शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

भाग-5 "मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से....!" (Manimahesh via kalah pass)

भाग-5 "मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से....!"

इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र
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                              "रब्ब दी पींग" 

           16अगस्त 2014.....सेबों के बगीचों से भरे "कलाह गाँव" से पगडंडी हमें चढ़ाई चढ़ा रही थी। गाँव से ज़रा सा ही ऊपर हुए तो पगडंडी के बीच एक पेड़ से गिरे हुए पके फल बिखरे पड़े थे। देखने में वह फल बहुत खूबसूरत जान पड़ते थे। मैंने डरते-डरते जमीन से दो फल उठाये और विशाल जी की तरफ पेश करता हुआ बोला- "लगता है यह फल खाने योग्य है।"  विशाल जी ने भी चलते हुए एक फल उठा चखा और दूसरा फल मैंने खा लिया।
                      वह फल "खुरमानी" था..... और यह था खुरमानी से हमारा पहला साक्षात्कार, दोस्तों।
                     अब जब भी गर्मियों की छुट्टियों में, मैं सपरिवार हिमाचल का रुख करता हूँ तो शिमला के आगे किन्नौर क्षेत्र में सड़क किनारे लगे ढेरों खुरमानी के पेड़ों पर पत्ते कम तो खुरमानियाँ ज्यादा लगी होती हैं,  फिर क्या मैं खूब सारी मुफ्त की खुरमानियाँ इकट्ठी कर शौक से खाता हूँ और परिवार वालों को भी खिलाता हूँ। वैसे वहाँ के स्थानीय लोग इन खुरमानियों को इकट्ठा कर इसे धूप में सुखाकर इसके बीजों का तेल निकालते हैं, जिसे खाने में प्रयोग किया जाता है।
                     कलाह गाँव से करीब-करीब एक घंटा हो चला था हमें चले हुए,  रास्ता तो बस चढ़ता ही जा रहा था। नए पनपे मुझ पर्वतारोही के मन में यह ख्याल बार-बार आ रहा था कि 'क्यों और क्या पंगा' ले लिया तूने विकास, क्यों खामखा ज़िद कर बैठा... ले अब भुगत, चढ़ चढ़ाईयां अब, चढ़ चढ़ाईयां...!!!
                     पर मैंने अपनी परिस्थिति विशाल जी के समक्ष उजागर नहीं होने दी और विशाल जी ने भी अपने शारीरिक व्यथा मेरे सामने प्रकट नहीं होने दी,  भाई हम दोनों नए पनपे पर्वतारोही जो ठहरे... कौन किसी से कम कैसे..!!!!
                    रास्ते किनारे अब एक गुफा आई, जिसमें जाने के लिए एक लोहे की सीढ़ि भी लगी हुई थी। उस गुफा में "पौणाहारी बाबा बालक नाथ"  का स्थान बनाया गया है,  परंतु हम उस गुफा को बाहर से ही देख आगे बढ़ते हुए.... पत्थर पर पत्थर टिका कर बनाई हुई सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे कि पीछे से तीन नवयुवक धड़ाधड़ उन सीधी खड़ी सीढ़ियों को चढ़ते हुए हमारे पास से गुज़रने लगे। देखने और उनके चलने की रफ्तार से पता चल चुका था कि वे स्थानीय हैं, पूछने पर उन सब ने अपना गाँव होली के आसपास के किसी गाँव को बताया। शिव भोले के जयकारे के साथ वे हम से आगे निकल गए और हम दोनों का ऐसा हाल था जैसे चींटी चली पहाड़ चढ़ने...! 
                       त्यारी से पदयात्रा शुरू करने के बाद हमने किसी से भी रास्ता नहीं पूछा था क्योंकि रास्ता पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ रही थी। रास्ता खुद हमें रास्ता दिखा रहा था, मतलब कुछ-कुछ दूरी पर रास्ते-किनारे के पत्थरों को चूने से रंग कर सफेद किया हुआ था। यह सफेदी हर साल जेल-खड्ड में लंगर लगाने वाले बाबा जी लगाते हैं और रास्ते की देखभाल जंगलात विभाग के ज़िम्मे है।
                      मैं बार-बार पीछे मुड़कर नीचे रह गए कलाह गाँव को अपने से दूर जाते देख लेता।  गहरी हो चुकी घाटी में जेल-खड्ड नाले के बहने की आवाज़ ही अब केवल सुनाई देने लगी थी। हां, सामने के पहाड़ पर एक जलप्रपात बहुत ऊँचाई से नीचे कहाँ गिर रहा था, यह देखने के लिए तो घाटी में उतरना पड़ेगा....परंतु यहाँ तो यह चढ़ाई ही खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।
                     एक मोड़ मुड़े तो आगे का दृश्य देख हमारी आँखें चंद क्षणों के लिए झपकना ही भूल गई।

               " क्यों, क्या देख लिया इन आँखों ने....?"
 इन आँखों ने वो नज़ारा जीवन में पहली बार और अब तक भी आखिरी बार ही देखा है कि घाटी के बिल्कुल बीच एक पर्वत से दूसरे पर्वत तक "इंद्रधनुष" का सेतु बना हुआ है।  मेरे मुख से अकस्मात निकला- "वाह री क़ुदरत,  हम मनुष्यों की बस्तियों से दूर तू इन पहाड़ों में खेल रही है..... मुझे भी अपने संग खेला ले ना...!!"
                   विशाल जी बोले- "हां विकास जी, मैं भी खेलना चाहता हूँ इस क़ुदरत में, क़ुदरत के साथ...!!!"
 अब हम दोनों अट्टहास लगा हंस रहे हैं और फिर मैं विशाल जी को अपनी बचपन की याद सुनाता हूँ कि जब भी बरसात के महीने में बारिश होने के बाद शाम को धूप निकल आती, तो मैं भाग कर अपने कोठे (छत) पर चढ़ जाता,  "रब्ब दी पींग"  (इंद्रधनुष) देखने के लिए।
                     कलाह गाँव से चलते हुए हमें एक घंटा हो चुका था। हम से आगे निकल कर गए वो तीन युवक रास्ते किनारे आई वर्षा-शालिका में बैठे आराम कर रहे थे कि हम भी वहाँ जा पहुँचे। चंद मिनट वहीं बैठ अब हम सब इकट्ठे चल पड़े पगडंडी पर। वो तीनों डोगरी भाषा में शिव-भोले के भजन-भेटें गाते हुए चढ़ रहे थे और हम दोनों साढूँओं की रक्सैकों पर बंधी घंटियाँ हिल-हिल कर उनके भजनों के साथ संगीत दे रही थी।  परंतु हम दोनों उन तीनों का ज्यादा दूर तक पीछा नहीं कर पाए, धीरे-धीरे हमारा और उनके बीच का फासला चौड़ा होता जा रहा था। फिर से हम दोनों ही उस वीरान पगडंडी पर अपनी घंटियां बजाते हुए बढ़ते जा रहे थे।
                     हम अब उस ऊँचाई पर जा पहुँचे थे, जहाँ से सामने "कुज्जा पर्वत" पूर्णतः दिखाई पड़ने लगा था। सामने दिख रही नंगे पर्वतों की दीवार पर पड़ी कुछ बर्फ को देख मन मचल रहा था कि क्या हम इस बर्फ को छूँ पाएंगे।
                     शाम के पाँच बज रहे थे, रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति मिला जिसने अपनी पीठ पर सूखी लकड़ियों से भरी एक बोरी बांध रखी थी। वह व्यक्ति हमारी खुशी देख हैरान हो रहा था....अरे भाई उस वीरान पगडंडी पर उन जनाब का मिलना हमारे लिए खुशी की ही तो बात हो सकती थी, है कि नहीं।
                      दो-चार बातें और रास्ते के बारे में पूछ कर हम आगे बढ़ लिये। उस व्यक्ति के बताये अनुसार कोई बीस मिनट चलने के बाद एक ऊँचे से सीधे खड़े दीवार नुमा पहाड़ के नीचे से पगडंडी हमें आगे ले जा रही थी। उस व्यक्ति ने उस जगह को "बखोली कुड" नाम से सम्बोधित किया था। इस दीवार नुमा पर्वत के नीचे बहुत बड़ा कुड यानि प्राकृतिक वर्षा-शालिका बनी हुई थी, जिसके नीचे भेड़-बकरी वाले रात में अपना डेरा जमाते होगें। उस राहगीर ने हमें यह भी कहा था कि जेल-खड्ड से पहले "धरम्बड गोठ"  नामक भी जगह आयेगी, वहाँ जंगलात कर्मचारियों द्वारा भी मणिमहेश यात्रियों के लिए छोटा सा लंगर लगाया गया है।
                       चलते-चढ़ते एक घंटा और बीत गया, कभी पगडंडी इतने घने जंगल से हमें ले जाती कि जैसे लगता एक दम से अंधेरा हो गया हो...परन्तु फिर उस जंगल से बाहर निकाल हमें सुख की साँस दे जाती कि अभी तो सूर्यास्त भी नहीं हुआ है।
                       हमने फिर उन तीनों युवकों को जा घेरा, जो हमसे बहुत आगे जा निकले थे। अब हमें उनकी तेज़ रफ्तार का राज मालूम हो चुका था.... वो तीनों ही "भांग की बूटी"  को अपने हाथों से मलते हुए 'बम-बोल' के जयकारे लगा रहे थे। उन्हें यह कृत्य करते देख मन एकदम से परेशान हो उठा कि नशा हमारी युवा पीढ़ी को गर्क में ले जा रहा है। अब हम उनके पास ठहरते नहीं है, आगे बढ़ जाते हैं।
                       दस मिनट चलते रहने के बाद घाटी ने एक खुला सा रूप ले लिया, जिसमें बहुत बड़ी "घासणी" (बुग्याल) थी। उस घासणी में पगडंडी के किनारे एक पक्की शैड़ देख हमने अंदाजा लगा लिया कि "घरम्बड गोठ"  आ गया है। पीछे मुड़कर देखा तो दूर कलाह गाँव अब भी नज़र आ रहा था।
                        हम दोनों ही बुरी तरह से थक चुके थे। जैसे ही जंगलात विभाग द्वारा बनाई गई पक्की शैड के पास पहुँचे तो हम दोनों एकदम से उस शैड के अंदर जाकर लेट गए। परंतु मुझे लेटते ही भयंकर खांसी-हूत्थूँ छिड़ गया, जिससे साँस लेना भी दूभर हो गया। खांस-खांस कर मेरी आँखों से भी पानी निकल आया। दोस्तों, इस घटना के बाद मैं ट्रैकिंग के दौरान फिर कभी भी नहीं लेटा, यहाँ तक कि बैठता भी नहीं हूँ.....बस खड़े-खड़े या ट्रैकिंग स्टिक के सहारे थोड़ा झुक कर तेज़ चल रही ह्रदयगति और चढ़े हुये सांस को धीरे-धीरे संभालता हूँ।
                        अब हम दोनों साढूँओं ने अपना दुख एक-दूसरे से छिपाना बंद कर दिया था, क्योंकि हम दोनों ही अब एक समान दुखी जो थे....जेल-खड्ड अभी भी दूर है।  सात घंटे से हम नए पनपे पर्वतारोही लगातार चढ़ाई चढ़ते आ रहे थे, सो जंगलात विभाग में गार्ड के पद पर तैनात "राजकुमार जी" (जो वहाँ धरम्बड गोठ में हर साल न्यौण यात्रा के समय मणिमहेश पदयात्रियों के लिए छोटा सा लंगर लगाते हैं) से कहते हैं कि हम आज रात आपके पास ही रुक जाते हैं।  तब राजकुमार जी ने विनम्रता के साथ हमें जवाब दिया- "नहीं, हम लोगों के पास आप लोगों को रात रुकवाने का इंतजाम नहीं है...जेल-खड्ड पहुँचने में अब आपको ज्यादा से ज्यादा दो घंटे और लग सकते हैं, वहाँ लंगर आयोजक 'बाबा सुरजीत' जिनका आश्रम होली में है,  ने सब इंतजाम कर रखे हैं।"
                         खैर हमें राजकुमार जी और उनके एक और सहयोगी ने चाय के साथ ब्रेड परोसी। मेरे प्रश्न कभी भी थम नहीं सकते,  सो राजकुमार जी से पूछ बैठा कि वह सामने टेढ़ा पर्वत शिखर जो सुबह से हमारे आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, इसका क्या नाम है...?
                     "कुज्जा वज़ीर महाराज"  यह भगवान शिव का भांजा है....!
                     "क्या कहा आपने, भगवान शिव का भांजा वह कैसे.....?"
                      तब राजकुमार जी ने हमें इस टेढ़े पर्वत शिखर की दंतकथा सुनानी आरंभ की और हमारे पीछे दिख रही धौलाधार हिमालय की पर्वत श्रृंखला की ओर इशारा कर बोले कि वो सामने पहाड़ पर एक झील है, जिसे "क्यू डल" या "नाग डल" कहा जाता है... हमारे बुजुर्ग हमें बताते हैं कि भोलेनाथ शिव हर रोज मुँह-अंधेरे उस डल पर स्नान करने आते थे, तब जब आसपास के गाँवों के सब लोग सो रहे हो। परंतु उस बार आधी रात के समय.... रास्ते के एक गाँव में एक बुढ़िया को नींद नहीं आ रही थी, सो वह अपनी झोपड़ी से बाहर बैठ दीया जलाकर चरखा कातने लगी।
                         शिव जी के कानों में चरखा चलने से होने वाली "धूँ-धूँ" की आवाज़ जैसे ही पड़ी,  शिव चौंकने हो गए कि क्या मैं आज देरी से आया हूँ नहाने, जो लोग जाग गए....ऐसे तो लोग मुझे देख लेंगे, मुझे परेशान करेंगे, मेरा ठिकाना जानकर मेरी तपस्या में विघ्न डालेंगे... मुझे अपना ठिकाना बदल लेना चाहिए।
                       वे अपने वज़ीर जो उनका भांजा भी है "कुज्जा वज़ीर"  को आदेश देते हैं कि जाओ मेरे लिए कोई ऐसी नई जगह खोजो,  जहाँ कोई भी मुझे आसानी से प्राप्त ना कर पाए... मेरी शांति और तपस्या भंग ना कर पाए। कुज्जा वज़ीर ढूँढते-ढूँढते इसी कलाह घाटी में आ पहुँचे और उन्होंने पाया कि इस जगह पर कोई भी आदमी नहीं है व इस ऊँचे पर्वत से अच्छी जगह तो कोई और हो ही नहीं सकती। सो इस पर्वत को अपने मामा के लिए तैयार करने लगे। परंतु इस पर्वत क्षेत्र की सुंदरता देख कुज्जा वज़ीर का मन बेईमान हो गया और इस पर्वत पर उसने अपना निवास स्थान बना लिया। उधर भोलेनाथ अपने भांजे का इंतजार करने के बाद, आखिर उसे ढूँढते-ढूँढते यहाँ पहुँचे और सब सच्चाई देख उन्होंने गुस्से से पर्वत को लात मार टेढ़ा कर दिया। फिर यहीं से आगे निकल मणिमहेश कैलाश पर अपना डेरा जा जमाया। देखने में यह कुज्जा वज़ीर पर्वत मणिमहेश कैलाश पर्वत से ऊँचा जान पड़ता है, परंतु हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि नाप में यह मणिमहेश कैलाश से दस रत्ती बराबर छोटा है।
                        विशाल जी अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान हैं, उनके चेहरे पर यह कहानी सुनते हुए आये श्रद्धा के भाव को मैं पढ़ रहा था। जबकि मैं सिरे का नास्तिक हूँ, परंतु यह कथा सुन आनंद मुझे भी बहुत आया। मेरा दिमाग चाहे अंदर ही अंदर कितने ही तर्क-विचार देता रहे, परंतु मेरा मन इन पुरातन कथाओं को सुन हर्षित हो उठता है दोस्तों।
                      शाम के 7बजने को थे और फिर उन तीनों स्थानीय युवकों के साथ हम धरम्बड गोठ से आगे चल पड़े। थोड़े समय के बाद ही सूर्यदेव हमें छोड़कर धौलाधार पर्वत माला के पीछे जा छिपे और वे तीनों स्थानीय युवक सूटे के सरूर में हम से दुगनी चौड़ी "लांगे पट" (चौड़े-चौड़े कदम ले) पगडंडी से ओझल हो गए।
                        ऊपर से हो रहा अंधेरा, वीराने में गुज़र रही पगडंडी,  झींगरों का शोर, जेल-खड्ड नाले की गर्जना और हम दोनों नौसिखिये।
                        एक अजीब सा वहम, जेल-खड्ड तक पहुँचने का दबाव, बैटरी की रोशनी की परिधि से बाहर खड़ी काली हो चुकी झाड़ियाँ और सबसे बड़ा डर "भालू" का...... हमारा शरीर यह देख कर आपातकालीन प्रणाली में आ, अपने-आप को थका होने के बावजूद भी चौकन्ना कर लेता है...शरीर में एक रहस्यमय सी ऊर्जा जाग उठी। हम दोनों साढूँ रह-रहकर जोर-जोर से शिव- भोले के जयकारे लगाते जा रहे थे।
                         साढे आठ बज चुके थे, परंतु दूर-दूर तक फैला स्याह अंधेरा जता रहा था कि अभी भी जेल-खड्ड दूर है। रास्ता अब पत्थरों-चट्टानों का यार हो चला था।  पसीने से तरबतर हम दोनों बगैर कहीं भी रुके पगडंडी पर चलते जा रहे थे। अब एक-एक मिनट और वह रास्ता ऐसे लगने लगा था जैसे कट ही ना रहा हो।
 तभी सामने से पगडंडी पर एक प्रकाश गोला हमारी ओर आता क्या दिखाई दिया,  हम दोनों की बांछें खिल गई। चंद क्षणों में उस प्रकाश गोले का पीछा कर रहे दो युवकों ने हमारे पास आते ही शिव-भोले का जयकारा लगा पूछा- "क्या आप ही दिल्ली वाले हो...?"
                        जी हां का जवाब सुनते ही वे बोले-"आपसे पहले पहुँचे उन तीनों स्थानीय युवकों से बाबा सुरजीत जी ने पूछा कि पीछे और कितने बंदे आ रहे हैं, तब उन्होंने आपके बारे में बताया तो बाबा जी ने उन्हें बहुत फटकार लगाई कि रात का समय हो गया है और तुम लोग उन दोनों अनजान बाहरी व्यक्तियों को ऐसे ही जंगल में क्यों छोड़ आए, तुम लोगों को उन्हें अपने साथ ही लाना चाहिए था....तब बाबाजी ने हम दोनों को आप लोगों को लेने के लिए भेजा है।"
                         यह बात सुन हमारा खून आधा सेर और बढ़ गया, हमारी गर्दन व छाती शाम से तन गई कि हमें भी कोई लेने आया है।  आखिर आधा घंटा चलने के बाद हमें एक सीधे खड़े पहाड़ के नीचे जलती आग की कुछ रोशनी दिखाई दी और वहाँ पहुँचते ही देखा कि तरपालों से बनाये हुए तीन-चार तम्बू और उनके बाहर खड़े आठ-दस आदमी हमारी राह देख रहे थे। उनके पास पहुँचते ही बाबा सुरजीत जी ने हमें ले जाकर तम्बू के अंदर बिठाकर पानी पिलाया।
                          त्यारी गाँव में हम से लिफ्ट लेने वाले फार्मासिस्ट व उनका चपरासी भी उसी तम्बू में पहले से बैठे थे। हमें देख रहे वे फार्मासिस्ट बोले- "अच्छा तो आप लोग पहुँच ही गए,  मैंने तो सोचा था कि आप लोग त्यारी से ही वापस हो गए होंगे।"
                         मैंने हंसते हुए उनसे कहा-"सच बोलूँ तो आप को ही देख कर मैंने ज़िद पकड़ ली थी कि मुझे मणिमहेश जाना है बस।"
                         बातें करते-करते ही हमारे आगे लंगर परोस दिया गया, काबुली छोले-आलू की सब्जी, चावल व रोटी..... आनंद आ गया, तब मैने खाना खाते वक्त विशाल जी से पंजाबी की एक मशहूर कहावत बोली- "टिडे पाईआं रोटिआं, सबणा गल्लां खोटिआं...!"    और हम दोनों साढूँ भाई मंद-मंद मुस्कान हंसने लगते हैं।
                        समय रात के दस बजने को हो रहे थे, बाबा सुरजीत जी बाहर से तम्बू में आ कर बोले- "अच्छा तो, आप दोनों मेरी जगह पर ही सो जाना....क्योंकि आपसे पहले आए लोग सारे कम्बल नीचे बिछा कर उस पर सो चुके हैं, जिनमें कुछ महिलाएँ भी है...अब उन सब को कैसे जगा कर उनके नीचे से कम्बल निकालूँ, सो आप दोनों मेरे बिस्तर पर सो जाओ।"
                     जब मैंने बाबा जी से पूछा- "तो आप कहाँ सोओगें बाबा जी....?"
                    " मेरा क्या है, मैं तो फक्कड़ आदमी हूँ कहीं भी सो जाऊँगा।"
                     मैने और विशाल जी ने एक सुर में बोला- "आप हमारे लिए इतना कष्ट मत उठाये, हम बगैर कम्बल के ही रात काट लेंगे" कि तभी वो जो दो युवक बाबा जी ने हमें लेने के लिए भेजे थे ना,  वे तब से ही हमारी सेवा में मगन थे, उन्होंने ही हमारे हाथ-मुँह धुलवा कर हमें खाना परोसा ..... ने हमारी बात बीच में काट बाबा जी से कहा कि हम इन को अपने साथ ही लिटा लेंगे, आप चिंता ना करें। उनमें से एक युवक तो होली गाँव में हार्डवेयर व पेंट की दुकान चला रहा था तो दूसरा स्वास्थ्य विभाग में फार्मासिस्ट था।
                       वे दोनों हमें संग लेकर तम्बू में बची हुई अपनी जगह पर ले आए और उस फार्मासिस्ट युवक ने अपने स्लीपिंग बैग की ज़िप खोल उसे हम संग बांट लिया और बाकी कम्बलों को आड़ा कर हम चारों में अपने ऊपर ले लिये। मेरे पैर तम्बू से बाहर निकल रहे थे, सो बूट डाले ही लेट जाता हूँ... वैसे भी आड़े कर ओढ़े हुए खुले स्लीपिंग बैग व कम्बल हमारे घुटनों तक ही पहुँच पा रहे थे।
                      लेटे-लेटे हमें उस फार्मासिस्ट युवक ने कहा- "आप मेरे गाँव आना, मेरे गाँव से ऊपर भी भगवान शिव का एक और डल (झील) है  'लमडल'  जो धौलाधार हिमालय की सबसे की बड़ी लंबी झील है, मैं आपको वहाँ लेकर जाऊँगा।"
                      हमारे लिए "लमडल" नाम भी बिल्कुल नया था, उन्होंने ही मुझे लमडल झील नाम से वाकिफ़ करवाया था....सो अगले साल मैं चल दिया लमडल देखने।  यह पदयात्रा मेरे जीवन की सबसे ज्यादा रोमांचकारी यात्रा साबित हुई दोस्तों।
                     खैर, अब हम सभी नींद के आगोश की ओर बढ़ रहे थे, मैं आज सारे दिन घटे घटनाक्रम के बारे में सोचने लग जाता हूँ।  दिनेश जी के त्याग की बदौलत हम इस पदयात्रा पर रवाना हुए और विशाल जी के संग के साथ ही मैं इस जगह जेल-खड्ड तक पहुँच पाया हूँ। यदि कहीं अकेला ही इस कठिन व दुर्गम राह पर चल देता तो क्या मैं अकेला ही आज यहाँ तक पहुँच पाता और मन ही मन सो चुके विशाल जी को एक मौन आभार व्यक्त करता हूँ।
                                        (क्रमश:)


                                       
सेबों के बगीचों से घिरा "कलाह गाँव"

कलाह गाँव से कुछ ऊपर।

कलाह गाँव से आगे रास्ते में आई इस गुफा में "पौणाहारी बाबा बालक नाथ" का स्थान है।

बाबा बालक नाथ की गुफा के बाहर ये तीनों स्थानीय युवक धड़ाधड़ इन सीढ़ियों को चढ़ गए, जबकि हमारा ऐसा हाल था जैसे "चींटी चली पहाड़ चढ़ने...!"

त्यारी से पदयात्रा शुरू करने के बाद हमने किसी से भी रास्ता नहीं पूछा था क्योंकि रास्ता पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ रही थी। रास्ता खुद हमें रास्ता दिखा रहा था, मतलब कुछ-कुछ दूरी पर रास्ते-किनारे के पत्थरों को चूने से रंग कर सफेद किया हुआ था।

इन आँखों ने यह नज़ारा जीवन में पहली और अब तक भी आखिरी बार ही देखा है कि घाटी के बिल्कुल बीच एक पर्वत से दूसरे पर्वत तक "इंद्रधनुष" का सेतू बना हुआ था।
 इंद्रधनुष को हम पंजाबी  "रब्ब दी पींग" कहते हैं दोस्तों, मतलब भगवान का झूला।
पीछे मुड़कर देखता हूँ....तो यह नज़ारा फिर आगे नहीं देखने देता, "धौलाधार हिमालय का तलांग पास"

कलाह गाँव से चले हुए एक घंटा बीत चुका था, हमसे आगे निकल गए वो तीनों स्थानीय युवक रास्ते किनारे आई वर्षा-शालिका में बैठे आराम कर रहे थे कि हम भी वहाँ जा पहुँचे।

विशाल जी, ज़रा रुकना....एक फोटू तो खींच लूँ आपकी और विशाल जी अपना साँस अंदर खींच कर पोज़ देने लगे...!!!!

हम अब उस ऊँचाई पर जा पहुँचे थे, जहाँ से सामने "कुज्जा पर्वत" पूर्णतः दिखाई पड़ने लगा था।

कलाह घाटी का मुख्य आकर्षण "कुज्जा पर्वत"
सामने दिख रही नंगे पर्वतों की दीवार पर पड़ी कुछ बर्फ को देख मन मचल रहा था कि क्या हम इस बर्फ को छूँ पाएंगे।

रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति मिला जिसने अपनी पीठ पर सूखी लकड़ियों से भरी एक बोरी बांध रखी थी। वह व्यक्ति हमारी खुशी देख हैरान हो रहा था।

"बखोली कुड" इस दीवार नुमा पर्वत के नीचे बहुत बड़ा कुड यानि प्राकृतिक वर्षा-शालिका बनी हुई थी, जिसके नीचे भेड़-बकरी वाले रात में अपना डेरा जमाते होगें।

"बखोली कुड" के पास से गुज़रती पगडंडी पर बढ़े जा रहे विशाल जी।

हमने फिर उन तीनों युवकों को जा घेरा, जो हमसे बहुत आगे जा निकले थे। अब हमें उनकी तेज़ रफ्तार का राज मालूम हो चुका था.... वो तीनों ही "भांग की बूटी"  को अपने हाथों से मलते हुए 'बम-बोल' के जयकारे लगा रहे थे। उन्हें यह कृत्य करते देख मन एकदम से परेशान हो उठा कि नशा हमारी युवा पीढ़ी को गर्क में ले जा रहा है।

लो भाई, "दरम्बड गोठ" आ गया है।

पीछे मुड़कर देखा तो दूर कलाह गाँव अब भी नज़र आ रहा था। 
                                       
हम दोनों ही बुरी तरह से थक चुके थे। जैसे ही जंगलात विभाग द्वारा बनाई गई पक्की शैड के पास पहुँचे तो हम दोनों एकदम से उस शैड के अंदर जाकर लेट गए।
                                       
कुछ समय आराम करने के बाद हम उठ कर शैड से बाहर आ गए।

जंगलात विभाग में गार्ड के पद पर तैनात "राजकुमार जी" और उनके सहयोगी वहाँ धरम्बड गोठ में हर साल न्यौण यात्रा के समय मणिमहेश पदयात्रियों के लिए छोटा सा लंगर लगाते हैं।

लंगर में बनी " मूँग-मसूर की दाल"

राजकुमार जी के सहयोगी हमारे लिए चाय बनाते हुए।

वो तीनों स्थानीय युवक भी धरम्बड गोठ पहुँच जाते है।

हमें चाय के साथ ब्रेड परोसी जाती है।

भूख में तो चने भी बादाम लगते हैं, दोस्तों....यह सूखी ब्रेड तब मुझे ऐसी ही लग रही थी।

घरम्बड़ गोठ पर ही इनसे भी भेट हुई थी।

रात नौ बजे जेल-खड्ड पहुँच कर खाया यह लंगर।

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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

भाग-4 " मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से....!"



भाग-4 "मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से....!"

इस यात्रा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र
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                                 " खींच"



                          16अगस्त 2014.....  मणिमहेश जाने के लिए डाली गई "टॉस" में मिली हार ने मेरे मन में उठ रहे ज्वार भाटे की लहरों को एकदम से शांत कर दिया और मैं अपना लटका सा मुँह लेकर गाड़ी की पिछली सीट पर चुपचाप जाकर बैठ जाता हूँ। विशाल जी व दिनेश जी गाड़ी की अगली सीटों पर बैठ गए,  जैसे ही दिनेश जी गाड़ी का इंजन चालू करते हैं.... तभी मेरे मन-दिमाग में फिर से बेचैनी सी छाने लगती है, जैसे मेरा कुछ वहाँ पर छूट रहा हो। उसी क्षण चलने को तैयार गाड़ी का दरवाजा खोल, मैं बाहर निकल खड़ा हो जाता हूँ।
                    दिनेश जी एक लंबी साँस छोड़, गाड़ी का इंजन बंद करते हुए मुझसे पूछते हैं कि अब क्या हुआ...?
                    मैं आठ-दस क्षण मौन रहने के बाद बोलता हूँ- "माना कि मैं टॉस हार चुका हूँ, परंतु अब भी मैं मणिमहेश जाना चाहता हूँ,  मुझे खुद समझ नहीं आ रहा कि जैसे कोई मुझे खींच रहा है.... मेरे दिलो-दिमाग पर यह अजीब सी खींच निरंतर चल रही है कि चल तुझे मणिमहेश जाना है,  मैं आप दोनों के सामने हाथ जोड़कर कहता हूँ कि मुझे अपने-आप को शांत करने के लिए मणिमहेश जाने दे...!!!" 
                     मेरी इस आखिरी पंक्ति में लाचारगी के भाव देख दिनेश जी के मन में दया का भाव जाग उठा और वह बोले- " देखो भाजी,  तुम्हें मैं किसी भी हालत में अकेला तो जाने नहीं दूँगा मणिमहेश,  यदि यह रास्ता मेरी शारीरिक क्षमताओं के अनुसार होता तो मैं ही तुम्हारे संग चला जाता मणिमहेश।"
                       और..... फिर वे विशाल जी की तरफ देखते हुए बोले-  "विशाल जी, अच्छा तो आप भाजी के साथ चले जाओ मणिमहेश" परंतु विशाल जी ने फिर से अपने निर्धारित समय-सीमा का राग अलाप दिया। तो दिनेश जी ने फिर कहा- "माना कि आपके पास छुट्टी नहीं है, पर फिर भी आप एक बार अपने बॉस से फोन पर बात तो करो।"
                      विशाल जी ने जेब से अपना मोबाइल टटोल कर सिग्नल टटोला..... और मेरी किस्मत बलवान जो होने चली थी कि उस वक्त विशाल जी के मोबाइल पर सिग्नल भी जाने कहाँ से आ गया, जो पिछले काफी समय से लापता चल रहा था।
                   "हां सर,  मैं मणिमहेश यात्रा पर आया हूँ परंतु यहाँ बहुत ज्यादा भीड़ होने से यहीं फंस गया हूँ.... शायद एक-आध दिन और लग जाए मुझे वापस दिल्ली पहुँचने में...!!"
                       मेरी और दिनेश जी की आँखें फोन कर रहे विशाल जी के चेहरे के भावों को एकटक पढ़ रही थी...और,  उनके चेहरे पर एकदम से आए एक विशेष भाव को देख हमारी आँखें चौड़ी हो गई और चेहरे फूल से खिल उठे।
                       अब, हम दोनों साढूँ गाड़ी की डिक्की में पड़ी अपनी रक्सैकों को तैयार कर रहे थे और दिनेश जी हमारी तरफ पीठ कर खामोशी से शून्य में घूर रहे थे। मैं निरा स्वार्थी उस समय तो बहुत प्रसन्न था, पर दिनेश जी की मेरे प्रति चिंता और अपने टूर की कुर्बानी मेरी प्रसन्नता से हजारों गुणा ऊँची थी। मझधार में फंसी मेरी कश्ती को दिनेश जी ने अपनी छुट्टियों की कुर्बानी रुपी पतवार बना पार लगा दिया था। दिनेश जी का यह त्याग मैं सारी उम्र नहीं भुला सकता, दोस्तों।
                       हमने अपने रक्सैकों से जयपुरी रजाइयों को निकाल गाड़ी में रख दिया,  क्योंकि त्यारी पुल से हमारी गाड़ी में लिफ्ट लेने वाले फार्मासिस्ट ने कहा था कि मणिमहेश को जाते इस रास्ते पर जेल-खड्ड नामक जगह पर लगने वाले एकमात्र लंगर पर रात रुकने का पूरा इंतजाम है।  तब नए पनपे हम पर्वतारोहियों ने " स्लीपिंग बैग" साक्षात देखे भी ना थे,  ट्रैकिंग स्टिक के नाम पर  हमारे पास बाँस की दो मजबूत लाठियाँ थी,  जो मैंने अपने फार्म हाउस पर लगे बाँस के बेड़ो से कटवाई थी।
                        सवा ग्यारह बजे दिनेश जी ने मुस्कुराते हुए हम दोनों को शिव-भोले के जयकारे के साथ मणिमहेश की ओर रवाना किया और हमें तब तक देखते रहे, जब तक हम उस मोड़ से ऊपरी त्यारी गाँव की ओर मुड़े नहीं। हम से आखिरी अभिनंदन पा कर, दिनेश जी गाड़ी लेकर घर वापसी की राह पर बढ़ गये और हम पांच-सात मिनट चलने के बाद ऊपरी त्यारी गाँव की तंग सी गली में से गुज़र रहे थे कि एक बूढ़ी अम्मा ने हमें रोककर पूछा- "मणिमहेश जा रहे हो, क्या...?"
                     हमने खुशी से अपने सिर जैसे ही हिलाये, तो वह अम्मा बोली- "ज़रा रुको"  और अपने घर के भीतर से हमारे लिए सेब ले आई। हम दोनों के चेहरे पर खुशी व हैरानी के मिश्रित भाव उभर आये कि कैसे कोई अंजान किसी दूसरे अंजान से गैर स्वार्थी स्नेह प्रकट करता है।
पूछने पर अम्मा ने अपना नाम "पारो देवी" बताया और कहा कि आगे आने वाले आखिरी गाँव "कलाह" में भी हमारे घर हैं, वहाँ पहुँच दोपहर का भोजन कर आगे जाना। अम्मा ने सेबों के साथ-साथ हमें हमारी यात्रा की ढेर सारी शुभकामनाएँ देकर रुख़सत किया।
                          दस- बीस कदमों में ही ऊपरी त्यारी गाँव पीछे छूट गया और हम पहाड़ पर चढ़ती पगडंडी पर चढ़ने लगे। जैसे-जैसे ऊपर चढ़ रहे थे सामने रावी नदी के पार पहाड़ पर तराशे हुए सीढ़ीदार खेत और उनमें बने घर हमें मजबूर कर रहे थे कि हम वहीं ठहर कर उन्हें निहारतें रहें।
                         हम नए पनपें पर्वतारोहियों को पदयात्रा के पहले घंटे में ही चढ़ाई ने थकाना आरंभ कर दिया। खैर अभी तो शुरुआत है थकना कैसा.... चंद मिनट रास्ते के किनारे पत्थरों पर बैठ, कुछ दम ले फिर से चल पड़ते चढ़ाई पर।
                         छोटा सा त्यारी गाँव अब और भी छोटा सा नज़र आने लगा उस ऊँचाई पर पहुँच कर। दोपहर का एक बजने को था, सूर्यदेव का तेज़ ऐसे लगता था कि मेरे सिर के बाल भी जल जाएंगे... सो अपनी रक्सैक से तौलिया निकाल सिर ढक लेता हूँ।  चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते हम उस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं, जहाँ से नीचे बहुत खूबसूरत दृश्य दिखाई दे रहा था कि दो पर्वत श्रृंखलाओं के बीचो-बीच बह रही रावी नदी और सामने नज़र आ रही धौलाधार हिमालय श्रृंखला के "तलांग पर्वत"  के सिर पर बंधी सफेद पगड़ी खूब जच रही थी। जबकि हम पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला में चढ़ाई कर रहे थे। पर्वतों पर छाई हरियाली का हरा रंग ऐसा था,  जैसे प्रकृति देवी ने पूरे जी-जान से उसे पत्थरों पर पोता हो।
                        त्यारी गाँव से काफी ऊपर आकर रास्ते किनारे पत्थरों से बना एक चबूतरा सा आया, जिस पर कुछ समय बैठ नीचे का नज़ारा देखते हुए हम दम लेते रहे। उस चबूतरे से ज़रा सा ऊपर चढ़ने पर रास्ते किनारे बनी पहली 'वर्षा-शालिका' आती है... परंतु हम उस में बैठते नहीं, बस फोटो खींचे आगे बढ़ जाते हैं।  आगे बढ़ते ही पीछे छूट चुका त्यारी गाँव दिखना बंद हो जाता है और एक नया दृश्य आँखों में उभर आता है....नीचे घाटी में रावी नदी के किनारे बसे गाँव "होली" का विहंगम दृश्य और होली गाँव के ठीक ऊपर तलांग पर्वत के हिमाच्छादित शिखर।
                        कुछ समतल सी पगडंडी पर चलने के बाद एक मोड़ मुड़े तो होली गाँव दिखना भी बंद हो गया और हम एक नई घाटी में पहुँच जाते हैं.....इसके बहुत नीचे "जेल-खड्ड"  से बह कर आ रहा नाला बह रहा था, जो होली में पहुँच रावी नदी में समा जाता है। घाटी के मध्य कई सारे 'बाज़' उड़ रहे थे जो कुछ-कुछ समय बाद उड़ते-उड़ते हमारे पास से भी गुज़र जाते, जैसे पता कर रहे हो कि कौन अजनबी उनके इलाके में घूम रहे हैं।
                      कलाह गाँव की तरफ जाती इस घाटी में एक बहुत ऊँचा पर्वत शिखर बार-बार हमारा ध्यान खींच रहा था,  जिसका नाम व इतिहास हमें बाद में पता चला.... इसका वर्णन में आगामी किश्तों में करूँगा। उस टेढ़े पर्वत शिखर का नाम "कुज्जा पर्वत" है, दोस्तों।
                     त्यारी गाँव से ढाई घंटे चलने के बाद रास्ते किनारे बनी दूसरी वर्षा-शालिका आती है, इसके सामने हम पेयजल की पाइप लाइन पर लगे नल से जमकर पानी पीते हैं......क्योंकि त्यारी गाँव के बाद अभी हमें पानी मिला था, त्यारी गाँव में पेयजल के नलों के अलावा एक प्राकृतिक बावड़ी भी है जो हमारी नज़र में आने से छूट गई।
                     पहाड़ की बाँह के डोले पर वह छोटी सी पगडंडी ऐसे जान पड़ रही थी जैसे उस पर नज़र का काला धागा बंधा हो, उस पगडंडी पर हम दोनों आगे बढ़ते-चढ़ते जा रहे थे कलाह गाँव की ओर।  पीछे मुड़कर देखने पर अब फिर से होली गाँव के दूर-दर्शन होने लगे थे और सबसे प्रभावशाली दर्शन तो 'तलांग पर्वत' शिखर के थे जो बार-बार मुझे पीछे मुड़कर देखने के लिए विवश किये जा रहा था।
                       समय दोपहर के ढाई बजने को थे, पगडंडी ने एक तीखा मोड़ काटा और रास्ते की तीसरी वर्षा-शालिका व उसके साथ ही बना एक छोटा सा मंदिर आया। यह मंदिर "केलांग देवता" का था, केलांग देव के बारे में जानकारी हमें कलाह गाँव में पहुँचने पर ग्राम-वासियों से हुई "केलांग वजीर"  शिव जी के बड़े पुत्र कार्तिक का नाम है।
                       तभी हमारे पीछे से तीन यात्री और आ गए, जिनमें एक औरत भी थी। वे सब होली गाँव से थे और हमारी तरह ही कलाह पर्वत को लाँघ कर मणिमहेश झील पर लगे हुए 'न्यौण मेले' में नहाने जा रहे थे। उन्हें देख हम में कुछ संतोष जगा कि इस दुर्गम रास्ते पर हम अकेले नहीं हैं।  उन तीनों के जाने के बाद एकाएक विशाल जी को याद आया कि आज तो शनिवार है और ग्रहों के मुताबिक मुझे कुछ-ना-कुछ कुछ मीठी चीज़ दान करनी होती है..... तो मैंने हंसते हुए कहा तो क्या है रक्सैक से मीठे बिस्कुटों का पैकेट निकाल सामने मंदिर में चढ़ा दो और विशाल जी ने वही किया। बिस्कुटों का पैकेट निकालते वक्त मैंने मक्खन का पैकेट भी रक्सैक से निकाल लिया और शक्ति व स्फूर्ति पाने के चक्कर में हम दोनों साढूँओं ने मक्खन की पूरी टिक्की सूखी ही रगड़ डाली,  मतलब पेट के हवाले कर दी...!!
                       कुछ समतल सी पगडंडी पर दस मिनट चलने के बाद हमें मानव-बसो चिन्ह नज़र आने लगे। सूरजमुखी के फूल, आडू के पेड़ और दो-तीन मोड़ों के बाद दिखाई दे रही स्लेटों से बनी छतें.... मतलब कलाह गाँव आने को है।  तभी सामने पगडंडी पर से एक औरत एक लड़की को थामें चली आ रही थी और वह लड़की जोर-जोर से रो रही थी। उन्हें दूर से देखने पर मैंने विशाल जी से कहा- "हो सकता है यह लड़की बिमार हो, उसे कहीं पर दर्द हो.... चलो पास आने पर पूछते हैं, उसे कोई दवाई  आदि देंगे, शायद ये इसे लेकर नीचे होली में किसी डॉक्टर के पास जा रही हो...!"
                    परंतु उनके पास आने पर बात कुछ और ही निकली.... पूछने पर जवाब मिला- "इस लड़की का पिता मर गया है, बिमार था 'टांडा' में इलाज चल इलाज रहा था.... लाश त्यारी गाँव से लेकर आनी है, उसे लेने जा रहे हैं।"
                     "टांडा"  नाम सुन कर, मैं कुछ हैरत में पड़ गया कि टांडा शहर तो होली से 250किलोमीटर दूर जिला होशियारपुर (पंजाब) में है, इतनी दूर इलाज...!
                    दोस्तों, मुझे इस घटना के तीन साल बाद पता चला कि वो टांडा जिला होशियारपुर वाला नहीं, बल्कि "डॉ राजेंद्र प्रसाद आयुर्विज्ञान महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, टांडा" जो कांगड़ा में है, उसकी बात कर रही थी। परंतु होली से कांगड़ा भी तो करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर है, यह दूरी भी इलाज के लिए बहुत ज्यादा है।  यहाँ तक कि कलाह गाँव से होली बाज़ार की दूरी भी दस किलोमीटर यानि कम-से-कम पाँच घंटों का पैदल रास्ता है,  जबकि बीमार के लिए तो अपने घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना मुश्किल हो जाता है। होली से ऊपरी त्यारी यानि आधे रास्ते तक जीप द्वारा पहुँचा जा सकता है, परंतु इन पाँच किलोमीटर के कच्चे व गड्ढेदार रास्ते पर जीप वाला भी 500रुपये ले लेता है.... जिसे देना हर किसी के बस की बात नहीं है। मतलब ऐसी दुर्गम जगहों पर रहने वाले लोगों के लिए मात्र साधारण सर्दी- ज़ुकाम रोग भी जी-का-जंजाल बन जाता है, बगैर दवाई या इलाज के......भयंकर या आपातकालीन स्थिति की तो बात ही क्या की जा सकती है।
                        तीन अभी बजने को थे और हम पत्थरों व लकड़ी की मिलीभगत से बनी दीवारों और स्लेटों की छतों वाले मकानों के बीचो-बीच जा पहुँचे। पगडंडी हमें कलाह गाँव में आई थी और हम दोनों 'पारो देवी' द्वारा दिए गए रसभरे सेबों को खाते हुए कलाह गाँव की कच्ची गलियों में बढ़ने लगे और मुश्किल से 15 से 20 घरों के गाँव कलाह में लकड़ी से बनी तीनमंजिला पुरानी इमारत में,  पूरे गाँव की एकमात्र चाय की दुकान पर जा पहुँचे। जिसके बरामदे में एक बुजुर्ग, चार-पाँच बच्चे और वह दुकानदार युवक ताश की बाज़ी जमाये थे। इमारत में लगी लकड़ी की चौखट में चाक द्वारा हाथ से लिखा हुआ था- "सूर्य अस्त, चगत मस्त....दुकान यहाँ है।" आज नकद कल उधार, जय मणिमहेश, गर्मा-गर्म चाय, 1-2-3-4 भोले की जय- जयकार, भोलेनाथ सबके साथ।
                       उस दुकान के सामने वाले घर में बैठे घर वाले हम मणिमहेश यात्रियों को देख प्रसन्न हो रहे थे, सवाल पूछे जाने लगे कि कहाँ से आये हो.....?
                        दुकान के पास लगे बगीचे में पेड़ों पर सेब झूल रहे थे। चाय के साथ मूंग दाल व गिरी मूंगफली ही हमें प्राप्त हुई उस दुकान से। पारो देवी के विषय में पूछताछ की तो मालूम हुआ कि कलाह गाँव उनका मायका है। गांव वासी हमें न्यौता देने लगे कि चलो हमारे घर में खाना खाओ, चाहे तो आज रात रुक कर कल मणिमहेश की ओर चल देना। वह सारा गाँव राजपूत बिरादरी का है, सब लोग एक ही गोत्र के हैं "उत्तम"
                       परंतु दुकान पर आये एक मुसलमान भाई को देख हमने सवाल किया तो जवाब मिला- "अरे यह तो भट्ट साहिब है, पेयजल की पाइप लाइन बिछाने वाले ठेकेदार है।"
                       गाँव वालों से अगले रास्ते की जानकारी ले और गाँव में बने ग्राम देव "कलिंग वजीर" का मंदिर देख, हम दोनों आधे घंटे में ही कलाह गाँव से ऊपर की ओर चढ़ती चढ़ाई चढ़ने लगे।
                                        (क्रमश:)


                                       
दिनेश जी का त्याग मैं जीवन भर नही भूला सकता दोस्तों, कि उन्होंने अपनी छुट्टियों की कुर्बानी दे...मुझ अड़ियल व ज़िद्दी बंदे के साथ विशाल जी को मणिमहेश जाने के लिए तैयार किया।

लो, चले पड़े नये पनपे पर्वतारोही मणिमहेश झील की ओर।

दिनेश जी से आख़िरी अभिनंदन।

लो, आ पहुँचे हम ऊपरी त्यारी गाँव की गलियों में।

" मणिमहेश जा रहे हो क्या" और अम्मा "पारो देवी" ने हमें सेब व ढेर सारी शुभकामनाएँ दे रुख़सत किया।


                                           
त्यारी गाँव से ऊपर चढ़ाई चढ़ते हुए दिख रहा मंजर।


यात्रा के पहले ही घंटे में हम नये पनपे पर्वतारोहियों को चढ़ाई ने थकाना आरंभ कर दिया, खैर थकना कैसा....अभी तो शुरुआत है। हम रास्ते किनारे पत्थरों पर दम ले फिर से चढ़ देते चढ़ाई पर।

छोटा सा गाँव " त्यारी" अब और भी छोटा नज़र आने लगा, इस ऊँचाई पर पहुँच कर।

धूप इतनी तेज़ कि मेरा सिर जलने लगा, सो रक्सैक से तौलिया निकाल सिर ढक लेता हूँ। 

परन्तु विशाल जी तो अपने डंडे को टोपी पहने में मश़रुफ़ थे। 
         
                                     
रावी घाटी की एक सुंदर अदा।


सामने दिख रही धौलाधार पर्वत श्रृंखला में "तलांग पर्वत"

धौलाधार हिमालय और पीर- पंजाल हिमालय के बीचो-बीच बह रही रावी नदी।

तलांग पर्वत के सिर पर बंधी सफेद पगड़ी।

पहाडों पर छाई हरियाली का हरा रंग ऐसा था, जैसे प्रकृति देवी ने पूरे जी-जान से इसे पत्थरों पर पोता हो।

रास्ते किनारे में आया पत्थरों से बना एक चबूतरा।

इसी चबूतरे पर बैठ, हम दम लेते हुए नीचे दिख रहे त्यारी गाँव को देखते रहे।

रास्ते की पहली वर्षा-शालिका।

आगे बढ़ते ही पीछे छूट चुका त्यारी गाँव दिखना बंद हो जाता है और एक नया दृश्य आँखों में उभर आता है....नीचे घाटी में रावी नदी के किनारे बसे गाँव "होली" का विहंगम दृश्य।

 होली गाँव के ठीक ऊपर तलांग पर्वत के हिमाच्छादित शिखर।

तलांग पर्वत का एक दिलकश दृश्य।

रावी नदी के किनारे बसा "होली गाँव"

होली गाँव में स्थित हैलीपैड।

लो, एक और नज़र होली गाँव पर।

  कलाह गाँव की तरफ जाती इस घाटी में एक बहुत ऊँचा पर्वत शिखर बार-बार हमारा ध्यान खींच रहा था, इस टेढ़े पर्वत शिखर का नाम "कुज्जा पर्वत" है, दोस्तों।

दरअसल विशाल जी अपनी सुंदर सी तस्वीर खिंचवाने के लिए सिर से टोपी उतार डंडे के सिर पर पहना देते थे, दोस्तों।

यह बंदा कुछ जाना-पहचाना सा लगता है, हैं ना दोस्तों।

घाटी के मध्य कई सारे 'बाज़' उड़ रहे थे जो कुछ-कुछ समय बाद उड़ते-उड़ते हमारे पास से भी गुज़र जाते, जैसे पता कर रहे हो कि कौन अजनबी उनके इलाके में घूम रहे हैं।

त्यारी गाँव से ढाई घंटे चलने के बाद रास्ते किनारे बनी दूसरी वर्षा-शालिका आती है, इसके सामने हम पेयजल की पाइप लाइन पर लगे नल से जमकर पानी पीते हैं......क्योंकि त्यारी गाँव के बाद अभी हमें पानी मिला था।

  पहाड़ की बाँह के डोले पर यह छोटी सी पगडंडी ऐसे जान पड़ रही थी जैसे उस पर नज़र का काला धागा बंधा हो।

उस पगडंडी पर हम दोनों आगे बढ़ते-चढ़ते जा रहे थे कलाह गाँव की ओर।

  पीछे मुड़कर देखने पर अब फिर से होली गाँव के दूर-दर्शन होने लगे थे और सबसे प्रभावशाली दर्शन तो 'तलांग पर्वत' शिखर के थे जो बार-बार मुझे पीछे मुड़कर देखने के लिए विवश किये जा रहा था।

उस ऊँचाई से नज़र आ रहा....होली का "पर्वतारोहण भवन"

 तभी हमारे पीछे से तीन यात्री और आ गए। वे सब होली गाँव से थे और हमारी तरह ही कलाह पर्वत को लाँघ कर मणिमहेश झील पर लगे हुए 'न्यौण मेले' में नहाने जा रहे थे। उन्हें देख हम में कुछ संतोष जगा कि इस दुर्गम रास्ते पर हम अकेले नहीं हैं।

 शक्ति व स्फूर्ति पाने के चक्कर में हम दोनों साढूँओं ने मक्खन की पूरी टिक्की सूखी ही रगड़ डाली,  मतलब पेट के हवाले कर दी...!!

तीसरी वर्षा-शालिका के साथ ही बना हुआ " केलांग वज़ीर" का मंदिर।

दो-तीन मोड़ों के पार हमें स्लेटों की छतों वाले दो मकान नज़र आए, मतलब कलाह गाँव आने को है।

कलाह गाँव की बढ़ते हुए.....पगडंडी किनारे लगे सूरजमुखी के फूल।

कलाह गाँव से पहले आया आडू का पेड़।

सामने दूर घाटी में दिखाई यह जगह रहस्यमय सी प्रतीत हो रही थी, जिसकी तरफ हमें जाना था।

कलाह गाँव से कुछ पहले, यहीं हमें वो रोती हुई लड़की मिली थी....जिसके पिता की मौत हो चुकी थी।

लो, आ गया आख़िरी गाँव "कलाह"

और,हम दोनों 'पारो देवी' द्वारा दिए गए रसभरे सेबों को खाते हुए कलाह गाँव की कच्ची गलियों में बढ़ने लगे।

 मुश्किल से 15 से 20 घरों के गाँव कलाह में लकड़ी से बनी तीनमंजिला पुरानी इमारत में,  पूरे गाँव की एकमात्र चाय की दुकान पर जा पहुँचे।

जिसके बरामदे में एक बुजुर्ग, चार-पाँच बच्चे और वह दुकानदार युवक ताश की बाज़ी जमाये थे।

    उस दुकान के सामने वाले घर में बैठे घर वाले हम मणिमहेश यात्रियों को देख प्रसन्न हो रहे थे, सवाल पूछे जाने लगे कि कहाँ से आये हो.....?

   दुकान के पास लगे बगीचे में पेड़ों पर सेब झूल रहे थे।

चाय के साथ मूंग दाल व गिरी मूंगफली ही हमें प्राप्त हुई उस दुकान से।

गड्डी जांदी आ, छलांगां मारी दी....मैनू याद आई मेरे यार दी।

सारा गाँव राजपूत बिरादरी का है और उन सब का गोत्र है "उत्तम", परंतु दुकान पर आये एक मुसलमान भाई को देख हमने सवाल किया तो जवाब मिला- "अरे यह तो  भट्ट साहिब है, पेयजल की पाइप लाइन बिछाने वाले ठेकेदार है।"

कलाह गाँव में शिव के बड़े पुत्र कार्तिक का मंदिर, जिसे गाँव वासी " कलिंग वज़ीर" नाम से सम्बन्धित करते हैं।


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