रविवार, 11 जून 2017

भाग-8 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-8 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....
                                     " वो धुँऐ भरी रात "

                                                 श्री खंड महादेव यात्रा में तीन लोगों की मौत की खबर सुना, उन लड़को ने हमारे मन में भी अचानक से एक डर पैदा कर दिया.... जूना अखाड़ा लंगर बराहटी नाले के तम्बू के साथ बह रही कुरपन नदी का शोर अब एकाएक डरावना सा लगने लगा,  हमारे तम्बू में पसरी ख़ामोशी तब टूटी... जब चार-पांच यात्री एक दम से तम्बू के भीतर अा खड़े हुए,  वे सब श्री खंड से वापस आ रहे थे और उनके बैठते ही निश्चित तौर पर हमारा उनसे सब से पहला सवाल उन तीन मौतों के विषय में ही होना था,  तो उन्होंने कहा, " हां जी यह खबर बिल्कुल सही है... ऊपर तीन व्यक्तियों की मौत हो चुकी है,  जालन्धर वाला लड़का तो बहुत जवान है जिसकी लाश ऊपर जंगल में ही पड़ी है,  ऊपर से नीचे तक लाश को ले कर आना भी बहुत मुश्किल व ख़र्चीला काम है..सुना है कि हजारों रुपये लग जाते है ऊपर से नीचे सड़क तक लाश को पहुंचाने में.... यह सब भोले नाथ की ही माया है, उसकी वो ही जानें... हम क्या है उसके आगे...!!! "
                        उस व्यक्ति की यही आख़िरी पंक्ति हमारे मुनष्य मन को समझाने के लिए काफी मानी जाती है,  सो मैने विशाल रतन जी से कहा कि, " ये कोई आम यात्रा नही है.. अत्यंत कठोर परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ सकता है हमें..! "  तो विशाल जी ने कहा, " हाँ मुझे भी आभास हो चुका है कि यह यात्रा जल्दबाजी की नही, संयम व ठंडे दिमाग से करने वाली यात्रा है...इसलिए हम कल सुबह जितनी जल्दी हो सके,  इसे शुरू कर देंगे...! "
                         तम्बू में अब धूआँ भरना शुरू हो चुका था,  क्योंकि उन लौटते हुए यात्रियों की थकान,  शायद सिगरेट पर सिगरेट पीने से उतर रही थी.... सो ताज़ी साँस लेने के लिए हम दोनों तम्बू से निकल, लंगर की तरफ आ गए..
                          रात के 8बज चुके थे,  सो भोजन कर हम जल्दी ही सो जाना चाहते थे, तांकि सुबह जल्दी से अपनी यात्रा को पुन: आरम्भ कर सके...... परन्तु लंगर प्रबंधक ने हमे कहा कि पहले साधुओं का भोजन है, तत्पश्चात् साधारण लोगों के लिए..... मैं झट से समझ गया कि यह साधु-अखाड़ों की रीत है, सो हम साधारण जन अपनी बारी की प्रतीक्षा में इधर-उधर घूमने लगे.....
                           दोस्तों,  एक बात और बताना चाहता हूँ कि प्राचीन काल में ऐसी कठिन पर्वतीय तीर्थ यात्राएँ अधिकतर साधु ही किया करते थे, हम साधारण मनुष्यों में न पहले इतना निष्ठावान ठहराव रहा होगा और न अब.. हम लोग तो ज्यादातर ऐसी जगहों पर मुँह उठा कर केवल पिकनिक मानने चल देते हैं,  जिस का भीषण परिणाम है ये तीन मौतें.... और एक बात हम सामान्य जन बगैर किसी तैयारी के अपने-आप को आस्था के नाम पर इन कठिन डगरों पर अग्रसर कर देते है,  जो कभी-कभार बदकिस्मती से "आत्महत्या" भी साबित हो जाती है....!!
                           दोस्तों, मेरी बात कड़वी लग रही है न...परन्तु यही सच्चाई है  कि जो व्यक्ति कभी अपने गाँव-शहर में दस कदम पैदल चलने से भी परहेज करता हो,  वो एकाएक अमरनाथ यात्रा को चल दे... तो उसकी यात्रा के दौरान क्या स्थिति होगी,  अाप बखूबी समझ चुके हो....!
                            खैर, सब साधु-महात्मा गण भोजन ग्रहण कर चुके थे...सो हमें भी वहीं बैठा कर लंगर परोसा गया.. माँह-छोले की काली दाल, (जिसे हर पंजाबी हर रोज़ खा सकता है... ठीक वैसे, जैसे हर दक्षिण भारतीय हर रोज़ अरहर की दाल खा सकता है) के साथ चावल,  रोटी, कद्दू की सब्जी,  आचार.... एक सम्पूर्ण आहार जिसकी हर थके हुए यात्रि की अति आवश्यकता थी.... कि इस सम्पूर्ण व स्वादिष्ट आहार को खा कर हमारा शरीर रात की नींद में अपनी थकी-टूटी हुई कोशिकाओं की मरम्मत कर उन्हें कल की यात्रा के लिए नव संचारित कर दे.......
                           भोजन करने के पश्चात् हम दोनों बाबा अशोक गिरि जी के पास उनके धूने पर जा बैठे, परन्तु बाबा जी ने हम साधारण जनों में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई... वे अपनी श्रेणी के साधु-महात्माओं के संग ही बतियाने में मस्त थे....सो हमने धूने पर यथासम्भव राशि चढ़ा कर माथा टेका और बाबा जी का धन्यवाद कर अपने तम्बू की ओर कदम बढ़ा दिये.... यदि बाबा अशोक गिरि जी हम में भी थोड़ी सी दिलचस्पी दिखाते तो यह कथा और भी लम्बी हो जानी थी,  क्योंकि मेरे पास सवालों की कमी नही होती........ यही सोचते हुए जब तम्बू में कदम रखा,  तो सारा तम्बू ही यात्रियों से भर चुका था, केवल हमारे "कब्जे वाली" ही जगह खाली थी..... तम्बू में करीब हम सब पंद्रह जन थे, परन्तु उनमें से ज्यादातर लोग धूम्रपान करने वाले ही थे... धूँए का प्रकोप तम्बू में जल रहे बल्ब की रोशनी पर भी भारी पड़ रहा था,  पर किस से कहें और क्यों कहें,  कौन हमारी बात सुनेगा....क्योंकि हम अनजान जगह और अनजान लोगों के बीच थे,  सो मन मार कर अपने-आप को हालात के हवाले ही करना मुनासिब जाना....और उन नये आये यात्रियों द्वारा कुछ-कुछ कम की हुई हमारी कब्जे वाली जगह पर हम जैसे-तैसे लेट गए ......और सोने से पहले तय हुआ कि सुबह चार बजे का अलार्म लगा कर उठना है.....
                            कुछ ही देर बाद जेनरेटर बंद कर दिया गया और हर तरफ का रंग स्याह हो गया,  उस स्याह रंग की खामोशी को तीन तरह की आवाज़ें निरंतर तोड़ रही थी....मेरे भीतर की शंखनाद ध्वनि, बाहर कुरपन नदी से उठ रही जलतंरगी ध्वनि और इन दोनों मधुर ध्वनियों की संगीतमय युगलबंदी को बेसुरा करती तम्बू में हमारे संग लेटे हुए धूम्रपानियों की खाँसी......लेटते ही मेरे चेतन व अवचेतन मन की कुछ वार्ता चली और मेरी आँखों की पलकें भारी हो गई................. करीब आधे घंटे बाद अर्ध सोई अवस्था में मेरे अवचेतन मन में मुझे महसूस हुआ कि मेरा दम घुट रहा है....और चेतन मन ने झट से शरीर में चेतना जगा, मुझे एक झटके से उठ कर बिठा दिया... मेरे उठते ही विशाल जी भी मेरी तरह से, मेरे साथ ही उठ गए और उन्होंने भी वही बात दोहराई,  कि मेरा भी सोते हुए दम घुटा........कारण समुद्र तट से 2175मीटर की ऊँचाई और बंद तम्बू में धूम्रपान की क्रूरता.......... खैर कुछ देर बैठ,  हम दोनों ने फिर से अपने-आप को हालात के हवाले कर दिया और थके हुए तन-मन पर आखिर नींद का साया भारी पड़ा...... या यूँ कहें कि "सूटे" के मादक धूँए ने अप्रत्यक्ष रुप में हमें नींद में मदहोश कर दिया......!!
                             चार बजे के अलार्म ने हमारी निद्रा तोड़ी और अपने स्लीपिंग बैग व बाकी सामान को पैक कर चुपके से तम्बू में सोये हुए लोगों के ऊपर से गुजर कर बाहर आ गए.... नित्यकर्म में आधा घंटा लगा,  साढ़े चार बजे अंधेरे में हमारी रक्सकों पर बंधी घंटियाँ पुन: बजनी शुरू हो गई.... हम दोनों अकेले ही टार्च की सहायता से नदी के साथ-साथ चलने लगे, पंद्रह मिनटों के बाद हम कुरपन नदी पर बने पुल के ऊपर खड़े थे, यहाँ दो नालों का संगम है जिसे "बराहटी" नाम से जाना जाता है.....और उस पुल पर खड़े अंधेरे में हमे सिर्फ पानी की चीत्कार ही सुनाई पड़ रही थी.....दोस्तों इस स्थान पर बरास या बुराश के पेड़ों की भरमार है, जिस पर बेहद हसीन लाल रंग के फूल खिलतें है... जो मुझे बेहद पंसद है,  इसलिए इस जगह का नाम बराहटी पड़ गया.......
                               पुल पार करते ही "गीरचाडू देवता".का मंदिर था... और उसके सामने एक तम्बू लगा रखा था, जिसमें भी कुछ लोग सो रहे थे... मैने विशाल जी से कहा कि "यहाँ भी यह, एक छोटा सा लंगर लगा लगता है "  चार कदम आगे बढ़ने पर पता चल गया कि अब "डांडा की धार" शुरू हो गई है, इस पदयात्रा की पहली आठ किलोमीटर लम्बी चढ़ाई जो अपने नाम के ही अनुरुप ही "डण्डा रुपी" चढ़ाई है... मतलब सीधे खड़े डण्डे पर चढ़ना,  धारणा यह है कि जो यात्री इस पहली अत्यंत कठिन डण्डे रुपी चढ़ाई को चढ़ गया....वो श्री खंड यात्रा के लिए मान्य है,  यह चढ़ाई ही श्री खंड महादेव पदयात्री की पहली "अग्नि परीक्षा" है, जिसमें उत्तीर्ण हो वह यात्रा के अगले कठिन पड़ावों की ओर बढ़ता है.............

                                                        ...............................(क्रमश:)
 
               
                 
                         
           
लंगर में लगा.... यात्रा की दूरियाँ सम्बन्धी विवरण 
बरहाटी नाला लंगर में किया.... वो स्वादिष्ट रात्रि भोजन 

बाबा अशोक गिरि जी......जूना अखाड़ा बरहाटी नाला लंगर प्रबंधक 

सुबह साढे चार बजे हम दोनों जूना अखाड़ा लंगर से आगे की ओर चल दिये..... और कुरपन नदी पर बने पुल पर उस समय अंधेरे में सिर्फ़ हमे पानी की भीषण चीत्कार ही सुनाई दे पा रही थी... 

बरहाटी नाले पर लगा यात्रा सम्बन्धी बोर्ड..... 

गीरचाडू देवता मंदिर,  बरहाटी नाला 



बरहाटी नाले के चार कदम चलने पर ही चढ़ाई शुरू हो गई.....
श्री खंड कैलाश महादेव पदयात्रा की प्रथम अग्नि परीक्षा "डांडा की धार" की चढ़ाई..... 

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