी मंदोदरी का मंदिर भी कहते हैं,  दर्शनीय है और सबसे अद्भुत तो यह है शिखर से "महान हिमालय श्रृंखला" के दर्शन....... परन्तु इस बार हमारी मंजिल श्री खंड महादेव थी,  सो हम जल्दी से जल्दी "जांओं" नामक ग्राम तक पहुंचना चाहते थे,  जहाँ से पदयात्रा का आरम्भ होती है... सो हम रास्ते के हर सुंदर स्थल को छोड़ मंजिल की ओर बढ़ने को प्राथमिकता दे चल रहे थे.....
                             नारकण्डा में नेगी ढाबें पर नाश्ता कर,  हम सैंज नामक जगह की ओर रवाना हो चले... अब गाड़ी फिर से मेरे काबू में आ गई थी और विशाल जी बाहर का नज़ारा अपने काबू में लाने के प्रयासरत थे..... नारकण्डा से तो बस उतराई ही उतराई शुरू हो जाती है, क्योंकि हम अब सतलुज घाटी में जो प्रवेश कर रहे थे... सैंज पार करने के बाद अब हमारी गाड़ी तिब्बत मानसरोवर के समीप राक्षक ताल से बह कर आ रही सतलुज नदी की प्रचण्ड धारा के विपरीत रामपुर बुशहर(1031मीटर) शहर की ओर बढ़ती जा रही थी....दोस्तों सैंज के बाद इस इलाके में बहुत जगह पर सेना के शिविर व छावनियाँ बनी हुई है,  क्योंकि 1962 चीन युद्ध के बाद से व चीन अधिक्रत तिब्बत की सीमा भी पास होने के कारण इस सारे इलाके पर सेना का कड़ा पहरा है.....
                             सतलुज नदी के दोनों ओर बसा पहाड़ी शहर रामपुर बुशहर एक प्राचीन रियासत है, जिसका सम्बन्ध हिमाचल प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह जी से है...जिनके पिता राजा पदम सिंह जी बहादुर 1914 से 1947 तक बुशहर रियासत के शासक रहे.... उनके द्वारा 1919में रामपुर बुशहर में ही बनवाया पदम महल बेहद सुंदर इमारत है..... परन्तु हमे रामपुर बुशहर से कुछ पहले ही नोगली गाँव के बाद बजीर बावड़ी नामक स्थान से सतलुज नदी पर बने पुल को पार कर दूसरी दिशा में मुड़ना था,  सो पुल पार कर अब हम एक बेहद हसीन पहाड़ी गाँव "निरमण्ड " की तरफ बढ़ गए...मुख्य सड़क से पुल के इस पार सड़क छोटी और घुमावदार हो गई...... और उस सड़क के किनारे खाई की तरफ बनाये हुए दो अलग-अलग स्मृति चिन्हों को मैं दूर से ही पहचान गया, उन्हें देखते ही गाड़ी के स्ट्रेरिंग पर मेरी पकड़ एकाएक मजबूत हो गई......
                              आप सोच रहे होंगे दोस्तों कि, "सड़क किनारे लगे उन पत्थरों के स्मृति चिन्हों से मेरी ड्राइविंग का क्या मेल......! "
                               दोस्तों,  ऐसे सड़क पर लगे स्मृति चिन्ह मैने अपने जीवन में पहली बार उत्तराखंड भ्रमण के दौरान देखें थे,  जब मैं कासौनी से ग्वालदम होता हुआ कर्णप्रयाग की तरफ जा रहा था..... पिंडर घाटी में बह रही पिंडर गंगा नदी के संग-संग, एक संकरी सी घूमती हुई सड़क के किनारे ऐसे कई छोटे-छोटे मंदिर नुमा स्मृति चिन्ह दिखें....पहले तो अपनी मस्ती में उन्हें नज़रअंजाद कर उनके पीछे दिख रही पिंडर घाटी को नहारता हुआ गाड़ी दौड़ता जा रहा था,  उत्सुकतावश एक स्मृति चिन्ह के आगे रुक कर उसे पढ़ा तो होश उड़ गए.... उस पर पहली पंक्ति में लिखा था, "ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना ".......फिर कुछ मृतकों के नाम लिख, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई थी...यानि कि यह स्मृति चिन्ह उस जगह पर बना था,  जहाँ से उन लोगों की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो पिंडर नदी के आगोश में जा गिरी थी... इसके बाद की यात्रा मैने बहुत ही ठहराव से की,  क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरे नाम का कोई पत्थर उस सड़क किनारे गड़ा जाए.....
                               दोस्तों, पहाडों में सड़क किनारे लगे ये स्मृति चिन्हों के पत्थर अपने आगे गुज़रने वाले हर गाड़ी चालक को एक खामोश सीख देते हैं.... कि पहाडों पर पूरे एहतियात से गाड़ी चलाये.... मैं बहुत बार जब भी पहाड में गाड़ी चला रहा होता हूँ.....तो सोचता हूँ कि औसतन 10-20मीटर के बाद एक मोड़ आ खड़ा होता है और मैं गाड़ी का स्ट्रेरिंग को घूमा कर गाड़ी मोड़, फिर एक अदृश्य विश्वास के संग अगले मोड़ की ओर बढ़ जाता हूँ.... पर खुदा-ना-ख़ासता कहीं मेरी गाड़ी मुझ से विश्वासघात कर जाए और उस मोड़ पर ना मुड़े...तो हजारों फुट गहरी खाई....!!!
                                दोस्तों,  यही तो वह अदृश्य विश्वास है जो हम अपने ऊपर नही, अपनी गाड़ी के ऊपर करते हैं और गाड़ी हमसे कभी भी विश्वासघात नही करती....... जबकि हम उससे विश्वासघात करते हैं...... जब चालक शराब के नशे में धुत गाड़ी चला रहा होता है..... और.....!!!!!

                                         .........................................(क्रमश:)
शिमला के बाद प्रकृति देवी इन इलाकों पर बेहद मेहरबान है....ठियोग शहर के कुछ सुंदर दृश्य 

दूर से नज़र आ रहा..... सुंदर सा शहर "ठियोग"

हे हिमालय देव, मुझ गरीब को भी ऐसे ही अपने कंधे पर रहने का छोटा सा स्थान दे दें....
यह चित्र खींचतें समय मैं यही बात सोच रहा था, दोस्तों 

काश कि मैं भी बादल बन जाता,
तेरे ऊपर मंडराता,
हे गिरिराज हिमालय

इस इलाके की सम्पन्नता...... सब्जियां और सेबों के बगीचे

पहाड की ऊंचाईयों या गहराईयों से सब्जियों व फलों को तोड़ जल्द से जल्द सड़क तक पहुँचने के लिए ट्राली की व्यवस्था....आप देख सकते हैं इस रास्ते पर 

कनाग देवी माता मंदिर.... और मंदिर के प्रांगण में लगा श्री खंड यात्रा का निमंत्रण 

लो,  बस पहुँचने ही वाले है..... एक खूबसूरत से शहर "नारकण्डा" में 

नेगी ढाबा नारकण्डा पर नाश्ता....परन्तु इस खिड़की से हमे इस बार "महान हिमालय श्रृंखला" के दर्शन ना हो सके, क्योंकि हिमालय राज पर बादलों को ज्यादा प्रेम उमड़ आया था, सो इस चित्र के नीचे क्रमवार पांचों चित्र पेश कर रहा हूँ, जो गत वर्ष की हुई मेरी रिकोंगपीओ यात्रा से है....जो मैने उस समय नारकण्डा में खींचे थे,इन चित्रों को देख आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि जहाँ प्रकृति ने दिल खोल कर स्वयं की ही कलाकृतियाँ बनाई हैं.. 

नारकण्डा से नीचे दिखाई दे रहा...... घाटी का मनमोहक दर्शन,
मानो कि एक अद्वितीय दृश्यपट आँखों के समक्ष हो.....

नारकण्डा से नज़र आती.... हिमालय की परतें 

नारकण्डा का प्रमुख आकर्षण......हाटू पर्वत पर स्थित माता हाटू का मंदिर 

हाटू पर्वत शिखर से दिेखाई देती महान हिमालय श्रृंखला.... 

वाह रे हिमालय राज.... तू बहुत मनमोहना है,
चित्र हाटू पर्वत शिखर से...

लो, आ पहुँचें हम....उस घाटी में जहाँ सतलुज नदी बह रही थी... 

सतलुज दरिया के किनारे-किनारे.... 

रामपुर बुशहर की तरफ बढ़ते हुए.....

पदम महल.... रामपुर बुशहर 

और, हम रामपुर बुशहर से कुछ पहले वजीर बावड़ी से मुख्य सड़क छोड़ निरमण्ड की तरफ मुड़ गए... 

मुख्य सड़क से सतलुज दरिया पर बने पुल के पार..... श्री खंड महादेव की ओर 

स्मृति चिन्ह का वो पत्थर...... जो प्रत्येक चालक को एक खामोश सीख देता है, कि पहाड में पूरे एहतियात से वाहन चलाए....

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