रविवार, 13 अगस्त 2017

भाग-17 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-17 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर..... 
                                                 " काल रुपी सांड "  

इस चित्रकथा को आरंभ से पढ़ने का यंत्र (https://vikasnarda.blogspot.in/2017/04/1-shrikhand-mahadev-yatra5227mt.html?) स्पर्श करें। 
                                   
                                      22जुलाई 2016........सुबह के दस बज चुके थे,  मैं और विशाल रतन जी भीम तलाई से ठाकुरकोट पास को पार कर गागनी पास से होते हुए "कुंशा" की ओर बढ़ रहे थे.... प्राकृतिक सुंदरता से धनवान उस पथ पर हम भौंचक्कें से कदम पर कदम बढ़ाये जा रहे थे,  पथ की दोनों ओर "वुशी" के जहरीलें परन्तु बेहद हसीन फूल विषकन्या की भाँति अपना आकर्षण हम पर छोड़ रहे थे... 
समुद्र तट से करीब 3500मीटर की उस ऊँचाई पर हर तरफ व हर किस्म के पौधे पर फूलों की बहार छाई पड़ी थी...कहीं दुल्हन के जोड़े सा सुर्ख लाल रंगी फूल,  तो कहीं बंसत की बहार जैसा पीला फूल,  तो कहीं नीलम जैसे रत्नों सी आभा बिखेरतें नीले व जामुनी पुष्प...... और दोस्तों हर तरफ सफेद धुंध छाई होने की वजह से इन पुष्पों की पुष्पांजलि ऐसी दिखाई दे रही थी कि मानो किसी चित्रकार ने एक बहुत बड़ी सफेद पृष्ठभूमि के मध्य एक छोटी सी रंग-बिरंगी चित्रकारी कर दी हो.... बेहद यादगारी दृश्य थे वो दोस्तों..... 
                             रास्ता तो वही चढ़ाव का ही था, चढ़ते-चढ़ते रास्ते की एक तरफ दीवार सा खड़ा एक बड़ा का पत्थर आया और मैं व विशाल जी उस खड़े पत्थर की टेक लगा कर खड़े-खड़े ही विश्राम करने लगे,  तो थकान से हमारी आँखें बंद हो रही थी...सो एक-दो मिनट की अल्प निद्रा ने हमे आ घेरा, निद्रा टूटते ही हम फिर से ऊपर की ओर चढ़ने लगे...ऊपर से एक सज्जन उतर रहे थे जिनके हाथ की लाठी एक विशेष किस्म के बाँस की थी,  सो लाठी देख पूछ बैठा कि यह बाँस तो हमारे यहाँ के किसी भी इलाके का नही है क्योंकि इसकी गांठें गोलाईदार है.... तो वो सज्जन हंसते हुए बोले मैं बंगाल से आया हूँ भाई..... 
                             हर तरफ छाई हुई धुंध मुझे निराश भी कर रही थी क्योंकि इस की वजह से ना तो पर्वतों की ऊँचाई दिख रही थी और ना ही गहराई.... खैर बीस-तीस कदम जो भी दिख रहा था, वो नज़ारा ही बेहद संतुष्ट कर रहा था... कुछ आगे चले तो एक झरने ने हमारा राह रोक लिया और कहने लगा, " क्या मेरे संग फोटो नही खिंचवाओगें जनाब...!" 
दस मिनट चलते रहने के बाद एक मोड़ मुड़े तो सामने इस यात्रा का पहला ग्लेशियर दिखाई दिया,  वो "कुंशा नाला" था... पर्वत की ऊँचाई से गिरता जल उस ग्लेशियर को भेदता हुआ नीचे की ओर आ रहा था..... गर्मियों के मौसम में मैदानी इलाकों की प्रचण्ड गर्मी को झेलता हुआ जब कोई व्यक्ति पहाड की ऊँचाई पर पड़ी बर्फ तक पहुंच जाए... वो पल उसे बेहद आनंदित करते हैं..... मेरे और विशाल जी के साथ ऐसा ही हो रहा था, हम क्या हमारे जैसे और कई जन उस ग्लेशियर पर बेहद आनंदित हो रहे थे.... खैर अपने मन की चंचलता को काबू में कर आगे का रुख किया......!!
                            गज़ब की हरियाली और रास्ते पर हम,  रास्ता कहीं अच्छा तो कहीं है ही नही.... कहीं दोनों कदम अच्छे से पड़ जाते,  तो कहीं अगला कदम रखने की जगह ही नही मिल पा रही थी... परन्तु इन सब कठिनाइयों पर प्राकृतिक सौम्यता भारी पड़ रही थी....और आगे देखने की चाह मेरे कदमों को मानो खींच सी रही हो,  फिर रास्ते में एक तरफ शेषनाग के फन की आकृति वाला प्राकृतिक पत्थर रखा देख, हम दोनों खड़े हो गए और उस नाग फन से पत्थर पर फूल-पत्ते भी यात्रियों द्वारा चढायें हुए देख कर सोचा कि शायद यह जगह शेषनाग से सम्बन्धित हो....!
                              जैसे-जैसे हम "कुंशा" नामक स्थान की ओर बढ़ रहे थे, पहाडों पर अब हरी-हरी घास के ऊंचे-नीचे मैदान नज़र आने शुरू हो रहे थे.... चलते-चलते फिर से हमारे कदम शिमला वाले हंसमुख कानूनगो साहिब त्रिभुवन शर्मा जी से जा मिले... और एक दूसरे से बातचीत करते हुए अब हम साथ-साथ ही चल रहे थे,  एक जगह कुछ विश्राम के लिए हम सब इक्ट्ठा बैठ गए........तो मैने त्रिभुवन जी से पूछ लिया कि आप कितनी बार पहले भी श्री खंड आए है,  तो वे बोले, " दो बार,  अब तीसरी बार जा रहा हूँ अपनी माँ के लिए.....!! "              और कहते-कहते त्रिभुवन शर्मा जी भावुक हो कर बोले कि मेरी माँ का देहांत हुए करीब एक साल होने को आया.... वे बीमार चल रही थी परन्तु मैं उन्हें बचा नही पाया, इस भार को साथ ले जी रहा हूँ...तो मेरी धर्मपत्नी बोली कि आप एक बार फिर से श्री खंड जा कर माँ की आत्मा की शांति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना कर के आओ,  ऐसा करने से आपके व्याकुल मन को भी शांति प्राप्त होगी.... और ये कह कर त्रिभुवन शर्मा जी फूट-फूट कर रोने लगे व मुझ अति भावुक व्यक्ति को भी अपने संग रुला लिया,  परन्तु मैने अपने आँसू छिपा लिये...... और चंद क्षण अपने-आप को थामने के उपरांत मैने त्रिभुवन जी को ढांढस बधानें के लिए अपने पिता डाक्टर कृष्ण गोपाल नारदा जी की आप बीती सुनानी मुनासिब जानी.........
                                वो आप बीती जो अकसर हम बचपन से ही उनके मुख से सुनते आ रहे हैं कि उनके बड़े भाई यानि मेरे ताया जी डाक्टर रवि दत्त नारदा (पी. एच. डी) .....सन् 1971 में मरणासन्न पड़े थे,  वे पंजाब में ही लुधियाना कृषि युनिवर्सिटी में प्राध्यपक के पद पर कार्यरत थे और कैंसर पर उनकी शोध चल रही थी कि रेडियो ऐक्टिव किरणों के प्रभाव में आने के कारण उनको ही कैंसर जैसी बेइलाज बीमारी ने आ घेरा..... चण्डीगढ़ के पी. जी. आई हास्पिटल में भरती थे.... और मेरे पिता जी भी उनकी देखभाल के लिए वहीं हास्पिटल में थे... तो उस रात जब मेरे पिता अपने सहपाठी मित्र डाक्टर अमीर अब्बास जैयदी जो सहारनपुर से मेरे ताया जी का हाल जानने आए थे,  के संग हास्पिटल में ही अपने ईष्ट भगवान शिव से प्रार्थना करते-करते कुछ समय के लिए सो गए..... तो अर्धनिद्रा के अवचेतन मन में भी मेरे पिता जी भगवान शिव से निरंतर प्रार्थना कर रहे थे कि आप तो मौत के देवता है शिव जी,  मेरे बड़े भाई की जान बख्श दें.. जान बख्श दें....जान बख्श दें....!!
                                कि तभी कमरे में एकाएक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ... और उस प्रकाश पुंज में उन्हें भगवान शिव के दर्शन हुए......मेरे पिता जी के अनुसार, मैं स्वप्न में ही अपने शरीर को छोड़ भगवान शिव के चरणों में पड़ गया कि हे प्रभु मेरे भाई को बचा लो.... तो भगवान शिव ने मुझे कहा कि तुम उस खिड़की से नीचे की ओर देखो..... तो मैं देखता हूँ कि नीचे हास्पिटल नही, एक भरा-पूरा बाज़ार है और लोग इधर-उधर भाग रहे हैं.... एक " सांड " उन लोगों में से किसी-किसी को टक्कर मार रहा था,  जिसे वे टक्कर मार रहा था वह मर रहा था.... तो भगवान शिव बोले, " यह ही काल है.. इसकी टक्कर से कोई नही बच सकता, जिन- जिन का समय नजदीक आ रहा है वे खुद-व-खुद इस काल रुपी सांड के सामने खिंचे चले आ रहे हैं......!!! "
                                मेरे पिता जी फिर से भगवान शिव के आगे गिड़गड़ाएे कि यह तो बता दो भगवन... कि मेरे भाई की कितनी साँसें शेष है........ तो भगवान शिव बोले, " आओ मेरे साथ "......और मैं भी भगवान शिव पीछे-पीछे उड़ चला,  आकाश में एक महल के कई सारे गलियारों को पार करने के पश्चात भगवान शिव ने मुझे चित्रगुप्त को सौंप दिया और उन्हें आदेश दे आलोप हो गए.....चित्रगुप्त ने मेरे भाई की जीवन-वही खोली और कहा कि बस आज की रात ही तेरे भाई की आखिरी रात है,  कल दो पहर से पहले ही उसकी जीवन लीला समाप्त है................. और मेरे पिता जी को नींद में बचैंनी से बुडबडातें हुए देख उनके मित्र ने जगाया.... और मेरे पिता जी झटके से उठ बैठे,  परन्तु ठीक वैसे ही हुआ त्रिभुवन जी.... मेरे ताया जी अगले दिन दोपहर से पहले 11बजे के करीब अपना दम तोड़ गये......!!!
                                "इस मृत्यु पर  हम मनुष्य कभी भी पूर्णतया विजय नही पा सकते त्रिभुवन जी,  मैडिकल साईस की बदौलत इस मृत्यु को कुछ समय तो टाला जा सकता है... परन्तु मृत्यु को सदा रोकना असत्य है,  इस सत्य का हर किसी के जीवन में घटित होना ही अंतिम सत्य है.... इसलिए आप अपने मन पर अपनी माता जी की मृत्यु का भार मत ले,  ये व्यर्थ का भार उठा आप अपने को भी ही परेशान कर रहे हो त्रिभुवन जी...!! "
                                  मेरी बातें सुन त्रिभुवन जी बोले कि आप से वार्तालाप कर मेरा मन बेहद हल्का है... कह कर त्रिभुवन शर्मा जी अपने साथियों के साथ फिर से यात्रा-पथ पर अग्रसर हो चले और मैं व विशाल जी वहीं पत्थरों पर बैठे रहे....और शायद हम दोनों एक सी ही बात सोच रहे थे कि इस यात्रा पर हर कोई एक कहानी बन चला जा रहा है, चला जा रहा है... चला जा रहा है.....चला जा रहा है...!!!!

                                                          ......................................(क्रमश:)
विषकन्या सा आर्कषक.... "वुशी" का जहरीला फूल 

दुल्हन के जोड़े सा सुर्ख लाल फूल.... 



नीलम रत्न सी आभा बिखेरतें....पुष्प 


दोस्तो, मेरा मानना है कि हमारे बुजुर्गो ने "सुंदर" शब्द की उत्पत्ति फूलो को देख कर की होगी....!!

तीखी चढ़ाईयाँ..... 

और, इन तीखी चढ़ाईयों को चढ़ने की थकान से हम उस पत्थर पर खड़े-खड़े टेक लगा कर अल्प निद्रा अवस्था में पहुँच गए... 

चंद क्षणों की अल्प निद्रा भी मुझे तरो ताजा कर जाती है,  दोस्तों... 

वुशी का फूल और पत्थर..... 

मैं बंगाल से आया हूँ भाई..... 

मैं ऐसा ही बहता हुआ जल पीता जा रहा था.... 

धुंध का प्रकोप..... बस कुछ दूर तक ही दर्शनीय था.... 

हमारा रास्ता रोक यह झरना बोला... क्या मेरे साथ फोटो नही खिंचवाओगें जनाब जी 

यात्रा की प्रथम बर्फ.....कुशां नाला ग्लेशियर 




कुंशा नाले पर हम दोनों.... 

इस यात्रा की पहली बर्फ पर स्पर्श.... 



हमने अपनी चंचलता पर काबू रखा, नही तो वहाँ कई लोग खूब आनंद मंगल हो रहे थे.... 

कुंशा नाला.... और विशाल रतन जी 

पर्वत राज..... वाह तेरी सुडोलता 

कुछ नाराज़ से रास्ते...!!! 

पर्वत राज पर मोहित... मैं या ये बादल 

रास्ते में कई जगह तो बस एक ही मौका मिलता है... आगे कदम बढ़ाने का,  जरा सी असावधानी और नतीजा दूसरों को सावधान कर जाता है, दोस्तों 

अरे, वो देखो.....भीम तलाई, जहाँ से हम चले आ रहे है 

रास्ते का एक रंग ऐसा भी......


फन फैलाए शेषनाग की आकृति वाला पत्थर..... 

 पहाड़ की ऊँचाइयों पर प्राकृतिक रुप में बने हरी घास के मैदान..... 

पर्वत राज का चेहरा.........उस पत्थर को ध्यान से देखो, दोस्तों... 

लो, यात्रा पथ पर हमारे कदम फिर से हंसते-मस्कुरातें कानूनगो साहिब त्रिभुवन शर्मा जी से जा मिले.... 

आपसी वार्तालाप के समय का चित्र,  त्रिभुवन जी की आँखें नम है... जबकि मैने अपने आँसू छिपा लिये... 
                                                    ( अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ स्पर्श करें )

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया यात्रा स्मरण
    मृत्यु को तो कोई नही टाल सकता जो पैदा होता है उसे एक दिन जाना ही है समय की गति से कोई न जीत सका ऐसा ही वाक्या मेरे साथ भी हुआ है हम लोग कुछ नही कर सकते बेबस और लाचार हो जाते है और समय रूपी काल सब कुछ समेट लेता है

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    1. बिल्कुल सही कहा...लोकेन्द्र जी, समय रुपी काल सब कुछ समेट लेता है... और हम बेबस व लाचार खड़े रह जाते हैं....

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  2. रोमांचक। रौशन वशिष्ठ

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  3. चढाई ही भयंकर हो तो उसे चढते ही कुछ पल साँस लेने को रुकना ही पडता है।

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    1. जी हां संदीप जी, सही कहा जी आपने...यदि ऊपर से आप समुद्र तट से 3800मीटर ऊपर की चढ़ाई चढ़ रहे हो, तो वातावरण में आक्सीजन का दबाव भी कम होने से कुछ चलने से ही साँस फूलने लग जाती है और बढ़ चुकी ह्रदय गति को जरा रुक कर साँस लेते हुए सामान्य कर आगे बढ़ना पड़ता है....... जी

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  4. मृत्यु अटल है....झरने ने रास्ता रोक कर पूछा वाला वाक्य बहुत पसंद आया..बढ़िया पोस्ट

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  5. बहुत शुक्रिया..... प्रतीक जी

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  6. "वुशी" का जहरीला फूल = Morina longifolia

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  7. I decided to write my comments at the conclusion but u forced me to write after reading of death of uncle and experience of dad and intimation of Bhole Shanker. No doubt death is natural n every one has to leave this world one day but there are only few lucky personalities n blessed souls who can observe n see predestined.Beautiful described visit.

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  8. I decided to write my comments at the conclusion but u forced me to write after reading of death of uncle and experience of dad and intimation of Bhole Shanker. No doubt death is natural n every one has to leave this world one day but there are only few lucky personalities n blessed souls who can observe n see predestined.Beautiful described visit.

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