सोमवार, 3 अप्रैल 2017

भाग-7 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-7 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गजपास(4470मीटर)
                 
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                                      पिछली किश्त में मैने आपको बताया था कि मैं और ऋषभ नारदा 24अगस्त2015 के दिन, गेरा गांव से पैदल लमडल झील की तरफ जाते हुए कपरालू माता मंदिर तक पहुंच चुके थे और अब वहां से आगे बढ़ रहे थे....
                       जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे,अब हमे रास्ते में आया वही खूबसूरत झरना जो सत्य साई बिजली परियोजना के पास था, पूर्ण रुप से दिखाई दे रहा था...... यह एक मानव निर्मित झरना था..... बिजली परियोजना के अनुसार ऊपर पहाड़ पर गज नदी का रुख मोड़ कर एक गुफा और फिर एक बड़े लोहे के पाईप मे डाल कर यहां नीचे उस तीव्र गतिमान पानी के साथ विद्युत उत्पादन जल-चक्की चलाई जाने की योजना चल रही थी....... उस उँचाई से गिरते जल की सुन्दरता पूरी गज घाटी की सुन्दरता को चार चांद लगा रही थी.......
                       कुछ आगे बढ़ने पर पर नदी और घाटी में मोड आया, इस मोड़ को स्थानीय भाषा में लोग "सेला" (यानि सिल्ला.. पानी की वजह से ठंडी जगह) कहते हैं, मैने समय देखने के लिए मोबाइल फोन खोला, तो देखा कि उसपर सिग्नल आ रहा था....... हैरानी हुई कि शहर से इतना दूर जंगल में आने पर भी.... यह सिग्नल मुझे चमत्कारी सा लगा, और वही गज नदी के किनारे बैठ कुछ सांस ली और अपनी श्रीमती जी को फोन कर अपनी स्थिति के बारे में अवगत कराया......और यह मेरी फोन पर आखिरी बातचीत थी, क्योंकि इसके बाद चार दिन कहीं कोई सिग्नल ही नहीं मिला........
                       उस स्थान से उठकर आगे बढ़ा ही था, कि दो रास्ते हो गए....... और मैने ऊपर वाला रास्ता चुन लिया, ऋषभ मेरे पीछे आ रहा था, परन्तु 50मीटर ऊपर चढ़ने के बाद वह रास्ता बहुत छोटा और कीचड़युक्त हो गया..... और उस पर मवेशियों के पैरों के निशान,  मैं सोच में पड़ गया कि क्या यह वही रास्ता है, जो कपरालू माता मंदिर पर मिले लड़को ने बताया था.... तभी मुझे याद आया कि मेरे पास पीने का पानी खत्म है, तो पीछे आ रहे ऋषभ की तरफ अपनी पानी की बोतल उछाली.....कि रास्ते में बह रही एक छोटी जल धारा से पानी भर लाओ.......
                       और, मैं एक ऊँचे पत्थर पर खड़ा हो कर दोनों रास्तों का मुआइना करने लगा...... कि तभी मुझे दूर सेला के मोड पर नीचे वाले रास्ते पर एक लड़की और एक आदमी आते हुए नजर आए,  वह आदमी अपने कंधों पर एक लाठी और उसपर अपने दोनों हाथ रख कर मस्ती सी चाल चल रहा था...... मैने ऊंची आवाज में उनसे पूछा कि "भाई,  बग्गा को कौन सा रास्ता " ......वह आदमी बोला, "नीचे आ जाओ, गलत जा रहे हो "...........बस उसी क्षण मैं ऋषभ को छोड़ पीछे की तरफ ऐसे भाग लिया, जैसे कोई मुसाफिर  छूट रही रेलगाड़ी के पीछे भागता है, और वह सज्जन व लड़की कुछ आगे एक पत्थर पर बैठे मेरा इंतजार कर रहे थे......
                        जैसे ही मैं उनके पास पहुँचा, वह सज्जन पहाड़ी भाषा में बोले कि, "तुम कौन 'पखला' (अंजान)  आदमी इस समय जंगल में घूम रहे हो, अंधेरा होने को है, कोई रिछ (भालू) तुम्हें काट खाऐंगा " उनकी यह बात मुझे स्थिर करने के लिए काफी थी.... मैने उन्हे बताया हम ट्रैकर हैं और लमडल झील की तरफ जा रहे हैं बग्गा होते हुए..... तो वह सज्जन बोले जिस रास्ते से आप जा रहे थे, वह बग्गा का रास्ता नही है, आगे बहुत घना जंगल पड़ता है.... आप दोनों उस में गुम हो कर मर-मरा जाते, घर वाले आपके परेशान और पुलिस वाले हम गद्दी लोगों को परेशान करते......
                        उनके मुख से निकली यह बात मुझे अजीब परन्तु एक कड़वा सत्य लग रही थी, तभी सारे दिन की थकान से थका-हारा ऋषभ धीरे-धीरे लडखडाता और झूमता हुआ हमारे पास आ पहुंचा..... ऋषभ को देख वह सज्जन बोले, "यह आपके साथ वाला बंदा झूमता सा चल रहा है, क्या इसने शराब पी रखी हैं.......!"        मैं गर्व से बोला, नहीं हम ब्राह्मण हैं......मांस-शराब नहीं पीते और यह मेरा छोटा भाई है,जो सारा दिन पैदल चलने की वजह थकान से चूर है, इसलिए ऐसे चल रहा है........ बस "हम ब्राह्मण हैं " यह वाक्य बोलने के बाद उन सज्जन का मेरे प्रति रव्वैया एक दम से बदल गया और वह हाथ जोड़ कर बोले, "आप ब्रह्म हो, तो मुझे आप सेवा करने का मौका दें "
                        उन सज्जन की बात सुन कर मैने कहा कि, "आप मुझे राजपूत जान पड़ते हो " वह बोले, "हां....मैं राजपूत गद्दी हूँ " और मेरा नाम है, "राणा चरण सिंह कौशल " रावा मेरा गांव और जहां से आगे रैयल धार पहाड पर मेरा पशुओं का डेरा है, आप लोग अभी तो मेरे साथ मेरे डेरे चलो, रात होने वाली है......कल सुबह आपको बग्गा के रास्ते पर डाल दूगां और बग्गा से ही कोई जानकार आदमी को लेकर लमडल चले जाना, मुझे उनका यह प्रस्ताव एक वरदान की तरह लग रहा था और इसको मानने के अलावा कोई भी चारा नज़र नहीं आ रहा था, सो मैने आभार सहित राणा चरण सिंह को अपनी सहमति दे दी....
                        साथ चलने से पहले चरण सिंह मुझ से मेरी पीठ पर लदा सामान जबरदस्ती लेने लगे, मैने उन्हें मना कर दिया ......तो वह हंसते हुए बोले कि लगता हैं, पंडितजी... आपको मुझ पर विश्वास नही है, कि यह पहाड़ी आदमी कहीं मेरा सामान लेकर रफूचक्कर ना हो जाए....... मैं हंसा और बोला, राणा जी मैं अपना बोझ खुद उठाना चाहता हूँ...भला आपको क्यों तकलीफ दूँ  जी............तभी चरण सिंह बोले,तो आपके छोटे भाई का सामान मैं उठा लेता हूँ... मैने खुशी से कहा, हां यह अच्छा है और ऋषभ ने भी देरी नही की, अपनी पीठ पर लदा सामान चरण सिंह को देने के लिए......... और हम सब चल दिये आगे की ओर....

                                          ............................(क्रमश:)

एक खूबसूरत नज़ारा... गज नदी व घाटी का 
               
                                                           
सत्य साई बिजली परियोजना पर ऊंचाई से गिरता झरना.... 

सेला मोड़..... यहाँ से मैने गलत रास्ता लिया और यहीं मेरी राणा चरण सिंह से भेट हुई... 

सेला मोड़ पर यहीं बैठ कुछ सांस ली... और किस्मत से यहाँ फोन पर सिग्नल था, आखिरी बातचीत एक बार फिर हुई घर वालों से... 

गज नदी के निर्मल जल का रंग तो देखो.... दोस्तों 

और,  आखिर हम राणा चरण सिंह के साथ गज नदी के किनारे-किनारे....बग्गा जाने की बजाय उनके डेरे, जो कि रैयल धार पर्वत पर था.... पर चल दिये

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भाग-6 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-6  पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470 मीटर)
                     
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                                    मैं और मेरा भाई ऋषभ नारदा 24अगस्त2015 के दिन पिछले 6घंटे से पैदल चल रहे थे.... धौलाधार हिमालय में भगवान शिव की सब से लम्बी व बड़ी झील लमडल की ओर...............
                       शाम के पांच बजने को थे, जंगल इतना घना व शांत, कि दिन मे ही अंधेरा सा लगने लगा  और मुझे बस मेरी रक्सक(ट्रैकिंग बैग) पर बंधी घण्टी की आवाज ही सुन रही थी.....मैं ऋषभ से कुछ आगे चल रहा था, कभी जोर से भगवान शिव के जयकारे लगाता और तो कभी, ऊंची आवाज़ में हिन्दी गाने गाता...... कि इस घने जंगल में अपनी मौजूदगी बता सकूं और ऋषभ कुछ देर बाद ही सीटी बजा कर मुझे बता रहा था कि मैं आपके पीछे-पीछे सही सलामत आ रहा हूँ..........
                       अब रास्ता ऊंचाई से नीचे उतर कर फिर से गज नदी के पास जा रहा था कि हमे एक छोटी सी वीरान बस्ती नजर आई, ये टीन के अस्थाई कुछ घर थे पर इनमे कोई नही था........ इसका मतलब कि सत्य साई बिजली परियोजना वाला स्थान आ गया है.... और परियोजना का कार्य अब गज नदी की दूसरी तरफ चल रहा था, हमे घने जंगल की वजह से दूसरी ओर की आवाजें तो सुनाई दे रही थी, परन्तु दिखाई कुछ नही दे पा रहा था, बस ऊंचाई से गिरता झरना दूर से दिखाई दे रहा था उस तरफ....... पर हमे कोई रास्ता नही मिल पा रहा था दूसरी तरफ जाने के लिए......
                        रास्ता ना मिल पाने पर हमने परियोजना पर जाने का मोह त्याग कर आगे बढ़ना ज़ारी रखा, क्योंकि मैं हर हालत में आज रात तक "बग्गा " पहुंच जाना चाहता था........ मुश्किल से सौ कदम ही आगे जाने पर आखिर कई घंटों के सफर के बाद एक महिला व पुरुष दिखे, जिन्होंने अपनी पीठ पर जलावन लद रखा था.... रास्ता फिर पूछा, "हां ठीक है...बढ़ते चलो".....कह कर वह लोग चले गए, तभी आगे एकाएक खुली जगह दिखाई दी, और एक छोटा मंदिर....... जिसे "कपरालू माता " मंदिर कहते हैं.....
                       स्थानीय वन देवी कपरालू माता का मंदिर उछलती-कूदती गज नदी के साथ ही बना है, दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड, और पहाडों से बतिया आ रहे बादल और पहाड के मध्य से निकल कर गज नदी में गिरता एक दुधिया रंग का झरना....... और इन सबके बीच समतल जगह पर बना एक छोटा सा कपरालू माता मंदिर.......... निहायत हसीन था वो मंजर, दोस्तों...
                        मंदिर प्रांगण में तीन युवकों को बैठे देख, मन में खुशी की लहर दौड़ गई और सोचा कि चलो कुछ आदमी तो दिखने शुरू हुए.......वे युवक बोले, कि हम लमडल के आधे रास्ते पर अगले सप्ताह होने वाली दो दिवसीय "नयोन " पदयात्रा के लिए लंगर आदि का सामान रख कर वापस आ रहे हैं,सुबह 8बजे से वहां से चले थे और अभी यहीं तक ही पहुंच पाए हैं.....उन्होंने कहा, कि इस स्थान और बग्गा के बीच में घना जंगल और कठिन चढाई है और हमे नही लगता कि अब इस समय आपको आगे के रास्ते में बग्गा से पहले कोई भी व्यक्ति मिले..........
                     खैर, उन्होंने मुझे बग्गा तक जाने का सब रास्ता समझाया और कहा कि अभी 5बजे हैं, यदि आप फुर्ती से चलते रहे तो रात साढे आठ बजे तक बग्गा पहुंच जाओगें............. ऋषभ ने अपनी मन की बात कहीं, कि क्यों ना आज रात हम यहीं कपरालू माता के रुक जाए, परन्तु मैने कड़ाई से उसकी बात काट कर कहा, कि हमारी आज की मंजिल बग्गा है बस..... और बढ़ गया आगे की ओर............ बेचारा ऋषभ भी पैर मलता हुए मेरे पीछे चल दिया......
                        मैने ऋषभ को समझाया, कि हमे तब तक चलते रहना है.....जब तक हम चल सकते हैं, यदि कहीं अंधेरा या रात ज्यादा हो गई और हम बग्गा तक नहीं भी पहुंच पाये, तो वहीं-कहीं रास्ते में सुरक्षित जगह देख कर "कैम्प" लगा लेंगे और सुबह होने का इंतजार करेंगे.............
                       अनजान जगह, घना जंगल और पंगड़डी भी कुछ फीकी सी होती जा रही थी, ऊपर से सूर्यअस्त का समय नजदीक आ रहा था...... बस मन मे एक अजीब से डर को लेकर दृढतापूर्वक ऋषभ को साथ लिये आगे बढ़ता जा रहा था..............

                                                            ..................................(क्रमश:)
                               
गज नदी अब काफी नीचे बह रही थी... घना जंगल और सन्नाटा,  उस सन्नाटें को तोड़ती एक आवाज़... जो मेरे ट्रैकिंग बैग पर बंधी एक घंटी की थी..... 

दिन में ही अंधेरा सा लगने लगा,  जब हम इस घने जंगल से गुजरें...क्योंकि पेड़ों ने मिलजुल कर एक छत बना रखी थी... 

रास्तें में आई एक प्राकृतिक गुफा.... और इसमें जानवरों के पैरों के निशान भी मौजूद थे... 

सत्य साई बिजली परियोजना की वीरान बस्ती और एक छोटा सा शिव मंदिर..... 

जैसे, किसी मरुस्थल में कोई हसीन नख्लिस्थान हो...ठीक ऐसी ही आभा दे रहा था,  घने जंगल में स्थित यह "कपरालू माता" मंदिर परिसर.....

कपरालू माता मंदिर परिसर में बनी सराय,  जिस पर ताला जड़ा हुआ था.... 

कपरालू माता मंदिर प्रांगण में विश्राम कर रहे,  लमडल के आधे रास्ते पर लंगर लगाने वाले तीन स्थानीय युवक... 

ये युवक अगले सप्ताह होने वाली दो दिवसीय "नयोन" पदयात्रा में श्रद्घालुओं के लिए लमडल झील के आधे रास्ते पर लंगर का सामान आदि छोड़ कर वापस आ रहे थे....


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भाग-5 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.... Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-5 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                   
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                                    मैं और मेरा भाई ऋषभ, 24अगस्त2015 के दिन भगवान शिव की पवित्र झील लमडल की तरफ पैदल अग्रसर हो रहे थे......... जैसा कि मैने पिछली किश्त में आपको बताया था, कि... रावा गांव से आगे हम दोनों जंगल की तरफ खुले में खड़े बारिश का सामना कर रहे थे, खैर कुछ समय के बाद बारिश कम हुई और हम दोनों फिर चल दिये आगे उस रास्ते की ओर....... जो रास्ता हमे अभी दो घंटे बाद जंगल में मिले एक आदमी ने बताया, परन्तु मुश्किल से बीस मिनट ही चल पाए कि तेज बारिश फिर से शुरू और अब तो बारिश के साथ बड़े-बड़े ओले गिरने लगे......खुशकिस्मती से हमे पगडंडी के साथ ही एक जगह मिल गई यहां मैं और ऋषभ बस खड़े हो सकते थे.......
                       खड़े-खड़े मेरा ध्यान मेरे पैरों की तरफ गया तो देखा कि.... मेरे पैरों की अगुलियां खून से लथपथ थी, सैंडल खोल कर देखा तो "जोंकें" पैरों से चिपक खून चूस रही थी........ दोपहर के तीन बज चुके थे, भूख ने भी अब सताना शुरू कर दिया.......और बारिश कहां थम रही थी,सोे जैसे-तैसे वहीं बैठ कर सिर पर छाता ले खाना खोला........ मेरी श्रीमती जी ने हमे दो दिन के लिए भोजन साथ दे दिया था..... आलू की सूखी सब्जी, भरवा करेले साथ में परोंठियां.... ऐसे व इन हालतों में भोजन का स्वाद कई गुणा बढ़ जाता है, दोस्तो......
                        बारिश थमने के इंतज़ार में वहीं रुके एक घंटा हो चुका था, ओले गिरने तो कब के बंद हो चुके थे.... पर बारिश पूरी तरह से रुक नही रही थी, मैने ऋषभ को कहा कि इसी प्रकार यहीं जंगल में खड़े रहे तो, हम अपने निश्चित स्थान पर नही पहुंच पाएंगें और यहीं कहीं जंगल में ही रात काटनी पड़ेगी...... और हमने बारिश में ही फिर से चलना शुरू कर दिया, अपने पहले दिन के पड़ाव "बग्गा" की तरफ......
                        आगे जंगल बहुत घना होता जा रहा था, बारिश भी थम चुकी थी और आसमान से बादल ऐसे साफ हो गया जैसा "गधे के सिर से सींग".......पगड़़ंडी पर दोनों ओर बिच्छू बूटी का ही साम्राज्य था और बार-बार हम दोनों को यह डस रही थी, मैने अपने पहने हुए कपडो के चयन में बहुत बड़ी गलती कर दी थी, जो भी मैने अपनी सुविधा के लिए शौटस् कपडे और पैरों में सैंडल डाल रखे थे, वही सब मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर रहे थे...... मुझ पर दोनों तरफ से हमला हो रहा था, "बिच्छू बूटी और जोंकें"....जबकि ऋषभ ने पूरे कपडे और बूट डाल रखे थे, जो कि उसका काफी हद तक भलिभांति बचाव कर रहे थे............
                       जो व्यक्ति हमे रास्ते में मिला था, उसने बताया था कि अाप इन बिजली के खम्बों के साथ-साथ ही चलते रहना..... यह बिजली की लाईन ऊपर गज नदी पर बन रही एक विद्युत परियोजना तक जाती है, चाहे तो आज रात आप लोग वहां भी रुक सकते हो.... बस उन बिजली के खम्बों और पगडंडी पर हम बढ़ते जा रहे थे........मैं हर हालत में आज बग्गा पहुंचना चाहता था पर यह भी ज्ञात ना था कि हमारी आज की मंजिल अभी कितनी दूर और कहां पर हैं, इसलिए मैने अब अपने चलने की रफ्तार तेज कर दी....... जिस वजह से ऋषभ कई बार पीछे छूट जाता, परन्तु मैं ऋषभ की तारीफ़ करता हूँ कि यह उसके जीवन का पहला ही ट्रैक था, बगैर किसी अनुभव के वह मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश कर रहा था..........
                       अब, जंगल इतना घना होना शुरू हो गया कि दिन में अंधेरा सा लगने लगा....ऋषभ पीछे चल रहा था और मैं उससे कई मीटर आगे, बार-बार जंगल में ऊंची आवाज से ऋषभ को सम्बोधन कर जंगल में अपनी मौजूदगी की खबर देता....और ऋषभ की तरफ से उसकी आवाज या जवाब का इंतजार करता..... फिर मैने ऋषभ को मुंह से बजाने वाली सीटी थमाई और कहा कि यदि मैं चलते-चलते तुम्हारी आंखों से ओझल हो जाऊ...... तुम हर दो मिनट के बाद सीटी बजा कर मुझे बता देना, कि मैं पीछे आ रहा हूँ........ मैं ऊंची आवाज़ में पुराने हिन्दी गाने गाता हुआ आगे बढ़ रहा था........... ताकि कोई भी जंगली जानवर खास कर भालू से हमारा एकाएक आमना-सामना ना हो जाए और जंगल में हमारी मौजूदगी देख वह पहले ही हमारे रास्ते से पीछे हट जाए........
                                                   
                                                      ............................(क्रमश:)
रावा गांव से आगे बढ़ने पर हमें दूर पहाड पर मक्लोडगंज के साथ नड्डी गांव के एक मशहूर स्कूल की इमारतें नज़र आ रही थी... 

ग्लेशियर से निकले पानी की स्वच्छता का मुकाबला कोई भी आर.औ.मशीन नही कर सकती.... दोस्तों 

बारिश और सिर पर बज रहे दनादन ओलों की मार से बचने के लिए यहाँ शरण ली.... 

वहीं खड़े-खड़े मैने दो अलग-अलग समय पर एक से खींचें..... अब आप अंदाजा लगाये कि मौसम कैसे-कैसे रंग, पल-पल दिखा रहा था... 
श्रीमती जी द्वारा साथ दिये अति स्वादिष्ट भोजन का आंनद... और अनुभव तमाम उमर याद रहेगा, कि छाता सिर पर ले बारिश में इस आलू की सब्जी के साथ परोंठियां खाई थी..... 
मेरे पैरों पर चिपक कर खून की पार्टी मना रही... "जोंकें"

आखिर... बारिश में ही आगे बढ़ना मुनासिब समझा.... 

ऋषभ के लिए यह सब एक स्वप्न सा लग रहा था..... 

गज नदी पर बना एक पैदल पुल.... 

मैं मुसीबतों में भी आगे बढ़ने की हिम्मत रखना जानता हूँ..... दोस्तों

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भाग-4 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-4  पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                     
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                             मैं और ऋषभ नारदा अपना जरुरी सामान पीठ पर लाद कर 24अगस्त2015 को "गेरा" गांव से पैदल चल रहे थे, "लमडल झील" की तरफ........ लमडल झील और गज पर्वत से निकली गज नदी पर बने पक्के पुल को पार कर, एक कच्ची पगडंडी पर हमने चलना शुरू कर दिया और कुछ दूर ही चले थे, कि हमे हमारी यात्रा का पहला मददगार मिला....जो हमारे आगे ही पैदल चल रहा था, नाम था उनका.....श्री रोशन लाल उत्तम जी,  गांव वरमेज..........वह वरमेज गांव से पैदल ही गांव रावा जा रहे थे, अपने किसी रिश्तेदार के घर हो रहे समारोह में शामिल होने के लिए.......वह बोले चलो रावा गांव तक तो मेरे साथ ही चलो और उससे आगे का रास्ता आपको दिखा दूँगा.............
                         गज नदी के साथ-साथ ऊपर चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते एक और गांव आया, नाम था "वंनठू".....गांव में गज नदी के किनारे एक मंदिर में दो छोटी उमर की लड़कियों की मूर्तियाँ देख मैने इस बारे में रोशन लाल जी से पूछा, तो वह बोले यह दो सहेलियो का मंदिर हैं, जब एक सहेली किसी कारणवश गज नदी के तेज प्रवाह में बहने लगी, तो दूसरी ने अपनी अटूट मित्रता निभाते हुए उसे बचाने हेतू गज नदी में छलांग लगा दी और दोनों ही मौत की भेंट चढ़ गई.......मैने कहा तो यह मंदिर नहीं यह तो अटूट मित्रता का एक स्मारक हैं, दोस्ती का रिश्ता जीवन में बहुत बार अपने सगे-सम्बन्धियों की तुलना में ज्यादा गहरा हो जाता हैं....
                        वंनठू गांव से आगे गज नदी पर एक झूला पुल, जिस पर चलना भी कोई आसान काम नही था, क्योंकि चलने से ही सारा पुल झूले की तरह झूल रहा था..... पार कर हम ब्राह्मण जाति के गांव 'बरमई' में कुछ समय गांव वालों से बातें बतिया कर रावा गांव की तरफ रवाना हो लिये....... फिर आगे गज नदी पर पुराने जर्जर हो चुके पुल के साथ बने नए पुल से गुज़र कर हम रावा गांव के मक्की के खेतों में पहुंचे, तो देखा कि लोग दोपहर के समय भी मचानों पर बैठ कर फसल की रखवाली कर रहे थे.....देख कर हैरानी हुई कि दिन के समय भी फसल की रखवाली, पूछा तो रोशन लाल जी ने बताया कि जंगली भालू और बंदरों से चौबीसों घंटे मक्की की फसल को बचाना पड़ता है.....कैसा मुश्किल है पहाड़ो में खेती करना भी, मन में यह ख्याल आया कि.... देखने में यह पहाड़ कितने खूबसूरत नज़र आते हैं, परन्तु यहां रह कर जीवन का  निर्वाह करना भी किसी "पहाड़" से कम नहीं है.......
                       अब हम "रावा" गांव में पहुंच चुके थे और रोशन लाल जी ने हमें आगे का रास्ता दिखा विदा किया, और अब फिर रास्ता पूछ-पूछ कर जाने का सिलसिला शुरू हो गया, तभी एकाएक मौसम ने करवट ली और झट से बारिश शुरू और हम फट से एक छत के नीचे...........कुछ समय बाद बारिश थमी और हम रावा गांव से बाहर निकल कर..... अब हम गज नदी से थोड़ा ऊपर की ओर चढ़ रहे थे, रावा इस तरफ का आखिरी गांव है और अब हम जंगल की तरफ बढ़ रहे थे........ और हम पहली बार रास्ता भटके, परन्तु कुछ समय बाद ही समझ आ गया फिर सही रास्ते पर वापिस आ गए...........और, फिर मेरा सामना हुआ "बिच्छू बूटी " से जिसे वहां स्थानीय भाषा में 'ऐयन' कहा जाता है, जैसे ही मेरा हाथ इस पर पड़ा...... मानो कि 440 वोल्ट वाली बिजली की तार को छू दिया हो, जीवन में बिच्छू बूटी से छूने का... यह मेरा पहला साक्षात्कार या अनुभव था, इसका असर कई घंटों तक बना रहता है, मैं ऋषभ से बोला..... भाई, ये तो पहला ही दिन है...अभी तो चार दिन इसी बिच्छू बूटी से भरे जंगल में रहना हैं हमे.......
                      तभी एक दम साफ हो चुके आसमान में फिर बादल उठे और एकाएक बारिश शुरू..... परन्तु इस बार बारिश से बचने के लिए कोई जगह नही, एक बिजली के खम्बे के चबुतरे पर सामान रख जल्दी से मैने अपना ट्रैकिंग रेन कवर पहना और ऋषभ को छतरी थमाई, और दोनों इक्ट्ठा हो खुले में बारिश का सामना करने लगे............हमारी इस ट्रैकिंग की मुसीबतों का अब आरम्भ हो चुका था तथा आगे खड़ी और कई मुसीबतें हमारी राह देख रही थी..........

                                                  .....................................(क्रमश:)
हमारी पदयात्रा के पहले मददगार राणा रोशन लाल उत्तम जी,  जो हमे "रावा" गांव तक अपने साथ ले गये.... 
                                               
लमडल झील की तरफ ट्रैकिंग.... गेरा गांव में यहीं से गज नदी पर बने पक्के पुल से हम कच्चे रास्तों पर चल दिए....


"वनंठू" गांव में गज नदी के किनारे स्थित दो सहेलियों की अटूट मित्रता को दर्शाता..... यह स्मारकीय मंदिर 

"वनंठू" गांव से आगे रास्ते में गज नदी पर बना एक झूलता पुल..... 

गज नदी किनारे हरियाली सी पृष्ठभूमि पर ब्राह्मण समाज का एक छोटा सा गांव "बरलई".....

"बरलई" गांव में एक ग्रामीण बुजुर्ग से बतियातें हम लोग.... 

"रावा" गांव से पहले गज नदी पर बने एक नये पुल पर खड़े,  हम तीनों हमराही.... 
रावा गांव में मक्की के खेत... और दिनदहाड़े भी फसल की जंगली भालूओं तथा बंदरों से रखवाली.... 

अपने कामों में व्यस्त रावा गांव के लोग और हम पास से गुज़र गए इनके...... 

गज नदी घाटी के आखिरी गांव "रावा" के बाद..... शुरू हो गया जंगल का रास्ता 

बारिश से बचना चाहते थे,  परन्तु भाई.... क्या करते ऐसे ही खुले में कुछ बचाव किया...

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रविवार, 2 अप्रैल 2017

भाग-3 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.... LamDal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-3       पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास(4470मीटर)
                         
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                               मित्रों,  यह मेरी लमडल पैदल यात्रा चित्रकथा की तीसरी किश्त हैं,  24अगस्त 2015 को मैं और ऋषभ धर्मशाला से करेरी गांव की तरफ जा रहे थे..... रास्ते में पूछने के लिए एक जगह रुका, तो वह भाई साहिब बोले.... करेरी गांव तक तो आपकी गाडी जा ही नहीं पाएगी, क्योंकि अभी गए बारिश के मौसम में करेरी गांव के रास्ते में सड़क कई जगह से बह गई हैं, जब मैने कहा कि मैने लमडल जाना हैं... तो वह हैरानी से मेरे तरफ देखते हुए बोले कि,  अभी तो "नाऊन" (पवित्र झील में नहाने का दो दिवसीय पर्व) तो अगले महीने हैं, आप अभी क्यों जा रहे हो.......मैने बोला कि भाई,  मैं तो एक ट्रैकर हूँ और ट्रैकिंग के लिए जा रहा हूँ......... उन्होंने कहा कि आपकी गाडी करेरी गांव से कुछ किलोमीटर पहले 'गेरा' गांव तक ही जा पाएगी, खैर हम चल पड़े आगे...... वही बात हुई गाडी, गेरा गांव से आगे नही जा सकती थी क्योंकि बारिश का पानी सड़क को अपने साथ ही बहा ले गया था......
                        गेरा गांव में एक चाय की दुकान पर हमने रुक कर लमडल के ट्रैक के बारे में पूछा तो वहां खड़े एक स्थानीय लड़के सतीश कुमार ने बताया कि आप यहां से लमडल झील दो रास्तों से जा सकते हैं, एक तो जो आप बता ही रहे हो करेरी वाला, और दूसरा आप करेरी गांव जाने की बजाय गेरा से भी जा सकते हो..... यहां से बग्गा और फिर गज पास नामक धौलाधार हिमालय पर्वत को लांघ कर लमडल झील तक पहुंच सकते हो.......... परन्तु इस दोनों रास्तों में करेरी वाला रास्ता इस रास्ते के कुछ आसान है, पर यह रास्ता गज पास वाले रास्ते से लम्बा हैं...... यानि कि आने-जाने में 6दिन पैदल का रास्ता, और गज पास वाला रास्ता कुछ छोटा तो हैं..... परन्तु बहुत ही कठिन, दुर्गम और सीधी चढाई है,  परन्तु इसमें कम से कम आने -जाने के लिए 4दिन लग जाएंगे........... और हमे दुकान से बाहर आकर सामने तन कर खड़ा "गज पास" दिखाया, जिसकी उँचाई को बादलों ने आधे से ज्यादा तक ढक रखा था ......और सतीश कुमार ने कहा कि इस पर्वत को पार करो, तो लमडल पहुंच जाओगें...... तो मैने झट से कह दिया कि "भाई, धन्यवाद अब मैं इसी गेरे वाले रास्ते से ही जाऊगां, क्योंकि मुझे कठिन रास्ते ही ज्यादा पंसद हैं.......... यदि आप मेरे लिए कोई पथप्रदर्शक या गाइड का प्रबन्ध करवा दो तो, बहुत आभारी हूँगा, जी "
                        तब सतीश जी बोले, इतनी जल्दी गाइड तो नही होगा... आप बस चलना शुरू करो, आगे बढ़ने का रास्ता व मददगार लोग खुद व खुद मिलते रहेंगे, और 13किलोमीटर का पैदल सफर तय कर आज रात तक "बग्गा" पहुंच जाओ....और उससे आगे के रास्ते पर पिछले साल के "नाऊन मेले" के दौरान रास्ता बताने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रंगे पत्थरों से आपको आगे बढ़ने का मार्ग मिलता रहेगा (परन्तु मित्रों,ऐसा हुआ नही..... क्योंकि एक साल में वर्षा व बर्फ सब कुछ मिटा व दबा देती हैं ) ............
                        बस फिर क्या था, मैं दुकानदार वीरू राम से बोला कि...... भाई, हमारी गाडी कहीं सुरक्षित जगह पर लगवाओ और अपने घर का फोन नम्बर उन्हें लिखवातें हुए बोला कि, "खुदा ना ख़ासता, यदि हम आज से चार दिन बाद वापस ना आए, तो पांचवें दिन हमारे घर में फोन कर देना.... ताकि घरवालें जल्द से जल्द हमे ढूढने की कार्यवाही तो शुरू कर सके, जी "
                        मित्रों, मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ कि,  जब भी हम ट्रैकिंग पर जाते हैं...हमारा सबसे सम्पर्क टूट जाता हैं क्योंकि सम्पर्क का एकमात्र ज़रिया हैं मोबाइल फोन, जो कि पहाड के थोड़ा ऊपर चढ़ने पर ही रेंज से बाहर हो जाते हैं.... और सब कुछ अपने रिस्क और दम पर ही करना होता हैं...... क्योंकि हमारे देश में ट्रैकिंग के लिए सरकार द्वारा कोई सुविधा व सुरक्षा इंतजाम नही है और आतंकवाद के कारण सेटेलाईट फोन पर भी प्रतिबंध हैं..........खैर मैने व  ऋषभ ने जल्दी से अपना सामान पीठ पर लाद कर जोर से "बम बम भोले" का जैकारा लगाया और रवाना हो चले  "लमडल झील" की तरफ.....
                                                                   ........................(क्रमश:)

गेरा गाँव (हिमाचल प्रदेश) में से निकल रही "गज नदी".....और इस नदी के किनारे-किनारे हमे लमडल झील के लिए पैदल चल कर, आज रात बग्गा नामक स्थान पर पहुंचना था..... 

गेरा गाँव में गज नदी पर बनी विद्युत परियोजना..... 



लो जी,  हमने अपना सामान लाद लिया है जी.... और चले लमडल झील की ओर "बम बम भोले " के जैकारे के संग.... 

गेरा गाँव में हमारे मददगार बने, सतीश कुमार जी..... जिनकी सलाह पर हमने लमडल पहुंचने के लिए गज पास वाला रास्ता चुना..... 

चाहे यह फोटो खिंचवाते समय मैं मुस्कराहट बिखरे रहा था... परन्तु भीतर से मेरी ह्रदयगति बहुत तेज थी और मैं उत्साहित होते हुए भी अनजान खतरों व रास्तों से भयभीत था.......

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भाग-2 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-2   पैदल यात्रा लमडल झील वाय गजपास (4470मीटर)

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                          जैसे कि मैने आपको पिछली किश्त में बताया था, कि........ आखिर 24अगस्त 2015 सुबह साढे चार बजे मैं और मेरा छोटा भाई ऋषभ नारदा  हिमाचल प्रदेश की धौलाधार हिमालय पर्वतमालाओं की सब से बड़ी व लम्बी झील....  लमडल झील के लिए करेरी गांव(धर्मशाला) की तरफ रवाना हो गए........... और रास्ता लिया अपने शहर गढ़शंकर (पंजाब) से होशियारपुर जाने की बजाय सीमावर्ती हिमाचल प्रदेश के गांवों से ......... और मैं ऊना के पास "झलेड़ा" गांव से गुजर रहा था, कि सड़क किनारे कुछ जाना-पहचाना सा एक चेहरा सुबह की सैर करते हुए मेरे सामने से गुजरा.......तो, मैं चलती गाड़ी से एक झलक में ही उन्हें पहचान गया, कि वह मेरे फेसबुक फ्रैंड हैं....  सुबोध अंगरा जी, परन्तु हम आपस में कभी भी व्यक्तिगत रुप में नहीं मिले थे और सुबोध जी मेरी तरह पर्वतारोहण का शौंक रखते हैं....... और गाड़ी वापस मोड़ कर उनके पास जा कर, जोर से आवाज़ दे कर बोला......मिस्टर सुबोध, और वह चेहरा मेरी आवाज़ की तरफ घूमा और हाथ उठा कर बोले, "यस "
                            मैं झट से गाड़ी से उतरा, और उनके पास जा कर बोला.... सुबोध जी, मुझे पहचानिए... पर सुबोध जी मुझे नही पहचान पाए..... आखिर जब मैने अपना नाम बोला कि, विकास नारदा......... बस फिर क्या था, उनकी आंखों में  चमक देखने वाली थी और हम दोनों ऐसे मिले, जैसे कि दो बिछडे यार आपस में मिलते हैं...... देखो यह कमाल हैं फेसबुक का,  हम कैसे एक-दूसरे से जुडते जा रहे हैं..... और शायद मैं या आप मुझे...कहीं इसी प्रकार मिल जाए, जिस प्रकार मुझे सुबोध जी मिले............. खेर वहीं खड़े-खड़े ढेरों बातें हुई, उन्होनें मेरा ट्रैकिंग सम्बन्धी सजोसामान देखा...... और फिर रूखस्त हुआ, सुबोध जी से यह कह कर...... कि फिर कभी आपके घर भी आऊगां, जी..... 
                              झलेड़ा से मुबारकपुर होते हुए जब आगे बढ़े, तो उस समय नवरात्रे चल रहे थे और जगह-जगह लंगर सेवा चल रही थी....... और हम रुके गुरुहर सराय वालों के लंगर पर, जो कि एक पंजाबी ढाबे के रुप में सजाया गया था.......... लंगर छकने के बाद रवाना होते हुए "कांगड़े के किले" के कुछ चित्र खींचे और आगे बढ़ गए...............क्योंकि मैं जल्दी से जल्दी करेरी गांव पहुंचना चाहता था, कि मैं कोई पथप्रदर्शक या गाइड का प्रबन्ध कर उसे ले लमडल ट्रैक पर रवाना हो सकूं....... और यदि गाइड ना भी मिले, तो भी इतना समय हो कि मैं करेरी गांव से 13किलोमीटर पैदल चढाई चढ़ कर करेरी झील तक पहुंच सकूं और अगले दिन आगे लमडल झील की ओर........... 
                                 धर्मशाला पहुंचने पर मैने एक सड़क किनारे विश्राम कर रहे एक बुजुर्ग व्यक्ति से करेरी गांव का रास्ता और लमडल के बारे में पूछा, तो वह बोले.....मैं दो साल पहले,  लमडल झील पर हर वर्ष लगने वाले दो दिवसीय मेला "नाऊन" (जिसका मतलब पवित्र झील में नहाना) पर गया था,  यह बात सुनकर मानो कि,  जैसे मेरी लाटरी ही निकल आई हो...... मैने उनसे विस्तार में सब पता करना शुरू कर दिया, उन्होनें बताया कि..... आप चार अलग-अलग रास्तों से लमडल झील तक पहुंच सकते हैं.... 
पहला रास्ता... धर्मशाला -तरूंड,  दूसरा रास्ता .... गेरा -बग्गा, 
तीसरा रास्ता....करेरी, और चौथा रास्ता  - सल्ली गांव से............और वह सज्जन बोले,  सब से आसान रास्ता "सल्ली" गांव वाला हैं और मैं इसी रास्ते से लमडल गया था....... 
                             उन बुजुर्ग सज्जन की बातों ने मेरे अंधेरे रास्ता में प्रकाश कर दिया था.... और उसी प्रकाश में हम दोनों चल दिए, धर्मशाला से करेरी गांव की ओर............ 
...............................(क्रमश:)
मुबारक पुर (हिमाचल प्रदेश) से आगे नवरात्रों के उपलक्ष्य में चल रहे कई सारे लंगरों में से एक.... गुरुहर सराय (पंजाब) वालों का लंगर,  जिसकी सजावट एक पंजाबी ढाबे की तर्ज पर की गई हुई थी.... 
सुबोध जी और उनके एक मित्र,  जो हमे झलेड़ा गांव(हिमाचल प्रदेश) में सड़क किनारे सैर करते हुए मिले.... यह एक आनंदमय पल था, उनसे इस प्रकार पहली बार मिलना..... क्योंकि हम दोनों एक दूसरे को सिर्फ फेसबुक के माध्यम से ही जानते हैं....
4000साल पुराने "नगरकोट दुर्ग" यानि कांगड़े का किला,  जिस की दीवारें अपना हजारों साल का इतिहास बयान करती है.... बशर्ते उस इतिहास को सुनने वाला चाहिए.... 


पठानकोट से जोगिंधरनगर जाती खिलौना गाड़ी का पुल..... जो कांगड़ा में स्थित है.... 

धर्मशाला शहर से पहले एक गांव के चौक पर लगा..... "मजनू" का यह खूबसूरत सा पेड़..... 

प्रथम दर्शन...... हिमालय की धौलाधार पर्वत माला का,  जो कांगड़े के बाद दिखना शुरू हो गया.... और मुझे यह दृश्य बहुत उत्साहित व आनंदित कर रहा था...

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भाग-1 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.... LamDal yatra via Gaj pass (4470mt)

भाग-1   पैदल यात्रा लमडल झील वाय गजपास (4470मीटर)
                         मित्रों, जय हिंद......... लो, मैं फिर से आ गया हूँ..... अपनी एक और साहसिक व रोमांचक यात्रा की चित्र-कथा ले कर......... और मेरा दावा हैं, जिन्होनें ने भी मेरी इस धारावाहिक चित्र-कथा की एक किस्त पढ़ ली, वह अगली किस्त का इंतजार जरूर करेंगे, जी................
                          दोस्तों, इस बार की धारावाहिक चित्र-कथा....... 24अगस्त 2015 को शुरू की, मेरी "लमडल पदयात्रा "(हिमाचल प्रदेश) से हैं.....लमडल झील( समुद्र तट से 3900मीटर ) हिमालय की इक्कीस पहाडों वाली बाहरी पर्वतश्रृंखला "धौलाधार" में सबसे बड़ी और लम्बी...... भगवान शिव जी की पवित्र एक झील हैं, जिस तक मैं एक कठिन तथा दुर्गम रास्ते, गज पास(4470मीटर) नामक ग्लेशियर पहाड को पार कर पहुंचा........
                          दोस्तों, जैसा कि आप मे से बहुत मित्र जानते हैं कि, मेरी ट्रैकिंग यात्राओं में मेरे साथी, मेरे साढूं साहिब   विशाल रतन जी हमेशा साथ होते हैं..... परन्तु इस बार परिस्थितियां मेरा साथ नहीं दे रही थी, बदकिस्मती से विशाल रतन जी इस ट्रैक पर मेरा साथ देने में असमर्थ थे, जबकि मैं इस ट्रैक पर जाने के लिए आतुर था और चाहता था, कि वे मेरे साथ चले.... परन्तु वे अपनी नई बदली हुई नौकरी की कार्य व्यवस्था की वजह से मेरे साथ नही जा पा रहे थे, तो मेरा हौसला कुछ-कुछ टूट सा रहा था, क्योंकि ट्रैकिंग के मामले में दोनों में बहुत तालमेल हैं........
                           और अब मैं अकेला ही रह गया था, परन्तु मैं जाना चाहता था..... क्योंकि अकेले होने की वजह से एक अजीब सा डर मेरे अंदर पैदा हो गया था........ फेसबुक पर रोज आ रहे पहाडों के चित्र, जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूँ..... मुझे अब डरा रहे थे और मेरा हौसला व मेरा अात्मविश्वास कमजोर हो रहा था, मेरे भीतर ही मेरा खुद से ही युद्ध चल रहा था..... "आत्मविश्वास और डर के बीच" ........और मैं हारना नहीं चाहता था, सो अकेले जाने का फैसला कर लिया, परन्तु मेरे घरवालें मुझे वहां अकेले नहीं जाने दे रहे थे, बहुत कोशिश की....... कोई और साथी मिल जाए, परन्तु निराशा ही हाथ लगी........
                            अंतत: मेरा बीस वर्षीय भाई ऋषभ नारदा मेरे  साथ चलने के लिए तैयार हो गया और घर वालों को भी संतोष हुआ कि चलो, दो भाई साथ जा रहे हैं, मेरे पास बस मेरे योग्य ही ट्रैकिंग सम्बन्धी गेयर या उपकरण थे, सो ऋषभ के लिए स्थानीय बाजार से कुछ ट्रैकिंग जुगाडूं सामान खरीदा...........
                             आखिर 24अगस्त 2015सुबह साढे चार बजे गाडी ले कर हम दोनों लमडल के लिए रवाना हो गए, परन्तु मुझे लमडल तक जाने का सही रास्ता मालूम नहीं था, बस इंटरनेट से एक चित्र लिया था, जिस पर ट्रैक का नक्शा बना था, जोकि धर्मशाला(हिमाचल प्रदेश) से आगे तरूड हो कर लमडल झील तक जाता था.......... और मुझे यह भी पता था कि एक और रास्ता धर्मशाला से करेरी गांव.... से भी शुरू हो कर करेरी झील से होते हुए, लमडल झील के लिए जाता हैं .............. जमी हुई करेरी झील तक पहुंचने की नाकामयाब कोशिश मैं और विशाल रतन जी 31दिसम्बर 2012 को कर चुके थे....... सो करेरी झील तक के ट्रैक की थोड़ी जानकारी होने से करेरी गांव तक पहुंचने का निश्चय कर चल दिए................
                                   ................... (क्रमश:)
गज पास(4470मीटर).....एक सीधी दीवार 

गूगल मैप से प्राप्त.... लमडल झील (3900मीटर) का चित्र, यह झील धौलाधार पर्वतमाला की सबसे बड़ी व लम्बी झील है.... 

भगवान शिव की पवित्र झील,  लमडल झील (3900मीटर) की दोनों ऋतुओं की तस्वीरें...

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