रविवार, 4 मार्च 2018

भाग-4 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

            " और ले पंगें,  और ले पंगें....!!"      
                                               
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                                    करेरी झील के ट्रैक पर बंदरों से हुई मुठभेड़ के बाद, मैं और विशाल रतन जी फिर से चल पड़े।  अब रास्ता और भी घने जंगलों से होकर,  दीवार रूपी पर्वत पर चढ़ रहा था।  पत्थरों को काट- काट कर बनाई सीढ़ियां उस पर्वत की दीवार पर चिनी हुई थी। यह चढ़ाई ऐसी थी मानो हम सौ मंजिल ऊँची इमारत पर चढ़ते जा रहे हो।                          पहाड़ के मध्य जो वृक्षवीहीन जगह,  हमें लियोंड खड्ड के निर्माणाधीन पक्के पुल पर मिले मजदूरों ने दूर से दिखाई थी... पर आ पहुँचते हैं।  यह बहुत शानदार घास का मैदान था....जैसे यह जगह नीचे से देखने पर पूरे पहाड़ का आकर्षण बिंदु लग रही थी,  वैसे ही इस जगह पर खड़े हो नीचे घाटी में हमारी नज़रें लियोंड पुल को तलाश रही थी।अब सामने दिख रहे पर्वत के शिखर पर ताज़ी गिरी बर्फ दिखाई भी देने लगती है।  बर्फ के पास पहुँचने की उम्मीद हमारे उमंग भरे मनों को उत्साहित करती जा रही थी.... क्योंकि पर्वतों में पहुँच बर्फ को पाना,  किसी पुरस्कार से कम नहीं होता दोस्तों।
                         कदम बढ़ाते ही मंज़र बदल गया,  पर्वतों के मध्य बेहद खुली घाटी और उसके मध्य में बह रही लियोंड नदी।  दूर एक झोपड़ी नज़र आई,  पास जाकर उस झोपड़ी की बनावट देख हम दोनों ने सही अंदाज़ा लगाया कि यह भेड़-बकरी चराने वाले का डेरा है.... परंतु तब वहां कोई नहीं था।  पचास कदम चलने के बाद नदी की दूसरी तरफ भी एक और डेरा दिखाई दिया,  मतलब कि मजदूर ठीक ही कह रहे थे कि रास्ते में आपको रात काटने के लिए डेरे मिल जाएंगे।  "परंतु अभी तो 3:30 ही बजे हैं,  आगे चलते हैं...!" मैं विशाल जी से बोला।
                        रास्ता अब कुछ समतल सा चल रहा था, एक मोड़ मुड़े..... और, रास्ते पर पड़ी एक चीज देख हम दोनों के हर्षोउल्लास की सीमा ना रही।  वह रास्ते के किनारे पड़ी थोड़ी सी बर्फ थी दोस्तों।
                         "पहुँच गए... पहुँच गए, बर्फ के पास...!!!!"  यह कहते हुए हम दोनों उछल रहे थे।  
कुछ ही दूर लियोंड नदी पर बना लोहे का पैदल पुल नज़र आ रहा था,  मतलब हम रीओठा नामक जगह पर पहुँच चुके थे।   पुल पार कर हमें बांयी ओर मुड़ कर नदी के साथ-साथ ऊपर को चढ़ना था।  पुल पर खड़े हो जब बांयी ओर देखा तो बड़े-बड़े पत्थरों से थोड़ी सी जलधारा रिस रही थी।  यह ही छोटी सी जलधारा गर्मियों में विशाल रूप अख्तियार कर लेती होगी....जिसका प्रमाण यह लोहे का पुल और नदी में बिखरे पड़े पत्थर दे रहे थे।
                          पुल से बांयी ओर मुड़,  अब रास्ता बड़ी-बड़ी चट्टानों के ऊपर से हमें ले जा रहा था और आधा किलोमीटर बाद एक मोड़ मुड़े.......  तो दो पहाड़ों के मध्य आ रही इस नन्ही नदी लियोंड के सिवा सब कुछ बर्फ की चादर ओढ़े खड़ा था। यह दृश्य देख मेरी पहली नज़र में मुँह से निकला " वाह"  परंतु दूसरे पल दिमाग़ बोला " स्वाह...और ले पंगें....!!!!!"
                          परंतु मेरा मन पहले से ही लापरवाह रहा है,  दिमाग़ की कम ही सुनता है। सो हम चलते-चलते नदी किनारे चल एक समतल सी जगह पर आ रुके,  जिसमें एक झोपड़ी का ढांचा खड़ा था।  क्योंकि अब आगे बर्फ ही बर्फ और आगे बढ़ने का रास्ता बर्फ के नीचे कहीं दब चुका था।  इस बात का ज्ञान पहली बार हुआ कि सूरज की तरफ मुख वाले पहाड़ के हिस्से पर बर्फ नहीं थी,  जिस पर हम चढ़कर आ रहे थे और जब इसी पहाड़ की दूसरी तरफ पहुँचे तो इसे बर्फ से भरा पाया.... यानी सूर्य मुख वाले पहाड़ से बर्फ जल्दी पिघल जाती है।
                         अब हमें समझ नहीं आ रहा था कि इस बर्फ पर कहाँ अपना पहला कदम रखें.... तभी कुछ दूर पहाड़ पर चढ़ती पत्थर की सीढ़ियां दिखाई दी,  तो उसी दिशा में नीचे की ओर देखा तो हमें बर्फ में पड़े पदचिन्ह नज़र आ गए।वो पदचिन्ह जो सुबह आगे गए अंग्रेजों के दल और स्थानीय गाइड के दल ने बना दिए थे। ये पद चिन्ह अब हमारे पथप्रदर्शक बन चुके थे.... वरना इन निशानों के बगैर हम बर्फ में घुसने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।
                          4बज चुके थे और हम पदचिन्हों का पीछा करते हुए जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे,  बर्फ भी बढ़ती जा रही थी।  दिमाग़ ने सोचना बंद कर दिया था... आँखें केवल बर्फ पर बने निशानों को ही ढूँढ रही थी। पहाड़ की छाया वाले इस हिस्से पर ठंड भी एकाएक बढ़ चुकी थी...और हमारे चलने की रफ्तार कम होने से शरीर भी ठंडे हो रहे थे। बर्फ पर पड़े पदचिन्हों की गहराई कहीं-कहीं इतनी गहरी थी कि हम घुटनों तक बर्फ में धंस जाते।
                          विशाल जी ने स्पोर्ट्स शूज़ डाल रखे थे जो अब पूरी तरह गीले हो चुके थे.... मेरे चमड़े के सेमी हाई नैक शूज़ में पानी अभी अंदर नहीं पहुँच पाया था। परंतु कुछ समय बाद हम दोनों की हालत एक सी हो गई थी, बर्फ की वजह से हम घुटनों तक बुरी तरह से भीग चुके थे। बार-बार बूट खोलकर उसमें घुसी बर्फ को बाहर निकाल रहे थे। जीवन में पहली बार ताज़ी गिरी बर्फ से हम अनाड़ियों का साक्षात्कार हुआ था....सो दोनों पक्ष एक-दूसरे पर प्रभाव डालने के लिए कोशिश में जुटे हुए थे।
                          आखिर डेढ़ घंटे बाद लगातार उस बर्फीले रास्ते पर धंसते हुए,  हम दोनों अब एक ऐसी जगह खड़े थे....जो नदी के किनारे पर थी और रास्ता ऊपर को चढ़ रहा था।  परंतु उस पर ना तो हमारे पथप्रदर्शक पदचिन्ह थे और बर्फ भी बेशुमार थी।   मेरा दिमाग़ पिछले एक घंटे से हर दो मिनट बाद पंजाबी में चीख उठता था, "होर लै पंगें, होर लै पंगें...!!!! "
                           परंतु मन बेशर्म कहाँ सुनता है मेरे दिमाग की.... ठीक इसी प्रकार की मनोस्थिति विशाल जी की भी रही होगी, परंतु इस स्थान पर पहुँच शायद उनका दिमाग़ मन को जीत चुका था।  वह एकाएक बोले, " नहीं विकास, अब और आगे बढ़ना मूर्खता की निशानी है,  एक तो आगे कोई भी पदचिन्ह नही दिखाई दे रहा... दूसरा अंधेरा भी जल्दी ही हो जाएगा...!"
                           मेरा मन सदा से ही लापरवाह रहा है.... मैं विशाल जी को तर्क देता हूँ,  "इस जगह बर्फ ज्यादा होने के कारण वह लोग घूम-घाम कर आगे चढ़ गये होंगे और अभी साढे पांच ही तो बजे हैं,  वह देखो सामने पर्वत के शिखर पर कैसी धूप चमक रही है....और लगता है कि हम करेरी झील से ज्यादा दूर नहीं है, चलो आगे जाने का रास्ता ढूँढते हैं और आज रात जमी हुई करेरी झील पर बनी धर्मशाला में जाकर ही रुकते है... यदि करेरी ना पहुँच पाए तो रास्ते में आए किसी गद्दी के डेरे पर रुक जाएंगे...!"
                           परंतु विशाल जी ने सिरे से मेरी बात यह कहते हुए नकार दी, " विकास जी, भले ही दिन के उजाले में यह नज़ारा हमें बहेद खूबसूरत नज़र आ रहा है,  परंतु रात के अंधेरे में यह सारा नज़ारा खतरनाक रूप ले सकता है.... हमारे पास कोई टॉर्च भी नही है और यदि रोशनी रहते झील तक नही पहुँच पाऐं,  और रास्ते में रात गुज़ारने के लिए हमें कोई भी उचित जगह या गद्दी डेरा ना मिला,  तो निश्चित है हम दोनों कल आ रहे नव वर्ष के पहले दिन को ना देख पाएें, हमारी बेहतरी इसी में ही है कि दिन रहते हम वापस उस गुफा की ओर चलते हैं,  जो हमने अभी आते समय नदी के उस पार देखी थी... वही चल आज नववर्ष की पूर्वसंध्या मनाते हैं।"
                           मेरा लापरवाह मन नही मान रहा था क्योंकि वह व्यक्तिगत कीर्तिमानों का भूखा है.... परंतु जैसे एक गाड़ी के पहियें एक ही दिशा में चल व मोड़ सकते हैं,  सो मुझ पहिये को सूत्र में बंधा होने के कारण बेमन से विशाल जी रूपी पहिये के संग मुड़ना ही पड़ा।
                           नदी में पानी बहुत कम था,  सो पार हो हम दूर दिख रहे उस गुफा नुमा डेरे पर जा पहुँचें।  एक बहुत बड़ी चट्टान के नीचे बनी इस प्राकृतिक गुफा को किसी गद्दी ने अपनी जरूरत अनुसार ढाल रखा था। उस छोटी सी गुफा में एक चबूतरा बना,  एक तरफ भेड़-बकरियों के बच्चों के लिए एक बंद बाड़ा.... मध्य चूल्हा,  दो जनों के लेटने योग्य  समतल स्थान और सामने लकड़ी की एक छोटी सी अलमारी व गुफा के बाहर भेड़-बकरियों के लिए घास-फूस की छत वाला छप्पर। गुफा का मुहाना खुला था उसे तो बंद नहीं किया जा सकता था....हाँ नदी की तरफ वाली दिशा में एक-दो दरार नुमा झरोखे से थे,  जिनमें से सर्द हवा अंदर आ रही थी.... जिन्हें मैं अब पत्थर चिन कर बंद कर रहा था।
                           उस छोटी सी अलमारी को खोला तो उसमें से हमें लोहे का एक चिमटा और दो बोरियों को सिल कर बनाई हुई चटाई मिली..... उन्हें देख हम दोनों की खुशी का ठिकाना ना रहा और उस बोरी नुमा चटाई को गुफा के ठंडे फर्श पर बिछा लिया।  अब हमे अंधेरा होने से पहले लकड़ी का इंतजाम भी करना था,  गुफा के बंद बाड़े के फर्श को लकड़ी के फट्टों से बना रखा था और बहुत सी लकड़ी उस गुफा नुमा डेरे के निर्माण में लगी हुई थी।  हम दोनों ने सलाह की, कि इस गुफा में लगी किसी भी लकड़ी को हम तोड़ जलाएंगे नही.... क्योंकि यह भी किसी का घर है,  चलो आस पास जाकर सूखी लकड़ी ढूँढ कर लाते हैं।
                           और,  हम बाहर से इतनी लकड़ी इकट्ठी कर लाए जो सारी रात जल सके। इन्हीं यत्नों में कब अंधेरा हो गया,  पता ही नही चला और अब हाथ कांप रहे थे क्योंकि अंधेरा अपने साथ भयंकर सर्दी को भी ले आया था, दोस्तों।

                                       ............................(क्रमश:)
पर्वत शिखर गिरी ताज़ी बर्फ को दिखाता हुआ, मैं। 

वो,  चार किलो का डंडा...!!

पगडंडी में बुराश के पेड़ के तने को आधा काट कर रास्ता बनाया गया था।



और, जैसे- जैसे हम पहाड़ पर चढ़ते जा रहे थे... बर्फ नजदीक आती जा रही थी। 

कुछ दम लेते हुए.... विशाल रतन जी। 

अरे,  यह तो किसी गद्दी का वीरान डेरा है। 

नदी की दूसरी तरफ दूर हमें एक और वीरान गद्दी डेरा दिखाई दिया,  मतलब कि वे मजदूर सही कह रहे थे कि आपको रात गुज़ारनें के लिए रास्ते में गद्दियों के वीरान डेरे मिल जाएंगे,  परन्तु अभी तो दोपहर के साढे तीन ही बजे थे... सो हम अागे बढ़ जाते हैं। 

पहुँच गए,  पहुँच गए बर्फ के पास.....
पर्वतों में पहुँच बर्फ को पाना किसी पुरस्कार से कम नही होता दोस्तों। 

तब मोबाइल में फ्रंट कैमरा का अविष्कार नही हुआ था,  परन्तु मैं डिजीटल कैमरे को अपनी तरफ मोड़ खुद की ही फोटो खींच लेता था....
जिसे आजकल "सैल्फी" नाम से जाना जाता है। 

लियोंड खड्ड पर बना लोहे का पैदल पुल... रीओठा पुल। 

रीओठा पुल। 

पुल से बायी ओर लियोंड नदी के साथ हम ऊपर को चढ़ते हुए....इस समतल से स्थान पर पहुँचें,  जिससे आगे बर्फ ही बर्फ थी। 

बस बर्फ ही बर्फ,  हमारे आगे गए अंग्रेज़ों के दल के पदचिन्ह अब हमारे पथप्रदर्शक बन चुके थे। 

रास्तें में गद्दियों के वीरान व सूने डेरे मिलते जा रहे थे। 

गिरता हुआ पानी भी जम चुका था,  हमारे पैर भी गीले हुए बूटों में जम चुके थे। 

आखिर, इस जगह पर पहुँच रास्ता बर्फ में कहीं गुम हो चुका था और हमारे पथप्रदर्शक पदचिन्ह भी एकाएक गायब हो चुके थे। 

और....आखिर हम रात काटने के लिए इस गुफा नुमा डेरे की ओर बढ़ रहे थे।

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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

भाग-3 करेरी झील..... " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा "

                                                         
                                      " वो चार किलो का डंडा....!!! "

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                                      कांगड़ा में रात रुक,  सुबह जल्दी ही रवाना हो लिये धर्मशाला की ओर,   ताकि जल्दी से जल्दी करेरी गाँव पहुँच कर झील की तरफ 10 किलोमीटर की चढ़ाई शुरू कर सकें। 31 दिसम्बर 2012 के दिन सुबह 7:30 बजे ही हम धौलाधार हिमालय के चरणों में बसे शहर धर्मशाला जा पहुँचे।
                         सामने दिख रहे धौलाधार पर अभी चंद रोज़ पहले हुई ताज़ी बर्फबारी ऐसे प्रतीत हो रही थी, जैसे पर्वत हमें रिझाने के लिए तैयार हुए हो।  तभी उन पर्वत शिखरों पर सूर्योदय की सुनहरी किरणें आन पड़ी और ऐसा आभास हुआ कि पर्वतों के शिखरों पर सोने के पत्र मढ़ दिये हो.......यह नज़ारा मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा था।                                करेरी का रास्ता पूछते-पूछते, हम बाज़ार से निकले तो मेरी तेज नाक ने दूर से बन रहे "छोले-भटूरो" की गंध सूँघ ली....." चटोरे तो हम दोनों साँढ़ू भाई जन्मजात ही हैं.....!!!"
                         उस हलवाई की दुकान में दाख़िल होते हुए...तिल-भूग्गा,  अलसी की पिन्नी, इमरती और जलेबियों से हमारी आँखें दो-चार होना स्वाभाविक ही था दोस्तों।   खूब दबाकर नाश्ता किया और समोसे व "पलंग-तोड़"(मिल्क केक)पैक करवा कर, करेरी झील का रास्ता पूछा तो वह दुकानदार हमें घूरता हुआ बोला, " भला आज कल भी कोई करेरी झील पर जाता है.... बर्फ पड़ चुकी है, सब रास्ते बर्फ में दब गए होंगे... झील भी जम चुकी होगी,  मूर्खता है इस मौसम में करेरी जाना...यदि जाना ही चाहते हो तो,  'त्रियुड़' चले जाओ... वहाँ तो लोग आते-जाते रहते हैं और सुविधाएं भी उपलब्ध हैं....!!!!"
                          दुकानदार की यह बातें सुन, मुझ में से हवा निकली नही....बल्कि और ज्यादा बढ़ गई कि इस मौसम में कोई नहीं जाता करेरी,  तो फिर विकास नारदा अवश्य जाएगा...!!!     और,  विशाल जी ने भी जलती आग में घी डाल दिया "we will done it " कह कर अपनी मूँछों को ताव देने लगे।
                         और.....बगैर तैयारी व उपकरणों के हम फूली हुई छाती ले,  मुँह उठाकर चल दिए......जमी हुई करेरी झील देखने।  करेरी गाँव धर्मशाला से पठानकोट रोड पर 25किलोमीटर की दूरी पर है।  मुख्य सड़क छोड़ अब छोटी सी सड़क हमारे गाड़ी के टायरों के नीचे थी।  चंद किलोमीटर जाने के बाद काली सड़क,  मिट्टी के रास्ते में तब्दील हो गई।  हम उस इलाके की तरफ जा रहे थे, जिसके सामने धौलाधार हिमालय खड़ा होने से रास्ता आख़िरी गाँव करेरी तक जाकर बंद हो जाता है......और सामने दिख रहे धौलाधार के "भीमकसूटरी पर्वत"  पर पड़ी ताज़ी बर्फ हमारे आकर्षण का केंद्र बन चुकी थी।
                           गज नदी के किनारे गाँव से, अभी हाल में ही करेरी गाँव के लिए सड़क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। अब एक कच्ची सड़क पर हमारी गाड़ी बढ़ रही थी......और कदम-कदम पर बदलते दिलकश मंज़र हमें बार-बार गाड़ी से बाहर निकाल लाते। करेरी गाँव तक पहुँचने का मार्ग गाड़ी के चलने योग्य नही था,  सो उस वीरान जगह में ही अपनी गाड़ी को लावारिस छोड़ने के सिवाय हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नही था.....क्योंकि करेरी गाँव अभी भी  दो किलोमीटर दूर था।
                           उत्साह में बहुत ताकत होती है,  सो हम दोनों अब अपने बच्चों के स्कूल-बैगों में अपना जरूरी सामान भर रहे थे। पिट्ठू बैग पीठ पर डाल दो कदम चले तो मन में जाने क्या आया....अपने बैगों से हम दोनों ने ही गर्म लोईयाँ निकाल कर गाड़ी में फेंक दी,  कि सिर्फ दस किलोमीटर ही तो दूर है करेरी झील... करेरी गाँव से...!   और फटाफट जाकर शाम को वापस भी आ जाएंगे,  इस गर्म लोई के भार को क्यों व्यर्थ में उठाना है.....!!
                          10किलोमीटर की चढ़ाई जो करेरी गाँव (1900मीटर) से शुरू होकर करेरी झील (2934मीटर) तक जाती है, हमारी नज़र में चंद घंटों का ही खेल था.... क्योंकि पहाड़ों को अब तक हमने सड़कों पर ही खड़े होकर देखा था। जबकि पहाड़ की चढ़ाई पर एक इंच भी एक मीटर जितना बड़ा लगता है दोस्तों....इस बात का इल्म कहाँ था...!!
                        पंजाबी में एक कहावत है, " या तां बाह पेआ जानें,  या राह पेआ जानें...!!"
 मतलब वास्ता पड़ने पर ही मुसीबत का ज्ञान होता है या उस रास्ते पर चलने पर ही कठिनता का आभास होता है।
                           गाड़ी को राम भरोसे छोड़ उस कच्ची सड़क नुमा रास्ते पर हम चल दिए, करेेरी गाँव की ओर।  करीब पौने घंटे की चढ़ाई के बाद सरसों के पीले फूलों के खेत और स्लेटों से बनी छतों वाले कच्चे-पक्के मकानों ने हमें दर्शन दिये।  उस ऊँचाई से पीछे मुड़ गाड़ी की तरफ देखा तो वह काली चींटी सी नज़र आ रही थी। धूप सेक रहे गाँव वाले हम अजनबी शहरी छोरों को प्रश्नवाचक नजरों से देख रहे थे।
                          करेरी झील पर कौन सा रास्ता जाता है का सवाल मानो उन्हें हैरान-परेशान  कर गया हो।उत्तर मिला, "भाई आजकल तो वहाँ कोई नही जाता, तुम क्यों जा रहे हो...!!"  मैंने चहकते हुए कहा बस हमें जमी हुई झील देखनी है।  तो उन्होंने कहा, " तुम लोग झील तक नही पहुँच पाओगे,  रास्ते में ही कहीं गुम ना हो जाओ....अच्छा है गाँव में एक गाइड सुरेश है, जो लोगों को झील पर घुमा कर लाता है...उसके घर जा कर उसे मिल, अपने साथ ले जाओ...!!!                                  विशाल जी बोले, " सलाह अच्छी है "   और हम दोनों उस गाइड सुरेश के घर जा पहुँचे तो पता चला कि वह तो सुबह सवेरे जल्दी ही जिला वन विभाग के मुख्य अधिकारी के बेटे और उसके मित्र को लेकर करेरी झील पर चला गया है और कोई भी व्यक्ति उस छोटे से गाँव में हमारे संग जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।
                           गाँव के घरों में हमारे अलावा एक और दल भी घूम रहा था,  जिसे देख बड़ी हैरत हुई कि हिमालय के इस सदूर गाँव में, जहाँ अब तक सड़क भी नहीं पहुँची है..... इसाई धर्म के प्रचारक वहाँ पहुँच गाँव में नववर्ष के तोहफे बांट रहे थे। यह परोपकार देख मेरे मन का इंसान तो बहुत खुश हुआ,  परंतु दिमाग का हिंदू परेशान हो गया....!!!!
                           विशाल जी के पिट्ठू बैग की एक तनी उखड़ गई थी,  सो उसे भी ठीक करवाना था। दर्जी का घर ढूँढ बैग को सिलवाया और वही पड़ी हिमाचली टोपी पहन विशाल जी खूब इतराये।  इस चक्कर में दोपहर के 12बज चुके थे,   यानी हम आधा दिन खो चुके थे।
                          गाँव वालों से आखिर हमने करेरी झील का रास्ता पूछकर और गाइड का मोह त्याग, चलना शुरू कर दिया। करेरी से कुठारना गाँव तक का सड़क मार्ग निर्माण कार्य चल रहा था, बस उसी सड़क पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद हमें "लियोंड खड्ड" पर बने नए पक्के पुल से पहले लियोंड खड्ड के साथ-साथ ऊपर को चढ़ना था। करेरी गाँव के घरों से निकल हम अब उस निर्माणाधीन सड़क पर चल पड़े।
                          कुछ आगे आने पर सड़क किनारे कंक्रीट की रोक लगाने वाले लोहे के सांचे पड़े थे और उसमें से मुझे एक सीधी लकड़ी मिल गई जो इन सांचों को फिट करने के बाद सीधा खड़ा रखने के लिए सहारे का काम देती होगी।  वह डंडा नुमा लकड़ी मैंने विशाल जी को थमा दी..... और बीस कदम बाद फिर से मुझे निर्माणाधीन सड़क के किनारे पड़ी एक दूसरी डंडा नुमा लकड़ी भी मिल गई,  परंतु वह लकड़ी ज़रा भारी थी... डंडा कम शहतीर ज्यादा लग रही थी। उस चार किलो के लठ को उठा,  मैंने अपनी पीठ पर लाद लिया यह सोचते हुए कि लाठी की लाठी और जरूरत पड़ने पर जलाने के लिए ईंधन।
                           दोपहर एक बजे हम लियोंड खड्ड पुल पर जा पहुँचे,  जहाँ से करेरी झील को रास्ता मुड़ रहा था। पक्के पुल पर पहुँच खुशी उल्लास उत्साह उमंग हमारे कदमों को नचाने लगी... और हम दोनों साँढ़ू भाई भांगड़ा डालने लग पड़ते हैं...!!     सड़क निर्माण में लगे मजदूर हमारे साथ-साथ अपनी उन लकड़ियों को भी घूर रहे थे,  जो हमने उनके सामान से चुरा ली थी।  लकड़ियों के प्रश्न पर हमने उनसे निवेदन किया कि आप और लकड़ी काट लेना भाई,  ये हमें चाहिए...क्योंकि हम करेरी झील पर जा रहे हैं।  तो वे मजदूर बोले, " इस समय करेरी तो बहुत देर से जा रहे हैं.....आज तो नहीं पहुँच पाओगे,  रास्ते में आपको गद्दियों के वीरान डेरे मिल जाएंगे... उसमें रात गुज़ार कर सुबह करेरी झील चल देना...!"
                            उस गाइड और दो लड़कों के बारे में पूछा तो जवाब मिला वह लोग सुबह गए थे और उन तीनों से पहले दो अंग्रेज जोड़े भी करेरी झील की ओर चढ़े हैं।   यह सुन हमें कुछ तसल्ली हुई कि हमारे आगे कुछ और लोग भी गए है......और हमें वह वापसी करते हुए मिल भी सकते हैं।
                             हम दोनों उस समय हर चीज को अपने मुताबिक ही सोच रहे थे,  परंतु पहाड़ कभी भी आपके मुताबिक नही सोचता।      "पहाड़ का तो अर्थ ही होता है, मुश्किल"    हर कदम मुश्किलें आपका रास्ता रोक कर कहती हैं, " एे बंदे, मैं पहाड़ हूँ पहाड़.... तुझे तेरी औकात मुझ पर चार कदम चल कर ही पता लग गई होगी...!!"  इस सत्य का प्रकाश हमारे अनुभवहीन दिमाग़ में जल्दी ही हो गया। सीधा-सादा रास्ता अब टेढ़ी-मेढ़ी पत्थर की सीढ़ियों और कदम-दर-कदम घुमावदार पगडंडी ने ले लिया।  पर अभी यह सब मुसीबतें बेहद मीठी लग रही थी, चढ़ाई चढ़ने में खासा आनंद भी प्राप्त हो रहा था।  लियोंड खड्ड की जलधारा को उसी में पड़े बड़े-बड़े पत्थरों पर उछल-उछल कर फाँदना ऐसे लग रहा था,  जैसे हम बचपन में पहुँच " स्टापू" खेल रहे हो....!
                             मैंने उन मजदूरों से करेरी झील की दिशा के बारे में पूरी जानकारी ले ली थी कि सामने दिख रहे इस पहाड़ की पिछली तरफ पहुँच, इसी नदी पर बने लोहे के पुल को पार कर... बाएं हाथ मुड अगले पहाड़ पर करेरी झील है।  सो एक मात्र पगडंडी पर अपने पग बढ़ाए जा रहे थे.....चढ़ाई और उखड़ी सांसो की जुगलबंदी ने हमें झट से ही थका डाला, कहाँ नाच रहे हमारे कदमों पर अब जूतों का भी भार महसूस होने लग पड़ा और ऊपर से मेरे हाथ में वह चार  किलो का मोटा डंडा जिसे मैंने अपनी ट्रैकिंग स्टिक बना रखा था।  चढ़ाई के इस पहले स्तर में ही हम दोनों थक कर रास्ते पर ही धूप में लम-लेट हो गए।  पलकें खुद-ब-खुद भारी हो बंद हो गई,  थकान झपकी का सहारा ले बैठी।
                             कुछ समय बाद मुझे उस घने जंगल में एक आहट अपने पास आते हुए महसूस हुई और झट से आँखें खोल उस ओर देखा..... तो,  एक बहुत बड़ा बंदर दबे पांव हमारे पास.... पीछे पड़े बैग उठाने के लिए बढ़ता आ रहा था और उसकी सेना पीछे खामोश खड़ी अपने मुखिया को देख रही थी। मैंने फुर्ती से अपना चार किलो का लठ उठाकर उस बंदर की तरफ दे मारा ....और पहाड़ की उस खामोशी में बंदरों व हमारे विरोध की चीखें गूँज उठी। चंद क्षणों में फिर से सन्नाटा छा गया,  बंदर हमारी नजरों से ओझल हो चुके थे।  तब ध्यान आया कि पहाड़ों में जंगल भी होते हैं और उन जंगलों में खतरनाक जंगली जानवरों का ही राज होता है.... खासकर भालू।
                              खैर अब डर की क्या बात जलावन के लिए उठाया वह चार किलो का डंडा,  ट्रैकिंग स्टिक के साथ अब मेरा हथियार भी बन चुका था।

                                                                 .................................(क्रमश:)
करेरी झील पर जाने के लिए,  सुबह साढ़े सात बजे ही हम धर्मशाला पहुँच गए।

धौलाधार हिमालय पर पड़ी ताज़ी बर्फ,  ऐसे प्रतीत हो रही थी कि पर्वत हमे रिझानें के लिए तैयार हुये हो। 

तभी सूर्योदय की किरणें पर्वत शिखरों से अठखेलियाँ करने लगी। 

सूर्योदय की स्वर्णिम किरणें ऐसा आभास दे रही थी कि जैसी पर्वत शिखरों पर सोने के पत्र मढ़ दिये गए हो,
यह नज़ारा मैं अपनी जिंदगी में पहली दफा देख रहा था दोस्तों। 

इतनी खूबसूरत मिठाई.... तो कैसे ना आँखें दो-चार हो। 

खूब दबा कर खाए,  " छोले-भूटरे " 

और,  मीठे में तिल-भूग्गा और इमरती। 



फिर,  धर्मशाला से चल दिये हम करेरी गाँव की ओर। 

रास्ते में दिख रही धौलाधार हिमालय की पर्वतश्रेणी। 

रास्ते में सड़क निर्माण का कार्य करते मजदूर। 

                                                                                 
करेरी के रास्ते में लगा एक छोटा सा विद्युतउत्पादन केन्द्र। 

विशाल जी,  मुझे यहाँ उतार दो....और गाड़ी वहाँ जाकर रोकना,  मैं उस झरने के साथ गाड़ी की फोटो खिंचूगाँ। 

रास्ते की सुंदरता... हमें बारम्बार गाड़ी से उतार बाहर खींच लाती। 

देखा ना क्या खूबसूरत चित्र,  धौलाधार में कच्ची सड़क पर हिमाचल परिवहन की बस और हमारी गाड़ी। 

धौलाधार हिमालय का भीमकसूटरी पास। 

भीमकसूटरी पर्वत पर पड़ी ताज़ी बर्फ। 

हिमालय तू गोरा भी सुंदर और काला भी सुंदर....!! 

घेरा गाँव आ गया दोस्तों। 

और,  हर जगह से दिखता भीमकसटूरी पर्वत हमारे आकर्षण का केन्द्र बन चुका था। 

घेरा गाँव में गज नदी पर लगी विद्युत परियोजना।

वाह,  कितना मनमोहक गाँव। 

घेरा गाँव से करेरी गाँव के लिए सड़क निर्माण कार्य चल रहा था। 
             
                                                                                 
धौलाधार के चरणों में मानव निर्मित सुंदरता। 

धौलाधार से बह कर आ रही नदियों में नाममात्र ही जल था। 

रास्ता अब हमारी गाड़ी को परेशान करने लगा था। 

और,  करेरी गाँव से दो किलोमीटर पहले कच्ची सड़क पर गाड़ी आगे बढ़ना मुश्किल सा हो गया,  तो इस वीरान जगह पर ही गाड़ी को लावारिस छोड़ देना हमारी मजबूरी बन गई, और अपने पिट्ठू बैग डाल हम सामने देख रहे पहाड़ पर चढ़ दिये....

करेरी गाँव की ओर। 

पहाड़ चढ़ने पर सबसे पहले हमे सरसों के खेत व स्लेटों की छतों वाले मकानों ने दर्शन दिये। 

उस ऊँचाई पर पहुँच, नीचे देखा तो गाड़ी काली चींटी सी नज़र आ रही थी। 

गाँव वाले हम अजनबी शहरी छोरों को प्रश्नवाचक नजरों से देख रहे थे। 

औसम्..... विशाल जी का तकिया-कलाम।

गाँव वालों से भेट-वार्तालाप। 

गाँव के दर्जी से विशाल जी के बैग की उखड़ी तनी ठीक करवाई,
वहाँ पड़ी हिमाचली टोपी पहन विशाल जी खूब इतराये। 

दर्जी के घर के बाहर।

और,  हम करेरी गाँव से झील का रास्ता पता कर चल दिये और जा पहुँचें करेरी झील से बह कर आ रही लियोंड नदी पर बने पुल पर,
जहाँ से हमें नदी के साथ-साथ ऊपर चढ़ना था। 

लियोंड खड्ड पर बने नये पुल पर पहुँच,  हमारे कदम खुशी उल्लास उत्साह उमंग से नाचने लग पड़ते हैं... 

और,  हम दोनों साँढ़ू भांगड़ा डालने लग पड़ते हैं...!!! 

लियोंड खड्ड पर पर पुराना पुल। 

पुल पर काम कर रहे मजदूर हमारे साथ अपने उन डंडों को भी घूर रहे थे,  जो हमने चुरा लिये थे। 

उन मजदूरों से करेरी झील के विषय में जानकारियाँ ले उस एकमात्र पगडंडी पर चढ़ दिये। 



लियोंड खड्ड को पार करते हुये,  उसमें पड़े पत्थरों को फाँदना ऐसा लग रहा था जैसे हम बचपन में पहुँच स्टापू खेल रहे हो। 

मेरी पीठ पर लदा,  वो चार किलो का डंडा...!!!!

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