गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

"श्री कालिनाथ कालेश्वर महादेव" ....."मेरी मनपसंद जगह "

                                      मेरी मनपसंद जगह.... " श्री कालिनाथ कालेश्वर महादेव"

                               "मनपसंद जगह".......का मतलब वो जगह यहाँ आप बार-बार, हजार बार जाए क्योंकि वह आपकी मनपसंद जगह जो है......ना कि वह जगह जो आप से 3000 किलोमीटर की दूरी पर हो और वहाँ पहुँचना भी चांद को चाहने बराबर ही होता है दोस्तों।
                              " सुख वही खास, जो मिले आसपास, बाकी सब बकवास...!!!"   इसी आस-पास के चक्कर में...मैं अपनी मनपसंद जगह का सुख उस जगह में संपूर्ण पाता हूँ, जहां मैं सुबह जाकर शाम को तृप्त हो घर वापस लौट आता हूँ ....ऐसी ही एक जगह है "कालेश्वर महादेव"( गांव मनियाला, परागपुर जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश) जो मेरे शहर गढ़शंकर (पंजाब) से केवल 100 किलोमीटर की दूरी पर है।  मुझे यह रमणीक स्थल इतना पसंद है कि गिनती तक भूल चुका हूँ कि मैं यहाँ कितनी बार जा चुका हूँ और यह भी याद नहीं रहा कि पहली बार कब और कौन मुझे वहाँ लेकर गया था।
                                हर वर्ष सावन के महीने में कोशिश होती है कि अपने मैदानी इलाकों की उमस़ भरी हवा से दूर, हरे भरे पहाड़ो से बह कर आ रहे बरसाती नदी- नालें लांघ,  कालेश्वर पहुँच व्यास नदी के किनारे बने शीतल जल के कुंड में गोते लगाऊँ।
                                और,   हर बार का सफ़र सुबह शुरू होता है....गाड़ी परिजनों से भर जाती है और निकल पड़ती है गढ़शंकर से हिमाचल प्रदेश की ओर। मेरे शहर से 5 किलोमीटर चलने पर ही हिमालय की निम्नतम पहली परत "शिवालिक" की उपश्रेणी पहाड़ियाँ स्वागत करती हैं।  दोस्तों यह श्रृंखला हमारे पड़ोसी पाकिस्तान से आरंभ हो तकरीबन 1600 किलोमीटर का विस्तार ले सिक्किम तक समाप्त हो जाती हैं।   मेरे "कथित पर्वत प्रेम" में इन छोटी पहाड़ियों का बेहद योगदान है, जब मैं भी छोटा था तो अक्सर छत पर पतंग उड़ाते समय दूर से इन पहाड़ियों को देख आकर्षित हो उठता था.... और जब कभी बारिश के अगले दिन मौसम साफ हो, तो मुझे छत से ही मेरी मनपसंद पवर्तीय "धौलाधार" हिमालय की सफेद धारों के दर्शन भी हो जाते थे और किशोर मन ना जाने कितने सपने अपने अंदर ही अंदर जमा कर लेता था।
                                सड़क मार्ग से शिवालिक की निम्न पहाड़ियों के शिखर पर पहुंच आंखें देखती है,  उस चौड़ी घाटी को जो पहाड़ियों और दूर आगे देख रही लोअर शिवालिक श्रृंखला का हिस्सा है। इस घाटी के मध्य "स्वां नदी"बहती है.... बचपन से ही अपने पिता के मुख से सुनता आ रहा हूँ कि इस नदी का नामकरण संस्कृत भाषा  में "श्वान" है। जिसका मतलब होता है कुत्ता यानि कि पता नहीं यह नदी कब एक कुत्ते की चाल की तरह अपनी दिशा बदल बैठे। श्वान नाम अब बिगड़ कर स्वां में तब्दील हो चुका है.... लेकिन अब स्वां नदी की इस क्रूरता को नकेल डालने के लिए तटीकरण का क्रम काफी हद तक हो चुका है। 80 किलोमीटर बहने के उपरांत इस नदी का साफ-सुथरा जल तिब्बत के मानसरोवर के समीप राक्षस ताल से बहकर आ रही सतलुज नदी का हिस्सा बन जाता है।
                                सामने दिख रही लोअर शिवालिक श्रृंखला में सबसे ऊंची पहाड़ी पर माता नैना देवी जी का मंदिर और वह दो पहाड़ों के शिखर दिखतें हैं, जिनके मध्य एशिया का सबसे का बांध "भाखड़ा बांध" बना हुआ है। घाटी में दूर-दूर दिखते हिमाचल और पंजाब के बहुत सारे गाँव, कस्बे व शहर।   नज़र के सामने दिख रहे दृश्य में एक छोर पर पूरे सफेद रंग से पुता, "गुरु गोविंद सिंह जी का शहर आनंदपुर साहिब" तो दूसरे छोर पर नंगल शहर की एन एफ एल खाद फैक्टरी एक खिलौने की भांति पड़ी नजर आती है।
                                दोस्तों, लोअर शिवालिक की इस श्रृंखला में माता चिंतपूर्णी, मां ज्वाला, मां कांगड़ा, मां बगलामुखी, मां चामुंडा और मां मनसा देवी के पावन शक्तिपीठ है और इस श्रृंखला के बाद अपर शिवालिक रेंज में डलहौजी, शिमला, मंसूरी आदि रमणीक पर्वतीय स्थल बसे हुए हैं।
                               हमारी गाड़ी हिमाचल प्रदेश की सीमा में प्रवेश पा,  मेरे पंजाब जैसे ही दिखने वाले लोगों और इलाकों से गुज़र "ऊना" शहर से गुज़रती है। वो शहर यहाँ आज भी गुरु नानक देव जी के वंशज रहते हैं और ऊना रेलवे लाइन द्वारा पूरे देश से जुड़ा हुआ है। दोस्तों अब तक पढ़ते-पढ़ते आपके मन में यह सवाल जरूर कोंदा होगा कि यह विकास नारदा कालेश्वर की बात कर करने की बजाय अभी रास्ते पर ही अटका हुआ है,  तो जवाब भी तैयार है जनाब जी..." खूबसूरत जगहों को जाने वाले रास्ते भी तो खूबसूरत ही होते हैं....!"  मेरे पर्वत प्रेम ही मुझे बार-बार खींच इन रास्तों पर ले जाता है और परिवार वालों को उनकी आस्था।
                                ऊना-अम्ब रोड पर 20 किलोमीटर चलते रहने के पश्चात बरूही गाँव मोड पर मेरी गाड़ी भी मुड़ जाती है,  इंसानी बस्तियों से दूर एक ऊंचे पहाड़ " ध्यूंसर " के शिखर पर बने "सदाशिव ध्यूंसर महादेव मंदिर" की ओर। बरूही मोड़ से 15 किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर ज्वालामुखी लावा के ठंडा होने पर बने बड़े-बड़े चट्टानी पहाड़ और बरसात के उस मौसम में उन पर गिरते जलप्रपात मेरी गाड़ी के ब्रेक- पैडलों पर अक्सर भारी ही पड़ते हैं। सड़क की एक तरफ गहरी खाई के उस पार,  दूर वो झरना हर बार मैं देखता हूँ.....  जिसका जल एक ताल से निकल, नीचे बहता हुआ दूसरे ताल को भरता हुआ आगे बह जाता है।  खुराफाती मन उछलता है,  चल विकास उस ताल में जाकर नहाते हैं परंतु हर बार परिवार नामक संगल से मेरे पैर बंधे होते हैं,  सो बंधा हुआ पैर फिर से गाड़ी का एक्सीलेटर दबा देता है और जा कर रुकता है सदाशिव ध्यूंसर महादेव (गांव वही, जिला ऊना)  की सीढ़ियों के आगे.....कोई दुकान- मकान नहीं, बस  ध्यूंसर पर्वत शिखर पर बना एक खूबसूरत शिव मंदिर और उस उँचाई से दिखती हरियाली भरी घाटियाँ ....जहाँ पहुंच प्रकृति प्रेमी पर प्राकृतिक सुंदरता की मदहोशी छा जाती है।
                            स्थल इतिहास भी हर पुरातन स्थल की तरह महाभारत काल से ही जुड़ा है कि पांडवों के पुरोहित ऋषि धौम्य ने इसी ध्यूंसर पर्वत पर भगवान शिव को तप कर प्रसन्न किया था और वर मांगा कि मेरे द्वारा स्थापित इस शिवलिंग पर जो भी भक्त मनोकामना मांगेगा, उसे आप पूर्ण करेंगे।  समय बदला युग बदला,  और 1937सन् में... उत्तरकाशी में गंगा तट पर तपस्या में लीन स्वामी ओंकारानंद गिरि जी को रात्रि स्वपन में भगवान शिव ने एक गुफा और यह स्थल दिखाते हुए कहा कि जहाँ जाकर मेरा भजन करो...... और स्वामी जी ने आखिर 10 वर्षों की खोज के बाद 1947 में यह स्थान ढूंढ ही निकाला और 1948 में संपन्न लोगों के अनुदान द्वारा इस जीर्ण मंदिर का पुनर्निर्माण आरंभ किया।  मंदिर में स्थापित शिवलिंग चौरस आकार का है और प्रसाद मिलता है चूरमे का दोस्तों।
                           गाड़ी फिर से वापस उसी सड़क पर दौड़ती हुई योल नामक ग्राम से मोड़ देता हूँ कालेश्वर की ओर....कई सारे गांव, धान व मक्की के पहाड़ी खेत, सिलेटी छतों के मकान,  बरसात में बह चुके कच्चे-पक्के रास्ते और दूर सामने दिख रही धौलाधार हिमालय की गगनचुंबी दीवार। कोई एक घंटे के पहाड़ी सुहाने सफर के बाद अम्ब-नादौन मार्ग से कुछ हटकर आखिर गाड़ी आ पहुँचती है, अपनी असल मंजिल "कालेश्वर"(480 मीटर ).....जैसे-जैसे गाड़ी मंदिर के समीप होती जाती है, भोले के भक्त हमारा स्वागत करते हैं और  बम भोले, जय भोले के उद्घोष साँझा भी होते जाते हैं।                            "श्री काली नाथ कालेश्वर महादेव मंदिर" के छोटे से पैदल रास्ते में दोनों तरफ खाने-पीने की दुकानों को पार कर हम कालेश्वर महादेव मंदिर परिसर में दाखिल होते हैं। मंदिर प्रांगण में मुख्य मंदिर के साथ और भी कई बड़े-छोटे नव व पुरातन मंदिर हैं और एक ताजे़ जल की बावड़ी है। मंदिर प्रांगण की दीवार को व्यास नदी का जल छू कर बह रहा होता है। आस-पास का बेहद हसीन नज़ारा आंखों को मोहित कर जाता है। मुख्य मंदिर में स्थापित शिवलिंग भी अद्वितीय है, जो मंदिर तल से करीब डेढ़-दो फुट नीचे भूमि में स्थित है। पुजारी द्वारा डाले जाते इस शिवलिंग पर चढ़ाएं जल के छींटे श्रद्धालुओं को आत्मीय शीतलता प्रदान करते हैं।
                          मंदिर इतिहास जुड़ा है मां पार्वती के महाकाली रूप से....... महाकाली की उत्पत्ति राक्षसों के सर्वनाश करने हेतु हुई,  तो राक्षस-संहार में मां काली का क्रोध इतना क्रूर और विकराल हो जाता है कि संपूर्ण देव शक्तियां एकजुट हो उन्हें शांत नहीं कर पाती.... तो भगवान शिव खुदा महाकाली के आगे लेट जाते हैं परंतु उस वक्त महाकाली का क्रोध सुध-बुध की सीमा से बाहर था। महाकाली ने अपना पैर महादेव की छाती पर जैसे ही रखा,  महाकाली की चेतना लौट आई कि उसने अनजाने में ही अपने पति को पैर लगा दिया और इस महापाप के पश्चाताप में महाकाली,यहीं व्यास नदी के किनारे समाधि मगन हो भगवान शिव की तपस्या कर पाप मुक्त होती है।
                          मंदिर परिसर में ही हर वर्ष सावन के चारों सोमवार,  मेरे गढ़शंकर शहरवासी भोले के दरबार में आए भक्तों के लिए खाद्य पदार्थों के लंगर लगाते हैं। यदि मैं सावन महीने के सोमवार को यहाँ आऊँ,   तो हर तरफ मुझे जाने- पहचाने लोग मिलते हैं और मेरे गढ़शंकिरये भाई बहुत सेवा करते हैं। वैसे मंदिर में अपना लंगर कक्ष भी है, मुझे याद आ रहा है कि एक बार जब हम लंगर में अपनी भूख लेकर पहुंचे तो लंगर खत्म।  मेरी बुआ जी के आग्रह पर हमें थोड़े से फीके चावल और अदरक का अचार मिला....क्या स्वादिष्ट तालमेल बना उस अदरक के अचार संग चावल...सारी उम्र के लिए वह स्वाद जीभ और ज़हन में ताज़ा है। मेरा अनुभव है दोस्तों,  यदि आप अपनी यात्राओं की यादों के संग वहां मिले स्वादिष्ट भोजन के स्वाद की याद को भी जोड़ लेंगे, तो उस यात्रा की याद हमेशा ही आपके दिमाग के स्मृति भंडार में अग्रिम क्रम में पड़ी होगी।
                          लंगर कक्ष के पास एक बेहद प्राचीन दीवार है जिससे स्थानीय लोग महाभारत समयकालीन बतातें हैं, वही आस पास कई सारे पुरातन मंदिर भी है जो अब जर्जर हो चुके हैं....शायद अब उन पर कोई श्रद्धालु भी ना जाता हो।  मंदिर के पीछे व्यास नदी की नील-हरी सी धारा के समीप श्मशान भूमि है, इसका ज्ञान मुझे तब हुआ जब मैं अपने पर्वतारोही संगी विशाल रतन जी को ले सर्दियों में कालेश्वर पहुंचा,  तो व्यास नदी की जलधारा तट से काफी दूर बह रही थी और उसके किनारे कई सारी चिताओं के जलाये जाने के अवशेष थे।
                          मंदिर के नीचे उतरकर व्यास जलधारा के पास पहुँचना भी तभी संभव हुआ था.... क्योंकि सावन के महीने में एक तो व्यास नदी की धारा प्रचंड रुप ले मंदिर के पीछे ही बह रही होती है और दूसरा परिजनों की बेड़ियां भी  मेरे मन की चंचलता पर जकड़ी होती है दोस्तों, क्या समझे...!!!
                          परंतु आवारा जल में जाना मौत को दावत देने समान ही होता है।  इस बात का प्रमाण मुझे तब साक्षात हुआ, जब मैंने नदी घाट की सीढ़ियों में एक संगमरमर का सूचना-पट्ट लगा देखा जिस पर लिखा था.......
                         " अमन के परिवार व परिजनों की तरफ से अपील है कि चट्टान के पास पानी बहुत गहरा है वहाँ कदापि ना जाएें....हम सब के दिलों में अपनी यादें छोड़ कर जुदा हो गया अमन,  हमें रोता बिलखता छोड़कर ना जाओ आगे पानी बहुत गहरा है,  कुछ हाथ ना आएगा पछतावे को छोड़कर"         (गुरमुख सिंह पिता, सुनीता माता, तरलोचन सिंह हरमीत सिंह भाई )जन्म 11-10-1991 स्वर्गवास 16-3- 2010
                            यह एक पत्थर ही काफी है मन की चंचलता को काबू में करने के लिए..... परंतु अफसोस वो नवयुवक "अमन" इसकी उदाहरण बना ताकि किसी और परिवार का अमन व चैन फिर से इस नदी में न डूब जाए।
                             खैर दोस्तों मंदिर से वापस चल,  फिर से उन 4-5 दुकानों के बाज़ार में हर बार रुक जाता हूँ क्योंकि  चाय-पकौड़े और नारियल के लड्डू भी खाने होते हैं जी......या यूँ कहें कि इस जगह मिलने वाले ज्यादा चीनी के नारियल लड्डू भी मुझे बार-बार यहाँ खींच लाते हैं।
                              सच बात बोलूँ....तो मुझ घुमक्कड़ को अलग-अलग जगहों पर मिलने वाले व्यंजन ही खींच ले जाते हैं दोबारा उन्हीं जगहों पर.....  जैसे मथुरा वृंदावन में मिलने वाली खस्ता कचौरी,  अमृतसर में मिलने वाले छोले कुलचे, धर्मशाला-मक्लोडगंज में मिलने वाले मोमोस्।
                             और,  अंत में आता है बारम-बार करने वाली यात्रा का मुख्य आकर्षण.... सावन के महीने की चिपचिपी गर्मी से राहत दिलाता कालेश्वर का वो जलकुंड.... जिसमें पर्वत से भूमिगत रूप से एक मोटी जलधारा आ गिर रही है।  उस शीतल जल धारा के नीचे जब मैं कुंड में प्रवेश कर अपना सर नीचे करता हूँ, तो उस समय की प्रचण्ड गर्मी में ऐसी अनुभूति होती है जैसे कि किसी चकोर को उसका चांद मिल गया हो। स्त्री-पुरुषों दोनों के लिए अलग-अलग जलकुंड हैं और नहाते हुए लोगों की "किलकारियां" उनकी चंचलता व प्रसन्नता का प्रमाण देती हैं।
                             और, हर बार की तरह दिन ढलने से पहले हमारी गाड़ी वापस चल देती है गढ़शंकर की ओर दोस्तों। आप जब भी हिमाचल प्रदेश में माता चिंतपूर्णी आए तो,   कालेश्वर आने की कोशिश अवश्य करें। माता चिंतपूर्णी से कालेश्वर की दूरी मात्र 31 किलोमीटर और  मां ज्वाला जी का मंदिर भी कालेश्वर से मात्र 13 किलोमीटर की दूरी पर ही है।
वो देखो दूर..... ध्यूंसर पर्वत पर " सदाशिव ध्यूंसर महादेव मंदिर "

खुराफाती मन उछलता है,  चल विकास उस ताल में जा कर नहाते है...
परन्तु हर बार परिवार नामक संगल से मेरे पैर बंधे होते हैं, सो बंधा हुआ पैर फिर
से गाड़ी का एक्सीलेटर दबा देता है सदाशिव महादेव मंदिर की ओर। 

बस हम कालेश्वर पहुँचने ही वाले हैं,  जी।

श्री कालीनाथ कालेश्वर महादेव मंदिर का मुख्य द्वार। 

श्री कालीनाथ कालेश्वर मंदिर। 

मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर चढ़ाएं जल के छींटे जब पुजारी आपके ऊपर फैंकता है,
 तो आत्मीय शीतलता की अनुभूति होती है दोस्तों। 

पूरे मंदिर परिसर में मुझे इस मंदिर की कारीगरी बेहद पसंद है। 

कालेश्वर मंदिर परिसर में महाभारत समकालीन एक पुरातन दीवार,  जिसे संरक्षित किया गया है। 

कालेश्वर मंदिर परिसर में कई सारे मंदिरों का समूह है दोस्तों। 

मंदिर परिसर में कुछ मंदिर तो जर्जर हो चुके हैं। 

मंदिर के पास बह रही व्यास नदी के तट पर श्मशान।

कालेश्वर के छोटे से बाज़ार में मिलने वाले नारियल के लड्डू....जो मुझे बहुत पंसद हैं। 

कालेश्वर का मुख्य आकर्षण...ठंडे जल की वो धारा,  जो भूमिगत रुप से  पहाड के गर्भ से निकल कुंड में गिरती है,
यह चित्र सर्दियों का है...बरसात में यह धारा बेहद मोटी होती है।

गर्मियों में कालेश्वर का मुख्य आकर्षण.... ठंडे व ताज़े पानी का यह कुंड।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढि़या लिखा आपने भाई जी, मेरे लिए एक नई जगह का पता चला, एक समस्या है इस पोस्ट में जी आपने अंत में लड्डु का चित्रा लगाया है उसे देखकर मन नहीं मान रहा जी क्या करें।

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    1. Haha Haha.... ये लड्डू ही ऐसे है कि मैं भी अपना मन मनवानें के लिए बार-बार इन्हें खाने कालेश्वर चल देता हूँ जी।

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  2. बहुत बढ़िया नई और आपकी पसंदीदा जगह से परिचय करवाने हेतु

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  3. उत्तर
    1. जी हां, ऐसा भी कह सकते हैं संदीप जी।

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