रविवार, 23 जुलाई 2017

भाग-14 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra

भाग-14  श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                                         " एक दिव्य अनुभूति.... और डाँडा धार पर्वत शिखर "

                                  मैं और विशाल रतन जी, श्री खंड महादेव कैलाश यात्रा के दूसरे पड़ाव थाचडू में कुछ समय रुक.... अब डाँडा धार पर्वत के शिखर "काली टोप" की ओर बढ़ रहे थे.... और अब तो चारों तरफ घनी धुंध का साम्राज्य हो चुका था,  पहाड की हरियाली को अब धुंध की सफेदी खा चुकी थी... बस कुछ ही दूरी बाद मानों तो हरियाली का रंग मद्धम हो चुका था.... तभी रास्ते में एक सज्जन पानी की पाइपों का निरिक्षण करते मिले,  बातचीत पर उन्होंने कहा कि सर्दियों में बर्फ पड़ी रहने से इन जल आपूर्ति पाइपों की हालत भी कोई ज्यादा अच्छी नही रही है,  परन्तु हमने उनका शुक्रिया कर कहा कि, " जो भी है आप के विभाग की वजह से ही हमें श्री खंड यात्रियों को डाँडा धार की इस खुश्क चढ़ाई में जीवन रक्षक जल मिल रहा है,  जी...! "
                    डाँडा धार पर्वत की चढ़ाई में अब पेड़ों का आना बंद हो गया था,  मतलब कि हम समुद्र तट से साढे तीन हजार मीटर के आस-पास पहुँच चुके थे,  हर तरफ मखमली सी हरी घास और उनमें पीले फूल ऊंचे हो-हो कर शायद हम श्री खंड यात्रियों को देख रहे थे.... इतनी ऊँचाई की ठंडक भी, पसीने से भीगें हमारे तनों को सुखाने में नाकामयाब साबित हो रही थी.... कि एकाएक मुझ में एक परिवर्तन सा हुआ... और मैं भावुक हो रोने लगा, मुझे समझ नही आ रहा था कि मेरे साथ ये क्या हो रहा है और मेरी आँखों में आँसू भर आए.....!
                    मैने अपनी मनोदशा तुरन्त विशाल जी से सांझा की,  तो वे बोले, " किस्मत वालों हो विकास जी, तीर्थ पर यात्री को ऐसी अलौकिक अनुभूति होना एक असाधारण घटना है... आप का अवचेतन मन चंद क्षणों के लिए ही सही, उस परम पिता से तो जुड़ा.....!! "
                    विशाल जी का ये उत्तर उनकी अटल आस्तिकता व अटूट ईश्वरीय विश्वास ही दे रहा था, जबकि मैं तो नास्तिक- वास्तविक सा इंसान हूँ.... इसी सोच में मगन था कि सामने से शिव के प्रिय वाद्य "डमरू" की आवाज़ ने मेरा ध्यान अपनी ओर बंटा लिया.... वो दो मित्र डमरू के साथ "बबम् बम" गाते हुए हमारी ओर बढ़ रहे थे.... और वार्ता के दौरान श्री खंड से वापस आ रहे उन दोनों सज्जनों ने हमें भांग के बीज और बादाम गिरी देते हुए सलाह दी,  कि श्री खंड यात्रा के अंतिम चरण में नयन सरोवर से बेहद कठिन चढ़ाई चढ़ ऊपर जाना पड़ता है,  सो जब आपकी सांस उखड़े शरीर जवाब देने लगे तो ये भांग के बीज व बादाम गिरी इक्ट्ठा चबाऐ,  इसे खाने से आप परिस्थिति के अनुकूलित हो जाएंगे.........उनकी कृतज्ञता का आभार व्यक्त कर हम दोनों फिर से पगडंडी पर बढ़ते जा रहे थे.....
                     हर ओर प्रकृति ने केवल दो रंग ही उड़ेल रख छोड़े थे.. "हरा और सफेद" ...हरा हरियाली से और सफेद बादलों का,  जो अब हमें नीचे की ओर दिखाई दे रहा था...कई दफा हवा के रुख से वो बादल हमे चूम कर भी निकल जाते.... राह पर मिल रहे यात्रियों से बम भोले का सम्बोधन निरंतर मिल रहा था,  मैं कभी बंगलौर से श्री खंड हो गई दयानंदा जी के साथ सैल्फी खिंचता तो कभी हमारी हमराही दस वर्षीय यात्री जवित्रा की रफ्तार से प्रभावित हो उसकी फोटो खींचता.... तो कभी नौ साल की रिती जो अपनी बड़ी बहन व नानी के संग श्री खंड जा रही थी... इन सब की फोटो खींच मैं सब को अपनी यादों में कैद करता जा रहा था.....
                      और,  अब डाँडा धार पर्वत का शिखर काली टोप भी नज़र आना शुरू हो गया था,  यहीं चढ़ते-चढ़ते एक विशेष किस्म की मक्खी बार-बार मेरी बाँहों पर आ बैठती और अपनी जीभ को मेरी त्वचा पर ऐसी घुसाती जैसे कोई सूई सी चुभा रही हो.........थाचडू से तीन घंटे चलते रहने के बाद आखिर हम डाँडा धार पर्वत के शिखर पर फैले बेशुमार पत्थरों के ढेर में से एक पत्थर पर जा बैठ सांस लेने लगे.... तभी नीचे से आ रहा एक दल हमारे पास से गुज़रा, तो उसमें से एक सज्जन ने मुझे कहा, " अरे भाई, यहाँ का मौसम एक दम बदलता है...इसलिए अपने शरीर को ढक कर रखो..! "
मैं उनको झट से पहचान गया कि ये जनाब रस्कयू दल के सदस्य है, जिन्हें मैने डाँडा धार की चढ़ाई पर उस युवक की लाश के पास देखा था,  सो उनके द्वारा कही ये बात मुझे भी वज़नदार लग रही थी... क्योंकि मुझे भी अब एकाएक ठंड लगनी शुरू हो गई थी... सो जल्दी से अपनी रक्सक से गर्म जैकेट निकाल पहन ली,  वे सज्जन फिर बोले, "आपने वज़न भी बहुत ज्यादा उठा रखा है, इसे कम करे "            मैने हंसते हुए उन्हें कहा, " ये वज़न तो मैने अपने-आप को संतुष्ट करने हेतू जानबूझ कर उठा रखा है जी, आज रात जहाँ भी रुकेंगें इसे वहीं छोड़ कल की यात्रा इसके बगैर ही करुँगा जी...!"
                     दोस्तों,  कड़ी मेहनत के बाद पर्वत शिखर पर पहुँचने का परम सुख हम पर्वतारोहियों को बेहद हर्षित व आनंदित करता है,  और इस डाँडा धार पर्वत शिखर की सुंदरता के बारे में....मैं क्या लिखूँ....पहाड के सिर पर बेहद खुली जगह में हरियाली का मैदान,  उस मैदान में प्रकृति ने जहाँ-तहाँ सैंकड़ों छोटी-बड़ी, गोल-चपटी चट्टानों को कलाकृतियों की भाँति सजा रखा था... और पूरे मैदान के श्रृंगार का जिम्मा लाल-पीले व जामुनी रंगी पुष्पों ने उठा रखा था,  चढ़ाई चढ़ कर आ रहे सब यात्रियों के लिए ये स्थान एक ओपन स्टूडियो की भाँति ही था... सब के सब यहाँ-वहाँ खड़े हो या फूलों में लेट कर अपनी यादों को चित्रों का रुप दे रहे थे....... हम दोनों के पास ही पांच स्थानीय औरतों का दल भी बैठा विश्राम कर रहा था,  जब वे चलने लगी तो उन्होंनें हम से कहा कि, "भैया आप भी हमारे साथ ही चलो श्री खंड "      मैने हंसते हुए उन्हें कहा, " बहनों आप तो स्थानीय पहाड़ी हो और हम मैदानी, आपके कदमों से अपने कदम मिला कर चलना हमारे बस से बाहर की बातें है, जी...!! "       और वे सब शिव का जयकारा लगा, आगे की ओर तेज चाल से चल दी और हम भी अपनी सुस्त चाल से उठ फूलों में खड़े हो एक-दूसरे के चित्र खींचने में व्यस्त हो गए......
                        अब आसमान मेघाच्छन्न हो रहा था, सो उस नज़ारे को छोड़ अगले नज़ारे की ओर बढ़ने में ही हमने अपनी भलाई जानी.... डाँडा धार पर्वत शिखर के पार दूसरी ओर का वह नज़ारा भी कम आकर्षक ना था दोस्तों.... "काली घाटी शिखर" पर बना "काली जोगणी" का एक छोटा प्रतीक स्थल व यात्री विश्राम के लिए लगे इक्का-दूक्का टैंट...एकाएक मेघों ने अपना करम दिखना प्रारंभ किया,तो उस हल्की सी बूंदाबादी में हम दोनों काली जोगणी मंदिर के पास ही एक टैंट नुमा दुकान में जा बैठे... और देखते ही देखते मेघों ने अपना राग तीव्र स्वरों में गाना शुरु कर दिया.... टैंट की छत पर धनाधन बारिश की बूँदे गिरने से औरों का तो पता नही,  पर मुझे राग मेघ-मल्हार जरूर सुनाई दे रहा था.....
                          हम दोनों ने दुकानदार तारा चंद जी से कुछ अल्पाहार खिलाने की फ़रमाइश कर डाली... दोस्तों, अब उस दुर्गम स्थल पर मेरे प्रिय पकौड़े तो मिलने से रहे... तो अल्पाहार के नाम पर वही "धक्के से पहाड़ी बना व्यंजन " नमकीन सेवईयों का गुच्छा "मैगी" फिर से हमारे समक्ष प्रकट कर दिया गया,  और काली शिखर की 3740मीटर की ऊँचाई की ठंडक पर अब बादलों ने भी अपना तड़का लगा दिया था... सो गरमागरम मैगी की प्लेटों से उठ रही भाप ने हमारी इच्छुक भूख को वास्तविक भूख में तबदील कर दिया.... और मजे की बात बताता हूँ दोस्तों कि,  विशाल जी उस मैगी की एक लड़ी को मुँह में रख "सू" की आवाज़ कर अंदर खींच रहे थे और मैने भी उनकी नकल करना शुरू कर दिया, शायद श्री खंड महादेव यात्रा की पहली परीक्षा डाँडा धार को पार करने की हमारी कामयाबी अब "चंचलता" का रुप ले चुकी थी....!!
                                                             ..........................(क्रमश:)

थाचडू से आगे....डाँडा धार की चढ़ाई पर छाई धुंध 

रास्ते में कई जगह भगवान शिव की महिमा गाती ऐसी तख्तियाँ पेड़ों से बंधी थी.... 

जल आपूर्ति की पाईप लाइन की देख-रेख करने वाले कर्मचारी... 

विकास जी,  अब तो चारों तरफ धुंध ही धुंध है....! 

ये सैल्फी, मैने ठीक उसी वक्त ली थी.... जब मुझे दिव्य अनुभूति सी हुई और मैं एकाएक मेरी आँखों से आंसू बहने लगे...!     

और बबम् बम, बबम् बम.... डमरू की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा 

डमरू वाले मित्रों से वार्तालाप करते विशाल रतन जी.... 

और, इन डमरू वाले मित्रों ने हमें ये भांग के बीज और बादाम गिरी दी....

बादलों की सफेदी..... हरियाली के हरे रंग को मद्धम करती जा रही थी 

बस दो ही रंग.... हरा और सफेद

डाँडा धार पर्वत शिखर की ओर बढ़ते यात्रिगण...

बंगलौर से श्री खंड महादेव हो आई दयानंदा जी के साथ सैल्फी.... 

श्री खंड महादेव पथ पर दस वर्षीय जवित्रा.....

नौ वर्षीय रिती भी चल रही थी श्री खंड... अपने नानी के साथ 
डाँडा धार शिखर की ओर चढ़ाई करते हुए ऐसी मक्खी बार-बार मेरी बाँह पर बैठ मुझे परेशान कर रही थी... 

लो, दोस्तों हम पहुँच गए डाँडा धार पर्वत शिखर पर.... 

भैया, आप हमारे संग चलो श्री खंड....!
नही बहनों, हम मैदानी भाई आप पहाड़ी बहनें के संग कदम से कदम मिला कर नही चल सकते, जी...! 


और, हम अपने सुस्त चाल से डाँडा धार शिखर की ओर चल दिये, कुछ अपनी हाज़री के चित्र भी तो खींचने थे ना.. 

रंग-बिरंगे फूलों से लदा डाँडा धार पर्वत शिखर "काली टोप"

एक यादगारी अहसास.... 

उसी अहसास में विशाल रतन जी.... 

डाँडा धार पर्वत शिखर पर.... प्रकृति द्वारा निर्मित  "खुले रंगमंच का मंच" 

चलो, अब डाँडा धार पर्वत शिखर के पार दूसरी ओर बढ़ते है....

और, उस पार पहुंच ये नज़ारा आँखों के समक्ष था.... काली घाटी टोप 

डाँडा धार पर्वत पर...... काली घाटी शिखर पर स्थापित "काली जोगणी" का प्रतीक स्थल... 

और, काली घाटी शिखर पर बारिश होने लगी.... और हम दोनों ने भाग कर काली जोगणी मंदिर के पास टैंट नुमा दुकान पर जा शरण ली..... व दुकान के द्वार पर आराम फ़रमा रही हमारी "चरण पादुकाएँ"

और, फिर अल्पाहार के रुप में प्रस्तुत किया गया " नमकीन सेवईयों का गुच्छा ".....!!!


                                 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया। मैग्गी के बारे में सही कहा 'धकके से बना पहाडी व्यंजन' परंतु इसका स्वाद एक तो जाना पहचाना रहता है दुसरा तुरंत तैयार हो जाती है। बाकि चित्र बहुत बढ़या पर कम है अग़ली कड़ी में चित्रो में कंजूसी न करे।

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    1. बेहद धन्यवाद अमित जी.....ये बात आपकी सही है कि ये तुरंत व्यंजन है... इस की बदौलत तो नाराज़ बीबी के पति कुछ बना कर खा लेते हैं.....जी

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  2. किस्मत वालों हो विकास जी, तीर्थ पर यात्री को ऐसी अलौकिक अनुभूति होना एक असाधारण घटना है... आप का अवचेतन मन चंद क्षणों के लिए ही सही, उस परम पिता से तो जुड़ा.यही तो खासियत है इन पहाड़ों की , हर पल , हर जगह पवित्र लगती है !! बहुत ही सुन्दर नज़ारे दिख रहे हैं यात्रा के

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