शुक्रवार, 29 मार्च 2019

"एक यात्रा बेईमान सी, तुंगनाथ की...!"

           " एक यात्रा बेईमान सी,  तुंगनाथ की...! "

         बद्रीनाथ से केदारनाथ को जाते समय 5अक्तूबर 2016 की शाम जब मेरी गाड़ी मुझे सपरिवार ले ऐसी जगह रुकी, जहाँ मात्र चंद ढाबों का जमावड़ा था। मैने हैरत से पूछा कि क्या ये ही चोपता है.... तो हां का उत्तर पा कर हैरानी और ज्यादा बढ़ गई कि इतना भारी-भरकम नाम "चोपता"(2800मीटर)  और चंद कच्ची-पक्की दुकानों का अड्डा व उनके मध्य एक छोटा सा द्वार जिस के पार विश्व के भौगोलकीय सर्वोच्च शिव मंदिर "तुंगनाथ" (3350मीटर) को पैदल मार्ग जा रहा है।
                      गाड़ी से बाहर निकलते ही मौसम में बहुत ठंडक महसूस होते ही, मैंने झट से अपनी यंत्र घड़ी पर तब का तापमान देखा... तो वह 14डिग्री के करीब था। पहाड़ पर कब्ज़ा जमाई धुंध ने सूर्यास्त की धूप को कहीं रास्ते में ही रोक रखा था। कैमरे के लिए एक नया मैमोरी कार्ड चोपता पहुँच खरीदने की मेरी आशा, चोपता के बाज़ार को देख धूमिल हो चुकी थी।  एक ढाबे पर बैठ चाय के संग तथाकथित पहाड़ी व्यंजन बन चुके 'मैगी' को होठों से खींच..... मैं खुराफाती सोच का बंदा अपने बीवी-बच्चों को संग ले चोपता की सड़क पर पैदल घूमता हुआ आगे की ओर चला आया,  तो एक बहुत बड़े बुग्याल में खुद को पा कर अचंभित रह गया। सड़क इसी बुग्याल के बीचो-बीच पहाड़ से नीचे उतर रही थी। सड़क के किनारे कुछ इक्का-दुक्का चाय-पानी की दुकानें और बुग्याल में जहाँ-तहाँ बनी चंद झोपड़ी नुमा इमारतें मन को मसता सी रही थी।       बुग्याल में कुछ कैंप भी गड़े नज़र आ रहे थे। सच में चोपता कैंपिंग के लिए एक आदर्श स्थल है, इसीलिए तो मेरी तरह के किसी गुमनाम प्रकृति प्रेमी ने इसे भारत में स्विट्जरलैंड होने जैसी बात कही होगी....!
                    कैंपों के आसपास घोड़ों को हरी घास चरता देख ज़ेहन में एक ऐसा विदेशी दृश्यालेख (सीनरी) संजीव हो गया, जो कभी मैं बचपन में अपने घर की दीवार पर टंगा देखा करता था।  नीचे बुग्याल में गद्दियों के डेरे और उसके आसपास लगे रंग-बिरंगे कैंप भी कम आकर्षण का केंद्र ना थे दोस्तों।
                    धुंध और धूप के मल्लयुद्ध में सूर्य देव कुछ क्षण के लिए ऊपर तो आए, पर धुंध ने उन्हें फिर नीचे दबा लिया और साथ में हिमालय दर्शन की मेरी अभिलाषा को भी।  मैंने वहाँ स्थानीय दुकानदार से पूछा कि यहाँ किस दिशा में हिमालय की चोटियाँ नज़र आती हैं, तो उसने उंगली उठाकर कहा - " परंतु अभी धुंध पड़ गई है, सुबह- सवेरे देखना कैसे गज़ब नज़ारा होगा।"
                     "मेरा खुराफाती मन तो आज सुबह से ही जाल बुन रहा था कि बद्रीनाथ से केदारनाथ जाते समय बीच रास्ते में पड़ते चोपता में आज रात के लिए अपने ही बुने जाल में बखुद बीवी-बच्चों सहित फंस जाऊँ और मेरी श्रीमति जी को भनक भी ना लगे कि मेरे इस बेईमान मन में क्या चल रहा है...!!"
                       बुग्यालों में मेरे सुस्त कदमों से तेज़... दिन को कत्ल करने वाला अंधेरा निकला,  जो अब एकदम से चारों तरफ पसर रहा था। हम बुग्याल से वापिस चोपता के नन्हे से बाज़ार में खड़ी अपनी गाड़ी की तरफ चल पड़े, तो मैंने अपने बुने जाल की अंतिम गाँठ लगाते हुए श्रीमति जी से कहा- " अब इस समय हम किसी भी हालत में केदारनाथ के लिए गौरीकुंड तक नही पहुँच सकते, बेहतर है यहीं चोपता में आज रात रुक सुबह चलते हैं केदारनाथ।"  श्रीमति जी की स्वीकृति मिलते ही मैंने झट से उसी मैगी वाले ढाबे के नीचे बने एक कमरे का ताला खुलवा लिया। चोपता में तकरीबन सारे ढाबे वालों ने यात्रियों को किराए पर देने के लिए कमरे भी बना रखे हैं।
                       7बज चुके थे,  अंधेरे में डूबे चोपता को देख मैने मज़ाक में ढाबे वाले से प्रश्न पूछा- "अरे यह क्या चोपता में देश आज़ाद होने के 70साल बाद भी अभी तक बिजली की तारें-खम्बें भी नहीं पहुँचे, बिजली क्या हवा में से उड़कर आएगी भला...!!"  वह हल्की सी मुस्कान के बाद गंभीरता से बोला- " क्योंकि चोपता तुंगनाथ क्षेत्र पक्षी अभयारण्य है इसलिए पक्षियों की आज़ादी व सुरक्षा के मद्देनज़र यहाँ बिजली कभी भी नही आएगी,  हम लोग सौर ऊर्जा से चलने वाली छोटी-मोटी लाइटें जलाकर गुज़र-बसर कर रहे हैं।"  तब मैंने ध्यान दिया क्यों हर दुकान के अंदर बहुत मद्धिम सी रोशनियाँ थी।
                     करीब 8बजे रात का खाना खाने कमरे से ऊपर चढ़ ढाबे पर आए,  तो मेरे बीवी-बच्चे ढाबे में तप रहे तंदूर के भंवरे बन बैठे और मैंने तब अपना अगला पासा फेंक तंदूर पर रोटियाँ बना रहे तंदूरिये से पूछा- "भाई, वो जो सामने सीढ़ियाँ चढ़ रास्ता उस छोटे से द्वार को भेदते हुए तुंगनाथ मंदिर जा रहा है, कितना कू लंबा है..?"
                   "यह ही कोई तीन-चार किलोमीटर का पैदल रास्ता है सर जी। "
                    "अच्छा, बहुत खूबसूरत जगह है क्या..!"
" जी हां, बहुत खूबसूरत..... भगवान शिव के पाँच केदारों में से यह तीसरा केदार है, इसलिए इस प्राचीन मंदिर का बहुत धार्मिक महत्त्व है।"   मैंने उसकी बात को और ज्यादा भारी करने के लिए श्रीमति जी की तरफ देख कर कहा- "भाई इस मंदिर की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यह मंदिर संपूर्ण धरती में सबसे ज्यादा ऊँचाई पर निर्मित है।" और अगले क्षण एक साँस में ही श्रीमति जी को बोल गया कि चलो कल पहले तुंगनाथ चलते हैं, फिर केदारनाथ जाएंगें।"
                     परंतु श्रीमतिजी ने ना में ही सिर हिलाते हुए कहा कि हमें समय और शक्ति बचानी है केवल केदारनाथ जाने के लिए, इसलिए कल सुबह जल्दी केदारनाथ की तरफ चलो बस।
                     मैं इतनी जल्दी कहाँ हार मानने वाला था क्योंकि मैं चोपता पहुँच कर भी तुंगनाथ देखे बगैर नही जाना चाहता था, ना जाने फिर कब इस तरफ आना हो या ना हो। संयम से अपना तर्क श्रीमति जी के समक्ष पेश करते हुए बोला- "समय तो हम सुबह जल्दी जाकर बचा सकते हैं और शक्ति घोड़ों पर तुंगनाथ जाकर बखूबी बच जाएगी.... इस तीन-चार किलोमीटर के ट्रैक पर हम तुंगनाथ भगवान के दर्शन कर तीन घंटों में वापिस चोपता भी आ जाएंगें और इस छह-सात किलोमीटर की घुड़सवारी से आपको अनुभव भी हो जाएगा.... क्योंकि आपको केदारनाथ जाने के लिए भी तो, घोड़ों की सवारी ही तो करनी है....इस छोटी सी घुड़सवारी यात्रा पर आप यह भी बखूबी समझ जाएंगे कि क्या आप केदारनाथ की करीब बीस किलोमीटर लंबी एकतरफा यात्रा पर घोड़े की पीठ पर सवार रह सकोगे या नही।"
                 श्रीमती जी अब मेरी बात पर गौर फरमा रही है और घुड़सवारी के नाम पर मेरा बेटा "प्रथमेश" उत्साहित होकर कह रहा है- "चलो मम्मी चलते हैं ना...!"  बेटी "अनन्या" आँखों में अस्पष्ट से भाव लिये माँ का मुखमंडल ताक रही थी...... तभी श्रीमति जी ने प्रथमेश के सिर पर हाथ फेर कहा- "ठीक है, चलो चलते हैं।"
                      और, मैंने झट से ढाबे के बाहर पहले से ही खड़े घोड़े वाले उन दोनों नवयुवकों को आवाज़ लगाई, जो मुझसे पहले ही दो बार तुंगनाथ जाने के बारे में पूछ चुके थे। ढाबे वाले उस सीधे-साधे नौकर की मदद से घोड़े वालों से मोलभाव कर, दो घोड़ों के कुछ घंटे खरीद लिये सुबह तुंगनाथ जाने के लिए.... जबकि मैं अपने जूतों "चरणदास" पर ही सवार हो तुंगनाथ की चढ़ाई चढ़ने वाला हूँ।
                     हम पंजाबियों की पहली पसंद 'दाल- मख्नी, आलू मटर की सब्जी और तंदूरी लच्छे परांठे'.....वाह-वाह, क्या स्वादिष्ट भोजन परोसा गया....उस लाटू की मद्धिम से रोशनी में जो सौर ऊर्जा से जग रहा था।  चोपता का ठंडा मौसम, मनपसंद खाना और मेरा मन बहुत प्रसन्न क्योंकि मेरे फैंके पासों में अब चित भी मेरा और पट भी मेरा साबित हो चुका था, मैं कल सुबह तुंगनाथ जो जा रहा हूँ दोस्तों।
                     ढाबे रूपी होटल के सीलन बड़े कमरे में भी सौर ऊर्जा चलित बल्ब भी मात्र "जुगनू"  जितना ही चमक रहा था।  बिस्तर और रजाइयाँ ठंड से अकड़ कर ठंडी हुई पड़ी थी,  जिन्हें बमुश्कित अपने जिस्म की गर्मी से गर्म किया। कमरे के पीछे पहाड़ की ढलान थी, सन्नाटा होने पर कमरे के पीछे ही गिर रहे एक प्राकृतिक जल स्रोत की ध्वनि ऐसे सुनाई देने लगी कि जैसे बाहर बारिश होने लगी हो। कमरे की एकमात्र खिड़की की छोटी सी चीथ (दरार) से रह-रहकर पवन पुरवइया अपनी चीख सुना रही थी....और बीच-बीच में कभी-कभी घुँघरू छनकने की ध्वनि माहौल को और ज्यादा रहस्यमय बना जाती,  परंतु चारों ओर फैले स्याह अंधेरे में आँखें कुछ देख तो नही पाई... हां आभास यह एहसास करा रहा था कि हम पहाड़ की ऊँचाई पर बसी इस छोटी-सी बसावट के छोटे से कमरे में सुरक्षित है।
                   सुबह 5बजे मशीनी मुर्गे की बांग पर हमने  बमुश्किल गर्म किये बिस्तरों को त्याग दिया क्योंकि साढे पाँच बजे से घोड़े वालों से खरीदे घंटे शुरू होने वाले थे और घोड़े वालों ने भी ठीक साढे पाँच बजे ऊपर ढाबे पर अपनी हाज़िरी ज़ाहिर कर दी। सारी रात वो घुँघरू छनकने की रहस्यमय आवाज़ का अब खुलासा हो चुका था कि हमारे घोड़ों का डेरा हमारे कमरे के पीछे ही है। आखिर भाले जैसी सीधी घड़ी की सूइयों वाले समय मतलब 6बजे हम भी सीधे हो लिए भगवान तुंगनाथ के दर्शन पाने हेतु।       
                       एक घोड़े पर मेरी बेटी व बेटा और दूसरे घोड़े पर मेरी आका......मैं गुलाम उनके पीछे-पीछे लगभग भाग रहा था, एक हाथ में अपनी ट्रैकिंग स्टिक और दूसरे हाथ में अपनी दूसरी पत्नी थामें (जो मुझे जानते हैं,  वे सब यह पंक्ति पढ़ समझ चुके हैं कि मेरी धर्मपत्नी की सौतन मेरी "बाँसुरी" है दोस्तों )
                       अरुणोदय से पूर्व मौसम अभी इतना ठंडा था कि मेरी नाक से पानी बह रहा था,  साँस तो फूली हुई थी पर मैं अपने दोनों पैरों से उन चार पैरों वाले बलशाली पर्वतारोहियों से चाल मिलाने की कोशिश में लगा हुआ था। कुछ देर बाद श्रीमति जी ने मेरी चिंता करते हुए मुझसे एक भार ले अपने हाथों में ले लिया "मेरी बाँसुरी" (दरअसल दोस्तों उन्हें असल चिंता यह थी कि कहीं यह पर्वत-प्रेमी मेरी सौतन को ले यहीं ना रम जाए)
                        कुछ ऊँचाई पर आते ही उन घने पेड़ों से ऊपर निकल मेरी नज़र बार-बार एक चौथाई आसमान जितने ऊँचे पहाड़ों की श्रृंखला में उस नज़ारे को तलाशने लगी,  जो मैं हर बार हिमालय देव की चरणों में आकर ढूँढता हूँ।  करीब साढे छह बजे वो नज़ारा भी प्रकट होने लगा कि रात से सो रही उस श्वेत पर्वत श्रृंखला के सबसे ऊँचे पर्वत के सिर को सूर्य देव थपथपा कर जगा रहे हैं,  मैंने झट से घोड़ा-वाहक से उस पर्वत का नाम पूछा तो उसने फट से जवाब दे डाला- "ऐसे बहुत से पर्वत आपको ऊपर जाकर दिखाई देंगे.....!!!"   मैं समझ चुका था कि इस बंदे को इस खूबसूरत पर्वत के नाम के बारे में नही पता है(वो चौखंबा पर्वत शिखर था, जिसकी जानकारी मुझे बाद में केदारनाथ जाकर हुई दोस्तों) 
                           वह घोड़ा-वाहक फिर बोला-" सर ध्यान रखें, उत्तराखंड का राजकीय पक्षी 'मोनाल' भी आपको यहाँ-कहाँ दिख सकता है।"  मैं मन ही मन मुस्कुराया कि चलो कुछ तो बताया इसने और हांफता हुआ बोला- "जब तुम्हें मोनाल दिखे तो हमें जरूर दिखाना भाई।"
                        चोपता से मात्र सौ मीटर की ऊँचाई पर आते-आते वृक्षों की कतारें एक दम से गायब हो गई और सामने नज़र आने लगे बहुत सुंदर बुग्याल, जिनके बीचो-बीच से पत्थरों से बना पक्का रास्ता लहराता हुआ पहाड पर चढ़ता जा रहा था। बुग्यालों की हरियाली में एक तरफ चटक संतरी रंगी आधुनिक झोपड़ियाँ (अस्थाई टैंट) गड़ी थी तो दूसरी तरफ गद्दियों के स्थाई डेरों में बनी घास फूस की झोपड़ियाँ। परंतु उन दोनों तरफ की झोपड़ियों में एक तरफ तो निश्चित व्यापार ही था और दूसरी तरफ मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन कच्ची झोपड़ियों में केवल प्यार व सत्कार ही रहता होगा...!
                             मैं अब उनका पीछा करते-करते थक रहा था तो मेरे भीतर के विकास नारदा ने बाहर के विकास नारदा को समझाया, "ओ अकड़ू इंसान, भगवान ने तुझे बहुत सोच विचार के बाद दो पैर देकर धरती पर भेजा है... चार पैर वाले बनने की कोशिश मत कर...!!!!" 
और, मैं अब अपनी सामर्थ्य की चाल चलने लगा। घोड़े वाली सवारियाँ मुझसे बहुत आगे निकल, आधे रास्ते में पहुँच सुबह-सुबह उस महिला दुकानदार को जगा... चाय बनवा कर मेरा इंतजार करने लगी। मैं पहाड़ों पर चढ़ता हुआ बहुत कम रुकता है साँस लेने के लिए, बस चलता रहता हूँ धीरे-धीरे.... क्योंकि मैं साँस तब ले लेता हूँ जब मेरा "स्मृति यंत्र" (कैमरा) व्यस्त होता है।
                     सूर्य देव ने थपकी मार अब सब पर्वतों को नींद से जगा दिया। मुझ प्रकृति प्रेमी की नजरें चलते-चलते भी उन पर ही गड़ी हुई हैं और हिमालय की धौली धारों (हिमाच्छादित शिखरों) को निरंतर निहार रही हैं, जो अब हल्के संतरी रंग में रंग चुकी थी।  फिर से उन पर्वतों का नाम जानना चाहा तो बस इतना सा उत्तर मिला कि उन पर्वतों के नीचे ही केदारनाथ मंदिर है....!!    दोस्तों मेरी एक आदत है कि मैं जहाँ भी भ्रमण के लिए जाता हूँ, उसके विषय में पहले से जानने की कोशिश नही करता..... बस कोरा कागज बन चल देता हूँ ताँकि खुद अपने अनुभव कर उस कोरे कागज को अपने अनुभवों का अनुभूतियों से भर सकूँ..... यहाँ भी केवल में एक ही नाम जानता था बस "तुंगनाथ "
                        चोपता से तुंगनाथ तक के करीब चार किलोमीटर लंबे पैदल रास्ते पर प्रकृति देवी खूब प्रसन्न नज़र आ रही थी। पैरों के नीचे बुग्यालों की हरियाली, सिर पर नील गगन और सामने देख रही स्वर्ग को जाती हुई  चोटियाँ।
                     आखिर.... सामने ऊँचाई पर मुझे एक मंदिर शिखर दिखाई पड़ा और मैं अकेला ही उस पगडंडी पर चढ़ता हुआ, दो-चार दुकानों को पार कर करीब 8बजे तुंगनाथ मंदिर के सामने जा पहुँचा.... जिस के प्रांगण में खड़े मेरे बीवी-बच्चे मुझे दूर से आता देख खुशी से हाथ हिला रहे थे।
                         मैं अब अपने परिवार के साथ संपूर्ण ब्रह्मांड के सबसे ऊँचे शिव मंदिर तुंगनाथ (3350 मीटर) के प्रांगण में सहर्ष खड़ा हूँ। हम ही सुबह के वह प्रथम श्रद्धालु थे, जो चोपता से यहाँ पहुँचे हैं।  हालाँकि मैं उस ऊँचाई से नीचे रास्ते पर भी देख रहा था, जिस पर अब कई लोग मंदिर की ओर चले आ रहे थे। अति प्राचीन तुंगनाथ मंदिर में जा माथा टेक, पुजारी से इस पावन स्थल का इतिहास जाना। इस ऊँचाई पर पहुँच मौसम की मनमर्जियाँ भी खूब देखने को मिल रही थी, मंदिर प्रांगण में कभी कहीं से उड़ते हुए बादल आ जाते तो कभी सूर्य की चमकार।  जब धुंध भी कुछ छट जाती तो मेरा ध्यान रह-रहकर मंदिर प्रांगण के ठीक सामने दिख रही हिमालय की गगनचुंबी दीवार पर खिंचा चला जाता।
              
              दोस्तों...... सच्चे मन से आपको एक बात बताना अब मुनासिब समझता हूँ कि मेरा तुंगनाथ आना एक धोखा था जो मैंने अपनी पत्नी को दिया।
              "धोखा"  जी हां,  धोखा...!!!!
मैं कुछ सनकी किस्म का पर्वत प्रेमी घुमक्कड़ हूँ,  पर्वत भ्रमण ही मेरी घुमक्कड़ी की रीढ़ है। चाहे जहाँ भी जाऊँ, भारत के जिस भी प्रांत में घूमने जाऊँ..... तो वहाँ सबसे पहले पर्वतीय स्थलों की ही तलाश में रहता हूँ,  पत्थर- मिट्टी के यह ढेर ना जाने क्यों मुझे इतना आकर्षित करते हैं मैं खुद परेशान हूँ...!!
                      हर वर्ष की तरह 2अक्तूबर को आने वाली वैवाहिक वर्षगाँठ को हम ना जाने कितने वर्षों से घुमक्कड़ बन मना रहे हैं मुझे याद नही। वैवाहिक वर्षगाँठ टूर पर कौन सी जगह पर घूमने जाना है इसका अधिकार मेरी श्रीमति जी के पास ही सुरक्षित है,  जबकि बाकी सारे साल की घुमक्कड़ी के अधिकार मेरे पास आरक्षित हैं। श्रीमति जी ने हुकुम दिया कि अक्तूबर 2016 के टूर पर इस बार हम बद्रीनाथ-केदारनाथ दर्शन को जाएंगे। अंधे को और क्या चाहिए दो आँखें,  मैं उत्साहित हो बद्रीनाथ और केदारनाथ के अलावा उस क्षेत्र में पड़ने वाले कई पर्वतीय स्थलों के नाम गिनाने लगा....... तो अत्यंत धार्मिक मेरी श्रीमति जी ने कहा- " मैं सिर्फ बद्रीनाथ धाम व केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना चाहती हूँ बस.... खबरदार यदि किसी और जगह का नाम भी लिया...!!!"
                   खैर बद्रीनाथ दर्शन उपरांत जब हमारी गाड़ी वापस चल पड़ी केदारनाथ की और...... तो गोविंदघाट आते ही मेरे भीतर का पर्वतारोही उबलने लगा।  हालाँकि दोस्तों,  मैं बद्रीनाथ से सुबह मुँह-अंधेरे अपने बीवी-बच्चों को रेस्ट हाउस के कमरे में सोता छोड़... अकेला ही "वासुधारा जलप्रपात" का 6किलोमीटर लंबा ट्रैक नाप आया था। मैने अपना पासा फेंक कहा- "केदारनाथ छोड़ो, हेमकुंड साहब चलते हैं....एक तरफ का सब कुछ इस बार देख जाते हैं, केदारनाथ अगली बार आ जाएंगे...!!!" श्रीमति जी ने मुझे अपना वचन याद दिलाया कि यह टूर उनकी मर्जी से चलता है।
     मरता क्या ना करता प्राण जाए पर वचन ना जाए।
                         दिमाग में अब एक नई खुराफात जन्म ले चुकी थी कि कर्णप्रयाग वाले सीधे रास्ते से केदारनाथ जाने की बजाय, गाड़ी को गोपेश्वर से चोपता की तरफ मोड़ दिया....यह कहकर कि यह रास्ता भी केदारनाथ ही जाता है और जानबूझकर रास्ते में देर करता रहा कि आज किसी भी हालत में केदारनाथ ना पहुँच पाए। मुझे रास्ते में यानी 'चोपता' पहुँचते-पहुँचते ही शाम हो जाए,  फिर श्रीमति जी से कहूँगा कि अब तो शाम हो गई है यहीं रुक कर कल सुबह चलेंगे केदारनाथ के लिए। चोपता रुकने का स्वार्थ तो आप समझ ही चुके हैं दोस्तों, "तुंगनाथ की ट्रैकिंग"  इस ट्रैकिंग के लिए मैंने बद्रीनाथ को जाते समय कर्णप्रयाग के होटल (जिसमें हम रात रुक बद्रीनाथ गए थे) में छूट चुके अपने कैमरे के कवर व चार मैमोरी कार्ड को पुनः प्राप्त करने का मोह भी त्याग दिया..... और खुशकिस्मती यह रही कि वे चारों मैमोरी कार्ड खाली ही थे दोस्तों।
                        मामा शकुनि की तरह ही सारे पासें मेरे मन की जान वैसे ही पड़े,  जिसका नतीजा ही था मैं अब तुंगनाथ मंदिर परिसर में अपने परिवार के साथ खड़ा हूँ। भगवान तुंगनाथ के दर्शन उपरांत घोड़े वालों ने भी अपना दांव खेला कि वापसी के लिए तीसरा घोड़ा करो क्योंकि उतराई में एक घोड़े पर दो बच्चों का बैठना खतरनाक साबित हो सकता है।  तभी मेरी अर्धांगिनी ने मेरा हाथ पकड़कर प्यार से कहा कि मैं पैदल ही आप संग नीचे जाऊँगी, आप दोनों बच्चों को इन दोनों घोड़ों पर नीचे चोपता में भेज दें।
                अब, हम दोनों तुंगनाथ मंदिर परिसर में खड़े घोड़ों पर वापस चोपता जा रहे अपने दोनों बच्चों को आँखों से ओझल होने तक देखते रहे।
                     तभी, मेरी प्रिय प्राणेश्वरी मेरी तरफ अपना सुंदर मुख कर बोली- "मैं आपके रग-रग से भलीभाँति वाकिफ़ हूँ.... कि केदारनाथ जाते हुए क्यों चोपता-चोपता का राग आलापने लग पड़े और हम सिर्फ चोपता में चाय- पानी पीने के लिए ही तो रुके थे..... परंतु आप वहीं जम गए, मैं जानती हूँ कि आप पहले से सब कुछ सोच कर आते हैं और खुद जानबूझकर बेवकूफ बने घूमते और हमें भी बेवकूफ बना उन सब जगह पर घूमते रहते हो, जहाँ आपको खुद घूमना होता है.....!!!!"
                      अपनी पोल खुलती देख मैं करीब-करीब चापलूसी भरी ज़ुबान में बोला- "तुम बारिश का पानी और मैं कश्ती कागज़ की, जिस ओर बहा ले जाओगी अंग-संग बहता रहूँगा....!!!"
                     वह बोली- "आप खुद ही देख लो जी कि हम दोनों में से कौन कश्ती और कौन बारिश का पानी,  आप तो हमें ही बहाये ले जा रहे हो....!!!!! "
             मेरे पास अब केवल हंसने का एक ही सटीक मंत्र बचा था, सो हंस दिया।  तभी हमारे मधुर वार्तालाप को एक दम से विराम मिल गया, जब हमारी नज़र पड़ी उस परिवार पर.... जो मंदिर की ओर चला आ रहा था। एक सज्जन ने अपने आठ-दस साल के बच्चे को उठा रखा था और उसकी पत्नी उसके पीछे-पीछे परेशान ही चलती हुई आ रही थी। पास आने पर मैंने उनसे पूछा कि इस बालक को क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि एकदम किसकी तबीयत  बिगड़ने लगी और यह बेहोश हो गया है।  मैं झट से समझ गया कि इस बालक को ऊँचाई की बीमारी यानि हाई एल्टीटयूट सिकनेस हो गया है।  मैंने उन्हें इस बारे में बता कर कहा कि जितनी जल्दी हो आप इस बच्चे को नीचे ले जाए, उतना ही अच्छा है.... यह चोपता पहुँचकर बिल्कुल ठीक हो जाएगा।  परंतु उस दंपति ने मेरी बात नहीं मानी और मंदिर की तरफ चल दिए यह कहते हुए कि भोले बाबा इसे ठीक कर देंगे।
             अब मैं अपनी अर्धांगिनी को साथ ले तुंगनाथ मंदिर से कुछ ऊँचाई पर चढ़ गया ताँकि मंदिर और दूर दिख रही हिमालय पर्वतमाला को पृष्ठभूमि बना अपने बाँसुरी वादन का एक यादगार वीडियो उनसे बनवा लूँ। परंतु इतनी ज्यादा ऊँचाई और ठंड में बाँसुरी को लगातार बजाते रहना बेहद मुश्किल काम साबित हो रहा था, बाँसुरी को फूँकते हुए साँस बहुत ज्यादा फूल रही थी। पर यह भी मेरे जीवन की एक उपलब्धि है कि मैंने समुद्र तल से 3350मीटर की ऊँचाई पर बाँसुरी बजा, भगवान तुंगनाथ को सुनाई।
                   अब हमने वापसी का रुख लिया था , चलते-चलते मेरी पत्नी ने अपनी दिल की मुझे कही कि चलो अच्छा ही हुआ जो आप हमें यहाँ ले आए, पांच केदारों में  से एक भगवान तुंगनाथ के आपने मुझे दर्शन करवा दिये.....यह क्षेत्र बहुत रमणीक है, मन खूब प्रसन्न है यहाँ आकर.... जीवन में पहली बार 'मोनाल' पंछी को देखा जो बेहद सुंदर था,  चोपता में रात रुकना भी अपने-आप में एक अलग सा अनुभव है कि जंगल में वह जगह जहाँ पर आधुनिक मनुष्यता की प्रथम जरूरत बिजली ही नही है।
              
                        रास्ते भर हम दोनों एक-दूसरे की तस्वीरें खींचते रहे और वो मेरे बाँसुरी वादन के वीडियो बनाती रही। जब हम चोपता पहुँचने वाले थे तो मैंने गंभीर सा होकर अपनी पत्नी  "भावना"  से कहा- " मैं चाहता तो तुंगनाथ मंदिर से और ऊपर जा पर्वत के शिखर पर स्थित 'चंद्रशिला' भी जा सकता था..... परंतु नही गया, क्योंकि मुझे फिर से यहाँ दोबारा आना है और इसीलिए वापस आने का कारण छोड़ कर जा रहा हूँ......!!!!!! "                  

बस,  आने वाला ही है 'चोपता-3 किलोमीटर '

"क्या ये ही चोपता है"  इतना भारी-भरकम नाम 'चोपता' और चंद कच्ची-पक्की दुकानों का अड्डा।  

और , इस अड्डे के मध्य एक छोटा सा द्वार जिस के पार विश्व के भौगोलकीय सर्वोच्च शिव मंदिर "तुंगनाथ " को पैदल मार्ग जा रहा है। 

तथाकथित पहाड़ी व्यंजन 'मैगी' कुछ रस-मिसी सी। 

चोपता अड्डे के दोनों छोर।

और,  मैं अपने बीवी-बच्चों के संग चोपता की सड़क पर पैदल घूमता हुआ आगे की ओर चल देता हूँ ...जहाँ सामने बहुत बड़ा बुग्याल नज़र आ रहा था।

बुग्याल में जहाँ-तहाँ बनी चंद झोपड़ी नुमा इमारतें मन को मसता सी रही थी। 

बुग्याल में सड़क किनारे कुछ इक्का-दुक्का चाय-पानी की दुकानें थी।

धुंध और धूप के मल्लयुद्ध में सूर्य देव कुछ झण के लिए ऊपर तो आए,  पर धुंध ने उन्हें फिर नीचे दबा लिया। 

बुग्याल में घोड़ों को हरी घास चरता देख ज़ेहन में एक ऐसा विदेशी दृश्यालेख संजीव हो उठा,  जो कभी मैं बचपन में अपने घर की दीवार पर टंगा देखा करता था। 
                                         

रात का खाना खाने जब हम ढाबे पर आए, तो मेरे बीवी-बच्चें ढाबे में तप रहे तंदूर के भंवरे बन बैठे।

अगले दिन सुबह 6बजे हमने तुंगनाथ भगवान के दर्शन पाने हेतू चढ़ाई आरंभ कर दी। 

बीबी-बच्चें घोड़ों पर सवार....और मैं अपने जूतों 'चरणदास' पर सवार हो तुंगनाथ के लिए चल दिया। 

सो रहे हिमालय पर सूर्य की थपकी। 

मैने घोड़ा-वाहक से इस पर्वत का नाम पूछा तो उसने कहा, "ऐसे बहुत से पर्वत आपको ऊपर जा दिखाई देंगे...!" मतलब वह इस पर्वत का नाम नही जानता था (यह चौखंबा पर्वत शिखर है दोस्तों,  जिसकी जानकारी मुझे बाद में केदारनाथ जा कर हुई)

चोपता से मात्र सौ मीटर की ऊँचाई पर आते-आते वृक्षों की कतारें गायब,  और सामने नज़र आने लगा नज़ारा.... इस हरे-भरे बुग्याल का।

बुग्याल में गद्दी का डेरा। 

दोस्तों,  इस चित्र में बुग्याल के पीछे देखें.....अरुणोदय की प्रथम किरणों से सराबोर 'चौखंबा शिखर '

बुग्याल के हरियाली में चटक संतरी रंगी आधुनिक झोपड़ियाँ (अस्थाई टैंट) और गद्दियों के स्थाई डेरों में बनी घास-फूस की झोपड़ियाँ।

बुग्याल के बीच से निकल रहा रास्ता भी कम हसीन ना था दोस्तों। 

रुकों भाई .... ज़रा दम तो लेने दो।

घोड़े वाली सवारियाँ मुझसे बहुत आगे निकल,  आधे रास्ते में पहुँच सुबह-सुबह उस महिला दुकानदार को जगा... चाय बनवा कर मेरा इंतजार करने लगी।

घोड़ों वाले फिर से आगे निकल गए और मैं अपनी सामर्थ्य की चाल चलता रहा।

तुंगनाथ को जाता हुआ रास्ता भी क्या कम हसीन है दोस्तों।

उस हसीन रास्ते का एक हसीन सा मोड़। 

इस ऊँचाई पर पहुँच नीचे सारा रास्ता नज़र आने लगा , जिस पर हम चल कर ऊपर पहुँचे थे ।

चोपता से तुंगनाथ तक के करीब चार किलोमीटर लम्बे पैदल रास्ते पर प्रकृति देवी खूब प्रसन्न नज़र आ रही थी।

घोड़ों वाली सवारियाँ बेहद आगे निकल चुकी थी.....और मैं अकेला ही बढ़ा चला जा रहा था पथ पर।

तुंगनाथ के रास्ते में आते गणेश मंदिर पर ध्वज हेतू लगे डंडे पर विराजमान पक्षी।
गणेश मंदिर। 


सूर्य देव और तुंगनाथ मंदिर के प्रथम दर्शन। 

तुंगनाथ मंदिर की पहली झलक।


तुंगनाथ मंदिर के प्रांगण में पहले से खड़े मेरे बीवी-बच्चें मुझे दूर से आता देख खुशी से हाथ हिला रहे थे। 

तुंगनाथ मंदिर द्वार। 

लो, बाबा मेरी भी हाज़िरी कबूल करो।

मंदिर प्रांगण से नीचे दिख रहा छोटा सा बाज़ार, जिसे लाँघ कर हम ऊपर आए थे। 

और, सामने दिख रही प्रकृति देवी की अनूठी कलाकृति 'हिमालय'

मनमोहक सा हिमालय।

स्वप्नलोक सा हिमालय।

स्वर्ग का रास्ता सा हिमालय। 

संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे ऊँचा शिव मंदिर "तुंगनाथ "(3350मीटर)

दर्शन उपरांत हमारे दोनों बच्चें दो घोड़ों पर वापस चल दिए....

और,  हम दोनों मंदिर से कुछ ऊँचाई पर आ खड़े। 


मंदिर के पीछे से पर्वत शिखर "चन्द्रशिला " की ओर बढ़ा चला जाता रास्ता। 

देखो दोस्तों, चंद क्षणों बाद मौसम ने कैसी करवट बदली और वही रास्ता स्याह सा लगने लगा। 

समुद्र तट से तुंगनाथ मंदिर की ऊँचाई- 3350मीटर।

तुंगनाथ मंदिर और महान हिमालय।

तुंगनाथ मंदिर प्रांगण में पड़ी जल की गागरें। 

और, मंदिर में जलाभिषेक हेतू रखे ताम्रपात्र।

वापसी की डगर पर मौसम की मनमानी सी चल रही थी,  एक पल पहले तो धूप थी और दूसरे पल धुंध से घिर गया गणेश मंदिर।  

गणेश मंदिर की सीढ़ियाँ पर बाँसुरी की तान।

राह में पहली बार देखा गुलाबी बुराश का फूल वो भी अक्तूबर के महीने में ...जबकि बुराश का फूल ज्यादातर गहरे लाल रंग व अप्रैल-मई के महीनों में पेड़ों पर खिलते हैं।

वापसी का सफ़र।

वही खिलखिलाहट बिखेर बुग्याल ने पूछा- " फिर कब आओगे विकास..!!!"

तुंगनाथ बाबा को बाँसुरी सुना रहा मैं...
                      
मेरी साहसिक यात्राओं की चित्रकथाएँ..... 
(1) " श्री खंड महादेव कैलाश की ओर " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(2) " पैदल यात्रा लमडल झील वाय गज पास " यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(3) "चलो, चलते हैं सर्दियों में खीरगंगा "....यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
(4) करेरी झील " मेरे पर्वतारोही बनने की कथा " ......यात्रा वृत्तांत की धारावाहिक चित्रकथा पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें।
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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

"एक गाँव ऐसा, जहाँ घरों की दूसरी मंजिल बनाना वर्जित है..!" (जयंती देवी)


                    मैं चण्डीगढ़ बेशुमार बार गया हूँ...... और चण्डीगढ़  में रहती अपनी छोटी बहनों के साथ, चण्डीगढ़ या आसपास के दर्शनीय स्थलों पर घूमना-फिरना अक्सर ही होता रहता है।
              चण्डीगढ़ के आस-पास बहुत सारे दर्शनीय स्थलों में एक स्थल, चण्डीगढ़ से केवल 14किलोमीटर दूर हिमालय की प्रथम परत शिवालिक की पहाड़ियों की रमणीकता में, 600वर्ष पुरातन मंदिर "जयंती देवी"  एक ऊँचे पहाड़ी शिखर पर स्थित है।  बहुत समय से मन में था कि इस पुरातन मंदिर को जरूर देखना है.. और आखिर मार्च 2016 को यह वह समय भी आ गया, जब मुझे भी सपरिवार मां जयंती देवी का बुलावा ही आ गया।
              चण्डीगढ़ के प्रसिद्ध 17सेक्टर से पीजीआई हस्पताल वाली सड़क पर चलते हुए खुड्डा लाहौरा कस्बे से "जयंती मजारी" गाँव पहुँचकर व्यक्ति को सामने पहाड़ी शिखर पर किले की शक्ल में बना जयंती देवी मंदिर आकर्षित करने लग पड़ता है। सौ-सवा सौ सीढ़ियों पर चढ़ाई जब हमने शुरू ही की थी तो सूर्य देव अपने घोड़े अस्तबल की ओर ले जा रहे थे।  मार्च महीने की हल्की सी सर्दी पर, दिन की जाती हुई धूप की चमकार खूब भा रही थी।    अभी कोई बीस-तीस सीढ़ियाँ ही चढ़ पाए थे कि ऊपर से एक बुजुर्ग अपने लंबे टांहगू (डंडे) का सहारा ले, बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहे थे। उन्हें देख मन में विचार कौंदा तो उन बूढ़े बाबा से मैं पूछ बैठा, " बाबा आप कैसे इतनी सारी सीढ़ियाँ चढ़कर माता के दरबार में जा आये...!"
                तो वह ग्रामीण बुजुर्ग हंसते हुए बोले, " ओ पुत्रा मैं थोडी जानां हां,  मेैनू तांह माता आपे ही लेह जांदी आं..!!"  (बाबा के पंजाबी भाषा में कहें वाक्य का मतलब है कि पुत्र मैं खुद नही जाता, मुझे तो माता अपने आप ले जाती है।) बाबा की यह बात सुन मैंने झट से निष्कर्ष निकाल लिया कि स्थानीय लोगों में जयंती माता के प्रति गहरी आस्था है।
                जैसे ही आधी से ज्यादा सीढ़ियाँ हम चढ़ चुके थे तो उस ऊँचाई से जयंती माजरी गाँव का विहंगम दृश्य दिखना आरंभ हो गया.....तो मेरे बहनोई रमन जी ने मुझे गाँव की तरफ इशारा कर दिखाते हुए कहा, " भाजी,  देखो इस गाँव में क्या खास है..!" मैंने सरसरी सी नज़र मार कर कहा कि ऐसा तो कुछ खास नही, सामान्य गाँवों जैसा ही है यह गाँव है रमन जी..!!
                 रमन जी जो पहले भी जयंती देवी आ चुके थे, सो उस रहस्य को जानते थे..... जो रहस्य इस जयंती मजारी गाँव के बारे में प्रसिद्ध है। सो रमन जी ने हंसते हुए कहा कि इस गाँव की बनावट को ध्यान से देखो, यहाँ सारे मकानों की दूसरी मंजिल नही है....सारे के सारे मकान सिंगल छत के बने हैं..!!!!
                 अब मुझे सारा का सारा गाँव एक खुली किताब सा स्पष्ट दिखाई देने लगा कि हर गरीब-अमीर के छोटे-बड़े मकानों की छतों पर दूसरी छत ही नही है। यानि गाँव के मकान एक अनोखी गाथा समेटें बैठे हैं कि क्यों मकान मालिक पहली मंजिल के ऊपर दूसरी या तीसरी मंजिल नही बनाते।  हालाँकि मैं उस ऊँचाई से यह बात भी देख रहा था कि गाँव में बहुत सारे घर सम्पन्नतापूर्ण भी हैं, पर हैं सिर्फ एकमंजिला। यहाँ तक कि गाँव का गुरुद्वारा साहिब गाँव के मकानों से कुछ ऊँचा तो जरूर है, परन्तु है एकमंजिला ही।  मैंने हैरानी ज़ाहिर कर रमन जी से कहा, " सही कहा आपने... क्योंकि आज की आधुनिक सोच,  समय और जरूरत में अपने घरों को बहुमंजिला न करना खास बात है वैसे पुराने समय गाँवों में बनी धार्मिक जगहों की इमारतों की ऊँचाई से ऊँचा मकान कोई भी गाँव वासी नही बनाता था.... ठाकुरद्वारा के कलश शिखर हो या गुरुद्वारे साहिब के गुम्बद,  हर गाँव वासी सम्मान व आस्था में अपने बहुमंजिला मकान की ऊँचाई उनके बराबर नही होने देता था,  आज भी कुछ जगहों पर ऐसा देखा जा सकता है.... मेेरे शहर गढ़शंकर से केवल 6 किलोमीटर दूर हिमालय की प्रथम परत शिवालिक का पहला गाँव "कोट मैहरा " भी इस पुरातन रीति का उदाहरण है,  वहाँ के सब घर भी एकमंजिला है क्योंकि गाँव में मौजूद सारे धार्मिक स्थल भी एकमंजिला ही हैं.....  परन्तु यहाँ तो ऐसी कोई स्थिति भी नही है क्योंकि जंयती माता का मंदिर तो गाँव से करीब पाँच-छह सौ फुट ऊँची पहाड़ी पर बना है,  फिर भी क्यों लोग अपने घरों की ऊँचाई को मात्र दस-बारह फुट तक ही सीमित कर रखे हैं.....!!!!!"
                 रमन जी ने जवाब दिया कि मैंने भी यही सवाल स्थानीय लोगों से किया था तो उत्तर मिला कि जिस किसी ने भी कभी दूसरी मंजिल बनाने की कोशिश की... तो उसका नुकसान होना शुरू हो गया, सो लोगों ने दूसरी मंजिल बनाने की जुर्रत करनी ही छोड़ दी।
 
                     जैसे-जैसे हम सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे, ऊँचाई हमारी आँखों के समक्ष आस-पास व दूरदराज़ की सुन्दरता को प्रस्तुत किए जा रही थी.... एक तरफ तो दूर-दूर तक बिखरी सी पड़ी शिवालिक की पहाड़ियों का मनमोहक दृश्य और उसमें बांध बनाकर रोके गए बरसाती पानी से बनी सुन्दर जयंती झील.... दूसरी तरफ दूर तक देखते छोटे-छोटे गाँव और उनके खेतों में खड़ी गेहूँ की फसल की हरियाली।  मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते वहाँ घूम रहे मोरों को देख बच्चों का मन भी मयूर सा नाच रहा था।  शिखर पर पहुँचते-पहुँचते साढे छह बज चुके थे...हमारे सामने दिख रहे मैदानों में तो सूर्यास्त हो रहा था और हमारे पीछे शिवालिक की पहाड़ियों में चन्द्रोदय हो चुका था।
               शिखर पर पहुँच मंदिर प्रांगण में कदम रखते ही हमारा स्वागत तेज गति में बह रही हवा ने किया।  हवा इतनी तेज थी कि किले नुमा मंदिर की प्राचिरों और बुर्जों में बंधे लाल झंडों की  फड़फड़ाहट व मंदिर की घंटियों के मिश्रित ध्वनियां एक मंत्रमुग्ध संगीत की लहरें फैला रही थी।  मंदिर परिसर में कदम रखते ही यूँ ही नज़र दीवार पर लिखे  "जय मां कांगड़े वाली"  पंक्ति पर पड़ी,  तो दिमाग में आया कहाँ चण्डीगढ़ और कहाँ हिमाचल प्रदेश का प्राचीन शहर नगरकोट जो अब कांगड़ा नाम से जाना जाता है। कांगड़ा शहर तो माता ब्रजेश्वरी देवी मंदिर व चार हज़ार वर्ष पुराने नगरकोट दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है, क्या यह कांगड़े वाली माता ब्रजेश्वरी का ही स्थान है..... परन्तु इस मंदिर का नाम तो माता जयंती देवी है।
                मेरे दिमाग के स्मरण घोड़े प्रकाश की गति से दौड़ने लग पड़े और दो क्षणों में ही अंधेरे दिमाग में प्रकाश ले आये कि कांगड़े के नगरकोट दुर्ग के पास भी माता जयंती देवी का मंदिर है, जहाँ हर वर्ष  5दिवसीय मेला "पंचभीषम"  लगता है।  मंदिर की दीवार पर माता जयंती देवी का संक्षिप्त इतिहास पढ़ कर मां के दरबार में शीश निभाया।
                 क्या सुन्दर मां जयंती का दरबार, क्या सुन्दर सजावट, स्वर्ण आभूषणों से लदी मां की  पिंडियाँ और देसी घी से जल रही मां की ज्योतें देख मन ठहर सा गया। मेरी पत्नी व बहनें मां के दरबार में दुर्गा सप्तशती के पाठ में मगन हो गई और मैं व रमन जी पुजारी व स्थानीय लोगों से मंदिर के इतिहास व मान्यताओं के बारे में और ज्यादा जानकारियां हासिल करने में व्यस्त हो गए।
     
                  अब इन सब जानकारियों का सार आपको सुनाता हूँ कि कहानी शुरू होती है, 15वीं सदी में जब दिल्ली पर बाबर का राज था और अब यहाँ जयंती माजरी गाँव व मंदिर है, तब यह सम्पूर्ण क्षेत्र " हथनौर"  रियासत नाम से जाना जाता था। हथनौर के हिन्दू राजपूत राजा के 22भाइयों में से एक भाई किसी काम से कांगड़ा गया। तो वहाँ घूमते-घूमाते जब प्यास लगने पर वह एक कुुुएँ पर गया, तो वहाँ उसकी नज़र पत्थर तोड़ने वाले "बटाड़े" जाति की एक अति सुंदर कन्या पर पड़ी, तब वह अपने परिवार के साथ उस कच्चे कुएँ को पक्का करने में अपने मिस्त्री पिता की सहायता कर रही थी। उस लड़की ने ही राजकुमार को कुएँ से पानी निकाल कर पिलाया। वह राजकुमार उस लड़की के सौंदर्य व व्यवहार पर मोहित हो गया, और उसने तभी अपना परिचय उसके पिता के समक्ष रख....विवाह का प्रस्ताव दे डाला। वे सब हैरान-परेशान कि कहाँ हम गरीब पत्थर तोड़ने वाले और कहाँ यह महलों का राजकुमार।
                 दरअसल, वह लड़की कांगड़े के नगरकोट दुर्ग से भी ऊपर स्थित  "मां जयंती देवी"  की अनन्य भक्त थी। प्रतिदिन पर्वत शिखर पर स्थापित मां जयंती देवी के मंदिर दर्शन उपरांत ही वह जल ग्रहण करती थी। हो ना हो यह चमत्कार मां जयंती देवी की कृपा से ही हुआ होगा कि उसकी इस अनन्य भक्त को राजयोग मिले।
                  शादी तय होने पर उस लड़की को अब रात- दिन यह चिंता सताने लगी कि मैं अपनी ईष्ट मां से बिछुड़कर कैसे ससुराल में जी सकूँगी, और उन अनजानों के बीच मुझ गरीब की कौन सुनने वाला होगा!
                   खैर एक रात मां जयंती ने उस लड़की के स्वप्न में आकर कहा, " तुम क्यों व्यर्थ चिंता करती हो,  मैं तुमसे कहाँ बिछुड़ने वाली हूँ... तुम जहाँ भी जाओगी मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगी, तेरी अकेली की डोली कांगड़े से नही जा पाएगी...!!!"                           
                   आखिर विवाह का दिन भी आ गया,  विवाहोपरांत विदाई का समय..... डोली चलने को तैयार,  परन्तु यह क्या डोली उठाने वाले कहार पसीना-पसीना हो गए,  मगर उस लड़की की डोली उनसे उठ क्या टस से मस भी ना हुई...! यह करिश्मा देख हर कोई हैरान-परेशान था,  तो उसने अपने पिता को अपने स्वप्न सम्बंधी बताया, फिर एक अन्य डोली सजवा कर उसमें विधिपूर्वक जयंती मंदिर से मां जयंती को छोटी सी पिंडी रूप में बिठाया.... तो दोनों डोलियां एक साथ उठ गई और कांगड़ा से विदा हो हथनौर आ पहुँची। हथनौर के राजा ने कांगड़ा से विवाह कर लाई नववधु के साथ आई मां जयंती रूपी पिंडी को अपने राज्य की एक पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर बनवाकर स्थापित कर दिया और नववधु पुन: वैसे ही पूजा अर्चना करने लगी, जैसे वह कुंवारी होते हुए अपने मायके में किया करती थी।
                   वह जब तक जीवित रही और उसकी तीन पीढ़ियाँ करीब दौ सौ साल तक मां जयंती की पूजा अर्चना करती रही,  परन्तु आगामी पीढ़ियों ने धीरे-धीरे मां जयंती को भुला दिया...अहंकार में यह कहते हुए की माता तो हमारी बहू के साथ डोली में आई थी और हम उसे विवाह कर लाए थे, हम उसके आगे सिर नही झुकायेगें।
                     मां जयंती देवी का वो छोटा सा मंदिर अब वीरान हो चुका था। मां जयंती देवी इस पर क्रोधित हो उठी और अपने एक परम भक्त डाकू गरीबू  (जो तब आज के चण्डीगढ़ से सटा मनीमाजरा शहर जब जंगल हुआ करता था, में रहता था)  के सपने में आकर उसे आदेश दिया कि हथनौर रियासत के सर्वनाश का समय आ गया है, रियासत के शासक अपनी ऐश-प्रस्ती और अहंकार में मुझे अपमानित कर रहे हैं...तू हथनौर पर हमला कर और उन कुपूतों का नाश कर हथनौर का राजा बन राज कर...!!
                    गरीबू डाकू ने जब अपने संगी-साथी इकट्ठे कर हथनौर पर चढ़ाई कर दी तो चमत्कारिक ढंग से हथनौर किले के अंदर जगह-जगह खुद-ब-खुद आग लग गई। जो लोग आग से बचने के लिए किले से बाहर आते रहे उन्हें गरीबू डाकू के आदमी मौत के घाट उतारते रहे। रियासत में कोई भी मां जयंती के प्रकोप से बच ना पाया, केवल वही बच पाए जो उस समय हथनौर से बाहर थे या समय रहते हथनौर से भाग गए थे। सारे का सारा हथनौर नेस्नाबूत हो चुका था.... बचा क्या बस एक शिव मंदिर जो आज भी जयंती माजरी गांव की आबादी से बाहर है और दूसरा मां जयंती का मंदिर।
                        पूरे क्षेत्र पर गरीबू डाकू का नियंत्रण हो चुका था और उसके हाथ जो भी लूट का पैसा-जेवर लगा,  उससे उसने मां जयंती देवी मंदिर से पाँच किलोमीटर दूर एक नया गढ़ बसाया "मुल्लापुर गरीबदास"  जो चण्डीगढ़ से केवल दस किलोमीटर की दूरी पर है। मां की कृपा से गरीबू डाकू से राजा बने गरीबदास ने पहाड़ी पर बने मां जयंती देवी के छोटे से मंदिर के स्थान पर ही करीब चार सौ साल पहले किले नुमा इस बड़े मंदिर का निर्माण करवाया।
                      जयंती देवी मंदिर का पुजारी भी कांगड़े से ही मां की पिंडी के साथ ही आया था,  आज उसकी 10वीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है। मैंने पुजारी से जयंती माजरी गाँव के एकमंजिला मकानों के विषय में पूछा, " क्या यह मां जयंती का श्राप है कि गाँव का कोई भी घर बहुमंजिला नही हो सकता..!!!"
                        पंडित जी बोले कि यहाँ अकेले जयंती माजरी गाँव में एकमंजिला नही, बल्कि इस क्षेत्र के पाँचों गांवों में कोई भी मकान दो मंजिला नही है....माँ के श्राप से हथनौर रियासत का नामोनिशान भी नही रहा, कालांतर में लोग पुन: आ कर यहाँ बसने लगे और जिस किसी ने भी अपने मकान की दूसरी मंजिल बनानी चाहिए वह बन नही पाई... उसका कोई ना कोई नुकसान हो गया,  सो लोगों ने इस संयोग को मान दूसरी मंजिल बनाने ही छोड़ दी.... अभी कुछ समय पहले ही गाँव में सरकारी स्कूल बन रहा था, प्रशासन उसे दोमंजिला बनाना चाहता था परन्तु दूसरी मंजिल शुरू करते ही निर्माण कार्य में लगे एक व्यक्ति को करंट लग गया, ठेकेदारों के नुकसान पर नुकसान होने लगे तो आखिर उन्होंने भी हार मानकर स्कूल को एकमंजिला ही बनाया। चंद वर्ष पहले भी गाँव वालों ने देवी से दूसरी मंजिल डालने के संबंध में प्रश्न डाला था,  ग्यारह दिनों तक विधिवत पाठ-पूजा की गई,  फिर कन्या पूजन के उपरांत एक नन्ही कन्या से हां या नही की दो गुप्त पर्चियों में से एक उठवाई गई...... परन्तु जब पर्ची खोली गई तो मां का उत्तर  "नही"  ही निकला।  अपने मकानों को एकमंजिला रखना मां जयंती का श्राप कहो या वरदान,  परन्तु गाँव वासी बढ़-फूल रहे हैं देवी की कृपा इन सब पर बनी हुई है,  अब तो गाँव वाले मकानों की छतों से बच्चों को नीचे गिरने से बचाने लिए बनेंरे (रेलिंग) भी लगाने लगे हैं... जब कि पहले मकानों के बनेंरे भी नही बनाए जाते थे।

                         सूर्यास्त की लालिमा को धीरे-धीरे कर अंधेरा पीता जा रहा था, सात बजने को थे और हमारा लाम-लश्कर जयंती मंदिर पर माथा टेक सीढ़ियाँ उतरता जा रहा था....सीढ़ियाँ उतरते- उतरते मुझे दो स्थानीय नवयुवक मिल गए जो अब मेरे प्रश्नों का शिकार होने वाले थे।   मैंने उन नवयुवकों से पूछा, " भाई अब तो ज़माना बदल रहा है, सोच बदल रही है...आप लोग बताओ कि क्या अब भी आप लोग मकानों की दूसरी मंजिल नहीं बनाना चाहते..!!"       तब नवयुवकों का संयुक्त सा जवाब था कि समय व सोच तो आधुनिक हो रही है परन्तु पुरातन धारणाएँ हम सब के दिमागों में हावी है, चाहे हम अपने घरों में जगह की तंगी झेल रहे हैं क्योंकि हमारे परिवार बड़े होते जा रहे हैं... परन्तु हम फिर भी अपने घरों के ऊपर दूसरी मंजिल नही बनाते,   बस अब तो गाँव फैल रहा है लोगों ने खेतों में भी अपने एकमंजिला मकान बनाने शुरू कर दिए हैं,  चण्डीगढ़ जैसे चकाचौंध वाले आधुनिक शहर के इतने करीब होने पर भी हमारा गाँव पिछड़े का पिछड़ा ही है....गाँव से आने- जाने के लिए केवल एक ही बस आती-जाती थी जिसको भी अब सरकार ने बंद कर दिया है....बहुत लोग अपने-अपने साधनों पर माता जयंती माता माथा टेकने पहुँचते हैं, परन्तु उन्हें ले कर आने वाली सड़क पिछले कई वर्षों से टूटी हुई है....सफेद कपड़ों वाले चुनाव में वादे तो कर जाते हैं परन्तु शायद वह माता जयंती से नही डरते....!!!!!
               
                        सीढ़ियाँ उतर हम गाड़ी ले उस प्राचीन शिव मंदिर में जा पहुँचे....क्योंकि माता जयंती के दर्शनों के बाद इस प्राचीन शिवलिंग के दर्शन करने से ही यात्रा सफल मानी जाती है और इसी शिव मंदिर के अलावा पूरी की पूरी हथनौर रियासत विध्वंस हो गई थी और आज भी इस मंदिर के आस-पास कोई आबादी नही है।
                       काले हो चुके आसमान पर अब चाँद चमक रहा था और सड़क को मेरी गाड़ी की हेडलाइट चमका रही थी।  गाड़ी चलाते हुए मेरे दिमाग में सोच चल रही थी कि माता जयंती के प्रकोप से उजड़ चुके हथनौर में जब दोबारा आकर लोगों ने मां के श्राप से डरते हुए अपने घरोदों को पुन:  बनाना शुरू किया होगा तो बस सिर छिपाने हेतु ही छत डाली होगी.... और वही सिर छिपाने वाली छतें आज भी जयंती माजरी गाँव में है।

जंयती माजरी गाँव पहुँच कर, सामने दिख रहे पहाड़ी शिखर पर स्थित जयंती माता मंदिर आकर्षित करने लग पड़ता है। 

जंयती माता मंदिर का मुख्य द्वार व सीढ़ियाँ। 

जैसे-जैसे हम जयंती माता मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे,  ऊँचाई हमारी आँखों के समक्ष आस-पास व दूरदराज़ की सुन्दरता प्रस्तुत किये जा रही थी। 

एक ओर तो गेहूँ के हरे-भरे खेतों में सूर्यास्त हो रहा था....

और..... दूसरी ओर बिखरी सी पड़ी शिवालिक की पहाड़ियों में चन्द्रोदय हो चुका था। 

जयंती माता का किले नुमा मंदिर। 

माँ जयंती मंदिर प्रांगण। 

क्या खूब सजावट मां जयंती मंदिर की। 

क्या भव्य दरबार माता रानी का। 

मां दी आं सोहनीआं ज्योतें।


जंयती देवी मंदिर से दिखाई देता जयंती डैम।

जयंती माता मंदिर से नज़र आता जयंती माजरी गाँव,  यहाँ सभी मकान एकमंजिला है। 

जयंती देवी मंदिर के बुर्जों में खड़ा हमारा लाम- लश्कर। 


अंधेरा होने को था... और हम मंदिर माथा टेक वापस उतर रहे थे। 

जयंती माजरी गाँव से बाहर बना प्राचीन शिव मंदिर,  मान्यता है कि जयंती माता के दर्शनोपरांत यहाँ दर्शन करने से ही यात्रा सफल मानी जाती है। 

अंधेरे में शिव मंदिर से नज़र आ रहा माँ जयंती का मंदिर। 

गूगल नक्शे से प्राप्त जयंती माता क्षेत्र का चित्र.... बेहद रमणीक स्थान,  शिवालिक की पहाड़ियों में स्थापित माँ जयंती मंदिर व जयंती झील और पहाड़ियों के सामने मैदानों में बसे गाँव व उनके खेत-खलिहान।

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