रविवार, 4 अगस्त 2019

भाग-3 " मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से...!"



भाग-3 " मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से...!"

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                                  " टॉस"

                      16अगस्त 2014....भरमौर में लगे ज़बरदस्त जाम की वजह से हम भरमौर के बाहर ही होटल में रात काट,  सुबह तड़के पांच बजे ही भरमौर से वापस चल दिये चम्बे की ओर।  हम तीनों के मन बहुत भारी थे कि मणिमहेश कैलाश झील के इतने पास आकर भी, हम वहाँ नहीं जा पाये...मणिमहेश जाने के लिए "न्यौण यात्रा"  के दिनों में इतने ज्यादा लोग भरमौर-हडसर पहुँच रहे थे कि उनकी गाड़ियों की भीड़ से सड़के जाम हो चुकी थी।
                      हम तीनों चुपचाप से गाड़ी में बैठे थे,  गाड़ी दिनेश जी चला रहे थे।  मैं बाहर अंधेरे में शून्य में देख रहा था, कानों में सड़क पर दौड़ रही गाड़ी के टायरों की  'गूँज'  गूँज रही थी। मैं अपनी आँखें बंद कर सिर को सीट से टेक लेता हूँ...दिनेश जी व विशाल जी ने आगे बैठे क्या बातचीत शुरू की है, उसे अनसुना कर देता हूँ। बस दिमाग में चल रहा था कि यदि हम वापस जाने की समय-सीमा के गुलाम ना होते तो आज़ाद परिंदों की तरह पिंजरे को तोड़ (यानि गाड़ी को कहीं भी छोड़) भरमौर से किसी भी तरह हडसर पहुँच, मणिमहेश की पदयात्रा प्रांरभ कर देते।
                    गाड़ी का टायर किसी गड्ढे में गिरा तो मेरी चेतना वापस आई....आँखें खोल बाहर की तरफ देखा तो धरती के अंधेरे पर आसमान की ओर से आ रही भोर की हल्की लौ अपने पैर पसार रही थी।  करीब आधा घंटा हो चला था हमें भरमौर से चले हुए....एक मोड़ पर से मेरी निगाह पीछे छूट चुके भरमौर की ओर गई तो, सुबह होने से पहले की हल्की-हल्की रौशनी में मुझे एक बहुत खूबसूरत पर्वत शिखर नज़र आया,  जिसके शिखर बर्फ से लबालब थे।  मैंने सरसरी सी निगाह मार, उसे भी अनदेखा कर दिया।
                    परन्तु पिछले दस मिनटों से चल रहे सफ़र में पूरी " बूडिल घाटी" का आकर्षण वह हिमाच्छादित पर्वत ही बना हुआ था,  मेरी नज़र बार-बार उस पर ठहर ही जाती। चलती हुई गाड़ी से दो-तीन फोटो तो मैं उस पर्वत के खींच चुका था, जैसे ही एक बढ़िया कोण मुझे उस पर्वत का मिला.....मैने झट से गाड़ी रुकवाई और कैमरा ले बाहर निकल गया। तब विशाल जी व दिनेश जी से बोला- " मुझे यह पर्वत ही 'मणिमहेश कैलाश ' लगता है...!!"
                      अब हम तीनों ही उस पर्वत को देख रहे थे, परन्तु प्रश्नवाचक निगाहों से और इतनी सुबह हमारे इस प्रश्न का उत्तर देने वाला वहाँ कोई भी आस-पास नहीं था। सो फोटो खींच कर वहाँ से चल दिये। परंतु दोस्तों वह "मणिमहेश कैलाश पर्वत" ही था।
                      अब मन कुछ हल्का महसूस करने लगा, हम तीनों ही सामान्य बातचीत में मशरुफ़ हो गए। सूर्योदय अभी नही हुआ था फिर भी सुबह होने की रौशनी धीरे-धीरे पहाडों का हरा रंग फिर से गहरा कर रही थी, घाटी के बीचोबीच उड़ रहे बादलों की सफेदी को भी और बढ़ा रही थी।
                        मणिमहेश झील का जल संग ले बह कर आ रहा " बूडिल नाला" एक तंग दर्रे से गुज़रता हुआ "रावी नदी" में आ मिलता है। उस तंग सी घाटी जिसमें  बूडिल नाला और सड़क से गुज़रने योग्य ही जगह है,  हम कुछ क्षणों के लिए उसे देखने के लिए अपनी गाड़ी से उतर आये और वहीं से हमें "खड़ा-मुख" गाँव दिख रहा था...जहाँ बूडिल और रावी नदी का संगम होता है। खड़ा- मुख में रावी पर बने बांध के कारण नदी एक झील का रूप ले लेती है जो उस ऊँचाई से देखने में बहुत खूबसूरत लग रही थी और उससे भी सुंदर रावी नदी पर बने पुल की लाइटें लग रही थी, जो अभी बुझाई नहीं गई थी।
                      यात्रा का सुखद एहसास फिर से तन-मन पर छाने लगा,  मैंने सलाह दी- "समय-सीमा के अनुसार हमारे पास अभी घूमने के लिए पूरे दो दिन बचते हैं...कोई गम नहीं रहा कि हम मणिमहेश नहीं जा पाए, परंतु इन पहाड़ों में ही हैं...किसी और जगह चलते हैं, जहाँ हम गाड़ी ले जा सकते हो।"
                      और,  एकदम से बोला- " चलो, चम्बा से 'सच-पास' चलते हैं...!"
               सच-पास का नाम मैंने अपनी पिछली भरमौर यात्रा के दौरान जून 2010 में डलहौजी के "पंचपुला" दर्शनीय स्थल पर एक रेहड़ी वाले से पहली बार सुना था,  जिसके पास हम 'कथित पहाड़ी व्यंजन' मैगी खाने के लिए रुके थे। भरमौर जाने के बारे में उस से पूछताछ की तो वह बोला-" भरमौर क्या जाना, आप सच-पास जाकर देखो..!"
                 "सच-पास यह कौन सी जगह और कहाँ है भाई...?"
                  "चम्बा से नया रास्ता निकला है, बहुत जबरदस्त इलाका है झरनों और बर्फ से भरा हुआ।"
                    परन्तु मैं सच-पास नहीं गया क्योंकि मेरी दौड़ अभी मशहूर पर्वतीय स्थलों जैसे मसूरी, डलहौजी, शिमला, मनाली तक ही सीमित थी। सो डलहौजी से खज्जियार-चम्बा घूमते हुए भरमौर आ पहुँचे।
                       हम तीनों में एकदम से ठान लिया, हाँ सही है सच-पास ही चलते हैं।
                     रास्ते की खूबसूरती को रावी नदी में गिर रहे उस खूबसूरत झरने ने और बढ़ा दिया,  जो शायद जाते वक्त हमारी आँखों से छूट गया था। खड़ा-मुख से हम दस किलोमीटर चल चुके थे कि सड़क किनारे दीवार की तरह खड़े चट्टानी पहाड के शिखर से गिर रहे झरने पर आ रुके। दिनेश जी वहाँ अपना " पंच तरणी स्नान" में व्यस्त हो गए और मैं खुराफाती सोच का बंदा उस खड़ी दीवार नुमा चट्टान पर झरने के साथ-साथ ऊपर चढ़ने लगा। तभी सड़क से एक स्थानीय पिकअप जीप वाले ने रुक कर कहा-"यहाँ ऊपर से पत्थर गिरते हैं, यह खतरनाक जगह है।"
                     तो विशाल जी और दिनेश जी ने मुझे रोका.... नहीं तो मैं शायद "ऊपर" ही पहुँच जाता....!!!!!
                      गाड़ी फिर से चम्बा की ओर भागने लगी  सच-पास जाने के लिए,  मैं अपने पास मौजूद हिमाचल प्रदेश के नक्शे को खोलकर सच-पास के लिए रास्ता खोजने लगता हूँ।  तब हम घुमक्कड़ों का प्रिय ऐप "गूगल मैप" कहाँ हमारी पकड़ में था, हमारी पहुँच तो कागज़ पर अपने नक्शों या फिर रोड एटलस तक ही सीमित होती थी। यह "नेस्ट एड विंग्स" का फोल्डेबल नक्शा है, जो मैंने 2004 में अपनी शादी की सालगिरह पर सबसे पहले ट्रिप मनाली यात्रा की वापसी पर 'हिलौंगी माता' स्थल पर मौजूद एक दुकान से खरीदा था। मेरे हिमाचल भ्रमण का मुख्य स्रोत यह नक्शा ही है, जो आज भी मेरे पास मौजूद है।
                     परंतु तब उस समय मुझे मेरे नक्शे पर सच-पास का रास्ता ही मौजूद नहीं मिला, हो सकता है जब यह नक्शा छपा हो तब सच-पास का रास्ता ही ना बना हो। 
                     दोस्तों,  सच-पास का रास्ता भारतीय सेना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि पठानकोट से लेह क्षेत्र में जाने के लिए यह रास्ता छोटा पड़ता है और 1998 में इस रास्ते के निर्माण में लगे 35 हिंदू मजदूरों को आतंकवादियों द्वारा कत्ल कर दिया गया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए यह छोटा रास्ता बने..!
                       नक्शे पर सच-पास ना मिलने पर मैंने सरसरी नज़र हडसर से मणिमहेश झील को जाते पैदल मार्ग पर डाली, तो एकदम से चौंक गया कि नक्शा एक और जगह से भी पैदल रास्ता दिखा रहा है- "होली से मणिमहेश"
                        मुझे खुद पर ही हैरानी होने लगी कि मैंने यात्रा से पहले यह नक्शा क्यों नहीं देखा। चलो खैर जेब से मोबाइल निकाला, जो दो महीने पहले कीपैड वाले फोन से तरक्की कर टच एनड्राइड फोन में तबदील किया था। सोशल मीडिया " फेसबुक " पर इसी फोन ने मुझे जन्म दिया था।  फोन पर गूगल से प्रश्न पूछा तो उत्तर मिला कि होली से पहले "त्यारी" गाँव से पैदल रास्ता "कलाह पास " होते हुए मणिमहेश जाता है।  यह पढ़ मेरी आँखों में चमक लौट आई,  एक आस जाग सी जग उठी कि शिव भोले तुझे खाली हाथ वापस नहीं जाने देगें, विकास...!
                     मैंने उत्साहित हो गाड़ी के आगे बैठे विशाल जी और दिनेश जी को यह "खुशखबरी" सुनाई, परंतु उन्होनें मेरी इस बात पर कोई ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दिखाई...बस इतना कहा- "अब हम खड़ा-मुख जहाँ से होली को रास्ता मुड़ रहा था, से भी बीस किलोमीटर आगे निकल आये हैं।"  
                   मैं बोला- "तो फिर क्या हुआ, हम यहीं से वापस हो जाते हैं होली के लिए....अरे भाई हम लोग तो इन पहाड़ों में घूमने आये हैं चलो मुड़ चलते हैं, और रावी नदी के साथ-साथ होली को जाता रास्ता भी बेहद खूबसूरत होगा क्योंकि जिस घाटी के बीचो-बीच नदी बहती हो,  वहाँ दिलकश नज़ारे मिलना आम बात होती है.... होली से पहले त्यारी गाँव तक जहाँ से मणिमहेश को पैदल रास्ता शुरू होता है,  चलते हैं यदि वहाँ से सम्भव होगा तो चढ़ जाएगें मणिमहेश के लिए, नहीं तो हम घूम ही तो रहे हैं इन पहाडों में.....!!! " कह कर मैं हंसने लगा।
                          गाड़ी अब खड़ा-मुख की ओर वापस दौड़ रही थी। खड़ा-मुख पहुँच कर सुबह का नाश्ता खाकर और खाने-पीने का सामान लेकर व पूछताछ कर हम चल दिये खड़ा-मुख से होली वाली सड़क पर।  सुबह के 9बज चुके थे,  खड़ा-मुख से होली की तरफ दो-तीन किलोमीटर आगे बढ़ते ही धौलाधार और पीर पंजाल पर्वत मालाओं के बीचो-बीच रावी घाटी की खूबसूरती ने हमारा मन मोह लिया।
                गाड़ी अब मैं चला रहा था....जैसे-जैसे हम होली की ओर बढ़ते जा रहे थे,  पहाडों पर भी हुस्न चढ़ता जा रहा था। मैं अपने जीवन में पहले सबसे खूबसूरत पहाडों को देख रहा था,  पहाडों पर चढ़ा ऐसा हरा रंग मैने अपने जीवन में पहली बार ही देखा था। धौलाधार और पीर पंजाल की चोटियाँ बर्फ से सजी पड़ी थी। करीब आधे घंटे के सफर के बाद हम रावी नदी के पार " त्यारी गाँव " को जाते लकड़ी के झूलते पुल पर आ रुके।  हम असमंजस में खड़े सोच ही रहे थे कि क्या अपनी गाड़ी इस पुल पर चढ़ा दें या नहीं।  तभी दूसरी तरफ से आ रही एक कार से हमें उत्तर मिल गया कि इस पुल पर कार आ-जा सकती है।  हम तीनों गाड़ी से उतर कर पुल के छोर पर खड़े हो गए,  दूसरे छोर से आ रही कार के कारण लकड़ी से बना पुल हिल रहा था। कार के इस पार आने के बाद इस बहुत लम्बे पुल पर से एक जीप भी तेज़ रफ्तार से गुज़र गई।
                         दिनेश जी अपना कैमरा ले पैदल ही पुल पर चल पड़े,  मैने कार स्टार्ट कर उसे पुल पर चढ़ा दिया। दिनेश जी आगे से और विशाल जी पीछे से पुल पर जा रही गाड़ी के फोटो खींच रहे थे। मेरे लिए यह एक रोमांचित अनुभव था कि मैं उफन रही नदी के ऊपर पुरातन शैली में बने लकड़ी के झूलते पुल पर से गाड़ी को पार करवा रहा हूँ।
                         गाड़ी को पुल पार करवा कर हम दूसरी तरफ चले ही थे कि हमारे आगे पैदल जा रहे दो आदमियों ने हमें हाथ दे रोक कर कहा कि हमें भी साथ ले चलो। उनके गाड़ी में बैठते ही हमारे सवाल शुरु...... तो उत्तर मिला कि वे स्वास्थ्य विभाग में फार्मासिस्ट हैं और साथ उनका चपरासी है,  हम दोनों की डयूटी " जेल-खड्ड" नामक जगह पर लगे लंगर में लगी है, जो इस तरफ से मणिमहेश जाने वालों के लिए एक मात्र लंगर व रात रुकने की जगह है।  यह जवाब सुन हम तीनों के कान खड़े होने तय थे और फिर उनसे धड़ाधड़ सवाल पूछे जाने लगे।
यह रास्ता कितना लम्बा है....?
                      19किलोमीटर लम्बा, जबकि हडसर वाला मशहूर रास्ता 13किलोमीटर लम्बा है। मतलब दो दिन में पदयात्री मणिमहेश झील पर पहुँचता है,  ऊपरी त्यारी गाँव तक कच्चा रास्ता जाता है... गाड़ी वहाँ खड़ी कर "कलाह गाँव" को पैदल रास्ता, फिर कलाह गाँव से "जेल-खड्ड" में रात्रि विश्राम,  अगली सुबह जेल-खड्ड से "सुखड़ली" से "कलाह पर्वत" पर चढ़कर मणिमहेश जाया जाता है। इस तरफ से कोई घोड़ा-खच्चर नहीं है, बस अपने दम पर ही मणिमहेश पहुँचा जा सकता है और हां कलाह जोत की ऊँचाई बहुत ज्यादा है इसलिए यह हडसर वाले रास्ते से ज्यादा कठिन रास्ता है, साँस के रोगी और उच्च रक्तचाप वालों को हम सलाह देते हैं कि वे इस रास्ते से ना जाये।
                       उच्च रक्तचाप की बात सुन दिनेश जी ने उनसे पूछा कि मेरा भी रक्तचाप बढ़ जाता है तो क्या मैं जा सकता हूँ इस रास्ते से...?
                      तब वे सज्जन बोले- "मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप इस रास्ते से मणिमहेश ना जाकर हड़सर वाले रास्ते से घोड़े या हेलिकॉप्टर की सुविधा ले मणिमहेश जाएं तो अच्छा है।"
                      हम सब ने माथे पर हाथ मार कर कहा- "वहीं से तो धक्के खाकर इधर आये हैं...!"
हमारी बात सुन वे हमारी व्यथा समझ गए और बोले - "हाँ,  न्यौण यात्रा के दिनों में उस तरफ बहुत ज्यादा भीड़ हो जाती है, परन्तु इस प्राचीन रास्ते से कोई-कोई ही मणिमहेश जाता है।"
                           "दो दिन मणिमहेश पहुँचने में लगने थे"- इस बात पर विशाल जी बोले- "यदि हम इस रास्ते से मणिमहेश जाते भी हैं, तो दो दिन में वहाँ पहुँचेंगे और फिर तीसरे दिन हडसर....ऐसा कर हम वापसी की तय समय- सीमा से बाहर हो जाएंगे, इस रास्ते से हमारा जाना मुश्किल है...!!!"
                 मैं ऊपरी त्यारी गाँव को जाते हुए कच्चे रास्ते पर गाड़ी चढ़ा तो रहा था, परंतु मेरे दिमाग में विचारों का युद्ध भी चढ़ाई पर था।
                 एक तीखे मोड़ पर जब हमारी गाड़ी ने कच्चे रास्ते पर स्लिप मारना शुरू कर दिया तो मैंने भी गाड़ी से धक्का ना करते हुए उसे रोक लिया और वे दोनों स्वास्थ्य विभाग कर्मी हमसे विदा ले, कच्ची सड़क को छोड़ पगडंडी द्वारा ऊपर की ओर चढ़ गए। मैंने गाड़ी को मोड़ खड़ा तो कर दिया, पर उन दोनों से बोला- "हम दूसरी बार मणिमहेश के कितने पास आ कर फिर वापस जा रहे हैं, इस नामुराद समय सीमा की वजह से....इस तरफ से एक और दिन ही ज्यादा लगेगा, चलो चलते हैं मणिमहेश... जाने फिर कब इस तरफ आना हो या ना हो...!!!"
                       परंतु दोनों ने ही मेरी बात को सिरे से नकार दिया।  तब मैंने उस विचार को अपने मुख से निकाल शब्दों का रूप दे डाला जो मेरे दिमाग में पिछले दस मिनटों से उथल-पुथल मचा रहा था- "अच्छा तो,  मैं अकेला ही इस रास्ते से मणिमहेश जाऊँगा...!!"
कठोरता से भरे मेरे इस बोल में मेरा स्वार्थीपन कूट-कूट कर भर चुका था।
                     मेरे मुख से निकले ये शब्द जैसे ही दिनेश जी व विशाल जी के कानों में में पड़ेे, वह दोनों हक्के-बक्के से कभी मुझे तो कभी एक-दूसरे को देखने लगे।
                    दिनेश जी मुझे अक्सर "भाजी" कह कर सम्बोधन करते हैं।  दिनेश जी बोले- " ओ भाजी, अकेले नहीं जाने देगें तुम्हें मणिमहेश....चलो हमारे साथ, हम तो सच-पास जा रहे थे ना....!"   परंतु मैंने ना में सिर हिला कर फिर कहा- "मैं अकेला ही मणिमहेश जा रहा हूँ बस..!!"
                      अब विशाल जी बीच में बोले- " छोड़ विकास,  हम फिर से दोबारा आ जाएंगे मणिमहेश, अभी चलो हम सच-पास ही चलते हैं।"  मैने फिर एक जिद्दी बच्चे की तरह सिर हिला कर कहा - " नहीं,  मुझे तो मणिमहेश ही जाना है,  मैं आप की तरह समय-सीमा में नहीं बंधा हूँ.... आप लोग मुझे छोड़ दो,  मैं अकेला ही पहुँच जाऊँगा मणिमहेश। "
                          पांच-दस-बीस मिनट हो चले,  वे दोनों मुझे वहाँ से वापस ले जाने की बात पर अड़े थे और मैं वहाँ से अकेला ही मणिमहेश जाने की बात पर अड़ा था।
आखिर मैं एक उपाय उन्हें सुझाता हूँ कि चलो टॉस कर लो,  यदि मैं जीत गया तो आप मुझे मणिमहेश जाने से नहीं रोकेंगें और यदि आप लोग जीत गए तो मैं वापस चल दूँगा आपके साथ..... कह कर मैने अपनी इस यात्रा को किस्मत के सहारे छोड़ दिया और यदि हार भी जाऊँ,  तो मेरे अशांत मन को इतना तो संतोष मिले कि तेरी किस्मत में नहीं है मणिमहेश जाना...!!
                           अब टॉस करने के लिए सिक्का खोजा जाने लगा, क्योंकि हमारी जेबों में सिक्के तो तब हुआ करते थे जब हम छोटे बच्चे होते थे,  अब तो सरकारों ने भी सिक्कों की कीमत ही खत्म कर दी है....ये सिक्के अब सड़कों पर टोल-टैक्स के बकाया के रुप में ही मिलते हैं। सो,  गाड़ी के डैशबोर्ड से एक रुपये का सिक्का निकाला गया।
                           विशाल जी के हाथ से सिक्का हवा में उछाला गया और मैं बोला- "टेल"
             हम तीनों की ही साँस शायद उस समय तक रुकी रही,  जब तक सिक्का जमीन पर गिर कर पत्थर से टकरा, हम से कुछ दूर जा गिरा।  हम तीनों ही सिक्के के पीछे भागे और........... यह क्या!
                       दिनेश जी व विशाल जी के मुख से खुशी की विजयी चीख निकली " हेड"..........और,  मैं टॉस हार गया.....!!!!!
                                         (क्रमश:)

                                     
एक मोड़ पर से मेरी निगाह पीछे छूट चुके भरमौर की ओर गई तो, सुबह होने से पहले की हल्की-हल्की रौशनी में मुझे एक बहुत खूबसूरत पर्वत शिखर नज़र आया,  जिसके शिखर बर्फ से लबालब थे। 

वह मणिमहेश कैलाश पर्वत ही था दोस्तों।

सूर्योदय अभी नही हुआ था फिर भी सुबह होने की रौशनी धीरे-धीरे पहाडों का हरा रंग फिर से गहरा कर रही थी, घाटी के बीचोबीच उड़ रहे बादलों की सफेदी को भी और बढ़ा रही थी।

उस तंग सी घाटी जिसमें बूडिल नाला और सड़क से गुज़रने योग्य ही जगह है,  हम कुछ क्षणों के लिए उसे देखने के लिए अपनी गाड़ी से उतर आये।

खड़ा-मुख से पहले एक तंग दर्रे से गुज़रता बूडिल नाला। 

उस ऊँचाई से नज़र आता खड़ा-मुख गाँव और रावी नदी ।

उस घाटी की चौड़ाई इतनी सी ही थी,  कि भरमौर की जाती सड़क और बूडिल नाला ही गुज़र रहे थे। 

क्या खूबसूरत नज़र आ रही थी, खड़ा-मुख में रावी नदी पर बने पुल पर जग रही लाइटें......और पुल से पार जो रास्ता ऊपर जाता है, वह होली का रास्ता है। 

खड़ा-मुख से हम चम्बे वाले रास्ते पर चल पड़े, सच-पास जाने के लिए। 

बूडिल नाला और रावी नदी का संगम।

कोई गम नही रहा कि हम मणिमहेश नहीं जा पाये...रास्ते की खूबसूरती ने फिर हमारा मन बहलाना शुरु कर दिया, यात्रा की खुशी में मस्त दिनेश जी।

  रास्ते की खूबसूरती को रावी नदी में गिर रहे इस खूबसूरत झरने ने और बढ़ा दिया,  जो शायद जाते वक्त हमारी आँखों से छूट गया था।

खड़ा-मुख से चम्बे की ओर बढ़ते हुए...सड़क किनारे दीवार नुमा चट्टानी पहाड से गिर रहे जल-प्रपात ने हमें रोक लिया। 

उस जल-प्रापत पर पंच तरणी स्नान के उपरांत दिनेश जी।


और, मैं तो ठहरा ही खुराफाती सोच का बंदा....चढ़ने लगा उस दीवार नुमा पहाड़ पर बह रहे जल-प्रापत के साथ-साथ ऊपर को।


                                       
तभी वहाँ से एक स्थानीय पिकअप जीप वाले ने रुक कर कहा कि यह बहुत खतरनाक जगह है, यहाँ ऊपर से पत्थर गिरते हैं। यदि दिनेश जी, विशाल जी और जीप वाला मुझे ना रोकते,  तो शायद मैं "ऊपर" पहुँच चुका होता ।
     
वहाँ से नीचे उतरना बहुत कठिनाई भरा था दोस्तों। 

अक्तूबर 2004 में हिमाचल भ्रमण के दौरान खरीदा था यह नक्शा,
यह नक्शा ही मेरी ढेर सारी हिमाचल यात्राओं का साथी रहा।
मेरे इस नक्शे पर सच-पास का रास्ता ही नहीं मौजूद था,  हो सकता है जब यह नक्शा छपा हो तब सच-पास को सड़क ही ना हो। 



नक्शे पर होली से मणिमहेश झील को जाते पैदल मार्ग को देख मैं एकाएक चौंक गया। 

                                     
2014 में खरीदा मेरा पहला एनड्राइड फोन, जिसने मुझे सोशल मीडिया "फेसबुक " पर जन्म दिया,  और इस छोटे से टच फोन पर मैने अपनी यात्राओं की ढेर सारी धारावाहिक चित्रकथाओं को टाइप कर लिखा है। 

खड़ा-मुख से होली की ओर ज़रा सा ही चले थे कि रास्ते की खूबसूरती हमारा राह रोकने लगी। 
                                     
                                     
खड़ा-मुख से होली को जाती सड़क पर फैली सुंदरता। 

राह में आया, रावी नदी के पार एक गाँव। 

उस गाँव के बूढ़े और जवान घर। 

है कोई शब्द जो रावी घाटी की इस खूबसूरती को तोल सकें।

रावी घाटी की " निशब्द सुंदरता "

दूर एक हिमाच्छादित गिरिराज दर्शन दे रहे थे,  नाम नही मालूम.....जब दोबारा जाऊँगा तो पूछ कर आऊँगा दोस्तों। 

रावी नदी के किनारे एक छोटा सा खेत। 

रावी घाटी की खूबसूरती से आनंदित यात्री।

यह चित्र देख ऐसा लग रहा है जैसे विशाल जी किसी दृश्यालेख में खड़े हो।

पहाडों का ऐसा हरा रंग मैने अपने जीवन में पहली बार देखा था।

तू.....खींच मेरी फोटो!!!

रावी नदी पर पुरातन शैली में बना लकड़ी का झूला पुल जो त्यारी गाँव को मुख्य मार्ग से जोड़ता है।

त्यारी पुल के नीचे बह रही रावी नदी।

और, मैने पुल पर गाड़ी चढ़ा दी।

त्यारी पुल पर हमारी गाड़ी।

दिनेश जी आगे से,  तो विशाल जी पीछे से पुल को पार कर रही गाड़ी के चित्र खींच रहे थे।

ऊपरी त्यारी गाँव की ओर आता कच्चा रास्ता।
                             
                 ( अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )


रविवार, 28 जुलाई 2019

भाग-2 "मणिमहेश, एक दुर्गम रास्ते से...!"

      भाग-2  मणिमहेश,  एक दुर्गम रास्ते से ...!"  
          
                 
                       " जैसी तेरी मर्ज़ी,  भोले भण्डारी ...!!!" 

इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र
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             15अगस्त 2014.......  "भरमौर" शहर की जग चुकी बत्तियाँ (लाइटें) तो हमें नज़र आ रही थी, पर भरमौर नहीं आ रहा था। हम पिछले ढाई घंटे से भरमौर से निकल रही गाड़ियों और जा रही गाड़ियों के मध्य फंसे हुए थे। हम तीनों ही अब गाड़ी में निढाल से चुपचाप बैठे थे, गाड़ी सड़क पर चंद फुट रेंग कर फिर रुक जाती।  सड़क भी इतनी चौड़ी नहीं थी कि उसके किनारे हम अपनी गाड़ी खड़ी कर पैदल ही भरमौर को चल देते,  सो उन सभी फंसी हुई गाड़ियों में हम भी फंस कर चले जा रहे थे।
                       साढ़े आठ से ऊपर समय हो चला था, भरमौर की शुरूआत में ही हमारी तरफ की सड़क किनारे पर मुझे एक तीन मंजिला इमारत दिखाई दी। मैंने मन ही मन सोचा हो ना हो यह होटल ही लगता है, परंतु गाड़ी अभी उस इमारत से पचास मीटर की दूरी पर फंसी थी। धीरे-धीरे खिसकते हुए जैसे हम उस इमारत के पास पहुँचे तो वह इमारत सच में एक होटल थी और खुशकिस्मती से उसके आगे एक कार खड़ी होने की जगह भी बची थी।
                       मेरे तन-मन में एकदम से चुस्ती छा गई और तेज़ी से दिनेश जी को बोला- "गाड़ी को इस होटल की ओर मोड़ लीजिए और हमें हर कीमत पर इस होटल में कमरा लेना है, क्योंकि भीड़ के जो हालात दिख रहे हैं उससे ज़ाहिर हो चुका है कि यह होटल यदि हमारे काम नहीं आया तो सड़क पर ही गाड़ी में फंसे रात गुजारनी पड़ेगी...!!!"
                     अब हम तीनों फुर्ती से पिछली गाड़ियाँ रुकवा कर अपनी गाड़ी को आगे-पीछे कर उस होटल के आगे बची जगह में घुसा रहे थे।  हम तीनों में से किसी एक बंदे की किस्मत उस दिन बलवान थी... हमें उस "रश-रौले" (भीड़-भाड़)  में भी उस होटल में एक कमरा मिल ही गया।  भरमौर से बाहर ही उस जगह कमरा लेने से एक तो हमारा उस जाम से पीछा छूटा,  दूसरा मन में यह ख्याल उत्पन्न हो चुका था कि यह जाम तो कुछ देर बाद या कुछ घंटों में खुल जाएगा,  हम दोनों सुबह तड़के ही भरमौर से हडसर की ओर चल देंगे क्योंकि उस समय रास्ता साफ होगा और दिनेश जी सुबह हेलीकॉप्टर में भरमौर से मणिमहेश उड़ जाएंगे।
                    हम आठ-दस मिनट में हाथ मुँह धोकर होटल से नीचे उतर आए और पैदल ही भरमौर के लिए चल दिये कि पहले दिनेश जी की हेलीकॉप्टर बुकिंग करेंगे, फिर भरमौर के प्रख्यात "चौरासी मंदिर" दर्शन और अंत में "उदर-पूजन"  परंतु.....!!!!!
                      होटल से बाहर निकलते ही हम उस भीड़ का हिस्सा हो गये,  जो सड़क पर फंसी इन गाड़ियों के बीच बची जगह से होकर गुज़र रही थी। फंसी हुई गाड़ियों में अब केवल चालक ही बचा था, ज्यादातर लोग गाड़ियों से उतरकर भरमौर की ओर चले जा रहे थे हमारी ही तरह।  भरमौर मुख्य चौक पर पहुँचते-पहुँचते भीड़ बहुत ज्यादा बढ़ गई, इसी भीड़ में मुझे मेरे मुहल्लेदार राज्य सभा मैम्बर "श्री अविनाश राय खन्ना जी"  के परिजन भी भटकते हुए मिले, वे भी अपनी गाड़ी को जाम में छोड़ पैदल ही चले आ रहे थे।
                     हेलीकॉप्टर बुकिंग कार्यालय बंद कर दिया गया था, पता चला कि हेलीकॉप्टर में मणिमहेश जाने के लिए तीन दिन की प्रतीक्षा चल रही है।  सो मौजूदा हालात से सिद्ध हो गया कि दिनेश जी हेलीकॉप्टर से कल सुबह मणिमहेश नहीं जा पाएंगे, तो तय हुआ कि अब दिनेश जी सुबह हमारे संग ही हडसर से घोड़े पर मणिमहेश जाएंगे... जबकि हम दोनों साढूँ बंधु अपने चरण-कमलों पर ही मणिमहेश पहुँचेंगे, क्योंकि हम दोनों को पर्वतारोहण का नया-नया शौक जो चढ़ा था।
                      रात के 9बज चुके थे, हम भरमौर के प्रमुख आकर्षण "चौरासी मंदिर" देखने के लिए जा पहुँचे। विशाल जी व दिनेश जी पहली बार भरमौर आये थे , जबकि मैं चार साल पहले यानि जून 2010 में सपरिवार भरमौर घूम गया था।  सो चौरासी मंदिर में प्रवेश करने से पहले ही मैं उन दोनों के लिए मार्गदर्शक बन गया।
                       जब मैं पिछली बार चौरासी मंदिर आया था, सुबह का वक्त था.... "बूडिल घाटी " के बीचो-बीच इस चौरासी मंदिर परिसर में तब एकदम शांति थी, परंतु आज बस वहाँ शांति नहीं थी बाकी सब कुछ था।  जगती-बुझती टिमटिमाती रौशनी से जग रहे मंदिर परिसर में दाखिल होते ही मैं दिनेश जी और विशाल जी को सबसे पहले चौरासी मंदिर के प्रमुख मंदिर "मनमहेश मंदिर"( जो भरमौर के राजा मेरु वर्मा ने 7वीं शताब्दी में बनवाया था) की ओर ले कर जैसे ही मुड़ा तो एकदम से ठिठक गया,  क्योंकि मंदिर के आगे भी लाइन लगी हुई थी।
                      सो अपना रुख उस मंदिर की ओर मोड़ लिया,  जिसकी वास्तुकला व नक्काशी मुझे बेहद पसंद है और मुझे पक्का यकीन था कि इस भीड़ में भी उस मंदिर में हम अकेले ही घूम रहे होंगे। वह प्राचीन मंदिर "लक्षणा देवी मंदिर" है,  यह मंदिर भी राजा मीरू वर्मा के राज्य काल में सातवीं शताब्दी निर्मित है। इस मंदिर की निर्माण शैली इसे चौरासी मंदिर परिसर के अन्य मंदिरों से अलग करती है, क्योंकि इस मंदिर में लकड़ी पर बहुत सुंदर व बारीक नक्काशी की हुई है,  जबकि बाकी मंदिर पत्थरों से निर्मित है।
               "माँ महिषासुर मर्दिनी"  को समर्पित लक्षणा मंदिर की छत भी गुंबद की ना होकर ढालदार है। 1952 में सरकार द्वारा इस मंदिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया,  इस वजह से ही मंदिर की प्राचीनता कायम है, मंदिर की दीवारों को आज भी "गोलू मिट्टी" से पोता जाता है। मंदिर में स्थापित 1400साल पुरानी माँ महिषासुर मर्दिनी की सुंदर मूर्ति अष्टधातु निर्मित है, मूर्ति के आधार पर मूर्तिकार "गोगा" का नाम भी खुदा है, जो राजा मेरु वर्मा का मुख्य शिल्पी था।
                 मंदिर के फर्श पर बनी एक आकृति दिखाकर मैं बोला- " देखो यह चौरस लाइनों की भूलभुलैयाँ आकृति  एक खेल लगती है जिसे मंदिर निर्माण में लगे लोग खाली या आराम के वक्त खेलते होंगे।
                  लक्षणा देवी मंदिर में दर्शन उपरांत बाहर निकल फिर से मनमहेश मंदिर की ओर देखा, वहाँ अभी भी लाइन कायम थी। सो अपना रुख "श्री धर्मेश्वर मंदिर" की ओर कर लिया।  भरमौर स्थित धर्मराज का यह मंदिर समस्त विश्व में एक ही है और इस मंदिर के दरवाजे के सामने धर्मराज के लेखाकार चंद्रगुप्त का भी स्थान है। धर्मराज के मंदिर में हाज़िरी लगवा बाहर आये और हमनें चौरासी मंदिर परिसर के मुख्य मंदिर "मनमहेश मंदिर" में जाकर माथा टेका।  बाहर निकलते ही दिनेश जी ने मुझसे सवाल किया- "इस परिसर में मुझे 84मंदिर तो कहीं नज़र नहीं आ रहे, फिर क्यों इस स्थान का नाम चौरासी मंदिर है...?" मैंने उत्तर दिया- "ठीक कहा आपने, इस स्थान का नाम चौरासी मंदिर इसलिए पड़ा क्योंकि पुरातन समय में यहाँ 84संत आकर ठहरे थे।"
                    हम कुछ समय के लिए मनमहेश मंदिर के पास बैठकर 'रौनक-मेले' को देखने लगे और मैं उन्हें अपनी जून 2010 की पिछली यात्रा के बारे में बताने लगा कि मैं सपरिवार सुबह-सुबह ही भरमौर से हडसर जा मणिमहेश को जाते पैदल रास्ते पर बीस-तीस पौड़ियाँ चढ़ वापस उतर आया और जब हम सुबह 10बजे के करीब चौरासी मंदिर में आए तो मनमहेश मंदिर की छांव में एक दर्जन के करीब पगड़ियाँ बांधे लोग घेरा बना कर किसी गुफ्तगूँ में मगन थे,  उत्सुकतावश जब हमने उनसे बातचीत का विषय पूछा तो वह खुश हो कर बोले- "हम विवाह की तारीख पक्की कर रहे हैं"  वह झुरमुट वर-वधु पक्ष का था।
                    बेहद सुकून भरा वातावरण था तब यहाँ,  पूरा मंदिर परिसर घूमने के बाद मेरे पिता जी छाँव में बैठे स्थानीय बुजुर्गों से बतियाने बैठ गए। हम भी उनकी बातें ध्यान से सुनने लगे। उन बुजुर्गों से ही हमें पता चला कि भरमौर का नाम "भरमानी देवी" के नाम पर पड़ा।  भरमानी देवी भरमौर की ग्राम देवी है। चौरासी मंदिर परिसर के पीछे की तरफ के पहाड़ की चोटी की ओर इशारा करके वे बुजुर्ग बोले कि वह ऊपर भरमानी देवी का स्थान है, अब तो वहाँ जीप द्वारा पहुँचने के लिए कच्चा रास्ता बन गया है... पहले पैदल ही जाते थे। भरमानी देवी की स्थानीय जनसाधारण में इतनी मान्यता है कि कृष्ण जन्माष्टमी से राधाअष्टमी तक हर वर्ष मणिमहेश झील पर लगने वाले " न्यौण" (स्नान मेला) में जाने से पहले भरमानी देवी मंदिर पर जाकर कुंड में स्नान करने की प्रथा है।
                   तब मैं झट से बोला- " मतलब मणिमहेश जाने से पहले भरमानी देवी के जाना,  पदयात्री की शारीरिक परीक्षा है यदि वह भरमानी देवी की चढ़ाई चढ़ जाता है तो वह मणिमहेश भी जा सकता है...!!" उन बुजुर्गों ने हंसते हुए मेरी हां में हां मिला दी।
                    भरमानी देवी के सम्बन्ध में एक और दिलचस्प किस्सा उन्होंने हमें सुनाया कि पहले भरमानी देवी को भेड़ू की बलि लगती थी, सन्1999 अक्तूबर के महीने में भरमानी देवी के मंदिर में जागरण हो रहा था, तो आधी रात के बाद माँ भरमानी की पिंडी बहुत बड़े आकार की हो गई और उस पिंडी की आँखों पर दो लाल जोतें दहकने लगी,  तभी जागरण में बैठे एक महंत पर माता भरमाणी की पौण (हवा) आ गई और उस महंत के मुख से माता बोली कि अब कोई भी भक्त मुझे भेडू की बलि नहीं देगा,  बस एक छोटा सा भेडू ला कर.... उसे लाल वस्त्र बांध मेरे मंदिर के आसपास खुला छोड़कर,  मुझे नारियल का भोग लगाए... बस इतने से मैं प्रसन्न हूँ और आपकी हर मनोकामना पूरी करूँगी।
                     विशाल जी और दिनेश जी मेरी यह बात सुन मेरे चेहरे की ओर उसी हैरानी से देख रहे थे, जिस हैरानी से हम सब उस समय इन बुजुर्गों के चेहरे देख रहे थे।  मैंने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा-"तब भरमानी देवी के इस चमत्कार की कहानी सुनकर मैंने अपने परिवार वालों से कहा कि चलो भरमानी देवी के भी चलते हैं"..... और हम सभी छोटे-बड़े मिलाकर आठ जन अपनी प्यारी ओमनी वैन में सवार हो, भरमौर से करीब पांच किलोमीटर दूर भरमानी देवी के चल दिये।
                      भरमौर की पक्की सड़क से जब मैने अपनी भरी हुई वैन को भरमानी देवी को जाते कच्चे रास्ते की तरफ मोड़ा,  तो मोड़ पर अपनी टैक्सियाँ लगाकर ग्राहकों का इंतजार कर रहे ड्राइवरों की टोली हमारी वैन को भरमानी जाती देख हैरानी से देखने लगी और उनमें से कुछ मेरी तरफ संकेत कर मुझ पर हंसने भी लगे। पर उनकी हंसी जायज़ थी क्योंकि उस कच्चे रास्ते को सच में जीप ही पार कर सकती थी। चढ़ाई पर तीखे मोड़ आते ही मेरी वैन का साँस टूट जाता, आखिर कुछ तीखे मोड़ों पर मैने सब सवारियों को उतार कर खाली गाड़ी को ऊपर चढ़ाया.... और, अंततः मैंने अपनी ओमनी वैन द्वारा किए कीर्तिमानों में भरमानी देवी का नाम भी जुड़ गया...!!
                     मेरी इस आखिरी पंक्ति को सुनते ही दिनेश जी व विशाल जी मेरे संग खिलखिला कर हंस पड़े।
                 मनमहेश मंदिर से उठते ही अब मैं उन्हें 10वीं शताब्दी में बने "नरसिंह मंदिर"  की ओर ले चल दिया। इस मंदिर में स्थापित भगवान नरसिंह की धातु मूर्ति बेहद आकर्षक है। नरसिंह भगवान बैठे हुए अपने दोनों हाथों के ऊपर अपने ठोढ़ी को रख मुस्कुराते हुए देख रहे हैं। मुझे नरसिंह भगवान की मूर्ति बहुत सुंदर लगती है दोस्तों।
                  रात के साढे दस बज चुके थे,  चौरासी मंदिर से निकल जब हम वापस मुख्य सड़क पर पहुँचे तो ट्रैफिक जाम का वैसा ही हाल था, जैसा हम छोड़ गए थे।
                    एक ढाबे पर बैठ स्थानीय राजमाँह,आलू- मटर और दाल-मखनी के साथ रात्रि भोजन कर, ढाबे वाले से ही पूछताछ की.... तो जवाब मिला- " पहले यह 'न्यौण' स्थानीय लोगों तक ही सीमित हुआ करता था, परंतु पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट चलने के बाद से बाहरी लोग बहुत आने लगे हैं... जिसका नतीजा आप देख रहे हैं, यात्रा में प्रशासन भी नक़ारा साबित होने लगता है...!"
                  हमने उनसे पूछा कि हडसर में क्या हालात होंगे, तो वे बोले- "आखिर यह सारी भीड़ हडसर ही तो जा रही है, वहाँ तो गाड़ियाँ खड़ी करने के लिए भी जगह नहीं मिल रही.... आज ही पता चला है कि लोग गाड़ी द्वारा हडसर भी नहीं पहुँच पा रहे हैं, ट्रैफिक पुलिस वाले दो-तीन किलोमीटर पीछे ही गाड़ियों को रोक रहे हैं... वहीं से लोग अपनी पैदल यात्रा कर रहे हैं और वहाँ गाड़ी पार्क करने की कोई जगह खाली नहीं है, पुलिस वाले गाड़ियों को वहाँ से वापस भरमौर की ओर भेज देते हैं। "
                   खैर,  हम तीनों ने वापस होटल में आ...सोने से पहले कार्यक्रम निश्चित किया कि सुबह 4बजे उठकर हम हडसर जाने की तैयारी करेंगे।
                   सुबह 4बजे अलार्म बजा और हम उठ बैठे। मैं अकेला ही होटल से बाहर निकल रास्ते का निरीक्षण करने चल दिया। होटल से केवल सौ मीटर बाद भरमौर की तरफ अभी भी ट्रैफिक जाम था,  लोग सड़क पर फंसी खड़ी अपनी गाड़ियों में सो रहे थे। वापस आ मैने उन्हें यह सूचना दी और हम तीनों ने निर्णय लिया कि अब हमें वापस ही चलना चाहिए,  हमारे भाग्य में मणिमहेश के दर्शन नहीं है।
                          तड़के 5बजे हम होटल छोड़ बाहर सड़क पर मणिमहेश की दिशा की ओर हाथ जोड़कर खड़े, भगवान शिव को वहीं से नमन कर दुखी मन से "जैसी तेरी मर्ज़ी, भोले भण्डारी " कहते हुए चम्बा की ओर वापस चल दिये।
                                   (क्रमश:)


भरमौर के प्रख्यात "चौरासी मंदिर"  के प्रवेश पर खड़े हम।

चौरासी मंदिर परिसर में स्थित "लक्षणा देवी" मंदिर के भीतर।

"लक्षणा देवी मंदिर " में  लकड़ी पर की हुई सुंदर नक्काशी। 

माँ लक्षणा देवी मंदिर का गर्भ ग्रह।

देखो भाई , क्या कमाल की कारीगरी है लक्षणा देवी मंदिर की। 

माँ महिषासुर मर्दिनी रुप माँ लक्षणा देवी की 1400वर्ष पुरानी अष्ट धातु मूर्ति।

लक्षणा देवी मंदिर के फर्श पर बनी यह आकृति दिखा कर मैं बोला-" देखो यह चौरस लाइनों की भूलभुलैयाँ आकृति एक खेल लगता है,  जिसें तब मंदिर निर्माण में लगे लोग खाली या आराम के वक्त खेलते होंगे। 

 7वीं शताब्दी निर्मित " माँ लक्षणा देवी मंदिर "

लक्षणा देवी की दीवारों को अभी भी गोलू मिट्टी से पोता जाता है,  क्योंकि इस प्राचीन मंदिर को सरकार ने 1952 में  राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया था। 

लक्षणा देवी मंदिर का नक्काशीदार मुख्य द्वार। 
                               
पूरे विश्व में धर्मराज का एक मात्र मंदिर " श्री धर्मेश्वर मंदिर, चौरासी मंदिर भरमौर "

धर्मराज के मंदिर के बाहर उनके लेखाकार "चित्रगुप्त " का स्थान। 

                                     
चौरासी मंदिर परिसर के प्रमुख मंदिर " मनमहेश मंदिर " के आगे खड़े हम।

मनमहेश मंदिर में माथा टेकने के बाद....हम वहीं बैठ गए रौनक-मेला देखने लगे और मैं उन्हें अपनी पिछली भरमौर यात्रा के किस्से सुनाने लगा। 


जून 2010 में, चौरासी मंदिर के भ्रमण के दौरान मेरे द्वारा खींची गई मनमहेश मंदिर का चित्र। 

चौरासी मंदिर प्रांगण।

मनमहेश मंदिर की छाँव में बैठे वर-वधु पक्ष के लोग। 

हम विवाह की तारीख़ व कार्यक्रम निर्धारित कर रहे हैं।

" नर सिंह मंदिर "

मंदिर में स्थापित नर सिंह भगवान की धातु प्रतिमा।

वाह, क्या दिलकश अंदाज है भगवान आपका। 

पिछली यात्रा में मेरे पिता डॉक्टर कृष्ण गोपाल नारदा जी.....स्थानीय बुजुर्गों से बतियाने बैठ गए और इन्होंने हमें भरमौर की ग्राम देवी " भरमानी देवी " की कहानी सुनाई। 

और, तब हम भरमानी देवी की कहानी सुन प्रभावित हो.....भरमौर से कच्चे रास्ते द्वारा पहाड़ की ऊँचाई पर स्थित भरमानी देवी के मंदिर की ओर चल दिये और रास्ते से नीचे दिख रहा भरमौर।  

भरमानी देवी के रास्ते पर दिख रहे भरमौर का निकट चित्र।

भरमानी देवी के रास्ते से नीचे दिख रही बूडिल घाटी में यह सीढ़िदार खेत ऐसे नज़र आ रहे थे, जैसे कोई बंगाल टाइगर लेटा हो...!!

भरमानी देवी को जाते कच्चे रास्ते के तीखे मोड़ों पर हमारी प्यारी ओमनी वैन का साँस टूट जाता,   मैं आधी-आधी सवारियाँ ले दो चक्करों में उन्हें भरमानी देवी ले कर गया।

भरमानी देवी से नज़र आता " मणिमहेश कैलाश पर्वत "
परन्तु इस फोटो को खींचते समय मुुझे यह ज्ञान नही था।  परसो जब यह सारी फोटो कम्प्यूटर से निकाली,  तब यह फोटो देखते ही पहचान गया कि अरे यह चोटी तो मणिमहेश कैलाश की है, जो हमें उस समय भरमानी देवी से नज़र आ रही थी ।
भरमानी देवी मंदिर। 



रात्रि भोजन। 

तड़के सुबह उठ कर देखा .....परन्तु भरमौर से हडसर जाने के लिए जाम अब भी नही खुला था,सो होटल से ही सड़क पर मणिमहेश को माथा टेक " जैसी तेरी मर्ज़ी, भोले भण्डारी" कहते हुए दुखी मन से भरमौर से वापस चम्बा की ओर चल दिये।
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