रविवार, 18 फ़रवरी 2018

भाग-2 करेरी झील....." मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

                     
                                                                 " कांगड़ा दुर्ग में चंद घंटे "

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                                        कानों में वॉइस गाइड लगाए हम दोनों, भारत के सबसे पुराने किले नगरकोट कांगड़ा दुर्ग की ओर बढ़ रहे थे.....और हमारे हाथों में किले का नक्शा था। जिसे वॉइस गाइड के अनुसार क्रमवार नंबरों में विभाजित किया हुआ था। निर्धारित जगह पर पहुँच वॉइस गाइड का नंबर एक दबाया,  तो विश्व के सबसे पुराने राजवंश "चंद्रवंशी कटोच राजपूत राजवंश" के 488वें  राजा आदित्य देव चंद कटोच जी की आवाज कानों में गूंजी.....और शुरुआत हुई 4000 साल पुराने कांगड़ा किले की कहानी की।
                        " हिमालय में बने इस किले पर जिसका कब्जा, वही पहाड़ों का राजा घोषित होता था " तो अनगिनत देसी-विदेशी हमलावरों से हजारों साल जूझता रहा कांगड़ा दुर्ग।
                        7800 ईसा पूर्व, यानी करीब 10000 साल पहले राजा भूमि चंद कटोच से इस राजवंश की शुरुआत हुई और मुल्तान (जो कि अब पाकिस्तान में है) में अपना राज्य स्थापित किया.... जिसका क्षेत्र लद्दाख तक था। यह वह राजवंश है जिन्होंने 5000 ईसा पूर्व भगवान श्रीराम से भी प्रभुता का युद्ध लड़ा था और इस दुर्ग के स्थापक राजा सुशर्मा चंद कटोच ने 1500 ईसा पूर्व कौरवों का साथ देते हुए अर्जुन से युद्ध लड़ा था।
                       किले के मुख्य द्वार महाराजा रणजीत सिंह द्वार के पास जाने के बाद हर कदम पर किला अपने स्वर्णिम इतिहास की कहानी सुना रहा है। हर मोड़ पर दीवारें व दरवाजे अपनी बात रख रही हैं और दीवारों में मढ़ी हुई मूर्तियां भी कहां खामोश थी।
                       25 सौ साल पहले सिकंदर से युद्ध लड़ने वाला राजा पोरस भी कटोच राजवंश से ही था।  करीब 2350 साल पहले सम्राट अशोक ने कटोचों से युद्ध लड़ मुल्तान छीन लिया।  पहली सदी में कांगड़ा घराना कन्नौजों संग जूझता रहा.....और पांचवी सदी में हिमालय पर प्रभुत्व के लिए कश्मीर के राजाओं संग कटोचों का आमना-सामना होता रहा।                            10 वीं सदी में आ धमका महमूद गजनी...और लुटेरे ने खूब लूटा कांगड़े को। लूटा क्या मैं तो इसे चोरी ही कहूँगा क्योंकि जब कांगड़े की सेना किसी और जगह युद्ध में रत थी और पीछे से कोई आक्रमणकारी आ पहुँचा पहली बार किले के भीतर...!
                       मोहम्मद गौरी भी आया था किला लूटने कांगड़ा, 11वीं सदी के अंत में।  13वीं सदी में कटोच लड़ते-लड़ते दिल्ली जा पहुँचे, तुगलकों और तैमूर के विरुद्ध भी घमासान युद्ध होते रहे।  दिल्ली का शहंशाह तुगलक कांगड़ा के किले को कई महीनों तक घेरे बैठा रहा और एक दिन किले की दीवार पर घूम रहे कटोच राजा की नज़र जा मिली तुगलक से  और इशारों- इशारों में ही दोनों बातचीत के लिए तैयार हो गए....बाद में इनकी संधि हो गई।
                       फिर 15वीं सदी में शेरशाह सूरी कांगड़े पर आ चढ़ा, परंतु हार गया। मुगल सम्राट अकबर से भी भीषण  युद्ध होते रहे.... 52बार अकबर ने कोशिश की इस दुर्ग पर विजय पाने की, परन्तु कामयाब ना हो सका..  अंततः कटोचों से उसकी संधि हुई।
                        सोलहवीं सदी में अकबर का पुत्र जहांगीर एक बहुत बड़ी सेना ले ठान कर आया और 14 महीनों तक किले की घेराबंदी कर रखी। अनाज-रसद खत्म होने पर आखिर राजपूतों ने आत्मसमर्पण करने की बजाय किले के द्वार खोल कर उस विशाल सेना से लड़ना-मरना ही मुनासिब समझा।
                        कहते हैं 12हजार के करीब कटोच सैनिक मारे गए इस भीषण संग्राम में.... किला हारते देख किले के अंदर जौहर की तैयारी होने लगी। अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान बचाने के लिए बलिदान देते हुए कटोच महिलाएं किले के सरोवर "कपूर सागर"  में अपने पैरों में पत्थर बांधकर डूब मरी।  कितना हृदय विदारक दृश्य होगा....सोच कर मेरी रूह कांप उठी।
                         तलवारों की आवाजें, तोपों के बारूद की गंध, भीषण युद्ध की चीत्कार, औरतों की चीखें व बच्चों के रोने की आवाजें मुझे चंद क्षणों के लिए उस खंडहर किले में अचानक से सुनाई देने लगी...... फिर,  एकाएक उन दीवारों को पुन: देखता हूँ और अपने-आप को आज में पाता हूँ।
                        बंदी बनाए गए कटोच राजा को जहांगीर मारता नहीं, बल्कि घुट-घुटकर मरने के लिए आजाद कर देता है। पर दोस्तों कटोच तो कटोच ही है ना... कटोच का मतलब "कट-ऊँच" जिसकी तलवार हमेशा ऊँची रहती है।  कुछ समय बाद सब कुछ हारे हुए उस कटोच राजा ने पुन: कोशिश की अपना राज-सम्मान व किला वापस पाने हेतु......परंतु वह हार गया और जहांगीर ने अब उसे बेहद क्रूरता से मारा.....जीवित अवस्था में ही उस वीर कटोच राजा की खाल उतरवा दी।
                         समय का चक्कर चलता रहा जहांगीर के बाद शाहजहां का भी कांगड़े किले पर अधिकार रहा। जहांगीर की क्रूरता का बदला उस कटोच राजा के पोते ने आ लिया.. उसने पुन: किले पर चढ़ाई कर किले में मौजूद जितने भी मुगल अधिकारी व सैनिक थे उन सब की जीवित ही खाल उतरवा दी....!!
                           17वीं  सदी में कटोच राजा भीम चंद ने औरंगजेब की हिंदू धर्म विरोधी नीतियों का विरोध कर गुरु गोविंद सिंह जी का साथ देते हुए औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध लड़ा। 17वीं सदी के अंत में ही बटाला के सिख सरदार जय सिंह कन्हैया और तत्कालीन कटोच वंशी राजा संसार चंद ने कमजोर हो चुके मुगलों से किला जीता और मैदानी क्षेत्रों के बदले किले को राजा संसार चंद कटोच को सौंप दिया।
                            कई सौ वर्ष के बलिदान और जंग के उपरांत आखिर फिर से कांगड़ा दुर्ग पर हिंदू राज लौट आया और सत्ता पर काबिज हो महत्वाकांक्षी राजा संसार चंद कटोच ने अपने राज्य के विस्तार के लिए अन्य राज्यों पर हमले आरंभ कर दिए.....सो 18वीं सदी में नेपाल के अमर सिंह थापा अन्य राज्यों का नेतृत्व कर अपनी गोरखा सेना ले 4 वर्षों तक कांगड़ा दुर्ग की घेराबंदी कर खड़ा रहा। तब राजा संसार चंद ने शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह से गोरखों के विरुद्ध संधि कर किला सिक्खों को सौंप दिया......और अंत में सिक्खों के राज के बाद अंग्रेज आ दुर्ग पर काबिज हो गए।                                इस दुर्ग पर अधिकार की सनक हर काल में हर एक शक्तिशाली राजा को रही....कटोचों की जुबानी यह कहा जाता है कि उन्होंने अपने संपूर्ण इतिहास में औसतन हर चार साल बाद एक युद्ध लड़ा है।
                              किले की ऊँची रक्षा प्राचीर जो चार किलोमीटर लंबी है,  के एक बुर्ज पर खड़ा मैं नीचे देखता हूँ कि किले की पहाड़ी को टापू की तरह मध्य ले,  दो नदियां पातालगंगा और बाणगंगा बह रही हैं जो किले की पहाड़ी के इर्द-गिर्द गहरी खाईयों का काम करती है।  सामने मुझे दिखाई दे रही है धौलाधार हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ.....कितना मनोरम स्थल जो मन को सुकून दे रहा था।  फिर किले के सामने उस बड़े मैदान को देख सोचने लग जाता हूँ कि यही आ कर सब आक्रमणकारी खड़े होते होंगे.... तोपों के भरे मुँह किले को घूर रहे होंगे।
                             इतनी सुंदर जगह पर कैसे कोई लड़ सकता है.... मुझे तो चारों और फैली रमणीयता से नयन लड़ाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही....!!!
                            फिर मन का एक पक्ष बोलता है, " रे तू तो ठहरा एक सामान्य प्राकृत प्रेमी और वे सब थे ताकतवर अमीर... वो अमीर जो दूसरे अमीर को लूटकर और ज्यादा अमीर होना चाहता था...!"  पुराने समय में राजा यही तो करते थे, वह एक दूसरे को लूट ही तो रहे थे।  राज्य, किले, खज़ाना, औरतें लूटकर हर विजयी राजा अपने राज्य और खज़ाने का विस्तार कर रहा था। जर, जोरू, जमीन बल से ही रखी जाती हैं इस कहावत की उत्पत्ति राजाओं के इस व्यवहार से ही हुई होगी वरना गरीब तो दूसरे जून की रोटी की चिंता में फंसा रहता होगा।
                            अपने मुँह-मिट्ठू की परिभाषा देता जहांगीर के बनाए जहांगीर दरवाजे को लांधने के बाद सीढ़ियां चढ़ते हम दोनों उस छोटे से दर्शनी दरवाजे के आगे खड़े होते हैं,   जिसके दोनों तरफ गंगा और यमुना की खंडित मूर्तियां लगी हुई हैं।  दर्शनी द्वार पार करते ही बेहद खुली जगह आती है और सामने नज़र आता है कटोचों की कुलदेवी अंबिका मां का मंदिर,वहीं एक और मंदिर में जैन तीर्थांकर आदिनाथ जी विराजमान है।
                           किले में जैन मंदिर का इतिहास भी खासा रोचक है दोस्तों....जैन धर्म के आखिरी तीर्थांकर महावीर जी ने अपनी बहन का विवाह कटोच राजा से इसलिए किया कि निशस्त्र जैन समुदाय को सुरक्षा मिले,  क्योंकि सुरक्षा के लिए शस्त्र उठाने आवश्यक है... जो कटोच हर समय अपने सिर से ऊपर ही उठाए रखते थे।  भगवान महावीर जी ने खुद ही भगवान आदिनाथ जी की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर इसे यहां स्थापित किया था, दोस्तों।
                          उस बेहद खुले आंगन जिसमें सदियों पुराना पीपल का वृक्ष अब भी हरा भरा है। जिसने ना जाने कितनी बार उस खुले आंगन में खुशी- गमी की सभाएं लगती देखी होंगी। किले के किशोर-किशोरियों को झूले झुलवायें होंगे।  ना जाने कितनी बार लहू से रंगी नंगी तलवारों को महल में दाखिल होते देखा होगा और अपने संरक्षकों को कटते भी देखा होगा।  काश मैं उस बूढ़े पीपल बाबा की भाषा समझ पाता जो वह अपने पत्ते हिला-हिला मुझे बता रहे थे...!
                         महल के इस आंगन में जगह-जगह नक्काशीदार अवशेष बिखरें पड़े हैं जो इस जगह की भव्यता की कब्र है।  इस आंगन से चंद सीढ़ियां चढ़ हम अब उन अवशेषों में खड़े हैं,  जो किले की सबसे ऊँची जगह पर है और यह अवशेष कभी सात मंजिल हुआ करते थे।  दुश्मनों की तोपों के गोले कभी यहां तक नहीं पहुंच पाए,  परंतु प्रकृति के सबसे बड़े दुश्मन "भूचाल" ने सन् 1905 में इस महल को नेस्तनाबूद कर दिया। उस किले की दीवारें तक उखाड़ दी जो कभी हजारों सालों से आक्रमणकारियों के हौसलें उखाड़ती आ रही थी।
                           शाम के साढे चार बज चुके थे किले के बंद होने का समय हो चला था,  सो नीचे उतर कर हम किले के बाहर बने सरकारी संग्रहालय में आ पहुँचे। परंतु अभी कटोच राजपरिवार का व्यक्तिगत संग्रहालय देखना बाकी था, सो उस छोटे से बाज़ार जहाँ एक नवीन व भव्य जैन मंदिर भी है...को लांघकर "महाराजा संसारचंद संग्रहालय" में जा पहुँचे।संग्रहालय में कटोच राजपरिवार की भव्यता देख बाहर निकले तो सूर्यास्त हो चुका था।  किले के पीछे मर चुके दिन की लाली अभी अंतिम सांस ले रही थी......और लगे हाथ हम दोनों किले के सामने बने जैन मंदिर में भी जा पहुँचे, बेहद भव्य मंदिर और शांति इतनी खुद की शंखनाद ध्वनि सुनाई दे रही थी।
                          मंदिर में धर्मशाला देख मैंने विशाल जी से कहा,  "अब हमें गाड़ी में रुकने की बजाय इस धर्मशाला में रुक जाना चाहिए क्योंकि हमें अपने फोन पर कैमरे में भी तो शक्ति भरनी है..!"  धर्मशाला संचालक ने कहा, "यदि आप जैन हो तो ही आपको कमरा मिल सकता है...!!"  अब भला ब्राह्मण बंदे झूठ भी कैसे बोल सकते हैं....तो उन्होंने फिर एक और सुझाव दिया कि किसी जैनी की सिफारिश डलवा लो। परंतु ऐन मौके पर यह भी ना हो सका तो हम गाड़ी ले कांगड़ा शहर के जगमगाते बाजार में आ रुके.... और "बृजेश्वरी देवी मां मंदिर" में पहुँच मां के श्रृंगार की मंगला आरती में हाज़िरी लगवाई व दाल-चावल का लंगर ग्रहण किया।
                           कांगड़ा बाजार में ही कमरा ले,  अब कल की रणनीति यह बनाते हैं कि जितना हो सके सुबह जल्दी ही निकलना है करेरी की ओर........लेटते ही हम दोनों में से नींद किसे पहले आई,  मुझे याद नहीं रहा। परंतु हम दोनों में से जो एक पहले सो गया होगा, उसके खर्राटों की आवाज से दूसरे को कहाँ जल्दी नींद आई होगी,  दोस्तों..!!!!

                                                                  ......................................(क्रमश:)
कानों में वॉइस गाइड लगाये हम बढ़ रहे थे,  कांगड़ा दुर्ग के प्रवेश द्वार "महाराजा रणजीत सिंह द्वार " की ओर। 

कांगड़ा दुर्ग का प्रवेश द्वार। 

मुख्य द्वार से अंदर जाने के बाद। 

कांगड़ा दुर्ग के अंदर का रास्ता। 

वॉइस गाइड की बातें सुनता मैं।  

अब,  दुर्ग की दीवारें व दरवाजे अपनी बात रख रहे थे। 

दुर्ग की दीवारों में मढ़ी मूर्तियाँ भी अब कहाँ खामोश थी,
कटोचों की कुल देवी अम्बिका माँ की मूर्ति। 

एक द्वार पर बैठ उसकी कहानी सुनते विशाल जी। 

किले की रक्षा प्राचीर की ओर बढ़ता मैं। 

कांगड़े दुर्ग की चार किलोमीटर लम्बी रक्षा प्राचीर पर खड़ा, मैं सोच में डूबा हुआ था। 

कि किले की रक्षा प्राचीर से नीचे देखता हूँ,  किले के आगे इसी मैदान में आक्रमणकारियों की सेना आ खड़ी होती होगी,
अब यहाँ एक बेहद सुंदर व भव्य जैन मंदिर स्थापित है। 

फिर ऊपर की ओर देखता हूँ,  तो धौलाधार हिमालय की धौली धाराएँ दिखाई दी... और सोचने लगा कि इस सुंदर जगह में आ, कैसे कोई लड़ सकता है। 

जब कि मुझे तो चारों ओर फैली इस रमणीयता से नयन लड़ाने से ही फुर्सत नही मिल रही,
कांगड़ा किले से दिख रहा पातालगंगा और बाणगंगा नदियों का संगम। 

किले की रक्षा प्राचीर पर खड़े विशाल जी मगन थे, वॉइस गाइड की किस्से-कहानियों में। 

भूचाल से गिर चुकी दीवारों को फिर से खड़ा किया गया है।

कांगड़े किले में जहाँगीर के द्वारा निर्मित मस्जिद,
कहते हैं कि इस मस्जिद के निर्माण से पहले जहांगीर ने यहाँ गाय की बलि दी थी। 

दर्शनी द्वार। 

इस छोटे से दर्शनी द्वार की दोनों तरफ गगां व यमुना की मूर्तियाँ स्थापित है,  जो अब खंडित हो चुकी है। 

दर्शनी द्वार पार करने के बाद एक बेहद खुली जगह आती है। 

और,  सामने दिखाई देता है... कटोचों की कुल देवी अम्बिका माँ का मंदिर। 

और,  उसी खुले से आँगन में जैन धर्म के पहले तीर्थांकर आदिनाथ जी का भी मंदिर है। 

मंदिरों की दीवारों पर की हुई नक्काशी। 

उस जगह बहुत सारे अवशेष बिखरे पड़े हैं.... जो इस जगह की भव्यता की कब्र है। 



काश,  मैं इस बूढ़े पीपल बाबा की भाषा समझ पाता,  जो ये अपने पत्ते हिला-हिला कर मुझे बता रहे थे। 

इस दुर्ग में एक राजा भी अपनी मरजी से नही आ सकता था,  साधारण व्यक्ति की बात ही क्या करनी।
परंतु आज एक साधारण व्यक्ति दुर्ग के अंदर अपनी मौज से चित्र खिंचवा रहा है दोस्तों। 

कांगड़ा किले के मंदिरों की नक्काशीदार दीवारें। 

उस खुले आँगन से सीढ़ियाँ चढ़ हम किले की सबसे ऊँची जगह पर बने महल के उन अवशेषों में जा पहुँचे,  जो कभी सात मंजिल ऊँचें हुआ करते थे।  

महल की उस खिड़की में खड़ा मैं.... जिसमें कभी रानियाँ खड़ी हो,  घाटी की सुंदरता को निहारती होगी। 

किले की सब से ऊँची जगह से खींची हुई तस्वीर.... नीचे घाटी में उड़ता एक बाज़। 

किले की पीछे से आ रही पातालगंगा और बाणगंगा नदियाँ,
यह चित्र किले की सबसे ऊँची जगह खींचेहैं। 

महाराजा संसार चंद संग्रहालय में.... कटोचों के सिंहासन। 

आखिर हमे भी सम्मान दिया गया कि आप भी इन राजसी कुर्सियों पर बैठ सकते हैं,
कटोचों के व्यक्तिगत संग्रहालय में। 

संग्रहालय से बाहर निकले तो,  कांगड़े किला के पीछे मर चुके दिन की लाली अंतिम सांस ले रही थी।

संग्रहालय देखने के पश्चात हम उस भव्य जैन मंदिर में आ पहुँचे,  जो किले के सामने ही बना है। 

और,  फिर हम कांगड़े वाली माता "ब्रजेश्वरी देवी" के मंदिर में माथा टेकने आ गये। 

और, माँ के श्रृंगार की मंगला आरती में भाग लिया तथा हमें प्रसाद मिला रौंगी दाल का, दोस्तों।

                                                     ( अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

                             

4 टिप्‍पणियां:

  1. इतिहास से ओत प्रोत पोस्ट कांगड़ा किले पर बहुत से लेख पढ़ा है लेकिन आपके लेख ने आखों में पानी भर दिया पा जी....

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    1. विनोद जी, हमारा इतिहास भी राजनीति का शिकार है......हमे इतिहास भी तत्कालीन सरकारों ने अपनी मर्जी से और अपने हित में ही पढ़ाया। लुटोरों को महान का ख़िताब दे डाला।

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  2. कांगड़ा किले का स्वर्णिम इतिहास की बहुत सी बातें जानने को मिली.....लगता है अब काल से करेरी झील की चढ़ाई शुरू होने वाली है

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    1. जी हां प्रतीक जी, आगामी किश्त में करेरी की चढ़ाई शुरु हो जाएगी जी।

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