रविवार, 21 मई 2017

भाग-5 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-5  श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                                     " एक निर्दोष सांप "

                          पिछली किश्त में मैने आपको बताया था कि,  20जुलाई 2016 को जांओं गाँव से श्री खंड महादेव पदयात्रा शुरू करने के कुछ समय बाद रास्ते में हमे एक स्थानीय लड़का "आशु" मिला.... वह सिंहगाड गाँव में यात्रा के प्रथम पड़ाव पर श्री खंड सेवा दल लंगर के सामने लगाई अपनी दुकान पर जा रहा था... और मैने अपने कदम आशु के संग मिलने शुरू कर दिये....और उस पर अपने सवालों का भार देने लगा,  कि उस घाटी,  नदी,  पर्वत,  गाँव,  पेड़,  पौधों के क्या-क्या नाम है,  और मुझे संतोषजनक उत्तर भी मिलते रहे......
                 फिर अाशु ने बताया कि यहीं अगले मोड़ से ही श्री खंड महादेव शिला के दर्शन भी हो जाते हैं,  जो जहाँ से 35किलोमीटर की दूरी पर है.... परन्तु मौसम साफ नही है,  शायद ही आपको उस अगले मोड़ से श्री खंड महादेव के दर्शन हो सके...... ठीक वैसे ही हुआ, मौसम हमारे हक में नही था.....
                 सामने से एक साधु बाबा आ रहे थे,  जो नंगे पैर थे... मैने उनके नंगे पैर देख कहा, " बम-बम भोले... बाबा नंगे पैर ही मिल आए क्या भोलेनाथ से...! "     उन्होंनें गर्व से कहा, " हाँ, मैं नंगे पैर ही गया था श्री खंड...!! "
उन बाबा के जाते ही मैने विशाल रतन जी से प्रश्न पूछा, " जैसे ये साधु बाबा नंगे पैर 72किलोमीटर लम्बी कठिन व पथरीली डगर पर चल कर अपने ईष्ट से मिल आये.... मैं इसका निंदक नही प्रशंसक हूँ,  परन्तु यह कहाँ तक उचित है या किस पौराणिक ग्रंथ में यह लिखा है कि,  भगवान अपने भक्त से चाहते है कि वह मेरे पास अपने शरीर को यातना देते हुए आये....!!! "
                   विशाल जी बोले, "भगवान की राह पर कोई भी अवस्था चाहे वो नंगे पैर, घुटनों के बल,  दण्डवत लेट कर या नाच-गा कर.......प्रतिक्रियाएँ भक्त के सच्चेपन व विश्वास को दर्शाती है,  और भक्त को एक ऐसी अलौकिक स्थिति में ले जाती है.. जहाँ पहुंच वह अपने होश व अस्तित्व को ही भुला देता है और अपनी अंतरात्मा संग एक हो जाता है,  उस अंतरात्मा संग जो सांसारिक गुलामी की ज़ंज़ीरों में जकडी हुई है,  यह कष्ट-क्रम उसकी आत्मा की शुद्धिकरण करते हैं.. उसके अर्तमन व आत्मा पर पड़े 'भार' को हल्का करते हैं........!!!"
                     विशाल जी का जवाब सुन मैने कहा, "आध्यात्मिकता से देखे तो आपकी कही इस बात का असर मेरे दिलो-दिमाग पर गहराई से छा रहा है,  कि शारीरिक श्रम व कष्ट से आत्मा को पवित्र करने की कोशिश द्वारा परमात्मा की अनुभूति पाना... परन्तु इस अलौकिक अवस्था या नज़ारे को वही देख व महसूस कर सकता है,  जो यह श्रम या अभ्यास कर रहा है...हम साधारण जन तो बस इस कर्म में मात्र तमाशबीन ही साबित होते है,  मेरा मत यह भी है कि कष्टकारी अवस्था में तीर्थ करना,  परिणाम है... कि उस भक्त को जीवन में क्या चोट लगी,  कि उसके आराध्य ने उसे उस चोट से उबारा हो..यह आस्था,  समर्पण,  शुक्राना व हठ का विषय है.. यह एक अनथक लगन की अद्भुत अनुभूति है,  जिसे वह ही पा रहा है, हम नही.... मुझे इन सब में विशाल जी,  एक बात ही बेहद अच्छी लगती है...वह है भक्त की देवता या देवी के प्रति आस्था की कोमल भावनाएँ,  कि सौ प्रतिशत भक्त अपने आराध्य के लिए समर्पित है.. और कोई भी ऐसा विषय इस संसार में नही है,  जिसमें मनुष्य अपना सौ प्रतिशत समर्पण दे..बस इस भावना की मैं कदर करता हूँ.....!!! "
                    हमारी यह वार्ता हमारा हमराही आशु बहुत ध्यान से सुन रहा था... और तभी सामने से एक तीर्थयात्री वापिस उतर रहे थे, जिन के हाथों में धातु का बना एक बहुत बड़ा दण्ड था... जिसके ऊपरी छोर पर घुघँरू बांध रखे थे और उस घुँघरू से बंधे दण्ड को हिला-हिला कर शिव के जयकारे लगा रहे थे... मैने उनको रोक कर पूछा कि जनाब यह आपने क्या उठा रखा है,  तो उन्होंने बताया कि, " यह शौगी गाँव के हनुमान मंदिर का झंडा है,  इसे श्री खंड माथा टिका कर ला रहा हूँ"..... इस यात्रा पर चलते हुए अभी पहला ही घण्टा चल रहा था,  इतने कम समय में ही हमे राह में मिलने वाले व्यक्तियों से की हुई छोटी सी मुलाकातें भी महत्वपूर्ण लग रही थी,  क्योंकि यही तो यात्राओं का असली आनंद होता है,  कि आपको पता नही कौन आपसे मिलने वाला है... जिंदगी और यात्रा की राह में पहली बार ही मिला कोई अजनबी आपको तमाम उमर याद रहता है और उस अजनबी को आप......!!
                    आशु से मेरी बातचीत निरंतर चल रही थी..... वडिगचा गाँव के बाद हम वाचा गाँव तक पहुंच चुके थे और इन गांवों के खेतों में राजमाँह, सब्जियां और मक्की की फसल लहलहा रही थी... वाचा गाँव में पगडंडी किनारे काफी मात्रा में लगी एक जानी-पहचानी सी फसल को देख मैने आशु से उस फसल का नाम पूछा,  तो उसने कहा कि इसे विथू बूटी करते हैं और यह बहुत कीमती है.... उस समय तो मैने अपने दिमाग पर बहुत जोर दिया कि, इस फसल को हमारे पंजाब में क्या कहा जाता है.. पर मुझे याद नही आ रहा था,  मतलब यह है कि बढ़ रही समुद्र तट से ऊँचाई  का असर कहीं ना कहीं मेरी यादाश्त पर होने लगा था... दो दिन बाद याद आया कि वो विथू बूटी "ग्वार फली" थी,  जिसके बीज काफी मंहगें होते हैं.......
                     तभी एक छोटा सा बालक अपनी माँ और दादी के आगे भागता हुआ सीढ़ियाँ उतर रहा था... और फोटो खींचने के लिए अपनी तरफ तन चुकी मेरी बांह को देख,  जाने क्यों वो सहम सा गया... उसके माथे पर लगा त्रिशूली टीका और सहम कर मुंह में डाली अंगुलियाँ उस बालक की मासुमियत पर चार चांद लगा रही थी.... यात्रा में हर पल बदलती दृश्यावली और राह में मिल रहे लोग जाने क्यूँ अपने से लग रहे थे......
                       मैं कभी उस बूढ़ी अम्मा का चित्र खींच रहा था, जो उमर के उस पड़ाव पर भी घरेलू जिम्मेवारी में पूरी शिद्दत से अपना योगदान दे रही थी,  उसकी पीठ पर ढेर सारा हरा चारा लदा था..... और कभी गाँव की गलियों में बुजुर्ग को रोक उन संग आज्ञा ले खुद चित्र खिंचवाता......
                        वाचा गाँव में छोटे से पक्के बने रास्ते पर से गुज़रते हुए एकाएक सामने खड़े गाँव के दो-तीन  बुजुर्ग हमें आवाजें दे कर अपने पास बुलाने लगे.... "सांप-सांप, जल्दी आओं... सांप...! "
                          उनके पास पहुंचतें ही उन्होंने कहा,  " तुम लोग जवान हो,  जल्दी से डंडा ले...इस सांप मार दो,  जो इस घर के आँगन में घूम रहा है..... आशु ने झट से ना में सिर हिला दिया, उस घर का आँगन जिसमें सांप इधर-उधर मारा-मारा घूम रहा था,  उस रास्ते के बायें तरफ नीचे की ओर था...... और हम सब उसे कुछ ऊंची जगह पर खड़े देख रहे थे...
                              "सांप-सांप,  मारो-मारो" की आवाजें सुन उस घर के अंदर से एक लड़की भी बाहर आ गई.... और वह सांप रेंगता हुआ,  घर की एक तरफ बने हुए स्नानघर की ओर,  उस दीवार के साथ-साथ रेंगने लगा... जिस पर हम सब खड़े थे,  और मैने झट से ठान लिया कि,  मैं इस " निर्दोष सांप " की यूँ ही जल्दबाजी में इन लोगों के हाथों हत्या नही होने दूँगा.... और वहीं दीवार पर खड़ा हो अपनी ट्रैकिंग स्टिक की मदद से उस सांप का रुख मोड़ने लगा....परन्तु उसी समय सांप ने अपना रुख बदल.... आँगन में खड़ी उस लड़की की तरफ कर लिया,  और उस लड़की ने मुझे ऐसे घूर कर देखा... जैसे सारा ही दोष मेरा है और मुझे "ओए" सम्बोधन कर जोर-जोर से चीखने लगी, "ओए,  ये क्या कर रहा है तू....!! "
                           और,  मैं उसी क्षण उस दीवार से छलाँग लगा,  सांप और लड़की के मध्य खड़ा हो गया... और अपनी ट्रैकिंग स्टिक की मदद से उस सांप को घर के आँगन से बाहर खेतों की तरफ उछाल दिया.......
                           यह सब घटना-क्रम केवल दस-बीस क्षणों के भीतर ही घट गया,  नीचे आँगन में खड़े-खड़े  मैने विशाल जी की तरफ देखा,  तो वह सुन्न से खड़े मुझे देख रहे थे.... मैने कहा कि,  मेरी कोई फोटो भी खींची क्या आपने... तो उन्होंने कहा कि,  सब कुछ इतनी जल्दी हो गया... मुझे कुछ सुझा ही नही...!!
                            ऊपर रास्ते पर वापस आ,  मैने विशाल जी से तर्क दे कहा, " विशाल जी,  हम भगवान शिव की यात्रा पर जा रहे हैं और उनके संगी सांप का कैसे वध करने देता, मैं.....!!! "

                                             .....................................(क्रमश:)
हमारा हमराही........आशु

हां, मैं नंगे पैर ही गया था..... श्री खंड 

 शौगी गाँव के हनुमान मंदिर के झंडे का माथा टिका कर वापस आ रहा हूँ..... 

कुरपन नदी के साथ-साथ... 

देखो मित्रों....इस हसीन वादी में,  वडिगचा गाँव के कुछ घर.... 

सेब, सब्जियां और राजमाँह की खेती.... 

विथू बूटी...... जिसे हम पंजाब में ग्वारा या ग्वार फली कहते हैं....

वाचा गाँव की ओर..... 

एकाएक अपनी ओर.....फोटो खींचने के लिए उठी मेरी बांह को देख कर घबरा से गए थे,  ये जनाब.. 

उमर के इस पड़ाव पर भी घरेलू जिम्मेवारी के निर्वाह में बूढ़ी अम्मा..... 

यात्रा में प्रसन्नता के भाव..... जब आप अनजान लोगों संग फोटो खिंचवानें लगते हैं... 

निर्दोष सांप......भगवान शिव की यात्रा पर जाते हुए,  मैं शिव के संगी सांप की हत्या कैसे करने देता.... दोस्तों 
           

                   
              

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