मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

भाग-13 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-13  पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                   
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                                   ग्लेशियर को पार कर राणा चरण सिंह एक खड़े पहाड पर चढ़ने लगे और मैं उनके पीछे-पीछे...... जहां हम अब चढ़ रहे थे, वहां बहुत ज्यादा हरियाली थी... हर तरफ तरुड़ घास ने सब कुछ ढक रखा था......यदि मैं अकेला होता तो मेरा इस जगह पर सही रास्ते को ढूंढ पाना ही मुश्किल हो जाता, पर चरण सिंह की मेहरबानी से सब कुछ आसान हो रहा था....... दोस्तों अब हम जिस रास्ते पर चढ़ रहे थे, वह एक दम से सीधी चढ़ाई थी और सिर्फ एक पांव रखने हेतू ही जगह थी, यानि पहला पांव गलत जगह पड़ा और "फोटो पर हार" चढ़ने वाली स्थिति....गज  गिरिराज की पूरी चढ़ाई ही ऐसी है कि जैसे आप किसी खड़ी दीवार पर चढ़ रहे हो.......परन्तु इस रोमांच का अनुभव हम पर्वतारोहियों के लिए बहुत ही प्रिय व मीठा होता है, इस अनुभव को पाने के लिए हम पर्वतारोही बार-बार पर्वतारोहण के लिए जाते हैं........ऊपर चढ़ते-चढ़ते नीचे का दृश्य अब धुंध में विलीन हो रहा था, परन्तु नीचे गिर रहे जल प्रपातों के मधुर स्वर सम्पूर्ण वादी में गूंज रहे थे..... और मुझ संगीत-प्रेमी को वह गिरते जल की ध्वनि को सुनना शास्त्रीय राग "होंसध्वनि" से कम नही लग रहा था......
                             पिछली किश्त में मैंने आपको बताया था कि मुझ से मेरा रक्सक(पीठू बैग) चरण सिंह ने ले लिया था.....  यह कह कर कि हम दोनों इस भार को बारी-बारी उठा लेते है...परन्तु दोस्तों मुझे मेरा रक्सक चरण सिंह ने वापस नही दिया, मेैंने जबरदस्ती भी अपना बैग वापस मांगा खुद उठाने के लिए....... परन्तु चरण सिंह ने यह मुझे हर बार मना दिया और कहा कि...... "ब्राह्मण देवता, आप मेरे अतिथि हो और मैं कैसे आपको भार उठाने दूँ...... मुझे आपकी सेवा करने का पुण्य कमाने दे और इस बात को दोबारा मत दोहरायें, क्योंकि यह बैग मैं आपको तब वापस दूँगा..... जब हम वापस अपने डेरे पर ऋषभ के पास पहुंच जाएगें "......दोस्तों, चरण सिंह की इस बात पर मैं तब भी निशब्द था और अब भी निशब्द हूँ....मेरे पास राणा चरण सिंह के अद्भुत अतिथि सत्कार की व्याख्या करने हेतू शब्द ही नही हैं....
                              गज पर्वत के ऊपर कुछ चढ़ने के बाद हम दोनों कुछ समय विश्राम के लिए रुके और हिमाचल प्रदेश के एक वियावान पहाड पर गुजरात की मशहूर कम्पनी की लस्सी, क्या आनंद था मित्रों...... पसीने से मैं तो एक दम नहा चुका था, पर चरण सिंह ने तो ऊपर से एक गर्म कोट भी डाल रखा था, मैने हैरानी से चरण सिंह से पूछा कि राणा जी, इस कोट में क्या आपको गर्मी नही लग रही, तो बोले.... "यह कोट मैने खुद अपनी भेड़ो के ऊन से बनाया है, यह हमारे शरीर को सर्दियों में गर्म तो गर्मियों में पसीना आने के बाद ठण्डा ही बनाए रखने में मदद करता है....इस कोट की वजह से एक दफा पसीना आने के बाद शरीर ठण्डे का ठण्डा ही बना रहता है और सूर्यास्त के बाद ठण्ड में फिर से मुझे गर्म रखता है"....... चरण सिंह की यह बात सुन अब मेरी समझ में आया कि जब भी मैं गर्मियों में पहाड पर जाता हूँ तो वहां के लोग अक्सर स्वेटर पहने नजर क्यों आते हैं.........
                             रास्ता तो बस, चढाई ही चढाई..... और हर तरफ बादल कहूं या धुंध कुछ समझ नही पा रहा था, क्योंकि ना तो मुझे ऊपर की ओर कुछ नज़र आ रहा था और ना ही नीचे की ओर, बस कुछ दूर तक ही दिखाई दे पा रहा था.... और खामोशी को तोड़ती हम दोनों की आवाजें..... कुछ समय बाद मैं भगवान शिव का उदघोष लगा कर वादी में अपनी आवाज़ फैला देता...... चरण सिंह ने मुझे रास्ते में एक पौधा दिखाया और बोले, कि यह "भूजलू" है..... एक अति ज्वलनशील पौधा है, इसे हरे को ही आग लग जाती है... इसे दोनों हाथों मे मल कर बस आग तो दिखाओ,फिर देखो यह पेट्रोल की तरह जलता है.... मेरे लिए तो यह जानकारियां लाभप्रदता से भरपूर सिद्ध हो रही थी, हर क्षण मैं राणा चरण सिंह से कुछ ना कुछ नया सीख रहा था..... कभी मुझे चरण सिंह "सर्प की मक्की" जिस की जड़ भालू बहुत चाव से खाता है,दिखाते....और कभी मवेशियों के लिए टॉनिक "निर घास" दिखाते...... तो कभी रास्ते से हट कर दरारों को पकड़ कर ऊपर चढ़ने का गुर सिखाते....... चरण सिंह बातों के धनी होने के साथ-साथ एक ज्ञानी व्यक्ति है, वह कभी मुझे  महाभारत के किस्से तो कभी राजाओं की कहानियाँ सुना रहे थे....मैने पूछा कि यह सब आपने कहां से सीखा, तो चरण सिंह ने कहा....."मैं तो सातवीं जमात तक पढ़ा हूँ परन्तु मैने सब कुछ अपने स्वर्गीय पिता राणा पुन्नू राम जी से सीखा है.... और हां मेरे पिता मुझे बताते थे कि हमारे पूर्वज जम्मू इलाके के किसी रियासत के शासक थे और हम कालान्तर में यहां आकर बसे है".... और हंसते हुए बोले कि मुझे एक स्वप्न बार-बार आता है कि मुझे मेरा खोया हुआ राजवंश दोबारा मिलेगा...... मैने महसूस किया कि चरण सिंह स्वप्नों में बहुत विश्वास करते हैं... उन्होंने मुझे यहां तक भी कह दिया.....कि पिछली रात मुझे सपने में वाणी हुई कि तेरे पास आया यह व्यक्ति (यानि मैं) साधारण व्यक्ति नही है......... मैं जोर-जोर से हंसने लगा, पर उन्होंने जो कुछ भी मेरे बारे में उस स्वप्न से सम्बधिंत कहा, वह सौ प्रतिशत सत्य था..........
                              धुंध और बादलों में से आगे बढ़ते हुए पगडंडी पर एक छोटी सी समतल जगह आई, तो चरण सिंह ने बताया कि इस जगह को हम "खराडी" नाम से बुलातें हैं... यहां नौयोन (दो दिवसीय वार्षिक मेला) के दौरान तीर्थ यात्रियों के लिए पहला लंगर लगाया जाता है....... मैने महसूस किया कि यह लंगर बिल्कुल सही जगह लगाया जाता है, कि जैसे ही पदयात्री यहां तक थका-हारा सा पहुंचे, उस में फिर से जोश व शक्ति भर कर उसके लक्ष्य की तरफ रवाना कर दो........
                               गज पर्वत पर चढ़ते-चढ़ते 3घंटे से भी ज्यादा हो चले थे और मेरे पास जो 1लीटर पानी की बोतल थी, वह खत्म हो चुकी थी........ मैने चरण सिंह से कहा कि, राणा जी, ध्यान रखना पानी खत्म हो गया है...... तो चरण सिंह ने कहा, अब तो शाम को लमडल झील पर जा कर ही पानी मिलेगा, क्योंकि गज नदी की सभी धाराऐं तो हम कब के नीचे छोड़ आए हैं........ उनकी यह बात सुन कर कि पानी अब रास्ते में कहीं नही मिलेगा, प्यास अति तीव्र रुप में तबदील हो गई......ऊपर से चढाई चढ़ते रहने की कठिनता और गज का शिखर तो कहीं दिखाई भी नही दे रहा था ....... समुद्र तट से बढ़ रही ऊँचाई से कम हो रहा आक्सीजन का स्तर, बहुत तेज गति से चल रही ह्रदयगति, सूख रहा मुंह-गला और मेरे पास पानी की खाली बोतल .....बहुत विकट परिस्थिति आन पड़ी थी मुझ पर अब........
             .............................(क्रमश:)
बकरोट ग्लेशियर से गुज़रते राणा चरण सिंह... 

गज गिरिराज पर पहले कदम.... चरण सिंह के पीछे दिखाई दे रहा गज नदी का झरना... 

इतनी हरियाली में रास्ता मिलना,  मेरे अकेले के बस से बाहर की बात थी.... 
परन्तु कई जगह तो पगडंडी ही नही थी... ऐसी ही खतरनाक चट्टानों पर ऊपर की ओर चढ़ रहे थे हम,  सांप-सीढ़ी के खेल की तरह अगला कदम गलत रख दिया... तो नतीजा भयंकर 

थकान के बाद...पी हुई लस्सी के आंनद को तो,  मैं उमर भर नही भूल सकता... दोस्तों 


सर्प की मक्की,  जिसकी जड़ भालू को बेहद पंसद है....

भूजलू का पौधा.... एक ज्वलनशील पहाड़ी मदद

बस चढ़ाई ही चढ़ाई... 
नौआन यात्रा के दौरान लगते,  पहले लंगर वाली जगह "खराडी" और यहां एक लोहे का पाईप पड़ा था,  जिस पर कपड़ा डाल यात्रियों के विश्राम हेतू कक्ष बनाया जाता है...

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भाग-12 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-12  पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
               
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                              पिछली किश्त में आप लोगों ने पढ़ा कि, कैसे पैर की चोट की वजह से मेरा छोटा भाई ऋषभ नारदा..वहीं राणा चरण सिंह के डेरे पर रह गया और मैं 25अगस्त2015 के दिन चरण सिंह को साथ ले कर लमडल की तरफ रवाना हो गया.......
                              गज नदी के किनारे पहाड की तलहटी में बसी बिखरी सी गद्दियों की एक छोटी सी बस्ती "बग्गा" की सुन्दरता के सूक्ष्म दर्शन अपनी आंखों व कैमरे में कैद कर अब हम दोनों आगे, गज पर्वत की तरफ बढ़ रहे थे......फिर  एक स्थान पर पत्थरों के ऊपर से गज नदी को पार कर..... कुछ चढाई चढ़ कर हम सांस लेने के कुछ देर बैठ गए और मैने अपनी रक्सक(पीठू बैग) उतार कर रख दी और आसपास की तस्वीरें खींचने में मश़रूफ हो गया......... तभी चरण सिंह ने कहा, "भाई जी....चलो चलते हैं"   मैने मुड़ कर देखा कि मेरी रक्सक चरण सिंह पीठ पर डाल कर आगे चलने के लिए तैयार खड़े है और मैने इस बात पर अपना ऐतराज़ ज़ाहिर किया, कि यह मेरा भार है...इसे मैं ही उठाऊंगा, तो चरण सिंह बोले, रास्ता लम्बा व कठिन है.... हम दोनों बारी-बारी इस बोझ को उठा कर चलते है, अब कुछ देर मैं उठाता हूँ...... फिर आप उठा लेना, मैने कहा..चलो ऐसा ही सही........और आगे की तरफ चढ़ने लगे
                      कुछ आगे चढ़ने के बाद मुझे गज नदी एक झरने के रूप में पहाड से गिरती हुई दिखाई दी, तो मैने चरण सिंह से इस बारे में पूछा......तो वे बोले, हां वह गज नदी की धारा ही है और हमे इस के साथ से ही ऊपर चढ़ना है, जो कि सीधी चढ़ाई है........मैने हंसते हुए चरण सिंह से पूछा कि राणा जी, चढ़ाई मुश्किल है या आसान..... राणा जी बोले "आसान ही होगी"       और इन के इस जवाब पर हम दोनों खिलखलाकर हंसने लगे...... मैं बोला, "चलेगें..... तो आसान"....... कह कर चरण सिंह की तरफ देखने लगा, कि वह मेरे वाक्य को पूरा करे.... "नही चलेगें, तो मुश्किल.. भाई जी " कह कर चरण सिंह ने मेरा अधूरा वाक्य पूरा किया............ दोस्तों, पहाडों पर अकेले शारीरिक बल से ही नही चढ़ा जाता......अपितु  बल के साथ-साथ दृढ़व्रत निश्चय और उस गिरि के प्रति सम्मान भी हर समय मन में होना चाहिए......
                             चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते मेरी सांस फूलने लगी, तो मैने जेबे टटोल कर अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा.... "ओह हो, चरण सिंह जल्दबाजी में मैं तो डेरे से टोफियां उठाना ही भूल गया...... यदि टोफियां मेरे पास होती, तो इस पहाड पर चढ़ते समय मुंह मे रखता, ताकि मुझे सांस कम चढ़े और मेरा मुंह भी ना सूखे"...... चरण सिंह ने मेरी बात सुनी और उसी समय उसी स्थान पर नीचे झुक कर जमीन से कुछ पत्ते तोड़ कर मुझे थमा दिये, और बोले..." यह लो पंडित जी.....इसे 'अमलू' कहते हैं, यह आप को टोफियों की कमी नही महसूस होने देंगे, इन्हें मुंह में रख चूसते रहे".....मैने हैरानी से देखा और झट से एक पत्ता मुंह में डाल लिया, और "अमलू" के स्वाद के आगे उस मशहूर कम्पनी की खट्टी-मीठी कैंडी की क्या औकात........
                             मुझे चरण सिंह ने एक पौधा दिखाकर हिदायत दी कि, यह "छरमरा" नामक एक ज़हरीली बूटी है... इसके सम्पर्क में आने से सिर में दर्द और चक्कर आने शुरू हो जाते है, इन पहाडों में बेशुमार जीवनदायी बूटीओं के साथ-साथ... बहुत विषैली जीवनहरनी बूटीयां भी हैं...... इसलिए किसी भी बूटी, फल या फूल के प्रति अपने आकर्षण पर काबू रखे, यह आकर्षण घातक भी सिद्ध हो सकता है......... चरण सिंह की बात सुनते-सुनते ही मेरा हाथ एकाएक रास्ते पर जगह-जगह उगी बिच्छू बूटी से छू गया, तो फिर से वही भयानक लहर तन-बदन में दौड़ने लगी, परन्तु तभी राणा चरण सिंह ने वहीं से एक बूटी तोड़ मेरे हाथ पर मल दी और कहा कि यह बिच्छू बूटी के विष को काटने वाली "ओवल" नामक बूटी है..... सच में ओवल के मलने के बाद दर्द की लहर एक दम से शांत हो गई.......
                     जैसे-जैसे मैं गज पर्वत के ओर बढ़ रहा था, तो उस प्राकृतिक सुषमा को देख मुझे ऐसी अनुभूति हो रही थी, कि इस सांसारिक मोह नगरी को छोड़ मैं जीवित ही स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ......... और अब हम दोनों गज गिरिराज के चरणों में पहुंच चुके थे........ "बकरोट" नाम बताया मुझे चरण सिंह ने इस "स्वर्ग के द्वार" का, जिस पर बर्फ के ग्लेशियरों ने सफेद रंगी स्वागती गलीचा बिछा रखा था...... और गज पर्वत में से प्रपात रुपी गज नदी उस बर्फ के ग्लेशियर को भेद कर भूमिगत रूप में हमारे सामने आ निकल रही थी...... और एक बात,  गर्मियों के मौसम में जमी हुई बर्फ के पास पहुंचने का अपना एक अलग ही आंनद होता है, दोस्तों.......
                                गज नदी के इतिहास को मुख्यतः बाकी और इतिहासों की तरह ही महाभारत काल से पाण्डवों के साथ जुड़ा बताया मुझे चरण सिंह ने...... पाण्डवों के वनवास के समय जब पाण्डव हिमालय भ्रमण के दौरान इस स्थान पर पहुंचे तो........ माता कुंती को प्यास लगी, परन्तु पानी यहां कहीं भी उपलब्ध नही था, तो महाबली भीम ने अपनी गजा (गदा) से  इस विशाल पर्वत के मध्य प्रहार किया और वहां से एक जल की धारा फूट पड़ी, जो कि इस पर्वत के शिखर पर स्थित लमडल झील के जल की है.........इसी वजह से इस पर्वत का नाम गज पर्वत पड़ा......और जिस स्थान पर हम दोनों खड़े हमारे पैरों के नीचे 30 फुट के करीब ग्लेशियर की पक्की बर्फ थी, गज नदी की धारा के अलावा सामने दूसरी तरफ एक और दुधिया रंगी जलधारा भी काफी ऊंचाई से नीचे गिर रही थी,जिसे चरण सिंह ने "माता कुंती की बतरी धारा" नाम से सम्बोधन किया..... मतलब कि, माता कुंती के दूध की धारा...... मैने मन ही मन कहा कि, किस्से-कहानियाँ तो आदिकाल से ही राजाओं और अमीरों की बनती रही है, गरीब को कौन पूछता था... और आज भी यह दस्तूर ज़ारी है......
                               अब चरण सिंह ग्लेशियर के ऊपर से चल कर ऊपर की ओर चढ़ने लगे..... और मैं उनके पीछे-पीेछे.... और मेरी नज़र किसी एक जगह टिक नही पा रही थी, हर तरफ की सुन्दरता मुझे पूछ रही थी..... "तू बता विकास,  कि मैं झरना सुंदर, या वो गज पर्वत, या वो बह रही गज नदी, या वो गगन को छूने की दौड़ में लगे पेड़, या वो पत्थरों के ढेर पर फैली हरियाली और उसमें उछलकूद कर रहे रंगबिरंगे पुष्प....."  परन्तु मैं मौन हो सब सुनता रहा, प्रकृति के इस मुश्किल प्रश्न को .... क्योंकि मैं निश्चय ही नही कर पा रहा था, कि कौन ज्यादा सुन्दर है...... बस उन सब नज़ारों को उमर भर के लिए अपनी आंखों में कैद कर रहा था............
                   
                                                                                                           ......................(क्रमश:)
"स्वर्ग की सीढ़ियाँ "











बकरोट में शुरू हुआ ग्लेशियर..... और चरण सिंह 
स्वर्ग के द्वार पर खड़े चरण सिंह मेरी प्रतीक्षा करते हुए....

गज गिरिराज के चरणों में खड़ा... मैं

माता कुंती की दुधिया रंगी बतरी जल धारा.... 

अमलू के खट्टे पत्ते... 

गज नदी के प्रपात को निहारते अपनी चिरपरिचित मुद्रा में चरण सिंह... 

"कभी आगे देंखूँ ....तो कभी पीछे"........पीछे छूट चुके बग्गा का दृश्य 

छरमरा का विषैला पौधा,  जो कांग्रेस घास की भांति ही नज़र आता है... 

गज नदी के उद्गम स्थल पर हम दोनों.... और मेरे हाथ में अमलू के पत्ते..

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(1) " श्री खंड महादेव कैलाश की ओर " यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(2) " चलो चलते हैं, सर्दियों में खीरगंगा" यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(3) करेरी झील, " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा " यात्रा वृतांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें

भाग-11 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-11  पैदलयात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                 
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                            मैं हम से रुठ गए हमारे मददगार चरण सिंह को मुझे लमडल ले जाने के लिए मना रहा था...... परन्तु उनका रुठना जारी ही रहा..... वैसे तो मैं बहुत अकडू स्वभाव का हूँ, परन्तु इस स्थिति में मुझ में परिवर्तन जाने कैसे हो गया.... अंतत: मैने चरण सिंह के आगे अपने दोनों हाथ जोड़े और गज पर्वत की तरफ देख कर बोला..... राणा जी, यदि आप मुझे इस पर्वत के शिखर तक ले जाए और फिर भगवान शंकर की पवित्र झील लमडल के दर्शन करवा लाये, तो मैं तमाम उमर आपका कर्जदार रहूंगा.................... मेरे दिल से निकले इन सच्चे शब्दों ने राणा चरण सिंह के दिल को छेड़ दिया और वह मेरी तरफ देख कर बोले....... "पंडित जी, क्या भाग सकोगे मेरे पीछे-पीछे "...........मैने झट से कहा... "राणा जी, यदि आप बीस कदम भागोंगे...तो मैं अठारह कदम तो आपके पीछे भाग ही लूंगा "..........और चरण सिंह एकाएक उठे और बोले,"चलो अब चलते हैं "........
                                 चरण सिंह बोले कि आप अपना साथ ले जाने वाला जरुरी सामान इक्ट्ठा कर लो, जब तक मैं चाचा के घर में भाभी को बोल आता हूँ, कि मैं आपके साथ जा रहा हूँ और पीछे से वे मेरी भैंसों और ऋषभ की रोटी-पानी का पूरा ख़्याल रखे........ मैने झट से अपनी रक्सक पैक कर पीठ पर डाल झोपड़ी से बाहर निकल कर गज पर्वत के शिखर की ओर देख कर मन ही मन कहा, " हे गज... मैं आ रहा हूँ, मुझे स्वीकार करो "............एकाएक मेरे अवचेतन मन में मुझे गज पर्वत के मधुर बोल सुनाई दिये.......... "स्वागत है मानुष, प्रकृति ने मुझे तेरे सुखों के लिए ही गड़ा है...... विधाता के नियम अनुसार मेरे ज़िम्मे तुम्हें निर्मल जल, फल-फूल, खनिज, जड़ी-बूटी तथा वन संपदा देते रहना है..... आओ, मेरे शिखर पर चढ़ो, मैं तुम्हें रोमांच की चरम सीमा की अद्भुत अनुभूति करवाऊंगा.......... और मेरे शिखर से इस सृष्टि की सुन्दरता को देखो..... "
                           "चले पंडित जी अब ".........मेरी गज पर्वत से हो रही इस अलौकिक वार्ता का क्रम टूटा, राणा चरण सिंह के इस कथन द्वारा............ अपने कंधे पर एक गर्म कम्बल और छड़ी ले तैयार खड़े थे चरण सिंह......  ऋषभ ने मुस्कराते हुए हमे विदा किया और हमने हंसते हुए एक-दूसरे को कहा कि भाई अपना-अपना ख्याल रखना.........
                              दोस्तों, सच बताना कि आपको इस रोमांचक पदयात्रा पर मेरे साथ-साथ जाने का आभास हो रहा है या नही............ तो लो, अब शुरू हो रही है लमडल के लिए आगे की पदयात्रा........ पर चरण सिंह चल नही भाग रहे थे, ऐसे जैसे की गज नदी भाग रही थी और मैं ग्लेशियर से निकली एक नन्ही सी बूँद की चाल के समान चल पा रहा था, जो कि गज नदी में मिलने के लिए प्रयासरत हो....... यानि कि मुझ से दस गुणा तेज थी राणा चरण सिंह की चाल,  या वो जानबूझ कर मेरी परीक्षा ले रहे होंगे.....खैर थोड़ी देर बाद ही वह मेरी दशा समझ गए और उन्होंने अपनी चाल मेरे मुताबिक धीमी कर ली.......
                              मुझे अब वह प्राकृतिक सौंदर्य नजर आ रहा था, जो कल रात के अंधेरे में चरण सिंह के डेरे पर आने के समय दिखाई नही दे रहा था..... हर तरफ देवदार, राई, गूं, अेस आदि के गगनचुंबी पेड़ों की भरमार थी, इन पेड़ों के बारे में चरण सिंह ने बताया कि इस घाटी के बहुत सारे पेड़ अंग्रेजों के द्वारा उनके शासनकाल में लगवायें गए थे, और इन पेड़ रोपन क्रम में उनके स्वर्गीय पिता जी भी शामिल थे......  चरण सिंह ने मुझे कई पेड़ दिखाये जो कि उनके पिता, चाचा व दादा द्वारा लगाये गये थे और बग्गा के रास्ते में आई एक समतल जगह दिखाई, जिस पर उस समय इन पेड़ों को तैयार करने के लिए अंग्रेजों की पौध-नर्सरी होती थी.......... अब मुझे समझ में आया कि, हिमाचल प्रदेश में पहाडों पर इतने पेड़ों के होने में आजादी से पहले की अंग्रेजी हुकूमत का बहुत योगदान रहा है, क्योंकि अंग्रेज भी मेरी तरह ही पहाडों के दीवाने थे........ और पहाडों पर जितने भी पर्यटक  स्थल विकसित हुए हैं, सब अंग्रेजों द्वारा ही स्थापित किये गए हैं.....जैसे शिमला, डलहौजी, मंसूरी जैसे बेशुमार नाम हैं दोस्तों.........
                              जिस पहाड पर हम चल रहे थे उसके सामने वाले पहाड पर गज नदी के किनारे एक काफी खुली व समतल जगह पर कुछ घर नजर आए, तो चरण सिंह बोले, "लो भाई जी, आपका बग्गा आ गया ".........यहां आप लोग कल रात में आना चाहते थे और हम इस स्थान को स्थानीय लोग बग्गा नही "बग्ग" कहते हैं....... बग्ग का अर्थ होता है, जो धरती बग्ग रही हो.... मतलब जिस पर खेती हो रही हो और खेती का नाम सुन कर मैने चरण सिंह से कहा, "भाई मैं पंजाब में खेती भी करता हूँ "........चरण सिंह ने फिर से मेरा परीक्षा लेते हुए पूछा, " अच्छा तो यह बताओ.... पंडितजी यह बग्ग वाली सारी जगह कितनी होगी "........मैने अनुमान लगाया और बोला.... राणा जी, दस एकड़........ तो चरण सिंह बोले, हां बिल्कुल सही यह 82कनाल जमीन है.... जो सरकार ने दो स्थानीय गांवों के गद्दी लोगों को गर्मीयों के मौसम में अपनी भेड़-बकरी रखने के लिए यह जगह दी है.....तो मैं बोला, "ठीक है.... पर खेती कहां हो रही है राणा जी "..........
                          चरण सिंह बोले, "पहले होती थी यहां खेती और हम रैयल धार पहाड पर अपने डेरे के आसपास भी करते थे खेती, आलू और मक्की आदि की खेती........ परन्तु अब जंगली जानवर बहुत हो गये हैं इन पहाडो में.....सब उजाड़ देते हैं, इसलिए हम गद्दी लोग इन इलाकों में अब खेती नही कर पाते.... बस भेड़-बकरी चराते है अब "..........बग्गा में कई भेड़-बकरी वाले गद्दीयों के डेरे और एक सराय भी है, जो कि लमडल के दो दिवसीय वार्षिक मेले "नौयान"के समय पदयात्रियों के ठहरने के लिए इस्तेमाल की जाती है........
                             और उन खूबसूरत पहाडों की वीरानी को तोड़ती एक नन्ही सी गद्दी लोगो की बस्ती "बग्ग" की कुछ तस्वीरें खींच कर हम दोनों आगे बढ़ गए गज नदी की ओर......
             

                                                                        ............................(क्रमश:)
अंग्रेेजों के समय की पौध-नर्सरी वाली समतल जगह पर खड़े चरण सिंह.... 
आखिर मेरी मेहनत रंग लाई..... राणा चरण सिंह मुझे ले लमडल की ओर चल पड़े..... 

धौलाधार हिमालय में गद्दीयों की बस्ती... "बग्गा"

कंधों पर लाठी,  उसपर हाथ रख चलना... यह चरण सिंह की मस्त चाल थी.. 

अपनी दिनचर्या में व्यस्त बग्ग वासी 

बग्गा की सराय... जो दो दिवसीय वार्षिक मेला "नौआन" के समय पदयात्रियों को सुविधा प्रदान करती है...

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भाग-10 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-10  पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                     
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                             राणा चरण सिंह के गद्दी डेरे पर सुबह तड़के एक आवाज़ से मेरी नींद टूटी, वो आवाज़ थी चरण सिंह के हाथों द्वारा चलाई जा रही दूध को रिड़कने वाली मधानी की...... और तभी मैने अपने सिर में हो रहे भयंकर दर्द को महसूस किया और झट से समझ गया कि, यह भयंकर सिर दर्द क्यों हो रहा है......... मैं ऊँचाई रोग (  High altitude sickness)  नामक बीमारी का शिकार हो गया था....... यह बीमारी हम मैदानी लोगों को पहाड़ की ऊंचाई पर जाते हुए अक्सर हो जाती है....... क्योंकि जब एक मैदानी व्यक्ति एक दिन में समुद्र तट से 1500मीटर-2500मीटर की ऊंचाई तक चला जाएे, तो वातावरण में आक्सीजन के घटते स्तर से उस के शरीर के खून और तंतुओं में भी आक्सीजन की कमी होनी शुरू हो जाती है...जब कि मैं तो 3000मीटर के करीब पहुंच चुका था..... इस बीमारी का मुख्य लक्षण सिर में भयंकर दर्द और भूख का एक दम से बंद हो जाना......और यह बीमारी हर किसी को नही दबोचती, अपने-अपने स्वास्थ्य स्तर की बात है,  क्योंकि ऋषभ इस बीमारी से बच गया......... खैर ऐसे ही सुबह तक मैं लेटा रहा और चरण सिंह ने उठाया कि, भाई चाय तैयार है उठकर पी लो....
                               उठ कर सबसे पहले मैे झोपड़ी से बाहर का नज़ारा देखने के लिए लपका......... क्या हसीन दिलकश नज़ारा था, हम धौलाधार हिमालय की गोद में थे..... सामने गज पहाड़ सीना ताने खड़ा था और सूर्योदय का प्रकाश  गज पर्वत के पीछे से आ रहा था, पंछियों की चहचहाहट, गज नदी का बज रहा जल-तरंग और वादी की सुन्दरता एक अलौकिक अनुभूति करा रही थी......... परन्तु सिर में हो रहा वो भयंकर सिर दर्द सब पर भारी पड़ रहा था........... हम सुबह के कार्यक्रम से निवृत होने में लग गए, तो इतने में चरण सिंह ने भी जल्दी से खाना बनाकर हमारे आगे परोस दिया......... परन्तु मुझे भूख कहां, सिर्फ दो कोर खाना लिया कि कुछ दवाई खा सकूं और खाना बीच में छोड़, दवा खा कर मैं फिर से लेट गया और मुझे नींद भी आ गई.......
                                 नींद खुली, दवा काम कर गई... अब मैं बिल्कुल ठीक था और समय देखा तो 9बज चुके थे...... एक झटके से उठ कर बाहर आया तो देखा कि, चरण सिंह धूप में बैठे हुक्का पी रहे थे और ऋषभ उनके पास बैठ अपने पैर पर लगी चोट पर हुई सूजन पर मालिश कर रहा था........ मैने उनके पास जा बड़ी गर्मजोशी से कहा, "राणा जी, अब क्या प्रोग्राम है ".........परन्तु चरण सिंह ने कोई खास प्रतिक्रिया नही दिखाई..... सिर हिला कर हुक्के के दो-चार कश खींच लिये, मैने फिर से पूछा, तो चरण सिंह उखड़े से बोले, "भाई जी, तुम खुद ही निकल लो लमडल को, यह रास्ता जाता है "........इनकी यह बात सुन मेरा माथा ठनका, कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है हमसे..... कि जो आदमी कल से अपनो की तरह हमारी सेवा में जुटा हुआ है, वह अब एक दम से पराया सा क्यों हो गया...... चरण सिंह फिर बोले, "मुझे बहुत काम है 'लिंगडू' (एक पहाड़ी जंगली सब्जी) का मौसम है और मैने लिंगडू इक्ट्ठा कर धर्मशाला शहर में जा कर बेचना है और मेरी एक भैंस कल रात जंगल से वापस नही आई, उसके पाँव में जख़्म है उसको भी ढूढंने जाना है..... वगैरा-वगैरा......... "
                               मैने स्थिति को अपनी "तुच्छ सोच" अनुसार समझते हुए चरण सिंह से कहा, कोई बात नही राणा जी....माना कि लिंगडू बेच कर आप पैसा ही कमायेगें, परन्तु मैं आपकी हानि नही होने दूगां, मैं आपको मुझे लमडल ले जाने के लिए एक "आर्कषक परिश्रम " दे देता हूँ...... परन्तु मेरी सोच के उलट चरण सिंह ने मेरी इस बात पर जरा ध्यान नही दिया और मेरी पेशकश को सिरे से नकार दिया........ और मेरी पैसागिरी अकड़ उसी समय धराशायी हो गई..........
                               मैं एकाएक ठगा जा महसूस करता हुआ, कभी ऋषभ की तरफ देखूं तो कभी चरण सिंह की तरफ..... परन्तु चरण सिंह मुझसे आंख तक भी नही मिला रहे थे, बस एक तरफ मुंह करके हुक्का पीये जा रहे थे.....अब हालात ऐसे बन गए थे, कि ऋषभ के चोटिल होने की वजह से वह आगे या फिर वापस जाने में भी असमर्थ हो चुका था और मैं किसी भी हालत में अपनी मंजिल के आधे रास्ते से खाली हाथ वापस नही जाना चाहता था, मेरे पास अपनी मंजिल को पाने की एकमात्र उम्मीद थे "राणा चरण सिंह जी "....क्योंकि मुझे अब आभास हो चुका था कि बगैर किसी स्थानीय की मदद के मैं गज पर्वत पर चढ़ कर लमडल तक नही पहुंच सकता, यदि ज़िद या हठ में अकेला ही उस ओर चल दिया......तो यह बात मेरे लिए "आत्महत्या " भी सिद्ध हो सकती है........
                               आदिकाल से क्षत्रिय(राजपूत) से कैसे राज्य का कार्य आदि चलवाना है, यह ऋषि(ब्राह्मण) भालिभांति जानते हैं....... सो मैने स्वार्थी हो, इसी तर्ज पर राणा चरण सिंह को हालात अनुसार फिर ठंडे दिमाग से कुरेदना शुरू कर किया...... और आखिर में चरण सिंह पहाड़ी भाषा में  बोले, "तूसां नू मुंजो बनाई रोटी पंसद ना आवे"..........(मतलब कि, मैने सुबह आप लोगों के लिए इतने प्यार से खाना बनाया..... और वह आपने नापंसद कर, बीच में ही छोड़ दिया).......
चरण सिंह की मासुमियत भरी बात सुन मैं और ऋषभ जोर से हंसने लगे और झट से चरण सिंह की हमारे प्रति मनोस्थिति समझ गया और मैने चरण सिंह को अब अपनी सफाई में समझाना शुरू कर दिया........... कि "मैने खाना इस लिए कम खाया, क्योंकि जब भी मैं एक दिन में पहाड़ की एक निश्चित ऊँचाई से ऊपर चला जाता हूँ, तो मेरी भूख मर जाती है और अक्सर सिर में दर्द शुरू हो जाता है.......चरण सिंह जी, यह एक ऊँचाई की बीमारी है.... जिसे हम मैदानी इलाकों में रहने वाले जब कभी पहाड़ की ऊँचाई पर पैदल जाते हैं, तो पहले-पहल इस बीमारी से अक्सर रुहबरुह होना पड़ता है,जी....बाकी आपके बनाये खाने और अतिथि सेवा में कोई कमी-पेशी नही है......कमी तो मुझ में है.........!"
                   

                                                                              ..............................(क्रमश:)
सुबह दूध रिड़क रहे.... राणा चरण सिंह 

धौलाधार हिमालय के पीछे से आ रहा सूर्योदय का प्रकाश.... 

रैयल धार पर्वत पर राणा चरण सिंह का गद्दी डेरा... 

यह जनाब हमें बार-बार देख रहे थे,  कि ये कौन मेरे घर में घुस आए हैं..... 

रैयल धार पर्वत पर नदी के किनारे राणा चरण सिंह के पारिवारिक गद्दी डेरे..... 

डेरे के पास ही नदी पर बना लकड़ी का पुल... 

बस यह भोजन ना खाना.... महंगा पड़ गया,  दोस्तों

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भाग-9 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-9 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                       
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                          जैसे पिछली किश्त में मैने आपको बताया था कि फिसलने से ऋषभ के पैर में चोट लग गई थी और बूट डाले होने के बावजूद भी पैर के अंगूठे का नाखून कुछ उखड़ गया था.........
                          रात के आठ बजे से ऊपर का समय हो चुका था, राणा चरण सिंह बोले..... चलो धीरे-धीरे चलते हैं, अब डेरा कोई ज्यादा दूर नही है....और ऋषभ हिम्मत कर खड़ा हो चल दिया........ पौने घंटे के बाद एक नदी पर बने कच्चे पुल को पार कर आखिर हम चरण सिंह के डेरे पहुंच गए और मैने समय देखा, तो रात के नौ बज चुके थे........
                        मिट्टी के तेल से चलने वाले दीये से रोशनी कर...... सब से पहले चरण सिंह ने दूध गर्म किया और एक सभ्य शहरी की तरह ही हमे गर्म दूध के साथ बिस्कुट प्रस्तुत कर अपनी मेहमान नवाज़ी का आरम्भ किया............ फिर तत्पश्चात हमे गर्म पानी दिया, ताकि हम अपने हाथ-मुँह धो सके और कहा कि मैं खाना परोसता हूँ.......हमने अपनी रक्सकों से खाना निकाल कर बाहर रखा, तो चरण सिंह बोले, "ब्राह्मण देवता अब अपना भोजन रहने दे, कृपया मेरा अतिथ्य  स्वीकार करे ".........मैं उनकी बात सुन कर हंस दिया और बोला, राणा जी....चलो जैसी आपकी मरजी जी.....और हम दोनों भाइयों को वो खाना परोसा, जो चरण सिंह अपने घर से साथ लाये थे, मैने इन से कहा कि यह भोजन तो किसी उत्सव का लगता है, तो चरण सिंह ने कहा..... कि आज मेरे स्वर्गीय पिता का चोबरक( चतुर्थ बरसी) था, सारे गांव और रिश्ते-नातेदारों को भोजन का न्यौता दिया था, तो मैने झट से हमे रास्ते में राणा रोशनलाल उत्तम जी का जिक़र किया, जिनके साथ हम गेरा गांव से रावा गांव तक आए थे....चरण सिंह बोले, हां वे हमारे रिश्तेदार है और हमारे पास ही आज इस मौके पर आए थे..........
                       रात्रिभोज बहुत स्वादिष्ट था दोस्तों...चने, रोटी, चावल, पनीर का मंदरा(हिमाचली व्यंजन) और मीठे में हलवा तथा मीठे चावल......... सलाद में पहाड़ी खीरा, यह सब व्यंजनों का स्वाद में जीवन भर नही भूल सकता........किसी पांच सितारा होटल में मोमबत्ती प्रकाशित रात्रिभोज में भी वो आनंद की अनुभूति नही हो सकती, जो इस दीये की लौ में किये भोजन और चरण सिंह की मेहमान नवाज़ी से हो रही थी........ सोच रहा था दिमाग में उस समय कि, " वाह रे विकास नारदा.... कभी पहले सोचा था कि एक दिन ऐसे किसी पहाड़ के बियाबान जंगल में एक गद्दी की झोपड़ी में उसके पशुओं के साथ बैठ मटरपनीर की दावत भी उडाएगा "
                       रात्रि भोजन करने के पश्चात चरण सिंह ने अपना हुक्का भरा और कश खींचते हुए मुझे बोले, "अच्छा तो पंडितजी...आप ब्रह्म हो तो मुझे कुछ ज्ञान दे".........मैं हंस दिया और बोला, "पूछिए जनाब... आप किस विषय पर विचार-विर्मश करना चाहते है" और फिर कुछ धार्मिक बातों का दौर चला और उल्टा  मैं राणा चरण सिंह के ज्ञान को देखकर आर्चरज में पड़ गया कि एक भेड़-बकरी चराने वाला गद्दी इतनी ज्ञान की बेशुमार बातें भी कर सकता है........
                       चरण सिंह के डेरे के आसपास तीन और झोपड़ियाँ भी थी, जोकि चरण सिंह के पारिवारिक सदस्यों की ही थी, यह सब डेरे मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और टीन का एक अस्थाई ढांचा हैं, जिसे वह परिवार साल के कुछ महीने इस्तेमाल में लाता है और बर्फ गिरने से पहले इन घरों की छते उतार कर यह लोग नीचे अपने गांव रावा में चले जाते हैं क्योंकि यहां कई फुट बर्फ पड़ जाती है......... इन झोपड़ियों का भीतरी डिजाइन मुझे बहुत पंसद आया, इन झोपड़ियों को चार भागों में बांटा गया है, सबसे पहला भाग पशुओं को बांधने के लिए, उसके से एक स्तर ऊपर मध्य में दीवार कर आधे हिस्सा में रसोई और बाकी में एक बंद कमरा, यहां नवजन्में पशुओं के बच्चों को ठंड से बचाने के लिए रखा जाता है और उस छोटे से कमरे की छत पर दो-तीन लोगों के सोने योग्य एक ऊंची व सुरक्षित जगह, जिसकी सीढ़ी रसोई की तरफ से जाती है...... और इस सारे ढांचे के ऊपर एक सम्पूर्ण छत........
                       ऋषभ के पैर पर अब सूजन काफी बढ़ गई थी, जिससे यह तो तय हो गया था कि...... अब आगे का सफर ऋषभ के बस से बाहर है...... परन्तु मैं तो हमेशा अपनी धुन का पक्का रहता हूँ, मन में ठान लिया, कि अब ऋषभ को चरण सिंह के डेरे पर छोड़.... कल सुबह आगे का सफर करूं और चरण सिंह से आग्रह किया कि आप ही मुझे लमडल तक ले जाए....चरण सिंह बोले, आप अभी सो जाईएे, कोशिश तो यह ही रहेगी कि मैं ही आपको लमडल ले जाऊं या फिर किसी और आदमी को आप के साथ भेज देंगे...कल सुबह को देखेगें........
                       सो, अब सोने की तैयारी शुरू हुई तो चरण सिंह ने हमे कम्बल आदि देने चाहे तो मैने कहा, कि राणा जी हमारे पास सब इंतजाम है, आप जैसे और रोज यहां सोते हो, वही सोईये...... हम आपके घर मे नये हैं और नई जगह कहीं भी सो जाएगें, आप तंग मत होना हमारी वजह से......परन्तु चरण सिंह कहां मानने वाले थे और हमे झोपड़ी की उस ऊंची व सुरक्षित जगह पर चढ़ा दिया ......और खुद नीचे रसोई वाले हिस्से में यह कहते हुए लेट गए, कि मुझे प्रात: जल्दी उठ कर पशुओं का दूध भी दोना है, यदि आपके साथ सो गया तो सुबह उठते समय आपकी नींद खराब होगी
                       सो हमने अपने बिस्तर खोले और मैं अपने -10डिग्री के स्लीपिंग बैग की जिप खोल कर उस में घुस गया........ सारे दिन में जल्दी-जल्दी बदल रहे घटनाक्रम पर सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई पता ही नही चला...............
           
                                                                           ............................(क्रमश:)
राणा चरण सिंह के डेरे के साथ बहती नदी पर बना एक कच्चा पुल... 

राणा चरण सिंह ने अपनी मेहनवाज़ी का आगाज कुछ इस तरह से शुरू किया.... 

और,  मेहमान नवाज़ी की एक सभ्य शुरुआत... 

मुझे इस अन्न के एक-एक दाने का स्वाद पूरे जीवन याद रहेगा.... दोस्तों 

"दीया प्रकाशित रात्रिभोज"  का सुखद अहसास... 

भोजन का आरंभ भी मीठे हलवे से.... 

और,  अंत भी मीठे चावलों से.... 

राणा चरण सिंह हुक्का घुडघुडाते हुए.....

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भाग-8 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास.....Lamdal yatra via Gaj pass(4470mt)

भाग-8 पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास (4470मीटर)
                     
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                                   अब मैं और ऋषभ नारदा......राणा चरण सिंह जी के साथ बग्गा जाने की बजाय उनके डेरे की तरफ चलने को तैयार थे, तो चरण सिंह की भतीजी ने कहा कि.... चाचू तुम ही इनको लमडल भगवान के दर्शन करवा लाओ....... और हमे खाने के लिए एक-एक कच्चा पहाड़ी फल जो कि आडू जैसा लग रहा था.....दिया, जो बहुत ही स्वादिष्ट था.......
चरण सिंह बोले, अभी तो चलते हैं सुबह देखेगें...कि क्या इंतजाम होगा, सो चल दिये हम दोनों भाई उनके पीछे-पीछे......
                       मेरे मन में बस एक ही ख्याल बार-बार आ रहा था, कि यदि हमारे और चरण सिंह के मिलन में क्षण भर का भी अंतर हो जाता,  और हम उस गलत रास्ते पर बढ़ जाते,  तो भगवान जाने कौन-कौन सी मुसीबत हमारा राह देख रही होती ....... यह सोच मेरे मन को विचलित और तन को कपकपा रही थी........ मुझे चरण सिंह में भगवान शिव के दिव्य दर्शन हो रहे थे,कि उन्होंने ही इन सज्जन को हमे अपने तक पहुंचाने के लिए हमारी सहायता करने हेतू भेजा है.........
                       कुछ आगे चले तो गज नदी पर बना लकड़ी का पुल पार कर एक वीरान छोटी सी जगह आई,  यहां बहुत सारी मशीनें आदि पड़ी थी...क्योंकि वहां सत्य साई गज प्रोजेक्ट का काम चल रहा था जो अब बंद पड़ा था....वहां से पहाड में सुरंग बनाई जा रही थी, जिसमें गज नदी का पानी डाल कर नीचे बन रहे बिजली उत्पादन प्रोजेक्ट में ले जाना था............ आगे फिर से एक छोटा लकड़ी का पुल आया और उसके नीचे गज नदी का पानी तेज प्रवाह में ऐसे बह रहा था, कि मानो पुल पार करने में कोई गलती हुई और वह हमे अपने आप में ही समा ले.....ऋषभ की पूरी जिम्मेदारी अब चरण सिंह ले रहे थे, वह उसके साथ-साथ चल कर उसकी पूर्ण सहायता कर रहे थे, इसलिए मैं अब  निश्चिंत हो कर उनकी भतीजी के साथ और  उन से आगे चल रहा था........
                       चरण सिंह ने मुझे बताया कि इस गज प्रोजेक्ट वाली जगह को हम स्थानीय लोग "नकेडा" कहते हैं और वो देखो सामने दूसरे पहाड पर यह छोटी सी पगडंडी भी.....यही से ही बग्गा के तरफ जाती है....... और यह देख-सुन कर मैं चरण सिंह के आगे अपने कद को छोटा होते हुए महसूस कर रहा था, कि कहां यह एक भेड़-बकरी वाला देहाती पहाड़ी गद्दी और कहां हम सभ्य बने शहरी, जो किसी पूछने वाले को रास्ता बताने के लिए,रुकते तक नही...... क्योंकि हमे तो अपनी ही दौड़ की सनक है और हमे उस राहगीर से क्या लेना-देना होता है........ जबकि राणा चरण सिंह जी से मैने तो सिर्फ रास्ता ही पूछा था, वह हमे बग्गा के इस सही रास्ते पर डाल कर खुद अपने रास्ते भी बढ़ सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नही किया...... और हम अनजान अजनबीयों के मददगार बन, हमे साथ ले अपने डेरे की तरफ जा रहे थे.........
                       गज नदी को पार कर अब हम एक पहाड पर चढ़ते जा रहे थे, और इस पहाड का नाम मुझे बताया गया "रैयल धार"......रास्ता तो मुझे कम ही नज़र आ रहा था, बस झाड़ियों के बीच-बीच में से निकल कर आगे बढ़ रहे थे......... और सूर्यास्त के बाद घने जंगल में एक दम से अंधेरे का साम्राज्य छा गया और मैने व ऋषभ ने अपनी टार्च निकाल ली, जबकि चरण सिंह ऐसे ही अंधेरे में चलते जा रहे थे....... मुझे आश्चर्य हुआ, मैने उनसे इस बारे में पूछा, तो वह बोले कि हमे अंधेरे में रास्ते पर पड़े पत्थरों की चमक से रास्ते का ज्ञान होता रहता है, मैने अपनी टार्च बंद कर ली,ताकि एक और नया तजुरबा कर सकूं....... सच में घोर अंधकार में भी रास्ते में गड़े हुए पत्थर एक हल्की सी लौ छोड़ रहे थे........और  चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा और उस ख़ामोशी को चीरता गज नदी के पानी का शोर........
                       हमे लगातार चलते-चलते दो घंटे के करीब हो चुके थे, कि मुझे एक आग की रोशनी सी दिखी, मैने सोचा चलो शुक्र है, कि हम डेरे पहुंच गए.... परन्तु एक गुफा से आ रही रोशनी की तरफ मुख कर दूर से चरण सिंह ने आवाज़ लगाई, "ओ पंजी ओ....ठीक है "  कह कर आगे बढ़ गए और बोले हमारा डेरा अभी और आगे है........
                       दोपहर को हुई बारिश से रास्ता कई जगह तो कीचड़ से बहुत फिसलनदार हो चुका था, कई बार तो फिसल चुके थे हम....... पर इस बार ऋषभ ऐसा फिसला कि उसका पैर आगे एक पत्थर से जा टकराया और अंगूठे का नाखून उखड़ सा गया और अब एक और नई मुसीबत ने घेर लिया हमें.........
           

                                                 
गज प्रोजेक्ट नकेडा में गज नदी की सहायक,  एक और नदी पर बना लकड़ी का पुल 

गज प्रोजेक्ट नकेडा 
हमे यह पुल बहुत खूबसूरत लग रहा था,  कई सारी फोटो इस पुल पर हम दोनों ने एक-दूसरे की खींच डाली.... 

चरण सिंह ने ऋषभ की पूरी जिम्मेदारी संभाल रखी थी.... 

गज नदी पर बने इस खतरनाक पुल से ऋषभ को पार करवाते चरण सिंह... 

जहाँ हम दोनों नकेडा पुल पर अपनी फोटो खींचने में व्यस्त थे.... तो चरण सिंह आगे रुके,  हमारा इंतजार कर रहे थे.. 

गज नदी पर बन रहे प्रोजेक्ट का रैयल धार पर चढ़ाई करते हुए लिया चित्र.... इस चित्र में टनल भी दिखाई दे रही है... 

गज नदी की अनुपम सुंदरता..... बार-बार मेरा ध्यान आकर्षित कर रही थी....

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