शनिवार, 15 जुलाई 2017

भाग-13 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-13 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर......
                                                  "यात्रा के दूसरे पड़ाव थाचडू में "
     
                                         मैं और विशाल रतन जी श्री खंड महादेव यात्रा के दूसरे पड़ाव "थाचडू"(3375मीटर)में श्री खंड सेवा दल की ओर से चलाए जा रहे लंगर पर दोपहर का भोजन कर चुके थे..... और जब पता चला कि ये लंगर हिमाचल प्रदेश के ही एक शहर "हमीरपुर" वाले लगाते हैं,  तो लंगर प्रबंधक "काका जी" के पास जा मुलाकात की.... और कहा कि आपने जो मूँग की दाल और चावल बना रखे है,  एक तो वह अति स्वादिष्ट है.. दूसरे इस कठिन यात्रा में पाचन-तंत्र पर भी हल्के है.... तो हमारे पीछे खड़े एक और महोदय जो अभी भोजन खा रहे थे, बोले पड़े कि "सच कहा जनाब आपने... यहाँ इस परिस्थिति में ये सादे दाल-चावल अमृत लग रहे हैं,  नही तो अपने घरों में बैठ हम तो पनीर की सब्जी में भी मीन-मेख निकाल डालते है....! "   और हम सब उनकी बात सुन हंस पड़े....
                       मेरा लंगर प्रधान काका जी से मिलने का मुख्य कारण था कि, इनके शहर हमीरपुर से मेरे एक फेसबुकिया मित्र थे... जो उस समय हमारे फेसबुक दायरे में बहुत सरगर्म थे,  बेहद ही रहस्यमय शख्सियत थे वो... जनाब मुझे पहली बार फेसबुक पर एक हिमाचली ग्रुप में मिले थे, लड़की के नाम से अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल चला रहे थे...और कमाल के हाज़िर जवाब, हर बात का शायरी में ही जवाब देना इन महोतरमा बने जनाब का अंदाज़ था और चंद रोज में मैने उन्हें बहन मान अपनी संक्षिप्त फेसबुक मित्र सूची में जोड़ लिया.... परन्तु एक-दो सप्ताह बाद उस फेसबुक ग्रुप में कोई विवाद खड़ा कर ये कथित महोतरमा फेसबुक की दुनिया से ही गायब हो गई,  बात आई-गई हो चली और फिर कुछ खास सूत्रों से पता चला कि वो कवयित्री नही बल्कि एक लड़का था,  जो लड़की के रुप में फेसबुक प्रोफ़ाइल चला रहा था... यह बात सुन बेहद गुस्सा आया कि वह हम सब की भावनाओं से एक लड़की बन खिलवाड करता हुआ खूब हंसता व औरों को भी, हम सब पर हंसाता होगा.....!
                      दोस्तों,  यह भी इस फेसबुक का घिनौना चेहरा है...कि कुछ लोग इसे मजाक बना अपना समय बिताते हैं, खैर फिर एक साल बाद..... फिर से एक अलग ग्रुप जिसका मैं एडमन था, में वही चिरपरिचित भाषा व अंदाज़ में एक अन्य नाम से वही जनाब प्रकट हुए.... और अपनी पहली पोस्ट में केवल मुझे केन्द्रित कर प्रणाम किया,  मैं झट से समझ गया कि वही ये मेरी पुरानी बहन है... जो एक नये नाम व मखौटे संग मेरे समक्ष हाज़िर है, बातचीत में उन्होंने मुझ से माफी माँग अपना पक्ष आगे रखा और फिर से फेसबुकिया दोस्ती कायम हो गई..... परन्तु ना जाने क्यों मुझे अब भी उन महोदय पर विश्वास नही हो रहा था, हालाँकि कई बार उन्होंने मेरे संग फोन पर भी बातचीत की थी,  अब उन्होंने बताया था कि वह हिमाचल पुलिस में कार्यरत है.....
                      सो,  काका जी से उनके विषय में जानकारी हासिल करनी चाही, परन्तु सिग्नल ना होने के कारण मोबाइल पर फेसबुक ना चलने से उनकी फोटो मैं काका जी को दिखा ना सका,  और उस नाम के पुलिस वाले को वो जानते नही थे...... सो बात वहीं समाप्त हो गई,  परन्तु दोस्तों इस घटना के 6महीने बाद इन फेसबुकिया कलाकार व शायर की असलियत तब सामने आ गई, जब हमारे एक सांझा फेसबुक मित्र उन्हें ढूँढते-ढूँढते हमीरपुर ही जा पहुँचें.... और पुलिस थाने पहुँच इनकी फोटो दिखाकर मिलाने की बात की..... और पाया कि ये जनाब पुलिस वाले भी नही निकले, बस उसके बाद से मैने इनको "अमित्र" कर दिया.....
                       कई दफा सोचता हूँ कि जाने क्यों कुछ शरारती तत्व निरंतर सम्पर्क सूत्र के विश्व प्रसिद्ध तंत्र "फेसबुक " में गलत नाम,  किरदार व पहचान छिपा कर लोगों के जज़्बातों से खिलवाड़ कर मजाक उड़ातें है... क्या ये एक प्रकार का मानसिक रोग है या फिर तुच्छ मानसिकता की उपज..!!!
                       इन कथित महापुरुषों की वजह से एक दिन हमारे सोशल मीडिया अकाउंट को भी हमारे आधार कार्ड से जोड़ दिया जाएगा,  और प्रोफ़ाइल की सुंदर सी हमारी तस्वीर आधार कार्ड पर लगी हुई "भावशून्य तस्वीर " में बदल जाएगी...!!
                        दोस्तों,  तीन साल पहले ही फेसबुक पर प्रकट हुआ हूँ.... कुछ अंतर्मुखी स्वभाव का हूँ,  मेरा कोई भी ऐसा जिगरी यार नही है जो मेरे राज जानता हो और मैं उसके..... तीन साल पहले मुझे कोई नही जानता था,  अब आप भी मुझे जानने लगे हो और मैं आपको..... इन तीन वर्षीय फेसबुक जीवन में मैने कई नए अनुभव सीखें, चंद ऐसे मित्र दिये जो मुझे अपने से लगते है.... कुछ के पास मैं पहुँच गया उनसे मिलने, तो कुछ मेरे पास आ पहुँचें मुझ से मिलने...!
                         फेसबुक के खट्टे-मीठे अनुभवों में से एक है कि एक ग्रुप में बढ़ रही मेरी लोकप्रियता से जलन रख,  उस पब्लिक ग्रुप के "मलिक बने एडमन" द्वारा ग्रुप में मेरे किरदार की "हत्या" कर देना..... और दूसरा है कि एक अन्य फेसबुक ग्रुप में मेरी कारगुज़ारी देख,  बगैर पूछें मुझे अनजान व्यक्ति को एडमन बना कर सम्मानित करना...... फेसबुक की ही बदौलत आज मैं भारत व विदेश के मशहूर बाँसुरीवादकों के सम्पर्क में हूँ और वे मुझे पहचानतें है,  जबकि दूसरा पहलू मेरे शहर के चंद फेसबुकिया मित्र मेरे पास से ऐसे गुज़र जाते है,  जैसे कि मुझे जानते ही नही....!!!
                          चलो छोड़ों मित्रों,  मैं कहाँ रोना ले बैठा....इस बुरी लत फेसबुक का, यात्रा-पथ पर फिर से बढ़ते है....    हम थाचडू लंगर पर करीब 15मिनट ही रुके होगे कि आगे का सफर शुरु कर दिया.... थाचडू में बहुत सारे टैंट लगे हुए थे रात्रि विश्राम के लिए,  उन टैंटों में एक टैंट पर मैडिकल सुविधा भी उपस्थित थी....सो वहाँ मौजूद कर्मियों से रास्ते में मिली लाश के विषय में पूछा,  तो वे बोले कि जालन्धर शहर से जतिन नाम का 28वर्षीय युवक पिछले चार दिन से हमारे पास ही था... उसे निमोनिया हो गया था, परन्तु अब तो वह ठीक था फिर क्यों रास्तें में वापस जाते हुए उस की मौत हो गई, समझ से बाहर है......... बातचीत में बाकी दो और मृतकों के बारे में भी जानकारी ली,  तो पाया हिमाचल प्रदेश के ही अन्नी से 35वर्षीय दयाल चंद की मृत्यु पार्वती बाग में सांस रुक जाने से हुई और अयोध्या से श्री खंड दर्शन कर वापस नीचे उतर रहे 24वर्षीय उमेश प्रताप की फिसल कर गिरने से सिर में चोट लग गई,  मौके पर बच गया परन्तु दिमाग में रक्तस्राव होता रहा...... पार्वती बाग में रेस्क्यू टीम के पास दो दिन पड़ा रहा, सेना के किसी बड़े अफसर का बेटा था... सो सेना का हेलीकाप्टर लेने भी आया, परन्तु मौसम साफ ना होने के कारण हेलीकाप्टर नीचे नही उतर सका...और अत: उमेश प्रताप दम तोड़ गया...!
                           ये सब लिखने का मक़सद है कि इस यात्रा पर पूर्ण रुप से स्वस्थ व्यक्ति ही जाए और संयम व चौकना रह कर ही इस यात्रा को पूर्णता तक ले जाए.....
                            थाचडू से चले तो कुछ कदम बाद ही फिर से चढ़ाई आनी शुरू हो गई, मैने विशाल जी से कहा कि "मुझे लगता था कि थाचडू  में ही डाँडा धार की चढ़ाई का अंत हो जाएगा.....परन्तु नही, चलो फिर जोर से बम-बम भोले का जयकारा लगा चढ़ते है इस डाँडा धार शिखर की ओर..! "      और भगवान शिव को समर्पित पहाड़ी भजन जो मुझे बेहद पंसद है, जोर-जोर से गाने लगा "शिव कैलाशों के वासी, धौली धारों के राजा... शंकर संकट हरना "
                             कुछ देर चलते रहने पर ऊपर से उतरता एक लड़का हमारे पास आ रुका, और उसने हम से कहा कि वह हमारी रक्सकों पर "ग्रीन श्री खंड ईको ड्राइव" के स्टीकर लगाना चाहता है.... हमने उसे इसके विषय में पूछा तो वह बोला, " मेरा नाम हर्षशूल शर्मा है और अरसू का रहना वाला हूँ और ग्रीन श्री खंड ईको ड्राइव संस्था का स्वयंसेवक हूँ.. हमारी संस्था ने पूरे श्री खंड मार्ग पर हर दुकान के आगे कचरा एकत्र करने हेतू पीले रंग के थैले बांध रखे है,  जिसे यात्रा के समाप्त होने के बाद इक्ट्ठा कर उचित जगह पर ले जाया जाएगा... और हम स्वंयसवेक रास्ते पर यात्रियों द्वारा फेंका गया कचरा एकत्र भी करते हैं"     हम दोनों ने हर्षशूल व उनकी संस्था की जम कर प्रशंसा की...... और पिछले साल सर्दियों में की हुई खीरगंगा यात्रा में पूरे रास्ते पर यात्रियों द्वारा फेंकें हुए कचरे के ढेर अचानक से याद आ गये.....दोस्तों आप जब भी पहाडों में जाओ, तो प्रण कर के चलो कि हमे अपना कचरा वहाँ ऐसे ही खुले में यहाँ-तहाँ नही फेंक आना है,  बल्कि निधार्रित स्थान पर ही फेंकना है.......
                               हर्षशूल से ये अल्प मुलाकात हमें हर्षित गौरवान्वित  कर गई, कि हमारे युवा इस विषय में भी कार्य कर रहे हैं......... कुछ ओर चढ़ाई चढ़ हम दोनों सांस लेने रुके ही थे, कि ऊपर से तीन युवक व एक युवती खुशी में चिल्लाते व भागते हुए हमारे सामने ही पहाड के किनारे पर बड़ी सी समतल चट्टान पर ऐसे कूदे कि जैसे वहीं से आसमान में उड़ जाना चाहते हो,  मैने उनकी खुशी देख पूछा...... तो जवाब मिला कि "खुश क्यों ना हो... हम श्री खंड माथा टेक वापस जो आ रहे हैं...!!! "

                                                                           ..................................(क्रमश:)







          
                     
                                                       
कढ़ी, मूँग की दाल व चावल का लंगर....

थाचडू में लंगर प्रबंधक काका जी और मैं..... 

श्री खंड महादेव के दूसरे पड़ाव "थाचडू" में लगे कई सारे टैंट.... 

थाचडू में एक दुकान के बाहर खड़े विशाल रतन जी... 

थाचडू से प्रस्थान.... 

हर्षशूल शर्मा "ग्रीन श्री खंड ईको ड्राइव" का स्टीकर लगाते हुए...

और, मेरी रक्सक पर भी हर्षशूल ने स्टीकर लगा दिया..... 
हर दुकान के बाहर "ग्रीन श्री खंड ईको ड्राइव" संस्था ने कचरा डालने के लिए पीले रंग के थैले टांग रखे थे...

खुश क्यों ना हो, हम श्री खंड माथा टेक वापस जो आ रहे हैं....!!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे हर्ष शूल शर्मा जी का प्रयास बेहतरीन और अनुकरणीय लगा !! फेसबुक पर ऐसे नमूनों की कमी नहीं हैं एक ढूंढिएगा हज़ार मिल जाएंगे !! आपका एक नया टैलेंट भी जानने को मिला , कभी साथ यात्रा का संयोग बना तो मौका मिलेगा आपको सुनने का !!

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  2. जी, जरूर योगी जी.... बेहद स्वागत है जीत, क्षमापात्र हूँ मैने आज ही आप कमेंट देखा, जी

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