शनिवार, 11 मार्च 2017

ताजमहल देखने जब आगरा जाऐ, तो बादशाह अकबर का मक़बरा "सिकन्दरा " जरूर देखें..

"सिकन्दरा".......बादशाह अकबर का मक़बरा (आगरा)
                     
             जलालुदीन मुहम्मद अकबर (1542-1605)मध्यकालीन भारतीय इतिहास में वो बादशाह थे, जिन्होंने सन् 1556-1605 तक राज किया...... तथा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की,  जो कि काबुल से आसाम व कश्मीर से अहमदनगर तक फैला हुआ।  उन्होंने युद्धरत राजपूत राजाओं को मुगल छत्र के नीचे एकत्रित किया और खुद भी विशुद्ध देसी बन देश को एक सी सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा प्रशासनीय व्यवस्था के अन्तर्गत जोड़ दिया।
              बादशाह अकबर ने अपने जीते-जी ही अपने मक़बरे का निर्माण शुरू करवा दिया,  परन्तु मक़बरा निर्माण सन् 1605 में शुरू होते ही अकबर की मृत्यु हो गई, तो उनके बेटे बादशाह जहाँगीर ने इस मक़बरे के निर्माण को चालू रख. सन् 1612 में सम्पूर्ण किया।
              बादशाह अकबर की एक अग्रणीय सोच थी, कि उनके पूरे परिवार का एक ही सामूहिक मक़बरा बने....... जो भी पारिवारिक सदस्य मृत्यु को प्राप्त हो, वह इस मक़बरे में दफन होता जाए........और अाने वाली पीढ़ी मक़बरों के बेशुमार खर्च से बच सके।
               इसलिए अपनी राजधानी आगरा में ही अकबर ने एक बहुत बड़ी जगह (119एकड़)जो कि सन् 1488-1517 तक हिन्दुस्तान के बादशाह रहे सिकन्दर लोदी द्वारा बनाए हुए ....एक बहुत खूबसूरत बाग "सिकन्दरा" में इस मक़बरे का निर्माण आरम्भ किया।  यह मक़बरा पांच मंजिला बना हुआ है और इसके भीतरी या मध्य, एक सादे से मुख्य कक्ष में बादशाह अकबर की सफेद संगमरमर की बनी हुई सादी सी कब्र है।  जब कि इस कक्ष के अलावा सारा ही मक़बरा बेहद सुन्दर व महीन नक्काशी से भरा पड़ा है। कब्र कक्ष की छत की ऊँचाई कोई 70फुट के करीब होने के कारण,  अंदर बोला एक-एक शब्द अपनी गूंज सुनाता है...... और इस मुख्य कक्ष के चारो तरफ कई सारे कक्ष और बनाए गए हैं।
                 इन बाहरी कक्षों की विशेषता यह है कि इन के फर्श खोखले रखे गए है,  ताकि जो भी पारिवारिक सदस्य काल का ग्रास बने... तो उसकी मृत देह को एक कक्ष प्राप्त हो,  परन्तु एेसा हो ना सका। बादशाह अकबर के सिर्फ तीन वंशज ही इस मक़बरे में दफन हैं...... जिन में अकबर की दो पुत्रियां, सकरूल निशा बेगम और अराम बानो बेगम तथा तीसरी कब्र हैं जहाँगीर के एक कम उमर पुत्र की है।
                 मेरे गाइड द्वारा जब यह बात बताई गई कि अकबर की एक पुत्री ईरान देश में विवाहित थी.... की मृत देह को ईरान से आगरा ला कर दफन किया गया, यह बात सुन मैं हैरत में पड़ गया और बोला, " क्यों मजाक कर रहे हो भाई.... कहाँ ईरान और कहाँ आगरा की दूरी और वो भी उस पुराने समय में....!!!"
                गाइड हंसा और बोला, " दूरीयां तो हम साधारण लोगों के लिए होती हैं जनाब,  वह तो राजे-महाराजे थे, जैसे आज हमारे देश के राजे यानि सरकार के लोग, नाश्ता तो दिल्ली में करते हैं और रात्रिभोज सात समुद्र पार किसी और देश में.....!!!!!"
बादशाह अकबर के मक़बरे में सोने-चांदी से की शानदार नक्काशी और स्वर्ण अक्षरों से लिखी कुरान की आएतें।
                बादशाह अकबर के अंतिम विश्राम कक्ष को छोड़ सारे मक़बरे में सोने, चांदी और रत्नों के साथ मीनाकारी की गई थी,  जो कि समय-समय पर लूट की बलि चढ़ते गए। मुगल साम्राज्य के अन्त के बाद ....एक जाट राजा
बादशाह अकबर की दोनों पुत्रियाँ... सकरुल निशा बेगम और अराम बानो बेगम की कब्रें। 
राम जाट मुगलों के प्रति अपना भयंकर गुस्सा को इस मक़बरे पर निकाला।
इस चित्र में, मैं आपको दिखाना चाहता हूँ... कि सिर्फ पहले कक्ष को नक्काशीदार ज़ालियों से बंद किया गया है,  क्योंकि इस कक्ष में बादशाह अकबर की दोनों पुत्रियाँ दफन है... और बाकी बने बेशुमार कक्ष खाली ही पड़े रह गए।
                    उसने मक़बरे के भीतर भूसा भर कर उसे आग लगा दी.... और दीवारों और छतों पर लगा सोना-चांदी पिघला कर इकटठा किया।  खजाने के लालच में अकबर की कब्र को भी तोड़ा और आग लगाई,  इससे मक़बरे में भारी क्षति हुई।
                    फिर बाद में अंग्रेजी हुकूमत के लार्ड करज़न ने इस मकब़रे की मुरम्मत करवाई, शायद यही बजह हैं कि भीतरी कक्ष इतना सादा है।
बादशाह अकबर की सफेद संगमरमर से बनी कब्र.... सिकन्दरा। 
सिकन्दरा के मुख्य द्वार और मकबरे के मार्ग का मध्य भाग... पूरा रास्ता कई सौ मीटर लम्बा है, और इसमें बहुत खूबसूरत पानी के फव्वारें लगे हुए हैं।
                   मक़बरे में हर तरफ बहुत बढ़िया मुगलिया वास्तुकला देखने को मिलती है, जैसे गलियारो की बात करें तो....जब आप उस की एक दीवार के कोने की तरफ मुंह कर धीरे से कुछ फुसफुसाते हो, तो वह सब सामने के दीवार के कोने पर कान लगा कर खड़े व्यक्ति को सुनाई देता है, जबकि कमरे में खड़े किसी भी व्यक्ति को सुनाई नही देता।
                   मकबरे के विशाल बाग  में खुले आज़ाद घूम रहे हिरण बाग की सुन्दरता को चार चांद लगा देते हैं। सिकन्दरा बाग में दाखिल होने से पहले सिकन्दर लोदी द्वारा निर्मित एक दोमंजिला  मक़बरा भी बना हुआ है,  जिस पर यह स्पष्ट नही है कि अंदर स्थित दो कब्रें किस दंपत्ति की है।
सिकन्दरा... बादशाह अकबर का पांच मंजिला मक़बरा।
                 पूरे का पूरा सिकन्दरा  मुगलों द्वारा निर्मित प्रमुख इमारतो में से एक सुन्दरतम इमारत हैं..... मैं दो बार इसे देख चुका हूँ और सच कहता हूँ कि मुझे यह ताजमहल से भी ज्यादा पसंद है।
सिकन्दरा आगरा... का मुख्य द्वार, जिसकी वास्तुकला हैदराबाद के चार मीनार से प्रेरित लगती है। 
सिकन्दर लोदी द्वारा निर्मित "लोदी मक़बरा ".....जो कि सिकन्दरा बाग में एक तरफ बना हुआ है।
इस चित्र में देखें...  मुख्य द्वार के आगे एक छोटा द्वार....इस द्वार को ऐसा इसलिए बनाया गया,  कि जब कोई भी व्यक्ति इन सीढ़ियों से ऊपर चढ़ कर द्वार से निकले,  तो क़ुदरती रुप में उसका सिर बादशाह अकबर के सम्मान में खुद ब खुद झुक जाए.... और इस द्वार की सीधी रेखा में ही बादशाह अकबर की कब्र है,  और बादशाह अकबर की कब्र के पीछे खड़े हो.. यदि आप कब्र कक्ष के द्वार की तरफ देखें तो,  उस द्वार के बीच कई सौ मीटर दूर यही पहला छोटा सा द्वार ही नज़र आता है.... भवन वास्तुकला की शानदार उदाहरण है... यह साधारण सा दिखने वाला छोटा सा द्वार।
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    (1) "श्री खंड महादेव कैलाश की ओर ".... यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(2) " पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास "...यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(3) "चलो, चलते हैं सर्दियों में खीरगंगा ".....यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।

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