रविवार, 11 फ़रवरी 2018

भाग-1 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "


                  मित्रों जय हिंद..... इस नई धारावाहिक चित्रकथा में मैने एक नया प्रयास किया है,  कथा को लिखने के साथ-साथ...  खुद बोल कर भी आपको कथा सुना रहा हूँ, क्योंकि व्यस्त जीवन शैली में शब्दों को पढ़ने में भी समय लगता है। परन्तु अब आप जब चाहे मेरी कथा को सुन भी सकते हैं। आशा है कि मेरा यह प्रयोग आपको बेहद पसंद व सुविधाजनक लगेगा और मेरी नज़र में ब्लॉग पर यात्रा वृतांत सुनाने का प्रयास करने वाला शायद मैं पहला व्यक्ति हूँ।
                     लीजिए पेश है मेरी धारावाहिक चित्रकथा, करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा " का मौखिक व्याख्यान........
         
                                         भाग-1    करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

                                              मैंने अपनी जवानी व्यायाम शाला में लोहे से दो-दो हाथ कर, ताइक्वांडो मार्शल आर्ट के अभ्यास से अपनी हड्डियां तोड़वा और बाँसुरी को फूँकने में बिता दी.......... और पर्वतारोहण का शौक आ चिपका जवानी गुजर जाने के बाद, 38 साल की उम्र में.....!
                             सोचता हूँ यदि यह शौक मुझे बीस साल की उम्र में लगा होता,  तो मेरी झोली में अनगिनत पर्वतीय यात्रा की सफलता होती। हिमालय में कुछ ऐसी दुर्गम यात्राएँ कर जाता,  जो आज मेरी जिंदगी का पैमाना होती।                               "परंतु मर जाना यह मन भी बड़ा बेशर्म है जो इसे मिल गया वह खाक़, जो ना मिला वह सोना है....!" दोस्तों इस नई धारावाहिक चित्र कथा को लिख रहा हूँ....जिसमें की हुई यात्रा ने मुझे सामान्य घुमक्कड़ से पर्वतारोही भी बना दिया। मैं इस यात्रा को अपने छोटे से पर्वतारोहण जीवन का आधार मानता हूँ कि शुगल-मेले में की हुई इस यात्रा को मेरा अशांत मन इतनी गंभीरता से ले लेगा.....और, मुझ में भयंकर हिमालय प्रेम जागृत हो जाएगा जो अपने कदमों से हिमालय को नापना चाहता है।
                             सन् 2012 की रुखसती करीब थी, बच्चों को सर्दियों की छुट्टियों में....मैं उन्हें उनके ननिहाल "नवांशहर"  छोड़ने गया था वहाँ मेरे सांढू भाई विशाल रतन जी दिल्ली से अपने बीवी-बच्चों को ले पहुँच चुके थे।
                             हम दोनों ही घुमक्कड़ किस्म के प्राणी हैं.....और बैठे-बैठे ही हम दोनों ने जीवन में पहली बार किसी जगह अकेले घूमने का कार्यक्रम बनाना आरंभ कर दिया और निष्कर्ष निकाला कि चलो हिमाचल चलते हैं क्योंकि सर्दियों में हम दोनों में से कोई भी पहाड़ों पर नहीं गया था....और हम भी उन अधिकांश लोगों की तरह पहाड़ों को केवल गर्मियों की बीमारी का इलाज समझते थे।
                             बातों बातों में ना जाने क्या मेरे दिमाग में कौंधा कि चलो किसी पहाड़ पर चढ़ते हैं और ख़्याल दौड़ चला धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) की ओर। विशाल जी ने झट से अपना लैपटॉप खोल लिया....हाँलाकि मेरी जेब में तब साधारण बोलने-सुनने वाले फोन से कुछ तरक्की हो 2 मेगापिक्सेल कैमरा फोन आ चुका था, जिस पर अभी जुम्मा-जुम्मा मेरी आंखें गूगल कुमार जी से लड़ रही थी। फेसबुक,  व्हाट्स एप, ब्लॉग नाम तो मैंने अभी सुने भी ना थे।
                            लैपटॉप पर उंगलियों की मेहनत से नाम सामने आया "करेरी झील " धौलाधार हिमालय पर समुद्र  तट से करीब 3000 मीटर की ऊंचाई पर जमी हुई झील के साथ अपना नववर्ष मनाने का उल्लास हम दोनों को उत्साहित कर चला।  हैरानी इस बात की हुई जब दोनों बहनों यानी हमारी पत्नियों ने बिना किसी लोलो-पोचो के हमें अकेले जाने की स्वीकृति दे डाली...!!
                            दोनों सांढू अब सोच रहे थे कि यात्रा में क्या-क्या चाहिए,  एक साधारण व्यक्ति सर्दियों में यदि पहाड़ पर मुँह उठाकर चल दे तो उसकी सोच में केवल गर्म कपड़े ही होते हैं... बस इससे ज्यादा हम कुछ भी ना  सोच पाये।यद्यपि सर्दियों में बर्फ भरे गिरिराज से साक्षात्कार करने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है।
                           हमारी हमसफ़र विशाल जी की फोर्ड फिगो गाड़ी बन रही थी तो मैंने तर्क दिया,  "चलो छड़े-मलंगों की तरह चलते हैं... आप अपनी गाड़ी की पिछली सीट फोल्ड कर उसमें बिस्तर बना लो क्यों किसी होटल वाले की कमाई में इज़ाफा करें...!"
                           विशाल जी का पैतृक घर भी नवांशहर में ही है और रोजी रोटी उन्हें दिल्ली में डेरा डालने के लिए मजबूर कर रखे है.... वह भी अपने घर जा कल की तैयारियों में जुट जाते हैं और मैं भी ससुराल से केवल 10 किलोमीटर दूर अपने शहर "गढ़शंकर" में,   शाम को कल सुबह शुरू होने वाली यात्रा की तैयारी में लिप्त हो जाता हूँ।
                          बेटी के पिट्ठू नुमा स्कूल बैग को खाली कर उसमें एक गर्म लोई यानी ओढ़ने वाली चादर,दस्तानें, बंदरटोपी और गर्म जुराबें बाजार से खरीद डाल लेता हूँ... और अपनी तरफ से निश्चिंत हो जाता हूँ कि पहाड़ पर चढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है।
                         धर्मशाला जाने का रास्ता नवांशहर से गढ़शंकर होकर ही जाता है....सो 30दिसम्बर 2012 सुबह 7बजे विशाल जी मुझे ले गाड़ी दौड़ा रहे थे हिमाचल प्रदेश की ओर। मेरी एक बहुत बुरी आदत है मैं कम समय में ज्यादा जगह देखना चाहता हूँ। धुंध से भरी पंजाब की सड़कों को पार कर अपना पहला दर्शनीय पडाव मुकर्रर करता हूँ हिमालय के जिला ऊना में  "ध्यूसर" पहाड़ के शिखर पर बने " सदाशिव ध्यूसर महादेव मंदिर" को।
                         मैं यहाँ कई बार आ चुका हूँ और विशाल जी को नई जगह भी तो दिखानी थी। इस स्थल पर पांडवों के पुरोहित ऋषि धौम्य ने तपकर शिवलिंग स्थापित किया हुआ है। पर्वत शिखर पर बना मंदिर और मंदिर प्रांगण से नीचे दिखती घाटियों की हरियाली मन को भी हरा भरा कर जाती है, परंतु उस समय हरियाली को धुंध ने सफेदी मार दी थी खैर उसे भी देखने का एक अलग ही आनंद था। विशाल जी की वाहवाही लूट गाड़ी वापस चल देती है, क्योंकि एक और नई जगह भी तो विशाल जी को दिखानी है "कालेश्वर महादेव "
                         यह स्थान मेरा मनपसंद स्थान है, यहाँ मैं अनगिनत बार जा चुका हूँ......हाँ सर्दियों में कालेश्वर जाना पहली दफा ही हो रहा था जबकि पहले हर बार सावन के महीने में ही जाना हुआ।
                          पेट ने दिमाग को संदेश भेजा मैं सुबह से खाली पड़ा हूँ, इस बंदे को बोल...कुछ खा ले अब तो दस भी  बज चुके है...!!  रास्ते में एक हलवाई के शो-केस में "गजरेला"  पड़ा चमक रहा था और खींच लिया उसने हमें।
                          विशाल जी की बहन ने रास्ते में खाने के लिए कचौरियां बनाकर साथ भेज दी थी। सुबह का नाश्ता बेहद स्वादिष्ट  "कचौरियां, चाय और गजरेला" को पेट व स्मरण में हावी कर चल देते हैं कालेश्वर की ओर।
                          छोटी सड़कों पर आए छोटे-छोटे गांव बड़ा न्योता देते हैं कि मुसाफिर चंद क्षण रुक मुझसे भी बात कर.......परंतु मैं आंखों ही आंखों में उनसे बतिया आगे बढ़ता रहता हूँ।  सड़क पर एक जगह रुक विशाल जी बिखरी हुई सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करने लग जाते हैं कि कहीं रात में बोन फायर करेंगे, मतलब यारों की मस्ती खूब होने वाली है।कभी हमारा रास्ता सलेटों की छतों वाले आशियानें रोक लेते हैं....तो कभी राह में मिले धौलाधार से नीचे उतर आए गद्दी और उनकी भेड़ें।
                         बाँस की कटाई का मौसम था तो सड़क किनारे सड़क से कटकर आए उम्दा किस्म के बाँसों के ढेर भी कम आकर्षक ना थे..... और हम दोनों सांढू प्रकृति कि हर खूबसूरती संग अपने चित्रों को संग्रहित करते जा रहे थे।
                          कालेश्वर पहुंचते साढे ग्यारह बज चुके थे,  सड़क से दिख रही व्यास नदी को देख विशाल जी बच्चों जैसी चहचहाहट बिखेरते हुए गाड़ी का स्टेरिंग छोड़ सड़क किनारे खड़े व्यास नदी की नीली जलधारा को निहार रहे थे। मैं उनके इस रवैय्या पर सोचता हूँ कि दिल्ली जैसे व्यस्त महानगर की लाल-हरी बत्तियों और लाल-पीली भीड़ से दूर आ व्यक्ति प्रकृति की गीतांजलि सुन, ऐसे ही मस्त हो जाता है जैसे अब विशाल जी हुए जा रहे हैं।
                          कालेश्वर स्थल अपने नाम के अनुरूप कि भगवान शिव को समर्पित स्थल है.... राक्षसों का सर्वनाश करने में लीन मां काली ने अपना पैर पति शिवजी को लगाने का पश्चाताप इसी स्थल पर किया था। यदि आप लोग मेरी कालेश्वर और सदाशिव महादेव यात्रा को विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो मेरे ब्लॉग पर इसे पढ़ भी सकते हैं केवल एक ही लेख में लिखा है।  "मेरी मनपसंद जगह"  और लिंक यह रहा.....https://vikasnarda.blogspot.in/2017/12/blog-post_21.html?m=1.मैं खामखा इस चित्र कथा को ज्यादा लंबा नहीं करना चाहता।
                           कालेश्वर महादेव मंदिर में माथा टेक, व्यास नदी किनारे घूम और बाजार से अपने मनपसंद नारियल के लड्डू खा हम चल दिए धर्मशाला की ओर....... परंतु बीच रास्ते घुमक्कड़ नजरें जा मिली "नगरकोट दुर्ग" जिसे कांगड़ा किला कहा जाता है। बस दोनों की एक राय बन गई और गाड़ी खुद-ब-खुद मुड़ चली पुराना कांगड़ा शहर की ओर...!!
                           दोपहर के ढाई बज चुके थे और किले कभी खाली पेट नहीं देखे जा सकते दोस्तों...!!!!  सो किले के सामने इक्का-दुक्का दुकानों में से एक पर, हमें एक महिला दुकानदार ने घर जैसा खाना खिला दिया। उदर भूख शांत होते ही नयन भूख तीव्र हो चली नगरकोट दुर्ग को देखने के लिए।
                           मैं इस दुर्ग को जीवन में दूसरी बार देखने जा रहा था हाँलाकि इस किले को मैंने पहली बार 30साल पहले देखा था जब मैं केवल 8वर्षीय बालक था और हमारा संयुक्त परिवार दुर्ग में पिकनिक मनाने आया था। 30साल पहले की एक धुंधली सी याद लिये किले के प्रवेश टिकट खरीदें और एक गाइड की मांग भी रखी। उत्तर ना में ही मिला और सुझाव दिया गया कि फिर से परिसर से वापस, बाहर निकल गेट के पास ही कांगड़े के राजसी परिवार के दफ्तर से आप लोग "वॉइस गाइड"  किराए पर ले सकते हैं।  यह नाम और उपकरण मेरे लिए नया ही था।  दो वॉइस गाइड उपकरण ले और उन्हें चलाने का ढंग सीख..... अब हम दोनों भारत के सबसे पुराने किले की ओर बढ़ रहे थे जो करीब 4000साल पुराना है जिसकी दीवारों ने  असंख्य हमलों को झेला है। बगैर वॉइस गाइड के यह किला खामोश रह जाता पर अब इस किले का हर पत्थर हमें अपने किस्से-कहानियाँ सुनाएगा।

                                                                       ......................................(क्रमश:)
दो सांढू़ भाई। 

विशाल रतन जी ने तब मूँछ पाल रखी थी,  दोस्तों। 

ध्यूसर सदाशिव महादेव के रास्ते में.....एक बेहद बड़ी चट्टान पर खड़ा मैं। 

ध्यूसर पर्वत शिखर पर बने सदाशिव महादेव मंदिर का दूर-दृश्य। 

रास्ते की सुंदरता....झरने का जल एक ताल से निकल दूसरे ताल को भर बहता हुआ। 

धुंध को भेद रही सूर्योदय की किरणें। 

सिंदूरी सवेर। 

सदाशिव महादेव मंदिर को जाता सीढ़ीदार रास्ता,  परन्तु हम सड़क मार्ग से ऊपर जा रहे थे। 

यात्रा की खुशी। 

धुंध फिर बलवान हो गई सूर्यदेव पर। 

परन्तु यह धुंध भरा दृश्य भी हसीन लग रहा था दोस्तों।  


सदाशिव महादेव मंदिर। 

सदाशिव महादेव मंदिर प्रांगण का प्रवेश द्वार। 

पांडवों के पुरोहित ऋषि धौम्य द्वारा स्थापित शिवलिंग। 

और,  यह शिवलिंग चौरस आकार का है। 


अरे विशाल जी,  ऊपर कहाँ देखने लगे...! 

ओह,  अब समझे.... सदाशिव महादेव मंदिर के शिखर को। 

सदाशिव महादेव मंदिर प्रांगण से नीचे दिखती सुंदर घाटियाँ। 

उस ऊँचाई से दूर-दूर दिखते गाँव व शहर। 

और,  दूसरी दिशा में दिखते पर्वत और धुंध।  

सदाशिव महादेव मंदिर में मिला चूरमे का प्रसाद। 

है ना.... कितना शानदार "गजरेला"

सुबह का नाश्ता बेहद स्वादिष्ट,  " कचौरियां, चाय व गजरेला"

विशाल जी गाड़ी से उतर सड़क पर बिखरी हुई सूखी लकड़ियाँ इक्ट्ठी करने लग जाते हैं,  कि कहीं रात को बोन-फायर करेंगें। 

कभी सलेटों की छतों वाले घर हमारा राह रोक लेते। 

तो,  कभी धौलाधार से नीचे उतर रहे गद्दी और उनकी भेड़े। 

गद्दी चरवाहा। 

कालेश्वर महादेव की ओर। 

बाँस की कटाई का मौसम था.... तो उम्दा किस्म के बाँस जंगल से काट कर सड़क किनारे इक्ट्ठा किये जा रहे थे। 

गलत बात है विशाल जी... जब मैने आपकी फोटो बाँसों के संग खींची, अब आप मेरी भी फोटो खींचो जी। 

एक किलोमीटर की दूरी पर कालेश्वर महादेव। 

कालेश्वर गाँव में खेतों की बाड़ बेहद लम्बी डंडा-थोर से रखी थी,  और हमे एक अलग पृष्टभूमि मिल गई अपने चित्र खिंचवाने के लिए।
वाह,  बहुत जंच रहे हो विशाल जी। 

फोटो खिंचवाने में... मैं बहुत माहिर हूँ दोस्तों,  देखा क्या खूबसूरत फोटो आई मेरी। 

कालेश्वर, मनियाला गाँव में बहती व्यास नदी। 

विशाल जी खूब चहक उठे व्यास नदी की नीली जलधारा देख कर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर मंदिर का स्वागती द्वार। 

कालेश्वर मंदिर परिसर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर मंदिर। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर शिवलिंग। 

बहुत सारे प्राचीन मंदिर बने हुये है कालेश्वर मंदिर परिसर में। 


व्यास नदी के घाट पर। 

घाट से नदी की ओर। 

व्यास नदी की जलधारा के किनारे.... जली हुई चितांएे। 

कालेश्वर के छोटे से बाज़ार में तब मेरे मनपसंद नारियल के लड्डू बन रहे थे। 

कालेश्वर से धर्मशाला की तरफ बढ़ने पर हमे धौलाधार हिमालय की धौली-धारें दिखनी आरंभ हो गई। 

कांगड़ा शहर से कुछ पहले सड़क के पुल के समान्तर पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरो गेज रेल मार्ग का पुल। 

कांगड़े से कुछ पहले आता गुफा मार्ग। 

कांगड़े में पहाड़ पर बना जयंती माता मंदिर। 

और,  कांगड़ा दुर्ग ने हमारा रास्ता रोक ही लिया। 

और,  हमारी गाड़ी मुड़ चली पुराना कांगड़ा शहर की ओर। 

मोटर साइकिल प्रेमी तो मैं शुरू से ही हूँ..... तब हीरो का ओफ रोड़ बाइक " इम्पलस्" बाज़ार में नया-नया आया था,
और कांगड़ा किले के सामने वाले बाज़ार में इसे खड़ा देख, अपनी फोटो इस संग खिंचवाने के लिए विवश हो गया। 

किले कभी खाली पेट नही देखे जा सकते,  तो किले के सामने वाले बाज़ार में एक महिला दुकानदार ने हमें घर जैसा खाना खिला दिया। 

और... आखिर हम वॉइस गाइड किराए पर ले कांगड़ा किले की ओर बढ़ रहे थे। 

                                                    (अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें


10 टिप्‍पणियां:

  1. विकास भाई आपकी यह यात्रा बहुत अच्छी लगी। फोटो व उनके कैप्शन बहुत सुंदर तरीके से इस यात्रा को व्यक्त कर रहे है।

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    1. बेहद धन्यवाद, सचिन त्यागी जी।

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  2. वाह, नई शैली और नया अंदाज़ जैसे आप हमे साथ ले जा रहे हैं और गुफ्तगू भी साथ चल रही है।

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    1. गुड़ से भी मीठा आभार पेश करता हूँ .... प्रवीण भाजी।

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  3. यह वाली कहानी सुनी भी और पढ़ी भी लेकिन पढ़ने में ज्यादा आनंद आया ऐसा लगा कि में भी कांगड़ा किले में वॉइस गाइड ले रहा हु....बाकी शुरुआत सटीक रही....चलो चलते है इस मजेदार सफर में

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    1. बिल्कुल सही कहा आपने प्रतीक जी.... कहानी पढ़ने में ज्यादा अानंद आता है क्योंकि शब्दों जब व्यक्ति पढ़ता है, तो उनसे जुड़े भाव उसमें खुद व खुद जागृत हो जाते हैं।
      बाकी, मौखिक व्याख्यान तो मैने उन लोगों के लिए करना आरंभ किया है, जो लम्बी पोस्टें नही पढ़ना चाहते... उनके लिए मौखिक व्याख्यान सुविधा जनक रह सकता है।

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  4. अलोकिक वर्णन,सालो बाद इतना सहज लिखा हुआ पढ़ा। कल रात 5 घंटे तक आपके श्री खंड कैलाश यात्रा को पूरा पढ़ा, लगा मैं खुद आपके साथ हु।

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